‘अर्थात्’ की तीसरी गोष्ठी में खुले छायावाद के बंध
पीयूष तिवारी
24 फरवरी 2026
प्रसाद-निराला-महादेवी-पंत के चतुष्टय पर आधारित छायावाद की कविताओं, उसकी भाषा, प्रवृत्तियों, संवेदना और सहमतियों-असहमतियों पर संवाद के उद्देश्य से 22 फ़रवरी की बीती दुपहर ‘छायावाद : खुल गए छंद के बंध’ विषय पर ‘अर्थात्’ का आयोजन हुआ। पाँय-लागू की बेबसी और रीढ़ तोड़ दिए जाने के ख़तरों से दूर यह ‘अर्थात्’ की तीसरी कड़ी है—अर्थात्, मुँह पर हाथ रखने के दौर में बोलने की एक सुरक्षित जगह।
विश्वविद्यालयी औपचारिकताओं के अनुशासन से मुक्त इस साहित्यिक संगोष्ठी की सदारत आलोचक आशीष मिश्र ने की। इस दौरान कवि-आलोचक अविनाश मिश्र तथा नई पीढ़ी के कवि-गद्यकार अखिलेश सिंह की उपस्थिति युवाओं के लिए उत्साहवर्धक रही।
समूचा कार्यक्रम कविता-पाठ और पर्चा-पाठ के द्वय पर आधारित रहा। इस आलोक में पहले कविताओं की सूची दे देना ज़्यादा श्रेयस्कर होगा—
1. कामायनी (चिंता सर्ग)/ प्रसाद
2. कामायनी (श्रद्धा सर्ग)/ प्रसाद
3. सखी वसंत आया/ निराला
4. मैं नीर भरी/ महादेवी
5. प्रथम रश्मि/ पंत
6. प्रलय की छाया/ प्रसाद
7. बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ/ महादेवी
8. नहीं हलाहल शेष.../ महादेवी
9. किनारा भी हमसे/ निराला
10. जाग तुझको दूर जाना/ महादेवी
11. वह तोड़ती पत्थर/ निराला
12. मुसीबत में कटे हैं दिन/ निराला
आंचल, प्रिया, मानसी, अतुल, फ़ातिमा, प्रियांशु, अमन, पुष्पांजलि और डिंपल ने क्रमशः कविताओं का लयबद्ध पाठ किया। बीच-बीच में आशीष मिश्र और अखिलेश सिंह की महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ भी आती रहीं।
छायावाद पर किसी भी गंभीर और समग्र बहस की स्थापना हेतु उसकी पूर्वपीठिका का विस्तृत एवं विवेचनात्मक प्रतिपादन अनिवार्य हो जाता है। ऐतिहासिक, वैचारिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के समुचित विश्लेषण के बिना छायावाद की काव्य-दृष्टि, प्रवृत्तियों और अंतर्विरोधों का संतुलित आकलन संभव नहीं है। खड़ी बोली आंदोलन की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए मोहित ने ‘छंद रहितता को एक स्थिति और छंद मुक्ति को प्रक्रिया-सापेक्ष-घटना’ बताया। क्रमशः शैलेंद्र ने छायावाद के नामकरण पर अपनी बात रखी और छायावाद की भारतीयता के कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए। बीच-बीच में प्रश्न आते रहे मगर ‘दूर की कौड़ी’ और ‘पांडित्य प्रदर्शन’ जैसे हल्के जुमलों ने अनावश्यक तल्ख़ी भी पैदा की।
इस बीच आशीष मिश्र ने ‘सिर्फ़ अवधारणाओं पर बहस करने के बजाय कविताओं के हवाले से तर्कों को प्रमाणित करने का आग्रह किया।’ यह टिप्पणी वस्तुतः पूरी संगोष्ठी के लिए आलोचनात्मक अनुशासन का संकेत थी।
आगे बढ़ते हुए जितेंद्र ने नंद दुलारे वाजपेयी के हवाले से रहस्यवाद पर बात की और खड़ी बोली को ‘काव्य भाषा से काव्यात्मक भाषा’ बनाने में छायावाद के योगदान को अतिविशिष्ट बताया। अगले वक्ता के तौर पर दानिश ने छायावाद की जगह स्वच्छंदतावाद शब्द को ज़्यादा उपयुक्त ठहराने का प्रयास किया, मगर ठोस ऐतिहासिक या पाठ-सापेक्ष तर्कों का अभाव उनके वक्तव्य को निर्णायक न बना सका।
यहाँ से कार्यक्रम एक अलग दिशा की तरफ़ मुड़ता दिखाई देने लगा। टोक-परंपरा का अद्भुत नमूना यहाँ फिर प्रस्तुत हुआ। अनौपचारिक कार्यक्रमों पर भटकाव की तलवार हमेशा लटकती रहती है। यह अनायास ही नहीं कि कभी-कभी लगता है—हर कार्यक्रम एक अशोक वाजपेयी चाहता है।
