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हबीब तनवीर : साधारण में असाधारण की खोज

नाट्य शास्त्र के पहले ही अध्याय में एक श्लोक है जो एक तरह से नाटक की परिभाषा है—

योऽयम स्वभावां लोकस्य सुखदुखसमन्वितः
सोंगभिनयोपेतो नाट्यमित्यभिधीयते।।

यह जो लोक (फ़ोक का अनुवाद नहीं, बल्कि समूचे संसार के अर्थ में) का सुख-दुख भरा स्वभाव है, वहीं जब नृत, संगीत, अभिनय आदि अन्य कलाओं के साथ मिलकर प्रस्तुत होता है—तब वह नाट्य कहलाता है।

भरत के द्वारा दी गई इस परिभाषा पर सोचते हुए जो नाट्य रूप आँखों के आगे उभरते हैं, उनमें हबीब तनवीर के नाट्य सर्वोपरि हैं। ऐसा इसलिए कि उनके नाट्य इस परिभाषा को संपूर्णता में अंगीकार करते हैं। परिभाषा का दूसरा भाग, जिसमें प्रस्तुति के नृत, संगीत, अभिनय से संयुक्त होने से नाट्य के बनने की बात कही है, वह तो बहुत-सी प्रस्तुतियों का हिस्सा होता है, किंतु परिभाषा का पहला हिस्सा है—‘लोक का सुख-दुख भरा स्वभाव’ यह अपने संपूर्ण आवेग और दु-धारपन (double edgedness) के साथ जैसे हबीब तनवीर के रंगकर्म का निचोड़ है। उनके नाटकों को देखने के बाद बतौर दर्शक मन की जो अवस्था हुआ करती थी, उसमें सुख-दुख के अहसास का पलड़ा बराबर का होता, जैसा कि अक्सर चार्ली चैपलिन की फ़िल्मों को देखने के बाद होता है—आप तयशुदा तौर पर कह नहीं सकते कि आपने ट्रैजेडी देखी है या कॉमेडी। यह जो जीवन को उसके ट्रैजिक-कॉमिक आयामों में एक साथ नद्ध करके देखना है, यह हबीब तनवीर के नाट्य रूपों की विशेषता है। आप लगभग उनके हर नाटक को इस कसौटी पर कस कर देख सकते हैं। ‘चरणदास चोर’ को ही लें—हबीब तनवीर की नाट्य प्रस्तुति में चरणदास मारा जाता है। अपने गुरु को दिए सत्य बोलने के वचन के ख़ातिर ही उसे जीवन से हाथ धोना पड़ता है। इस वचन के पहले चरणदास एक सामान्य चोर था; किंतु प्रण लेने के बाद वह सत्य का जैसे पालन करता है, यह उसे विलक्षण बना देता है—लाखों में एक। नाट्य प्रस्तुति में कोरस गा उठता है—

“एक चोर ने रंग जमाया, सच बोल के
दुनिया में नाम कमाया, सच बोल के…”

नाटक की कथा में वह चाहता तो आसानी से रानी से ब्याह कर देश का राजा बन सकता था। इसके लिए उसे सिर्फ़ सच बोलने का आग्रह छोड़ना था। सिर्फ़ एक वचन तोड़ना था। लेकिन वह ऐसा नहीं करता। वह अपने चौर्य-कर्म को जितनी संजीदगी से लेता है, उतना ही सत्य बोलने के वचन को भी लेता है। वह अपने जीवन की क़ीमत पर भी सत्य का दामन नहीं छोड़ता। इस तरह वह स्वेच्छा से अपने उसूल की ख़ातिर अपनी मृत्यु का वरण करता है। अपने से ऊपर किसी मूल्य को मानना—यही एक बात, चेतना संपन्न मनुष्य को दूसरे तमाम जीवों से अलग करती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी ने सच बोलने का साहस किया, वह मार दिया गया— सुकरात, गैलेलियो या गांधी। किंतु, सच यह भी है कि इन्हें कोई नहीं मार पाया। इनकी आवाज़ का सत्य, निष्कंप लौ की तरह आज तक दुनिया में रोशन है।

लेकिन ये तो फिर भी संभ्रांत, पढ़े-लिखे लोग थे। इस राजस्थानी लोककथा पर आधारित विजयदान देथा की कहानी—‘सच्चाई की बिसात’ और उस पर रचे गए हबीब जी के नाटक में तो एक अदना-सा, अनपढ़ चोर यह कारनामा कर दिखाता है। यह जो हर साधारण मनुष्य के भीतर असाधारण हो सकने की क्षमता है, इसी बात ने हबीब तनवीर की कल्पना को पकड़ा और उनसे यह अप्रतिम नाट्य रूप तैयार करवाया जिसने फिर सचमुच “दुनिया में नाम कमाया”!

‘चरणदास चोर’ नाटक की शुरुआत सतनामी समुदाय के लोगों द्वारा पंथी नृत्य से होती है। सतनामी सत्य को ही ईश्वर मानते हैं। पंथी नृत्य एक क़िस्म से सत का जाप है जो तेज़ शारीरिक गति संचालन के साथ किया जाता है। नाटक की शुरुआत में सत का यह जाप पूरे नाटक के लिए एक पार्श्व रच देता है। सत्य की दुशवार राह, इस पर चलने वाले का जो कठिन इम्तिहान होता है और अंत में वह किस तरह से अपनी जान देकर लोक स्मृति में अमर हो जाता है—नाटक में पिरोयी हुई कथा यही तो है। इसीलिए पंथी नृत्य से नाटक का आरंभ और अंत करना एक ज़बरदस्त नाट्य रूपक रचता है।

पूरा नाटक, ‘चूहा दौड़, बिल्ली आई’ के खेल की तर्ज़ में खेला जाता है—चोर आगे-आगे और पुलिस उसके पीछे-पीछे। ज़ाहिर है चूहा कहीं अधिक फ़ुर्तीला है बिल्ली से।
कोरस गाता है—“अरे अटकन मटकन दही के चटकन, खोलो भैया मोरे ढक्कन—का चीज है? बिलई ताके, मुसुआ बाड़ी में सटक गे!…”

मंच के मध्य में एक चबूतरा है और उसके पीछे एक पेड़ लगा है। मंच का खुला प्रारूप चोर-पुलिस के बीच हो रहे लुका-छिपी के भाग-दौड़ भरे खेल के लिए, तेज़ गति के पंथी नृत्य, कोरस के बार-बार उपस्थित हो मानीख़ेज़ गीत गाने के लिए बेहद उपयुक्त है। मंच का यह बिना ताम-झाम वाला, दृश्यबंध-विहीन स्वरूप, जिसमें कथा के घटित होने के विभिन्न स्थानों का आभास बहुत सादगी से खड़ा किया जाता है, बाद में हबीब तनवीर के लगभग सभी नाटकों की ख़ासियत बन गई।

यह नाटक लगातार बड़े तल्ख़ व्यंग भी करता चलता है—चोर साधु से कहता है, मैं इतनी भागदौड़ के बाद जो कमाता हूँ, उससे कई गुना आप मज़े से बैठे-बैठे कमाते हैं! चोर नाटक में कई अन्य अवसरों पर समाज में खुलेआम व्याप्त चोरी के कितने ही प्रकारों पर छींटाकशी भी करता है, जो हैं तो दरअस्ल चोरी, लेकिन की जाती है किसी दूसरे काम की आड़ में। चूँकि समाज के सभी लोग इस दुहरी वृत्ति में फँसे हैं, इसलिए कोई किसी को कुछ नहीं कहता। बल्कि समाज दुहरी बातों का इतना आदी है कि जब अपने सच बोलने के गुरु को दिए वचन के कारण, “तुम क्या करते हो?” के जवाब में चरणदास कहता है—“मैं चोर हूँ और चोरी करता हूँ!” तो कोई भी उसकी बात को नहीं मानता। इस तरह, सच बोल कर चोरी करना चरणदास के लिए ज़्यादा आसान और मुनाफ़े का मामला बन जाता है। नाटक के अंत तक पहुँचते-पहुँचते चरणदास के पास सब है और वह सरकारी ख़ज़ाने से सिर्फ़ पाँच मोहरों की चोरी, रानी/शासन का ध्यान अपनी चौर्य कला की ओर खींचने के लिए करता है।

नाटक में हबीब जी ने कई युक्तियों से चरणदास की अपने काम—‘चोरी’ में निपुणता को दिखाया है। एक समय हमारे समाज द्वारा चौर-कर्म को ‘कला’ का दर्ज़ा हासिल था, इसीलिए तो नाटक में गुरु जब चरणदास से चोरी छोड़ देने का वचन लेने को कहते हैं, तो वह कहता है—“यह तो मेरा धर्म है! इसे कैसे छोड़ सकता हूँ?”

इस नाटक में चोर की भूमिका में लालू राम (जिन्हें मैंने तो इसी नाटक पर श्याम बैनेगल द्वारा बनाई गई फ़िल्म में ही देखा) और बाद में नाट्य मंचन में मदन लाल, गोविंद राम निर्मलकर, दीपक तिवारी, चैतराम ने सिपाही और कभी मंत्री के बतौर स्वयं हबीब साहब ने और रानी के रूप में फ़िदा बाई और पूनम ने रंगमच को अपने अभिनय से यादगार पल दिए।

कोरस हबीब तनवीर के नाटकों का आधार स्तंभ है। वह उनके नाटकों की पहचान भी है। उनके नाटकों में कोई ख़ास किरदार निभा रहे अभिनेता अचानक अपने को उस किरदार से अलग कर, उससे पूरी तरह से असंपृक्त हो कोरस का हिस्सा बन जाते हैं और गाने लगते है। ब्रेख़्त की एलिएनेशन थ्योरी को हबीब तनवीर ने हमारे देश के पारंपरिक लोक रूपों में सहज ही विद्यमान पाया और अपनी इस खोज का बख़ूबी इस्तेमाल अपने नाटकों में किया। कभी यह कोरस नाटक के कथ्य का ख़ुलासा करता है, उसे गूढ़ अर्थ प्रदान करता है, कभी उसे आगे बढ़ा, गति प्रदान करता है। कभी लोगों की आवाज़ बन हस्तक्षेप करता है, तो कभी सूत्रधार की भूमिका निभाते हुए पात्रों की मनःस्थिति आदि का साझा दर्शकों के साथ करता है।

भारतीय रंगमंच को अपने जिस निजी मुहावरे की तलाश थी, वह पहले-पहल इसी नाट्य मंचन में मुकम्मल हुआ था। यह मुहावरा समकालीन भी था और सर्वकालिक भी, ठेठ देशज भी था और आधुनिक भी। इसमें एक ओर पल-पल पर इम्प्रोवायज़ेशन से उपजी ताज़गी थी तो दूसरी ओर, पंथी नर्तक दल के सत् नाम उच्चार से शाश्वत मूल्य गुंजायमान था।

विजयदान देथा कहानी के अंत में हबीब तनवीर द्वारा किए गए फ़ेरबदल से नाख़ुश थे। उनकी कहानी के अंत में रानी चोर को मरवाकर गुरु से विवाह कर लेती है और इस तरह दुनिया में झूठ-फ़रेब और सत्ता का दमन चक्र चलता रहता है।

हबीब जी के नाट्य रूप में चरणदास लोक की आस्था का संबल बन जाता है। लोग उसके चबूतरे/समाधि पर सत् नाम का जाप करते हैं, दिया लगाते हैं। इस लोककथा और उससे जुड़े लोक-मानस को समझने के ये दो बिल्कुल जुदा तरीक़ें हैं।

इतिहास में कितनी ही निरंकुश सत्ताएँ आईं लेकिन अंततः उन्होंने लोगों के स्वप्न और आंतरिक शक्ति के आगे घुटने टेके हैं। यह चरणदास या किसी व्यक्ति का मूर्तिपूजन नहीं है, बल्कि सत्य और साधारण जन की असाधारण शक्ति में आस्था का नाट्य है। हबीब तनवीर के लिए रानी सिर्फ़ सत्ता ही नहीं एक स्त्री भी है। चरणदास को मरवाना, शासक होने के नाते उसकी मजबूरी है। किंतु, वे उसके प्रेम को सिरे से ख़ारिज नहीं करते। ऐसा नहीं है कि वह चरणदास की जगह उसके लोभी गुरु से विवाह कर लेगी। वह चाहे सत्ता पर क़ाबिज़ मनुष्य हो, अथवा उससे दमित, होता तो वह मनुष्य ही है।

इस मनुष्य की ‘मनुष्यता’ पर से हबीब तनवीर की आस्था कभी नहीं उठी। तब भी नहीं, जब उनके नाटकों पर हमले हुए। विदिशा में हुए एक ऐसे ही हमले के बाद उन्होंने हतप्रभ होकर कहा था, “मैं यह मान ही नहीं सकता कि आप सब मेरे इस नाटक के विरोध में हैं। आप चंद लोगों के बहकावे में आकर, उनके डर से मेरे नाटक से उठकर जा रहे हैं।”

हबीब तनवीर की नाट्य शैली को वर्गीकृत करने, उसे—‘लोक’, ‘पारंपरिक’, ‘जन’, ‘आधुनिक’ आदि किसी एक ख़ास खाँचे में बिठाने की कोशिश हमें उनके नाटकों को समझने से दूर ले जाती है, क्योंकि उनके यहाँ किसी शैली का निषेध नहीं है। यदि है, तो सतहीपन, नक़लीपन और किसी भी तरह के दिखावटी साज-सज्जा का निषेध है। उन्हें युवावस्था में ही दुनिया भर के थिएटर देखने का मौक़ा मिला। वह उससे प्रभावित भी हुए लेकिन उसे ख़ुद पर हावी नहीं होने दिया।

उन्होंने मुझसे हुई एक बातचीत में कहा था—“मैं जानता था कि पराई संस्कृति में मैं अपनी अभिव्यक्ति नहीं पा सकूँगा। मुझे यह बात साफ़ थी कि एक भिन्न भाषा, संस्कृति, एक भिन्न दर्शक समूह के बीच मैं काम नहीं कर सकता। मैं महसूस करता था कि यदि मैं वहाँ रुक गया, तो कल्चरली आई विल बी लॉस्ट।

मैंने यह भी पाया कि शेक्सपियर को देखने का जो लुत्फ़ इंग्लैंड में आया वह और कहीं नहीं। रूसी ज़ुबान में चेखव को देखने मैं जो मज़ा आया वह और किसी ज़ुबान में नहीं आया। यही हाल ब्रेख्त का था, चुनांचे मैं इस नतीजे पर पहुँचा—ग़लत या सही कि अपनी ज़मीन की बू-बास अलग होती है और तभी नाटक में आकर्षण पैदा होता है। लिहाज़ा मैं यह चेतना लेकर लौटा था कि जाकर सीधे अपने लोगों से जुडूँगा। आई मस्ट कांटेक्ट पीपल ऑफ़ माय सॉइल।”

युवावस्था में ही इस बात को समझ पाना कठिन बात थी, लेकिन हबीब तनवीर तब तक इपटा मुंबई के साथ वर्षों काम कर चुके थे और इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह कि 1954 में विदेश जाने के पहले, वह जामिया के छात्रों- अध्यापकों के साथ शाइर नज़ीर पर अपना लिखा मौलिक नाटक—‘आगरा बाज़ार’ कर चुके थे। आगरा बाज़ार नाटक की भूमिका पढ़कर समझ में आता है कि स्वतंत्र रूप से अपने किए गए इस पहले ही नाटक में हबीब जी को कालांतर में विकसित हुई रंग शैली का कुछ पूर्वाभास मिल गया था। उन्होंने इस मंचन में जामिया के टीचर और छात्रों के अलावा ओखला गाँव के असल धोबी, पान वाले, दर्जी आदि को लिया था! संगीत और कोरस का इस्तेमाल भी यहाँ मौजूद था।

आगरा बाज़ार को उन्होंने बाद में फिर से उठाया और उनके अन्य नाटकों की तरह इसमें भी लगभग हर मंचन के साथ फेर-बदल होते रहे। इसकी स्क्रिप्ट में यूँ कथा-तत्त्व जैसा कुछ नहीं था, लेकिन उस दौर के आगरे का माहौल ऐसा ज़बरदस्त खड़ा होता है कि जीवन के तमाम रंग—ग़रीबी-अमीरी, उत्सव-मातम, मायूसी-ख़ुशी अक्षरशः दर्शकों के सामने से हो गुज़रते हैं।

परस्पर विपरीत ध्रुवों के प्रति हबीब तनवीर का आकर्षण हर प्रोडक्शन में दिखता है। उनके नाटकों के चयन में, चाहे वह विश्व साहित्य से हो या संस्कृत या लोक कथाओं से, उनमें एक रुझान ग़ौर किए जाने योग्य है। नृतत्वशास्त्री लेवी स्ट्रॉस की तरह हबीब तनवीर अपना ध्यान इन तमाम नाटकों या कथाओं की मूल संरचना पर केंद्रित रखते हैं। वह इन सभी में पहले उन तत्त्वों की तलाश करते हैं जो सार्वभौम और सार्वकालिक हैं, जैसे—ग़रीबी-अमीरी या शहरी-गँवई का भेद, युद्ध और शांति के बीच सतत चलती रस्सा-कशी जो हर काल और पृथ्वी के हर कोने में मौजूद रही है। इसके साथ-साथ नाटक में उपस्थित काल के समकालीन सरोकारों पर पैनी दृष्टि-समाज में उस समय, उस जगह क्या रस्मो रिवाज़ थे? क्या दास प्रथा थी? क्या हिंसा का बोलबाला था? कलाकारों, गणिकाओं की क्या स्थिति थी? समाज के मूल्य क्या थे? आदि। मसलन, आगरा बाज़ार को ही लें— छोटी-छोटी बातों पर लड़-मरते ककड़ी-तरबूज-लड्डू वाले उस समय की ज़बरदस्त मंदी, ख़स्ताहाली को बयाँ करते हैं। छापाख़ानों के आने से लोगों की साहित्यिक रुचि में क्या बदलाव आए, वह भी दर्ज़ होता है। एक मदारी द्वारा बंदरिया के खेल से आगरा के पूरे इतिहास पर रोशनी पड़ती है। पढ़े-लिखे शाइरों का ख़ुद को लोगों से ऊपर आँकना, उन्हें जाहिल समझना समाज से साहित्य के कटे होने और इसके विपरीत नज़ीर का रोज़मर्रा जीवन से जुड़े होने को पेश करता है। बलदेव जी के मेले में दो समुदायों के बीच मनमुटाव और फिर उसका आपसी विवेक से सुलझ जाना, समाज की आपसी समझ और सहिष्णुता को लक्षित करते हैं।

स्थापत्य में एक शब्द इस्तेमाल होता है—‘नॉन बिल्डिंग’ यानी ऐसी इमारत, जो होते हुए भी अदृश्य-सी रहती है। उसी की तर्ज़ पर कहा जा सकता है कि ‘आगरा बाज़ार’ का नायक-नज़ीर एक ‘अदृश्य’ नायक है। वह पूरे नाटक में बतौर किरदार अनुपस्थित है और फिर भी नाटक के हर दृश्य में मौजूद है। उसकी शायरी का यूँ फ़क़ीरों, तवायफ़ों, पतंग-बाज़ों, हिजड़ों, ककड़ी, तरबूज़, लड्डू बेचने वालों की ज़ुबाँ पर चढ़ा होना और हाँ, नकचढ़े शाइर जो शाइरी को सामान्य जन के बूते से बाहर का फ़न मानते हैं, उनके बीच, उसके नाम का ग़ाली की तरह इस्तेमाल होना भी इस अदृश्य किरदार को दर्शकों के मन में गढ़ता है।

साहित्य का यह गुणधर्म ही है कि उसे पढ़ते हुए हर पाठक के मन में उसके किरदारों की अपनी अलग छवि बनेगी। लेकिन फ़िल्म या नाट्य में तो प्रायः किरदार सशरीर होता है। हबीब तनवीर ने आगरा बाज़ार नाटक में साहित्यिक युक्ति का इस्तेमाल कर, जिसमें नायक ख़ुद उपस्थित नहीं होता लेकिन उसका ज़िक्र दूसरे तमाम पात्रों के मुँह से बार-बार सुनने मिलता है, इस जन के शायर नज़ीर की छवि को अगणित चेहरे दे दिए।

इस नाटक को जितनी बार भी देखा, उसमें चंद लोगों के मंच पर खड़े होते ही समूचे आगरे के बाज़ार के अपने पूरी रौनक़ के साथ मिनिटों में जीवंत हो उठने ने हमेशा चकित किया है। शोर-शराबे से भरे बाज़ार के बीच बार-बार फ़क़ीर नज़ीर की किसी नज़्म के साथ आते हैं और अब तक हल्के-फ़ुल्के नज़र आ रहे दृश्यों को अचानक अर्थ के अलग धरातल पर ला पहुँचाते हैं। “सब ठाठ धरा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा…” या “अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियाँ!” या “ये दुःख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़लिसी…” और अंत में ‘आदमीनामा’ तो एक ऐसा काव्य मोन्ताज़ है, जिसमें आदमी नामक शह का हर चेहरा फ़िल्म की एक रील में जैसे दर्ज़ हो गया है।

इस नाट्य मंचन में होली, दिवाली, जन्म, मेला, पतंगबाज़ी, तैराकी, किताबों की दुनिया सब मौजूद है। इन्हें जिस तरह से हबीब तनवीर ने मंच पर प्रस्तुत किया उससे न सिर्फ़ यह जन शायर बल्कि भारतीय संस्कृति की समूची रंगारंग छटा अपने पूरे वैविध्य के साथ खड़ी हो जाती है।

