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परिपक्वता पर उद्धरण

'वार्धक्य' परिपक्वता का दूसरा नाम है।

दुर्गा भागवत

माधुर्य, अनुभवों की परिपूर्णता और अलिप्तता से छोटे-बड़े व्यवहार समझने लायक समभाव होने का नाम ही बुढ़ापा है।

दुर्गा भागवत

कुछ लोग वृद्धावस्था को गिरना मानते हैं, लेकिन मैं वैसा नहीं मानता। वृद्धावस्था पका हुआ फल है।

महात्मा गांधी

ज्यों-ज्यों सही ज्ञान बढ़ेगा त्यों-त्यों हम समझते जाएँगे कि हमें पसंद आने वाला धर्म दूसरा आदमी पालता हो, तो भी उससे बैरभाव रखना हमारे लिए ठीक नहीं, हम उस पर ज़बरदस्ती करें।

महात्मा गांधी

ज्यों-ज्यों मनुष्य उम्र में बढ़ता है; जिज्ञासा पर केवल आग्रहों और दुराग्रहों के पुंज लदते-चलते हैं, वरन् स्वयं जिज्ञासा भी (शतधा) होती चलती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

प्रौढ़ता कल्पनामुक्त दर्शन से ही उपलब्ध होती है।

ओशो

प्रौढ़ता का उम्र से कोई संबंध नहीं।

ओशो

जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ी, मुझ पर कामू (एल्बर्ट कामू) के ‘द मिथ ऑफ़ सिसीफ़स’ के एक प्रेरणादायक उद्धरण का प्रभाव पड़ने लगा- ‘बंधनों में जकड़े हुए जीवन से दो-दो हाथ करने के लिए इतना बंधनमुक्त हो जाओ कि अपना पूरा अस्तित्व ही विद्रोही साबित हो जाए’।

अमोल पालेकर

भक्ति रस का पूर्ण परिपाक जैसा तुलसीदास जी में देखा जाता है, वैसा अन्यत्र नहीं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल