राजनीति

परज्या कौ रक्षा करै सोई स्वामि अनूप।

तर सब कौं छहियाँ करै, सहै आप सिर धूप॥

जान कवि

जानि लेहू कवि जान कहि, सो राजत संपूर।

जामै ह्वै ये तीन गुन न्याई दाता सूर॥

जान कवि

परजा जानहु मूल तुम्ह, राजा ब्रिच्छ बिचार।

अपनी जरहिं उषारिहै, परजा षोवनहार॥

जान कवि

सुजन सुखी दुरजन डरैं, करैं न्याय धन संच।

प्रजा पलै पख ना करैं, श्रेष्ठ नृपति गुन पंच॥

बुधजन

नृप चालै ताही चलन, प्रजा चलै वा चाल।

जा पथ जा गजराज तहँ, जात जूथ गजवाल॥

बुधजन

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