लेकिन यह सब देखने में जितना आसान जान पड़ता है, साधने में उतना ही दुरूह था। ‘चरणदास चोर’ के बाद के सफलताओं के दौर पर बात करते हुए हबीब तनवीर कहते हैं—“यह सब एक दिन में नहीं हुआ। बहुत लंबा समय लगा पकड़ बनाने में। 1958–1976 तक असफ़ल प्रयोग ही होते रहे—तो यह एक लंबी कथा है।”

कला में जो चीज़ जितनी अनायास हुई जान पड़ती है, वह अक्सर बहुत सोच-विचार और जतन के बाद निकलती है। अलबत्ता उसका यूँ अनायास हुआ लगना ही उसकी सबसे बड़ी सफलता है। सत्यजीत राय की फ़िल्म—‘अपूर संसार’ का वह सुबह का दृश्य जिसमें नायक उठने पर पत्नी की हेयर क्लिप अपनी क़मीज़ में अटकी हुई पाता है और मुस्कुरा कर आँखें बंद कर लेता है, ऐसा ही एक दृश्य है। कई लोगों ने राय से पूछा था कि क्या यह दृश्य एक्सिडेंटल था? राय ने एक साक्षात्कार में बताया कि फ़िल्म का यह छोटा-सा, अनायास घटित हुआ-सा क्षण कितने सोच-विचार और रेखांकनों का नतीजा था।

हालाँकि, कामयाब युक्ति तो वही है जो युक्ति-सी न लगे। हबीब तनवीर के सारे नाटकों में, शेक्सपीयर लिखित ‘मिड समर नाइट ड्रीम्स’ का उनके द्वारा किया गया रूपांतर—‘कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना’ सबसे कौतुकी, सबसे प्लेफ़ुल नाटक है। इसे देख कर यही लगता है कि यह जैसे अनायास, खेल-खेल में खड़ा हो गया हो। भरत ने नाट्य शास्त्र में लिखा है (१.११) कि “नाट्य का उद्भव ही ‘क्रीड़ा’ के रूप में हुआ।”

यह नाटक दरअस्ल लिखा भी बड़े क्रीड़ाभाव से गया है। इसमें नाटक के भीतर एक नाटक खेला जा रहा है। इसके अलावा इसमें परियों के राजा-रानी और उनके सेवकों का भी समावेश है। इंगलिश थिएटर कंपनी ने हबीब तनवीर को प्रस्ताव दिया था कि वह शेक्सपियर का कोई नाटक उनकी रैपर्ट्री और नया थिएटर के साथ मिलकर निर्देशित करें। हबीब जी ने इस नाटक का चुनाव किया, जिसकी बुनावट में ही दो विषम तबके और उनके बीच ग़ैर बराबर संबंधों की प्रामाणिक बानगी मौजूद थी। यह प्रोजेक्ट अन्यान्य कारणों से नहीं हो पाया। लेकिन, बाद में हबीब जी ने इसे नया थिएटर के ही शहरी और ग्रामीण कलाकारों के साथ किया। इस नाटक में तीन कथासूत्र हैं जिनके आपस में गुँथने से इसका ढाँचा खड़ा होता है। दो कथाएँ तो यथार्थ समाज से हैं—ड्यूक थिस्यूस और राजकुमारी हिप्पोलिटा के विवाह का अवसर है और इस मौक़े पर गाँव के निर्धन, अनपढ़ मज़दूर एक नाटक प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं। तीसरी कथा का संबंध परियों के राजा, ओबरॉन और रानी टायिटेनिया के बीच हुई खट-पट को लेकर है। इस कथासूत्र से, जिसमें रानी के एक प्रिय सेवक को अपने लिए प्राप्त न कर पाने से ख़फ़ा राजा, अपने सेवक पक से रानी की आँखों में ऐसा रस डलवा देता है, जिसके प्रभाव से वह सुबह आँख खुलने पर दिखने वाले पहले आदमी के प्रेम में पड़ जाती है। यह आदमी और कोई नहीं नाटक की रिहर्सल कर रहा मज़दूर बॉटम है जिसके सिर को पक ने जादू से गधे के सिर में बदल दिया है। इस सुखांत और मनोविनोद से भरी ‘अयथार्थ’ परिकथा के माध्यम से सच पूछो तो उस समय के ब्रिटिश समाज में स्त्रियों की कुछ उपहासजनक स्थिति और अभिजात्य वर्ग द्वारा जनसामान्य को ‘गधा’ समझने की वृत्ति का कैसा यथार्थ चित्रण खड़ा होता है।

इस संबंध में लोक नाट्य शैलियों में यथार्थवादी चित्रण के अभाव को लेकर पूछे गए मेरे प्रश्न के जवाब में हबीब जी की उक्ति याद आती है। वह कहते हैं—“ यथार्थ हम किसे कहेंगे? जीवन को लेकर जो तमाम बारीकियाँ हैं, सच्चाइयाँ—वे ही तो हमारा यथार्थ हैं, और वे बख़ूबी हमारी लोक शैलियों में चित्रित की जाती हैं। हाँ, जो देखा, उसका हू-बहू वैसा ही चित्रण करने को हमारे यहाँ तरजीह नहीं दी गई क्योंकि उसमें कल्पना के लिए कोई जगह नहीं बनती। न ही बात के कई स्तर पैदा होते हैं।”

इस नाटक की शुरुआत और अंत में हबीब जी ने बस्तर के ‘बाँसा’ वादन का प्रयोग किया है। बाँस से बने इस वाद्य से जब हवा गुज़रती है तो जंगल में पेड़ों के सरसराने की सी ध्वनि होती है। इस वाद्य के प्रयोग से यह नाटक जंगल या कहें प्रकृति का एक जादुई दुशाला ओढ़ लेता है। मज़दूरों के द्वारा किया गया एक दुखांत प्रेम नाटक अपनी सादगी और दो-टूकपन से हँसाते-हँसाते आपको रुला डालता है। किसी तरह की कलात्मक अभिव्यक्ति से कोसों दूर ये मज़दूर गले में कार्डबोर्ड पर बनी ईंटों की दीवार के चित्र को दिखा कहता है कि मैं दीवार हूँ और फिर उँगलियों से एक फाँक बना कहता है, “और मैं इस दीवाल में की दरार हूँ!”

