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सिनेमा पर उद्धरण

सिनेमा ऐसा कला-रूप है

जहाँ साहित्य, संगीत, अभिनय, नृत्य जैसे कलासिक कला-रूपों के साथ ही फ़ोटोग्राफी, एनीमेशन, डिजिटल एडिटिंग, ग्राफ़िक्स जैसे अन्य आधुनिक कला-रूप प्रतिबिंबित होते हैं। आधुनिक समाज और सिनेमा का अनन्य संबंध देखा जाता है, जहाँ दोनों एक-दूसरे की प्रवृत्तियों का अनुकरण करते नज़र आते हैं। इस चयन में सिनेमा विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।

सिनेमा मेरे लिए कोई 'art form' नहीं है, ये मेरे लोगों की सेवा करने का एक ज़रिया मात्र है। मैं कोई समाजशास्त्री नहीं हूँ और इसलिए ऐसे भ्रम नहीं पालता कि मेरा सिनेमा लोगों को बदल सकता है। कोई एक फ़िल्ममेकर लोगों को नहीं बदल सकता है। लोग बहुत विशाल हैं और वे अपने आप को ख़ुद बदल रहे हैं। में चीज़ें नहीं बदल रहा हूँ, जो भी बड़े बदलाव हो रहे हैं, मैं सिर्फ़ उन्हें दस्तावेज़ कर रहा हूँ।

ऋत्विक घटक

चेख़व की तरह मुझे भी मनुष्य के भविष्य पर आस्था है। मेरी कला मनुष्य को निराश नहीं कर सकती। रवींद्रनाथ ठाकुर का यह संदेश में कभी नहीं भूल सकूंगा कि 'मानुषेर विश्वास हरण पाप।'

ऋत्विक घटक

रचनात्मक दृष्टि से डाक्युमेंटरी एक प्रवृत्ति का नाम है। सत्य यथार्थ में निहित होता है, और कैमरा भौतिक यथार्थ के सभी पक्षों को पकड़ने में विशेष सक्षम होता है। यह कलाकार का कर्तव्य है कि वह यथार्थ को अंकित कर, कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करे।

ऋत्विक घटक

भक्ति, वीरता और सैक्स की मिली-जुली मानसिकता; फ़िल्मी हीरो को नेता, उद्धारक और पथ-प्रदर्शक बना देती है।

हरिशंकर परसाई

मानव मात्र की ज्ञान राशि का एक (अदृश्य) वृत्त बनता है, जो धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। आइंस्टीन जैसी कुछ ऐसी प्रतिभाएँ होती हैं, जो इस वृत के आकार में गुणात्मक परिवर्तन ला सकती हैं। सही माने में उस फ़िल्म को ही प्रयोगात्मक कह सकता हूँ, जो ज्ञानराशि के वृत में ऐसा ही परिवर्तन ला सके।

ऋत्विक घटक

मेरे लिए सिनेमा और कुछ नहीं, सिर्फ़ एक अभिव्यक्ति है। ये मेरे लिए अपने लोगों के कष्टों और दु:खों को लेकर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करने का माध्यम है। कल को सिनेमा के अलावा भी इंसान की बुद्धि शायद कुछ ऐसा बना ले; जो सिनेमा से भी ज़्यादा मज़बूती, बल और तात्कालिकता से लोगों की ख़ुशियों, दु:खों, आकाँक्षाओं, सपनों, आदर्शों को अभिव्यक्त कर सके—तब वो ही आदर्श माध्यम बन जाएगा।

ऋत्विक घटक

अपने नाम के मूल्य मुताबिक़, हर आर्ट को इंसान की बेहतरी के लिए काम करना ही चाहिए। मैं किसी कठोर थ्योरी में यक़ीन नहीं करता हूँ, लेकिन ठीक उसी समय मैं इन तथाकथित 'महान' फ़िल्ममेकर्स को लेकर हैरान हूँ, जो मूल रूप से कुछ नहीं बस नौसिखिए हैं और मानवीय रिश्तों के आर्ट का शोर मचाते रहते हैं। अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी से बचने का ये बहुत चतुर तरीक़ा है। असल में जो भी काम ये करते हैं, वो सिर्फ़ उनकी अपनी सत्ता को फ़ायदा पहुँचाने के लिए होता है। ये लोग इतने पक्षपाती हैं, जितना कि कोई हो सकता है, लेकिन अपक्षपाती होने का मास्क पहनते हैं। मैं ऐसे आदर्शों से घृणा करता हूँ।

