Font by Mehr Nastaliq Web
Swami Vivekananda's Photo'

स्वामी विवेकानन्द

1863 - 1902 | कोलकाता, पश्चिम बंगाल

आध्यात्मिक गुरु, विचारक और समाज सुधारक। पश्चिम में वेदांत और योग के प्रसार में योगदान।

आध्यात्मिक गुरु, विचारक और समाज सुधारक। पश्चिम में वेदांत और योग के प्रसार में योगदान।

स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

5
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

पाखंडी लोग कितनी आसानी से इस जगत् को धोखे में डाल देते हैं। सभ्यता के प्राथमिक विकास-काल से लेकर भोली-भाली मानव-जाति पर, जाने कितना छल-कपट किया जा चुका है।

हमारी आँखें सामने हैं, पीछे नहीं। सामने बढ़ते रहो और जिसे तुम अपना धर्म कहकर गौरव का अनुभव करते हो, उसे कार्यरूप में परिणत करो।

जो किसी चीज़ की इच्छा रखता हो और प्रकृति के साथ विलीन हो, उसके लिए प्रकृति के अनेक परिवर्तन, सौंदर्य और उदात्तता का एक अनुपम दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

हर उस चीज़ से सावधान रहो, जो तुम्हारी स्वतंत्रता छीन लेती है। जानो कि वह ख़तरनाक है और हर संभव तरीक़े से उससे बचो।

जो लोग तमस से भरे हुए हैं, अज्ञानी और सुस्त हैं, जिनका मन कभी किसी विचार पर स्थिर नहीं होता, जो केवल मनोरंजन की लालसा रखते हैं—उनके लिए धर्म और दर्शन मात्र मनोरंजन की वस्तुएँ हैं। ये लोग दृढ़ निश्चयी नहीं होते। वे कोई बात सुनते हैं, उसे बहुत अच्छा समझते हैं, फिर घर जाकर सब कुछ भूल जाते हैं। सफल होने के लिए आपको अदम्य दृढ़ता और दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

कार्य, कारण का व्यक्त रूप है।

हम ईश्वर को देख नहीं सकते। यदि हम ईश्वर को देखने का प्रयत्न करते हैं, तो हम ईश्वर की एक विकृत और भयानक आकृति बना डालते हैं।

योगी जानते हैं कि संसार के सभी भोग पुरुष और मन के संयोग द्वारा होते हैं।

पवित्रता ही आध्यात्मिक सत्य है। “पवित्र हृदयवाले धन्य हैं, क्योंकि वे ईश्वर का दर्शन करेंगे।” इस एक वाक्य में सब धर्मों का निचोड़ है। यदि तुम इतना ही सीख लो, तो भूतकाल में जो कुछ इस विषय में कहा गया है और भविष्यकाल में जो कुछ कहा जा सकता है, उस सबका ज्ञान तुम प्राप्त कर लोगे। तुम्हें और किसी ओर दृष्टिपात करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि तुम्हें उस एक वाक्य से ही सभी आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति हो चुकी। यदि संसार के सभी धर्म-शास्त्र नष्ट हो जाएँ, तो अकेले इस वाक्य से ही संसार का उद्धार हो सकता है।

यह जगत् आशावादी है, निराशावादी—वह दोनों का मिश्रण है और अंत में हम देखेंगे कि सभी दोष प्रकृति के कंधों से हटाकर, हमारे अपने ऊपर रख दिया जाता है।

सब जीवों में ब्रह्मदर्शन ही मनुष्य का आदर्श है।

इस संसार में बिना प्रतिरोध, बिना हिंसा और बिना इच्छा के कोई रह ही नहीं सकता। अभी संसार उस अवस्था में नहीं पहुँचा कि ये आदर्श, समाज में प्राप्त किए जा सकें।

हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे मनुष्य को इसी तरह, अर्थात् ईश्वर समझकर सोचे और उससे उसी तरह अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से बर्ताव करे; उसे घृणा करे, उसे कलंकित करे और उसकी निंदा ही करे। किसी भी तरह से उसे हानि पहुँचाने की चेष्टा भी करे। यह केवल संन्यासी का ही नहीं, वरन् सभी नर-नारियों का कर्त्तव्य है।