पिरेमस और थिसबी की यह प्रेमकथा अपनी मासूमियत में ख़ुद अपने पर ही हँसती है और हमें कहीं गहरे में उदास कर जाती है।

हबीब तनवीर के नाटकों की एक सिग्नेचर शैली है ज़रूर, किंतु उनके निर्देशित हर नाटक का नाट्य रूप अपने में ख़ास है।

उन्होंने यह कहा भी है कि—“नाटक के कथ्य में ही नाटक का रूप छिपा होता है। इसके लिए बाहर भाग-दौड़ करने से कुछ नहीं होगा, भीतर डुबकी लगाने से ही बात बनती है।” (उनके नाटकों की पुस्तक की भूमिका में)  उन्होंने एकाधिक बार आगरा बाज़ार, मिट्टी की गाड़ी और चरणदास को अपनी रंग यात्रा में मील का पत्थर बताया है। ये वो प्रोडक्शन हैं जिनकी माँग लगातार बनी रही। हबीब जी की इन प्रस्तुतियों के बासी न पड़ने के पीछे उनका लगातार उन्हें माँजते रहना, उनमें फ़ेरबदल करते रहना भी है। इन नाटकों में कई बार अभिनेता बदले और उसके व्यक्तित्व के अनुरूप भी नाटक में बदलाव हुए। इमप्रोवाईज़ेशन की जो अनूठी प्रविधि उन्होंने एक रंग कार्यशाला के अंतर्गत तैयार हुए नाटक—‘गाँव के नाम ससुराल, मोर नाम दामाद’ के दौरान निकाली, उसमें बदलाव के लिए वैसे भी बहुत गुंजाइश रहती है।

मेरी उनकी देखी सबसे पहली प्रस्तुति ‘मिट्टी की गाड़ी’ थी जो शायद ‘उत्सव-77’ के अंतर्गत भोपाल के रवींद्र भवन के मुक्ताकाश मंच पर हुई थी। मैं तब दस बरस की थी, और तब मुझे इसके महत्त्व का इलहाम नहीं हो सकता था। प्रस्तुति ने मुझे और तमाम दर्शकों को बेहद लुभाया था। वसंतसेना का अपने गहनों से चारुदत्त के बच्चे की मिट्टी की गाड़ी को भर देना और दीवार में सेंध लगाते चोर-शर्वलक का चित्र आज तक मेरी आँखों के आगे है। सबसे चकित करने वाली बात मेरे लिए यह थी कि मंच पर कोई दीवार नहीं थी और न चारूदत्त का घर लेकिन मैंने फिर भी चोर को दीवार में बाक़ायदा एक बड़ा-सा गोल छेद बनाते, उससे फिर चारूदत्त के घर में घुसते और चोरी करते यक़ीनन देखा था—यह तो हम बच्चों के खेल-सा था कुछ-कुछ।

इस नाटक को मैंने बाद में तीन-चार बार देखा और तब तक मैं संस्कृत नाटकों की कई अन्य प्रस्तुतियाँ भी देख चुकी थी। इसलिए यह समझ में आया कि कैसे हबीब तनवीर ने मिट्टी की गाड़ी के प्रस्तुतीकरण में जीवंत लोक नाट्य परम्पराओं के दृश्यबंध विहीन स्वरूप से नाता जोड़ कर दरअस्ल संस्कृत नाटकों के प्रस्तुतीकरण में अद्भुत ‘सेंध’ लगा दी थी।

इसी नाटक को करने के दौरान उन्हें यह समझ में आया—“संस्कृत नाटकों में कभी कोई दृश्य बंध न होता होगा और वातावरण की सृष्टि काव्य-शक्ति से की जाती होगी।” (हबीब तनवीर—‘दृश्यांकन की समस्या’,1965 नटरंग, वर्ष 1, अंक 1)

यह हिंदी रंगमंच के लिए तीन कारणों से ऐतिहासिक महत्त्व का पल था :

एक, इस नाट्य मंचन ने विद्वानों द्वारा संस्कृत नाटकों और लोक नाट्य शैलियों के बीच दर्शाई गई कृत्रिम खाई को पाटने का काम किया।

दो, इससे भरत के नाट्य शास्त्र में निदर्शित रंग प्राविधियों पर पड़े तालों को खोलने की चाबी भी मुहैया हुई। यह खुलासा हुआ कि नाट्य शास्त्र में वर्णित रस सिद्धांत और उसके निरूपण तक पहुँचने के लिए रास्ते सिर्फ़ प्राचीन और लगभग विलुप्त हो गई नाट्य परंपराओं मसलन कुडियट्टम के मार्फ़त ही नहीं जाएगा। हमें नए रास्ते तलाशने होंगे। ये रास्ते हमारी लोक परंपराओं के भीतर से खोजे जा सकते हैं, जिनकी रस धारा अभी भी प्राणवान बनी हुई है। वे लोक शैलियाँ जो अभी भी समाज के बीच अपनी जीवंत भूमिका अदा कर रही हैं।

तीन, क्या हमारे रंगमंच की कोई अपनी मौलिक, भारतीय आधुनिकता हो सकती है? यानी पश्चिम से आयातित आधुनिक मुहावरे के बरक्स क्या हम कोई अपना आधुनिक मुहावरा ईजाद कर सकते हैं? इस प्रश्न का जवाब खोजने की कोशिश भी इस प्रस्तुति से शुरू हुई।

इस नाटक में चारूदत्त और वसंतसेना के प्रेमकथा के अतिरिक्त जो अन्य कथाएँ गुँथी हुई थीं, उन्हें हबीब जी ने कुछ ऐसे बरता कि वे प्रासंगिक हो आज के समय और स्थितियों से जुड़ गईं। इन उप-कथाओं से उस समय की न्याय प्रक्रिया, राज परिवार का व्याभिचार, कुशासन, समाज का राजा के ख़िलाफ़ विद्रोह और उसकी जगह एक निचले तबके के विवेकवान आदमी को राजा के रूप में चुनना, उस समय के समाज के बारे में बहुत कुछ बताता है। हबीब जी की इस प्रस्तुति में एक ऐसा मुहावरा निर्मित हुआ कि उसमें पहली शती ईसवी में शूद्रक द्वारा लिखा नाटक उस काल विशेष में संदर्भित होते हुए भी हमारे आज के वर्तमान समय में प्रासंगिक हो गया।

स्टीफ़न ज्वाईग की कहानी, ‘माय ब्रदर्स अनडाइंग आईज़’ सालों तक हबीब तनवीर के ज़ेहन में अटकी रही थी। इस कहानी का मिजाज़ बेहद संजीदा और आस्तित्विक प्रश्नों को केंद्र में रखे हुए है। क्या मनुष्य जीवन कर्म और उसके परिणामों से मुक्त हो सकता है? भगवत् गीता में उठाए गए इन प्रश्नों को सम्मिलित करते हुए ज़्वाईग ने यह कहानी लिखी थी। इसी का नाट्य रूपांतर हबीब तनवीर ने ‘देख रहे हैं नैन’ नाम से किया। यह कथा मानव की मुक्ति के सर्वथा भिन्न दो पहलुओं का अन्वेषण करती है। एक ओर, हर मनुष्य के आगे अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने, मुक्ति ख़ुद खोजने की अनिवार्यता होती है, तो उसी के साथ नाटक के उत्तरार्ध में कथानक में से यह तथ्य उभर कर आता है कि सबकी मुक्ति के बिना, किसी एक की मुक्ति संभव नहीं है। अपने आस्तित्विक सरोकार में यह कथा वैश्विक है। लेकिन बुनी गई कथा में आए ग़ुलामों के प्रति व्यवहार, अपराध करने पर सज़ा के प्रावधान, न्याय प्रणाली आदि एक ख़ास देश-काल को रचते हैं। यह नाटक व्यक्ति और समाज, कर्म और अकर्म, मुक्ति और बंधन के विरोधी युग्मों के बीच से अपनी नाव खेते विराट नामक चरित्र के आत्म संघर्ष की कथा है।

इस नाटक में समाज के ‘भीड़’ या ‘मॉब’ में बदलने की प्रक्रिया का दर्ज किया जाना, क़ाबिले ग़ौर है। वे लोग जो कथा नायक विराट के सेनापति के रूप में लड़ाई जीतकर आने पर या न्यायाधीश के रूप में फैसले सुनाने पर या वन में कड़ी तपस्या करने पर उसके नाम के जयकारे गाते हैं, वही लोग अंत में उसके द्वारा समस्त सत्ता के पद छोड़कर, कुत्तों की सेवा जैसा ओछा समझा जाने वाला काम चुनने के लिए उसकी थू-थू करते हैं और फिर उसे पूरी तरह भुलाकर, गुमनामी की गर्त में धकेल देते हैं।

इस नाट्य प्रस्तुति में हबीब जी ने बस्तर के रेमावण्ड इलाक़े के गेड़ी नृत्य का समायोजन किया था। गेड़ी या बांस पर चढ़कर किए जाने वाले नृत्य में संतुलन बनाए रखना कठिन होता है। गेड़ी नृत्य का इस नाटक में प्रयोग कितना प्रतीकात्मक बन जाता है। इस संसार रूपी भवसागर में क्या सही है, क्या ग़लत, इसका चुनाव कहानी के नायक विराट को लगातार गेड़ी पर चलने-सा असंतुलित करता रहता है। कर्म को त्यागने के उसके निर्णय के भयानक परिणाम, एक बिलखती माँ का उसको आरोपी ठहराना विराट के हृदय पर गेड़ी की धमक की तरह बजता रहता है।

इस नाटक में दासों की बिक्री, उनका वस्तु की तरह मोल-भाव किया जाने वाला दृश्य हिला देता है। जहाँ कुछ लोग जीवन भर सिर्फ़ ग़ुलाम बन कर रहते हों, वहाँ न्याय की बात कितनी वाजिब होगी?

इसी तरह नाटक में विराट का पीछा करती उसके मृत भाई की घूरती हुई, कातर आँखें दिखाने के लिए हबीब जी ने बहुत कारगर नाट्य युक्ति इस्तेमाल की थी। वे तमाम अलग-अलग किरदार जिनमें विराट को अपने भाई की आँखें दिखती हैं, एक ही अभिनेता-चेतराम द्वारा किए गए। विराट की भूमिका में दीपक तिवारी ने अंतर्द्वंद के भंवर में फँसी मनस्थिति का निर्वाह कमाल का किया। विराट के हाथों ग़लती से मारे गए भाई की घूरती आँखों वाले चेहरे की भूमिका में अभिनेता—चेतराम का निर्विकार चेहरा, जो केवल आँखों से बोलता है, भुलाया नहीं जा सकता।

हबीब जी की तमाम दूसरी प्रस्तुतियों की तरह यहाँ भी दर्शकों को कोई जवाब थाली में परोस कर नहीं दिया जाता। रूसी लेखक चेखव, अलेक्सी सुवोरीन को लिखे एक पत्र में लिखते हैं—“कलाकार का काम केवल जीवन को हूबहू दर्ज करना है। उसे अपने किरदार या उनके द्वारा कही गई बातों को सही-ग़लत ठहराना नहीं है। उसे तो केवल एक निष्पक्ष साक्षी भर होना चाहिए।”

हबीब तनवीर अपने नाटकों में यही करते हैं। नाटक में आए विषय को कई कोणों से देखने और दिखाने की कोशिश भर करते हैं।

हबीब जी ने छत्तीसगढ़ के लोक मानस में एक कलारी चलाने वाली स्त्री और राजा के बीच प्रेम को लेकर बसी  लोक गाथा को आधार बनाकर एक नाटक लिखा गया—नाटक बहादुर कलारिन। कथा में राजा और कलारिन के प्रेम से उपजा बेटा अपनी माँ द्वारा अकेले ही पाला पोसा जाता है। उसके बड़े होने पर कलारिन बेटे का ब्याह कराती है, किंतु वह संतुष्ट नहीं होता। वह एक नहीं, 126 बार उसका ब्याह कराती है, लेकिन बेटे को कोई स्त्री नहीं रुचती। अंत में बेटा कहता है कि जो बात उसे माँ के स्पर्श में महसूस होती है वह किसी अन्य स्त्री में नहीं होती। कलारिन को तब जाकर समझ में आता है कि मामला क्या है। उस रात वह बेटे को अपने हाथों से खिला-पिला कर कुएँ में धकेल, ख़ुद भी आत्महत्या कर लेती है।

ईडीपस कॉमप्लेक्स की इस लोक में दर्ज और स्वीकृत कथा ने हबीब तनवीर की इस मान्यता को पुष्ट किया कि गाँव की और शहरी समझ जैसी कोई अलग कोटियाँ नहीं होतीं। जीवन की तमाम जटिलताओं का हर समाज को सामना करना होता है। लोक समाज द्वारा बहादुर कलारिन की इस कथा को याद रखना, बल्कि छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित उसके गाँव में उसके कुएँ को सहेज, उसे स्मारक में बदल देने ने उन्हें चौंकाया। यह एक जीवित समाज की निशानी है कि वह अपनी रुग्णता को छिपाने के बजाय, उसके वजूद को स्वीकारें। सिगमंड फ़्रायड के इलेक्ट्रा और ओडिपस कॉमप्लेक़्स के सिद्धांत बाद में आए, लेकिन पूरी दुनिया के तमाम समाजों में उसके उदाहरण तो पहले से मौजूद थे—मिथकों में इलेक्ट्रा और ओडीपस तो कब के दर्ज़ हो चुके थे। देखने के बात यह है कि विभिन्न समाजों ने इन परिघटनाओं का निर्वाह कैसे किया?

अत्यंत जटिल मानवीय स्थितियों—एक राजा का एक साधारण कलारिन से प्रेम हो जाना, उस कलारिन का लंबा अकेला संघर्षमय जीवन, अकेलेपन में अपना समूचा लाड प्यार बेटे पर ही न्योछावर करना और अंत में अपने उस एक मात्र आलंबन को अपने ही हाथों ख़त्म कर देने की विकराल विवशता। बहादुर कलारिन के किरदार को उसकी समूची जटिलता के साथ प्रस्तुत करने के लिए बड़ी अभिनय प्रतिभा दरकार थी। फ़िदाबाई ने इस किरदार को ऐसे निभाया था, कि उनके नया थिएटर से चले जाने के बाद हबीब जी इस नाटक को माँग होने के बावजूद, किसी अन्य अभिनेत्री के साथ तैयार नहीं कर पाए। बेटे को धकेलने के बाद कुएँ की जगत पर खड़ी, आर्तनाद करती फ़िदाबाई की वह छवि, आदम-कद से कहीं ऊँची बनकर स्मृति में अटकी रह गई है। इस नाटक पर बात करते हुए हबीब जी भावुक हो उठे थे और बोले—“दुनिया भर की पाँच श्रेष्ठ अभिनेत्रियों की मेरी सूची में फ़िदाबाई का नाम शुमार होगा।”

इस नाटक में बेटे के 126 ब्याह दिखाने के लिए हबीब साहब ने एक द्रुतगति के विवाह नृत्य-गीत का इस्तेमाल किया था। उस गीत के साथ दूल्हा-दुल्हन फ़ेरे लेते जाते हैं और हर फ़ेरे में लड़की बदलती जाती है। कुछ मिनटों में और कुछ ही दुल्हनों के बदलने से 126 ब्याह का एहसास दर्शकों के सम्मुख खड़ा हो जाता था। ऐसा नाट्य रूप एक ही दिन में खड़ा नहीं होता, भले ही सामने हबीब तनवीर जैसी प्रतिभा क्यों न हो।