प्रांजल ने आर्थिक-राजनीतिक संदर्भों से पुनः मूल विषय की ओर लौटने का प्रयास किया। हालाँकि, वक्तव्य के अंत तक आते-आते ‘प्रकृति’, ‘जागना’, ‘प्रिया’, ‘राष्ट्र’, ‘स्त्री-मुक्ति’ और ‘कल्पना’ जैसे शब्दों की आवृत्ति ने उनकी प्रस्तुति में एक क़िस्म की विचलन पैदा की। ‘प्रकृति का ईश्वरीयकरण’ जैसी बातों पर वह घिरते नज़र आये। इसी बिंदु पर संवाद का स्वर अधिक तीक्ष्ण और प्रश्नों के एक प्रभावशाली सिलसिले का उभार हुआ।
इसके उपरांत आदर्श ने दो आधार प्रश्नों से अपना वक्तव्य शुरू किया—‘राष्ट्रीय’ का अर्थ क्या है? और ‘जागरण’ किसका? खड़ी बोली और छायावाद के बीच के ‘ब्लेंड’ को स्पष्ट करते हुए उन्होंने छायावाद के नामकरण के औचित्य को सुगठित तर्कों के हवाले से प्रतिपादित किया। हालाँकि, ‘राम की शक्तिपूजा’ के संदर्भ में हनुमान के चरित्र को कविता से हटाए जाने पर भी कविता पर कोई विशेष अंतर न पड़ने का उनका सनसनीखेज़ दावा श्रोताओं के बीच एक असहज प्रश्न की तरह अटक गया और कहना न होगा कि माहौल में एक ज़रूरी ऊष्मा का संचार हुआ।
शिवानी अपना पर्चा पाठ ही रहस्यवाद से शुरू करती हैं और उसे सम्यक् रूप से समझने का आग्रह भी किया। आगे चलकर वह कुछ साहित्यिक भूल भी करती हैं जिसके लिए साहित्य समाज उन्हें क्षमा करे—मसलन, पलायनवाद को कविता के दुर्गुण के रूप में प्रस्तुत करना। जबकि T. S. Eliot के निबंध Tradition and the Individual Talent (‘परंपरा और वैयक्तिक प्रज्ञा’) के आलोक में देखा जाए तो ‘पलायन’ को ‘कवि के व्यक्तित्व से एक प्रकार की सर्जनात्मक दूरी के रूप में ग्रहण किया गया है’, जिसे उत्कृष्ट कविता की एक आवश्यक शर्त के रूप में भी समझा जा सकता है।
अब तक कार्यक्रम अपने अंतिम रूप में आ चुका था। युवाजन के चेहरों से जाता हुआ उत्साह और बार-बार आती हुई उबासियाँ इस बात का प्रमाण दे रही थीं।
इसी क्रम में दीपक जायसवाल ने एक बहुत महत्त्वपूर्ण टिप्पणी ‘छायावाद के मनोवैज्ञानिक धरातल’ पर की। तत्पश्चात् अविनाश मिश्र ने नामवर सिंह के रचनात्मक कार्यों का उल्लेख करते हुए ‘पलायन और अपराधबोध’ को अच्छी कविता का गुण घोषित किया। साथ ही, यह भी इंगित किया गया कि छायावादी प्रवृत्तियाँ आज भी विभिन्न रूपों में विद्यमान हैं—और उनका अनालोचित पुनरुत्थान समकालीन काव्य-संवेदना के लिए एक संभावित जोखिम के रूप में देखा जाना चाहिए।
अंत में आशीष मिश्र आए और उन्होंने जो बातें कहीं वे वैसी बातें हैं जो महत्त्वपूर्ण थीं और चर्चा में छूट गईं थी।
उनकी टिप्पणियों को संक्षेपतः निम्न रूप में विन्यस्त किया जा सकता है—
• छायावादी कवियों ने संस्कृतनिष्ठ भाषा में काव्य संभव किया।
• राष्ट्र की प्राणप्रतिष्ठा, उसकी आत्मा और उसके एस्थेटिक के खोज का श्रेय छायावाद को जाता है।
• रहस्यवाद स्त्रियों को फ़ैंटेसी रचने का मौक़ा देती है।
निराला की कविता ‘क्षय’ के पाठ के साथ उन्होंने अपनी बात ख़त्म की और यहाँ फिर से बहसों के लिए रिक्त स्थान छूट गया।
यह कार्यक्रम छायावाद की याद में नहीं बल्कि उसके पुनर्पाठ की कोशिश के रूप में आयोजित हुई थी। छायावाद को आधुनिक कविता का स्वर्णयुग मान लेने या प्रतिक्रियावादी कहकर खारिज कर देने के बीच जो आलोचनात्मक मध्य-भूमि है—उसकी तलाश ही इस संवाद का वास्तविक महत्त्व थी। फिर भी बहुत से महत्त्वपूर्ण पक्ष ऐसे थे जो छूट गए। छायावाद की प्रमुख उपलब्धियों में लोक-परंपरा से प्राप्त ‘लावनी’ और ‘आल्हा’ छंद का सर्जनात्मक आत्मसात् और उनका कलात्मक पुनर्संयोजन एक बेहद महत्त्वपूर्ण तथ्य है। लेकिन इनका ज़िक्र न होना चर्चा के तकनीकी आधार को कमज़ोर करने जैसा है। हालाँकि, बहसें समाप्त नहीं हुई हैं। वे केवल स्थगित हुईं—अगली कड़ी तक के लिए।
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‘अर्थात्’ की अन्य रपट यहाँ पढ़िए : ‘अर्थात्’ की शुरुआ | नई कविता और संवाद का दूसरा पड़ाव
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