ऋत्विक घटक

अच्छे सिनेमा को ज़िंदगी से अलग नहीं किया जा सकता। इसे लोगों की आकाँक्षाओं और घबराहटों का प्रतिनिधित्व करना ही होता है। इसे समय से साथ क़दम बढ़ाने होते हैं, इसकी जड़ें लोगों में होनी होती हैं। मेरे हिसाब से बंबई के सिनेमा की कोई जड़ें नहीं हैं।

ऋत्विक घटक

ढेर सारी पत्रिकाएँ मेरा नाम कुछ विख्यात निर्देशकों के साथ रखकर देखती हैं। मैंने इन निर्देशकों की जितनी भी फ़िल्में देखी हैं, उसे देखकर मुझे लगता है कि यह सिर्फ़ ग़लत है, बल्कि उन पर और मुझ पर—दोनों पर ज़्यादती है। वे एक स्पष्ट दृष्टिकोण से फ़िल्म बनाते हैं। जैसा कि मैं भी करता हूँ, लेकिन एक बिल्कुल दूसरे दृष्टिकोण से। यहाँ सवाल मूल्य-निर्णय का नहीं है, बल्कि भिन्नता का है।

ऋत्विक घटक

फ़िल्मकार की तपस्या ही यह होनी चाहिए कि वह किस प्रकार अलग-अलग तत्त्वों का मेल करवाए कि देखने वालों तक उनका संयुक्त प्रभाव पहुँच सके।

ऋत्विक घटक

इस पर हमेशा बहस की जाती है कि एक आर्टिस्ट को क्या सिर्फ प्रॉब्लम सामने रखनी चाहिए या उसके समाधान की ओर भी इशारा करना चाहिए। मुझे लगता है कि ये चीज़ों की तरफ़ बहुत बचकाने ढंग से देखने का तरीक़ा है। अगर आर्टिस्ट को समाधान सामने रखने की ज़रूरत महसूस होती है, तो उसका स्वागत है। लेकिन अक्सर वह समस्या बताता है और मामले को वहीं छोड़ देता है। ये दोनों ही ट्रीटमेंट समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। हम किसी एक पर आशावादी और दूसरे पर निराशावादी का लेबल नहीं लगा सकते हैं। केंद्रीय बिंदु यह है कि जो भी फ़िल्म की विषय-वस्तु और रचनाकार के दिमाग़ में से सहज रूप से विकसित होता है, वो पूरी तरह स्वीकार्य है। लेकिन जो भी उभरे, वो स्वतः होना चाहिए। सवाल यह है कि क्या वो आर्टिस्ट जीवन और इंसानों को लेकर पक्षपाती है या नहीं? अगर वो है, तो फिर ये प्रॉब्लम कभी नहीं होती।

ऋत्विक घटक

चैप्लिन की प्रतिभा का उत्कर्ष हम उसकी मूक फ़िल्मों में ही देख सकते हैं, ख़ास तौर से उसकी लघु फ़िल्मों में। मुझे लगता है कि चैप्लिन को मौन, मूक अभिनय और मूक फ़िल्मों की रचनाप्रक्रिया से गहरा लगाव था। ध्वनि उसके तर्क को ही बदल देती, उसकी प्रभावोत्पादकता में ख़लल डालती।

ऋत्विक घटक

इस देश में फ़िल्म सस्ते मनोरंजन का सबसे घटिया साधन बन गई है। इसलिए मैं इस देश में फ़िल्मों के भविष्य को लेकर काफ़ी चिंतित हूँ।