योगी को चाहिए कि वे तन-मन-वचन से किसी के विरुद्ध हिंसाचरण करें। दया मनुष्य-जाति में ही आबद्ध रहे, वरन् उसके परे भी वह जाए और सारे संसार का आलिंगन कर ले।

साधारणतः लोग कहते हैं कि वेदांत, दर्शन और धर्म, इस जगत् और उसके सारे सुखों एवं संघर्षों को छोड़कर इसके बाहर जाने का उपदेश देते हैं। पर यह धारणा एकदम ग़लत है। केवल ऐसे अज्ञानी व्यक्ति ही; जो प्राच्य चिंतन के विषय में कुछ नहीं जानते और जिसमें उसकी यथार्थ शिक्षा समझने योग्य बुद्धि ही नहीं है, इस प्रकार की बातें कहते हैं।

वीरता से आगे बढ़ो। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे।

स्वर्ग-नरक तथा आकाश के परे, राज करने वाले शासकों से संबद्ध अनेक कथाओं अथवा अंधविश्वासों के द्वारा मनुष्य को भुलावे में डालकर, उसे आत्मसमर्पण के लक्ष्य की ओर अग्रसर किया जाता है। इन सब अंधविश्वासों से दूर रहकर, तत्वज्ञानी वासना के त्याग द्वारा जान-बूझकर इस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है।

स्वयं अच्छे बनो और जो कष्ट पा रहे हैं, उनके प्रति दया-संपन्न होओ। जोड़-गाँठ करने की चेष्टा मत करो, उससे भवरोग दूर नहीं होगा। वास्तव में हमें जगत् के अतीत जाना पड़ेगा।

बुद्धि की उन्नति करने में तो हमें पुस्तकों से बहुत सहायता प्राप्त होती है, पर आत्मा की उन्नति करने में पुस्तकों की सहायता प्राय: नहीं के बराबर ही रहती है।

ऐसा कोई भी सिद्धांत नैतिक नियमों की व्याख्या नहीं कर सकता, जो मनुष्य को सामाजिक स्तर तक ही सीमित रखना चाहता हो।

मानव-हृदय पर संगीत का इतना प्रबल पड़ता है कि यह क्षण-भर में चित्त की एकाग्रता ला देता है।

जहाँ कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शांति पाता हूँ, वहाँ मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है।

जब मनुष्य ईश्वर को देखता है, तो वह उसे मनुष्य रूप में देखता है। इसी प्रकार अन्य प्राणी भी ईश्वर को अपनी-अपनी कल्पना, अपने-अपने रूप के अनुसार देखते हैं।

सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक कल्याण की एक ही नींव है, और वह यह जानना कि ‘मैं और मेरा भाई एक हैं।’ यह सब देशों और सब जातियों के लिए सत्य है।

योगी को अधिक विलास और कठोरता—दोनों ही त्याग देने चाहिए।

संख्या-शक्ति, धन, पांडित्य, वाक्चातुर्य—कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुद्ध जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी।

यह जीवन आता और जाता है—नाम, यश, भोग, यह सब थोड़े दिन के हैं। संसारी कीड़े की तरह मरने से अच्छा है, कहीं अधिक अच्छा है—कर्तव्य क्षेत्र में सत्य का उपदेश देते हुए मरना। आगे बढ़ो।

मनुष्य का सर्वोपरि उद्देश्य, सर्वश्रेष्ठ पराक्रम धर्म ही है और यह सब से आसान है।

स्मृति और पुराण; सीमित बुद्धिवाले व्यक्तियों की रचनाएँ हैं और भ्रम, त्रुटि, प्रमाद, भेद तथा द्वेष भाव से परिपूर्ण हैं। उनके केवल कुछ अंश जिनमें आत्मा की व्यापकता और प्रेम की भावना विद्यमान है—ग्रहण करने योग्य हैं, शेष सबका त्याग कर देना चाहिए। उपनिषद् और गीता सच्चे शास्त्र हैं और राम, कृष्ण, बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर आदि सच्चे अवतार हैं, क्योंकि उनके हृदय आकाश के समान विशाल थे और इन सबमें श्रेष्ठ हैं रामकृष्ण। रामानुज, शंकर इत्यादि संकीर्ण हृदय वाले, केवल पंडित मालूम होते हैं।

कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरुष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते—यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते।

भारतवर्ष में जितने वेदमतानुयायी दर्शनशास्त्र हैं, उन सबका एक ही लक्ष्य है और वह है—पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना। इसका उपाय है योग। 'योग' शब्द बहुभावव्यापी है। सांख्य और वेदांत उभय मत, किसी किसी प्रकार से योग का समर्थन करते हैं।

विचार ही हमारी कार्य-प्रवृत्ति का नियामक है। मन को सर्वोच्च विचारों से भर लो; दिन पर दिन यही सब भाव सुनते रहो, मास पर मास इसी का चिंतन करो।

जगत् के सभी महान् पैग़ंबरों का प्राण पर अत्यंत अद्भुत संयम था, जिसके बल से वे प्रबल इच्छाशक्तिसम्पन्न हो गए थे।

जो तुमको दुर्बल बनाता है, वह समूल त्याज्य है।

मेरा मूलमंत्र है—व्यक्तित्व का विकास। शिक्षा के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को उपयुक्त बनाने के सिवाए मेरी और कोई उच्चाकाँक्षा नहीं है।

वीर और अभय बनो, मार्ग साफ़ हो जाएगा।

यही रहस्य है। योगप्रवर्तक पतंजलि कहते हैं, ''जब मनुष्य समस्त अलौकिक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्ममेघ नामक समाधि प्राप्त होती है।''

सभी धर्म मेरे लिए पवित्र हैं।

जब मनुष्य इस संसार में किसी स्त्री से प्रेम करता है; तब कभी-कभी उसे प्रतीत होता है कि उस स्त्री के बिना वह जी नहीं सकता, यद्यपि उसकी यह भावना मिथ्या है।

स्वभाव से ही मनुष्य का मन बाहर की ओर प्रवृत्त होता है, मानो वह इंद्रियों के द्वारा शरीर के बाहर झाँकना चाहता हो।

चाहे स्वदेश हो या विदेश, इस मूर्ख संसार की प्रत्येक आवश्यकता पूरी करने की अपेक्षा; तथा निम्नतम स्तर का असार जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा, मैं सहस्त्र बार मरना अधिक अच्छा समझता हूँ।

विचारशील मनुष्य-जाति का भावी धर्म अद्वैत ही होगा, इसमें संदेह नहीं।

बीस वर्ष की अवस्था में मैं अत्यंत असहिष्णु और कट्टर था। कलकत्ते में सड़कों के जिस किनारे पर थिएटर हैं, मैं उस ओर के पैदल-मार्ग से ही नहीं चलता था। अब तैंतीस वर्ष की उम्र में मैं वेश्याओं के साथ एक ही मकान में ठहर सकता हूँ और उनसे तिरस्कार का एक शब्द कहने का विचार भी मेरे मन में नहीं आएगा। क्या यह अधोगति है? अथवा मेरा हृदय विस्तृत होता हुआ मुझे उस विश्वव्यापी प्रेम की ओर ले जा रहा है, जो साक्षात् भगवान है?

संसार में अधिकांश दुष्कर्म, व्यक्तिगत आसाक्ति के कारण ही किए गए हैं।

यदि कोई नैष्कर्म्य एवं निर्गुणत्व को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अपने मन में किसी प्रकार का जाति-भेद रखना हानिकर है।

हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है।

हिंदू मस्तिष्क का झुकाव; सदा निगमनीय अथवा साधारण सत्य के सहारे विशेष सत्य तक पहुँचने की ओर रहा है, कि आगमनिक अथवा विशेष सत्य के सहारे साधारण सत्य की ओर।

यम और नियम चरित्र-निर्माण के साधन हैं। इनको नींव बनाए बिना किसी तरह की योगसाधना सिद्ध होगी। यम और नियम में दृढ़प्रतिष्ठ हो जाने पर योगी अपनी साधना का फल अनुभव करना आरंभ कर देते हैं।

स्वर्ग तथा मर्त्य लोक में सर्वत्र, केवल पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ तथा दिव्यतम शक्ति है।

कोई मनुष्य, कोई जाति, दूसरों से घृणा करते हुए जी ही नहीं सकती।

Recitation