हबीब जी ने बताया था कि इस युक्ति से इस नाट्यरूप को खड़ा करने का विचार उन्हें दर्शक दीर्घा से इसके एक मंचन को देखने के दौरान ही आया था। जैसे एक खिलाड़ी अपना खोया हुआ फ़ॉर्म मैदान पर, किसी कड़े प्रतिद्वंदी के साथ खेलते हुए ही पाता है, वैसे ही हबीब तनवीर के शब्दों में—“नाटक दरअस्ल रिहर्सल से भी अधिक दर्शकों के आगे मंचन के दौरान आकार लेता है।” इसीलिए वह एक नाटक के वर्षों तक किए जाने के प्रबल हिमायती थे।

हबीब तनवीर की रंगयात्रा का पटल बेहद विस्तृत और वैविध्यपूर्ण है। देसी, विदेशी, लोक, शास्त्रीय, मौलिक इन सभी कोटियों में उनका भरपूर काम है। बावजूद इसके, उनका रुझान सामाजिक, आर्थिक, मानसिक और कुछ अन्य तरह की विसंगतियों को समेटे हुए लेखन पर अधिक रहा है। अमितेश कुमार ने अपनी पुस्तक में यह वाजिब प्रश्न उठाया है कि उन्होंने कालिदास की रचनाओं को क्यों कर नहीं छुआ? इसी सिलसिले में अमितेश लिखते हैं—“क्या कालिदास के नाटक में उन्हें राजनीतिक कथ्य नहीं दिखाई दिया? या उन्हें आशंका थी कि कालिदास का लालित्य उनके अभिनेता नहीं सँभाल सकेंगे?”

संगीता गुंदेचा द्वारा लिए गए एक साक्षात्कार में ‘शकुंतला’ नाटक के बारे में बोलते हुए वह एक हद तक उपरोक्त प्रश्न का जवाब देते हैं, “मैं उसे सबसे कठिन नाटक मानता हूँ क्योंकि उसके अंदर एक ऐसी नाज़ुक कविता है कि उसे करते मुझे डर लगता है।”

उनका यह कथन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अपनी सीमाओं को जानना और उसका स्वीकार बड़ी बात है।

कुछ नाटक होते हैं जो हर समय, हर समाज में प्रासंगिक होते हैं। मोलीयर का नाटक ‘बुर्जुआ जेंटलमैन’ ऐसा ही एक नाटक है। हमारे जैसे बेहद स्तरीकृत समाज में जहाँ साँप-सीढ़ी का खेल चलता ही रहता है, वहाँ तो यह नाटक हर दिन, पहले से अधिक सटीक होता जाता है। हबीब जी द्वारा किए गए रूपांतरण में लाला शोहरत राय एक नवधनाढ्य छत्तीसगढ़ी बनिया है। अमीरी के साथ ज़ाहिर है उसके मन में समाज के ऊपरी तबके में शामिल हो जाने की चाह जन्म लेती है। वह तमाम तरह के ट्यूटर रखता है जो उसे अभिजात्य वर्ग की तरह बोलना, उठना-बैठना, पहनना-ओढ़ना, खाना-पीना, गाना-बजाना सिखाते हैं। नाटक में एक जगह साहित्य का ट्यूटर उसे गद्य और पद्य का फ़र्क़ बताता है, तब शोहरत राय बेसाख़्ता बोल उठता है, “तो क्या मैं इतने सालों से गद्य बोल रहा था।”

अपने मन और रुचि के उलट दूसरों को दिखाने के ख़ातिर अपनाई गई जीवन शैली को जीता हुआ मनुष्य कितना हास्यास्पद और भौंडा होता है, इसे मंच पर लाला शोहरत राय का किरदार निभा रहे गोविंदराम निर्मलकर के अभिनय में साक्षात् देखा जा सकता था। लंबी औपनिवेशिक ग़ुलामी सह चुके हमारे देश में तो यह प्रवृत्ति दिन ब दिन और ज़ोर पकड़ती जा रही है। इस नाटक में छत्तीसगढ़ी और हिंदी-अँग्रेज़ी के इस्तेमाल से सत्ताधारी वर्ग और सामान्य जन के बीच, देश में जो अपाट्य खाई है उसका बहुत ही यथार्थ चित्र उभरता है। हबीब तनवीर की यह नाट्य प्रस्तुति एक साथ अपने देश के लालची-नकलची, आत्महीनता से ग्रस्त स्वभाव और औपनिवेशिक प्रवृत्तियों पर तीखा व्यंगात्मक प्रहार करती है। ‘कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना’ की प्रस्तुति भी शासक वर्ग के साथ-साथ उन्हें ख़ुश करने पर आमादा जनता, दोनों का ही व्यंग विद्रूप खड़ा करती है।

दूसरे पर व्यंगोक्ति के साथ-साथ, ख़ुद अपना उपहास कर पाने की क्षमता मुझे छत्तीसगढ़ की लोक नाट्य परंपराओं, विशेषकर ‘नाचा’ की बड़ी ख़ूबी लगती है। इसके चलते इन अभिनेताओं की अदायगी में एक धार है जो अन्यत्र मुश्किल से देखने मिलती है। एक लिहाज़ से यह छत्तीसगढ़ी भाषा में सन्निहित ख़ूबी है। हबीब तनवीर ने न केवल इस भाषा और इसके पारंपरिक नाट्य रूपों की इस ख़ूबी को पहचाना बल्कि उसका ज़बरदस्त परिष्कार भी किया।

यह कितनी विचित्र किंतु सत्य बात है कि अक्सर जो चीज़ हमारे लिए सबसे महत्त्व की होती है, उसे हम दुनिया भर में ढूँढ़ते फिरते हैं और तब एक दिन ख़ुलासा होता है कि वह तो हमारे बिल्कुल आस-पास, घर में ही मौजूद थी। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि उस चीज़ या नाचीज़ की अहमियत का पता, दुनिया भर में भटकने के बाद ही चलता है। हबीब तनवीर पूरी दुनिया घूम कर लौटते हैं तो अपने लिए सबसे बेहतरीन अभिनेता, ज़ुबान और नाट्य शैली अपने ही अंचल, अपनी ही मिट्टी में पाते हैं।

1973 में वह एक रंग कार्यशाला करते हैं, जिसमें नाचा के अंतर्गत किए जाने वाले तीन छोटे-छोटे प्रसंगो को मिला कर चालीस से भी अधिक अभिनेताओं के साथ एक प्रस्तुति तैयार करते हैं। इस प्रस्तुति से जादू की मानिंद हबीब तनवीर का अपना बेहद विशिष्ट मुहावरा, रंग पद्धति/प्रविधि भी जन्म लेती है।

इस कार्यशाला में अभिनेताओं को हबीब जी ने पहले से संवाद देने के बजाय सिर्फ़ वस्तु स्थिति समझाई जिसके तहत उन्हें ख़ुद संवाद गढ़ने थे। इमप्रोवाईज़ेशन की इस विधि से ही एक नाटक तैयार हुआ—‘गाँव के नाँव ससुराल, मोर नाँव दामाद’। उसी वर्कशॉप में ‘चरणदास चोर’ की कथा के साथ भी यह प्रयोग किया गया। यहाँ तक कि उसे बेहद कच्चे रूप में ही लोगों के आगे प्रस्तुत भी किया गया, ताकि दर्शकों का प्रतिक्रिया मिले। लोगों ने उसे भी ख़ूब सराहा। तो यह थी हबीब तनवीर और भारतीय रंगमंच को एक अद्यतन आधुनिक मुहावरा मिलने की कहानी।