ऋत्विक घटक

मैं अर्थछठाओं के पीछे भागता हूँ—उन दुर्गाह्य क्षणभंगुर अर्थछठाओं के पीछे। उन्हीं में तो जीवन की चिंगारियाँ छिपी होती है, नाच-गाने भी गले की फाँस नहीं होते, वे रचनात्मक तत्व होते हैं और अगर कथ्य संदर्भ की मांग हो, तो उनमें अनगिनत संभानाएँ होती हैं। अगर भारत में कोई सच्चा गंभीर कलाकार; इस पर अपने तमाम बुद्धि वैभव को दाँव पर लगा देगा, आख़िर मिजोगुची और कुरोसावा या किनुगासा जैसे लोगों ने नोह और काबुकी को अपने हाथों निचोड़कर ही तो उससे अपने नितांत वैयक्तिक वक्तव्य अर्जित किए थे।

ऋत्विक घटक

कोई भी कला, अन्य कलाओं का सुथरा हुआ रूप होने का दावा नहीं कर सकती। इस विश्व में हर कला का अपना अलग स्थान है। उनकी अभिव्यक्ति के तौर-तरीक़े और सीमाएँ भिन्न हैं। फ़िल्म जो कह सकती है, वह अन्य कला-विधाओं की परिधि से बाहर है। इसी प्रकार अन्य कलाओं में जो सामर्थ्य है, वह फ़िल्म में नहीं हो सकता। अतः इन में तुलना या प्रतियोगिता का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए।

ऋत्विक घटक

दो तरह का सिनेमा बनता है। या तो आप सिने इतिहास की राहों पर चल दें या अपनी पगडंडियाँ ख़ुद बनाएँ, नए रास्ते ढूँढें, बनाएँ।

ऋत्विक घटक

ये मेरे दर्शकों को तय करना है कि क्या मैं एक पोलिटिकल फ़िल्ममेकर हूँ या नहीं? कि क्या मैं भारत का पहला और एकमात्र पोलिटिकल फ़िल्ममेकर हूँ? विस्तृत संदर्भ में कहूँ, तो मेरी सारी फ़िल्में पोलिटिकल हैं, जैसे कि हर आर्ट होता है, हर आर्टिस्ट होता है। ये या तो इस या उस वर्ग के बारे में होता है। एक फ़िल्ममेकर चाहे, तो इसे पोलिटिकल नाम दे दे और दूसरा उसे ऐसा नाम दे, लेकिन अंत में दोनों फ़िल्में इसी मक्सद को पूरा करती हैं।

ऋत्विक घटक

हमें विश्व के महान फ़िल्मकारों से सीखते रहना चाहिए, लेकिन उनका अनुकरण नहीं करना चाहिए।

ऋत्विक घटक

फ़िल्मों में अभिनय; असल में डायरेक्टर और एक्टर्स के बीच गहरे तालमेल के बाद जन्मता है, और ख़ेद है कि वो भारत में ग़ायब है।

ऋत्विक घटक

जिस समाज में पूँजी का वर्चस्व हो, वहाँ सिनेमा अनिवार्य रूप से उसकी जकड़बंदियों में ही ज़्यादा फँसा रहता है।

ललित कार्तिकेय

साहित्य एक कला रूप है और फ़िल्म दूसरा। इसलिए जब आप साहित्य से स्क्रिप्ट बना रहे होते हैं, तो आप उसे बेवकूफ़ी से बस फॉलो नहीं कर सकते। वह सही नहीं है। फ़िल्म मुख्य रूप से दृश्यात्मक है—एक दृश्य कला। इसे ध्यान में रखना चाहिए।

ऋत्विक घटक

यह सिर्फ़ मेरी बात नहीं है, दुनिया में कोई भी गंभीर कलाकार; जो बंगाल में या कहीं और गंभीर काम किया हो, जिसका नाम आपने सुना हो—उनमें से हर एक व्यक्ति एक व्यक्ति से प्रेरित है और उसका नाम सर्गेई आइज़ेंस्टाइन है।