अपने काम के संदर्भ में हबीब जी ने बार-बार कहा, “लोग इसे जो भी नाम देते हों, पर मैं दरअस्ल समकालीन और आधुनिक रंगमंच ही कर रहा था, आज भी वही कर रहा हूँ। हमारे समय के जो महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं, उन्हीं को मैंने अपने नाटकों में उठाया हालाँकि उन लोगों के साथ जो ज़मीन से जुड़े हुए हैं, जिनमें बेबाक़ी है, खुलापन है। इन दो चीज़ों के जोड़ से एक नया मुहावरा पैदा हुआ—आज इसे सफल रंगयात्रा कहेंगे लेकिन यह बहुत-सी प्रारंभिक असफलताओं के बाद हाथ लगी सफलता है।”

उपरोक्त बात सौ टंच सही है कि हबीब तनवीर के नाटकों में लोक कलाकारों, बोलियों, प्रदर्शनकारी शैलियों का समावेश था लेकिन उनकी प्रस्तुतियों की फ़ितरत, उनका दर्शकों पर कुल असर इससे कई गुना बड़ा होता था। हबीब तनवीर के बाद बहुत से निर्देशकों ने लोक रूपकारों, शैलियों का इस्तेमाल करते हुए नाट्य प्रस्तुतियाँ तैयार कीं, लेकिन वैसा प्रभाव रतन थियम, प्रसन्ना जैसे गिनती के दो-चार लोग ही पैदा कर पाए हैं।

हबीब तनवीर की नाट्य प्रस्तुतियों में लोक का ऐसा सफल समावेश संभव हो पाने के तीन मुख्य कारण नज़र आते हैं : पहला, वह इन लोक शैलियों, के इनसाईडर बने। उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर, रात-रात जागकर नाचा, गम्मत, पंडवानी आदि देखे, इन कलाकारों के जीवन को क़रीब से देखा, समझा, उनकी भाषा, तीज-त्योहार को देखा, उसमें शामिल हुए। यानी उस शैली को एक तरह से उसकी संपूर्णता में आत्मसात् किया।

दूसरा, हबीब तनवीर ने अपने नाटकों में कभी लोकरूपों या शैलियों का अलंकारिक, सौंदर्यात्मक या नैतिक दिखावे के लिए इस्तेमाल नहीं किया। मसलन, ‘चरणदास चोर’ में सतनामी पंथी नृत्य का इस्तेमाल। नाटक के सत्य की शक्ति पर आधारित कथ्य के साथ सतनामियों के ईश्वर को सत्य मानने से मेल खाता है, इसीलिए इस नाट्य प्रस्तुति को पूरकता प्रदान करता माहौल रचता है। इसी नाटक में चरवाहों द्वारा किए जाने वाले राउत नृत्य की मस्ती के बीच साहूकार की दुकान ख़ाली कर देने का प्रयोग भी गाँव की पृष्ठभूमि में कितना मौज़ू बैठता है।

तीसरा, उन्होंने इन लोक कलाकारों को संकुचित करने की कोशिश नहीं की। उन पर कृत्रिम भाषा, ज़रूरत से ज़्यादा भारी भरखम कथ्य नहीं लादा।

चौथा, हबीब जी ने उनकी आस्था, रीति-रिवाज़ के प्रति सम्मान का भाव रखा। यह एक बहुत जटिल बात है, लेकिन हबीब जी ने इसका निर्वाह किया। अपनी व्यक्तिगत आस्था से इतर, उन्होंने लोक की आस्था को तरजीह दी। मृत्यु के बाद ‘चरणदास चोर’ या ‘बहादुर कलारिन’ के लोक नायक या पुरखे के रूप में पूजे जाने को उन्होंने लेखक विजयदान देथा की नाराज़गी मोल लेते हुए भी अपने मंचन में शामिल इसीलिए किया था क्योंकि यह उनकी व्यक्तिगत आस्था का नहीं, लोक की आस्था का प्रश्न था।

लोक में आस्था रखे बग़ैर नाट्य खेला ही नहीं जा सकता क्योंकि नाट्य तो अपना प्रमाण ही लोक से पाता है।

‘जिस लाहौर नई देख्या वो जन्म्याइ नई’ का कथ्य अलग था और वह अपने साथ नाट्य रूप भी अलग लेकर आया। इसमें यथार्थवादी शैली दरकरार थी और हबीब जी ने यहाँ प्रकाश, ध्वनि और प्रॉप्स के बेहद संयमित इस्तेमाल से जो वातावरण खड़ा किया वह क़ाबिले ग़ौर था। चाय की दुकान, मस्जिद और वह घर जिसे नाटक की नायिका—हिंदू बुढ़िया छोड़ने को राज़ी नहीं होती, वे इतनी ख़ूबी के साथ मंच पर अवतरित हुए कि असल से भी असल का दर्शकों को अहसास हुआ। दिलचस्प बात यह कि नाटक के लेखक असग़र वज़ाहत इस सफल और लाजवाब प्रस्तुति से काफ़ी नाख़ुश रहे। उन्हें हबीब जी का नाटक के अंत को बदल देना, उसमें बुढ़िया और मौलवी के जनाज़े का मंच पर एक साथ उठना और फिर दंगे की आहटों के बीच, ‘ज़ुल्म जब बढ़ता है तो मिट जाता है...’ गीत से समाप्त करना नहीं जँचा था।

यहाँ भी देखिए हबीब तनवीर की आस्था उस लोक में है, जिसके बीच वे पले, बढ़े और अपने नाट्य मंचन किए।  अपने शुरुआती नाटक, ‘आगरा बाज़ार’ जिसका जामिया के कुछ लोगों ने विरोध किया था (इस नाटक की भूमिका में यह बात दर्ज है) से लेकर अपनी अंतिम प्रस्तुति—‘राजरक्त तक’, वह जो कुछ भी समाज में राजनीति और धर्म के अंतर्गत हो रहा था, उसे दिखाने से न तो पल भर के लिए भी डरे और न ही समाज को हिस्सों में बाँट कर देखने का आसान रास्ता चुनने के लिए राज़ी हुए।

हबीब तनवीर हमारे देश की उन चंद प्रतिभाओं में से हैं जिन्होंने अपनी बुनियाद पर खड़े होकर, खाँटी देशज आधुनिकता और भारतीय रंगमंच की स्वायत्त पहचान खोजने की राह प्रशस्त की है। वह अंतिम दिनों तक नाट्य कर्म करते रहे तो इसलिए कि उनके मन में अपने लोगों और कलाकर्म के प्रति सच्चा दर्द और आस्था थी।   भारतीय ही नहीं, रंगमंच मात्र को उनका अवदान और असर इतना बड़ा है कि उसकी थाह लेने में (अमितेश कुमार की उनके अवदान पर हाल ही में आई किताब—‘वैकल्पिक विन्यास’ इस संदर्भ में बहुत शोध के बाद लिखी गई महत्त्वपूर्ण पुस्तक है) हबीब अभी कई और बरस लगेंगे।

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