ऋत्विक घटक

फ़िल्म देखने जाना भी एक तरह का संस्कार है। जब बत्तियाँ बुझ जाती हैं; परदे ज़िंदा हो जाते हैं, तो सब दर्शक एक हो जाते हैं। ये एक समुदाय वाली भावना हो जाती है। हम इसकी तुलना चर्च, मस्जिद या मंदिर जाने से कर सकते हैं।

ऋत्विक घटक
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फ़िल्मों की आलोचना करने के लिए, पहले माध्यम को समझना चाहिए।

ऋत्विक घटक

फ़िल्म बनाने का प्राथमिक उद्देश्य मानवजाति के लिए भलाई करना है।

ऋत्विक घटक

मैं अपनी ज़िंदगी इस भरोसे नहीं जी रहा कि कौन मेरे काम को पसंद करता है, कौन नहीं। मैं तो जो कहना चाहता हूँ, कह रहा हूँ। उन्हें मिला, वे चिल्लाना चाहते थे, वे चिल्लाएँ।

ऋत्विक घटक
  • संबंधित विषय : कला

चलचित्र को 'रेखांकित' करने के लिए अचल स्थिति पर ध्यान केंद्रित करना भी आवश्यक है। कहीं विराम और स्थिरता चलचित्र को प्रचंड प्रभाव देती है। कभी-कभी संपूर्ण अनाटकीयता, अगले क्षण की नाटकीयता को नया आयाम देती है।

ऋत्विक घटक
  • संबंधित विषय : कला

इस दुनिया में अभी तक वर्ग-हीन कला जैसी कोई चीज़ नहीं है। कारण ये है कि कोई वर्ग-हीन समाज ही नहीं है।

ऋत्विक घटक

आर्ट में सब कुछ जायज़ है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जो लोग ज़ोरदार ढंग से न्यूडिटी और किसिंग का समर्थन करते हैं; क्या वो कला के बारे में सोचते हुए ऐसा करते हैं, या फिर वे जल्दी रोकड़ा कमाने के लिए ऐसा करना चाहते हैं?

ऋत्विक घटक
  • संबंधित विषय : कला

तमाम घटिया फ़िल्मों की एकमात्र पहचान यह है कि वे आपके साथ-साथ थियेटर से बाहर नहीं आतीं, बल्कि आप थियेटर के भीतर ही उनसे मुक्त हो चुके होते हैं।

ललित कार्तिकेय

सबसे महान फ़िल्म! आप चाहते हैं कि मैं उसका नाम लूँ? 'बैटलशिप पोटेमकिन।' ऐसी कोई फ़िल्म नहीं बनी, जो इसे टॉप कर सके। कोई नहीं।

ऋत्विक घटक

किसी ने 'बैटलशिप पोटेमकिन' से बड़ा कुछ नहीं बनाया।

ऋत्विक घटक

फ़िल्मों में आपके पास इतनी गुंजाइश नहीं होती। आप कहानी से दूर नहीं जा सकते, आपको जो कहना है, कहानी के भीतर कहना है। किताब में आप कहानी के दो हिस्‍सों के बीच आसानी से अपनी बात कह सकते हैं, चिंतन कर सकते हैं।

लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई

हल्की फ़िल्म और हल्का साहित्य चला है। अच्छी फ़िल्में फेल होती हैं, अच्छा साहित्य अलमारियों में रखा रहता है। परिणाम यह है कि हिंदी का लेखक वास्तव में भूखा मरता है।

हरिशंकर परसाई

मैं कभी ‘फ़िल्मी’ हीरो नहीं बन सका और बन जाना टालता भी रहा।

अमोल पालेकर

सिनेमा में मेरा करियर स्वायत्तता के प्रति मेरा जुनून प्रतिबिंबित करता है। मैंने हमेशा ही लीक से हटकर काम किया है और जोखिम लेने में पीछे नहीं हटा।

अमोल पालेकर

मैं फ़िल्मों का आदमी नहीं हूँ, क्‍योंकि वह दुनिया मुझे कभी पसंद नहीं रही।

लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई

हिन्दवी उत्सव 2026

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