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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

06 मई 2026

‘जीवन से हारते बच्चे : दबाव, डर और टूटती उम्मीदें’

‘जीवन से हारते बच्चे : दबाव, डर और टूटती उम्मीदें’

दसवीं, बारहवीं और प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम घोषित हो चुके हैं। नतीजों का मौसम ख़ुशियों के बजाय अब डर पैदा करने लगा है क्योंकि आए दिन परीक्षाओं में विफल होने पर बच्चों के आत्महत्या कर लेने की ख़बरे

06 मई 2026

‘अर्थात्’ की छठी कड़ी : प्रगतिवाद पर बात

‘अर्थात्’ की छठी कड़ी : प्रगतिवाद पर बात

चैत्र में बसंत के उनींदे से जागा ग्रीष्म वैशाख में अपना वैभव खोजता है। दुपहरें अपनी दीर्घता से ऊबकर अलसाती हैं और निस्पं

06 मई 2026

हिंदियाँ : भाषाई विविधता का आयोजन

हिंदियाँ : भाषाई विविधता का आयोजन

हिंदी-साहित्य के संवर्धन में सक्रिय ‘रेख़्ता फ़ाउंडेशन’ के उपक्रम ‘हिन्दवी’ ने बीते शनिवार की शाम एक विशेष साहित्यिक-सांस

05 मई 2026

स्मृतियों के सिवा कुछ भी नहीं

स्मृतियों के सिवा कुछ भी नहीं

यदि तुम बरसों बाद घर लौटकर आओ—तो वे एकदम पहचान लेते हैं, पर वे यह नहीं जानते, तुम कहाँ से लौटकर आए हो। वे कभी सोच नहीं स

04 मई 2026

वे बंगाली लड़कियाँ आततायी नहीं थीं!

वे बंगाली लड़कियाँ आततायी नहीं थीं!

वे अनपेक्षित बाढ़ की तरह आती रहीं। उनका पानी मैला नहीं था, न ही उतना साफ़। वे मेरे भीतर बने घर को—जो पहले से खंडहर था और

03 मई 2026

रविवासरीय 4.0 : नवीन सागर : एक बेसँभाल असमाप्त

रविवासरीय 4.0 : नवीन सागर : एक बेसँभाल असमाप्त

• प्रवेश आसान होता है, अगर परिचय प्रगाढ़ हो। इस राह में परिचय की स्मृति और संदर्भ भी सहायक हो सकते हैं। यों भी न हो, तब भ

02 मई 2026

शनिवारेर चिट्ठी : छाया और छायेच्छाएँ

शनिवारेर चिट्ठी : छाया और छायेच्छाएँ

छायालीन यह दृश्य है या एक ठहरा हुआ उच्चारण! जैसे समय ने अपनी जीभ बाहर निकाल शब्द को अधूरा छोड़ दिया हो। क्षितिज पर शह

01 मई 2026

कार्ल मार्क्स की मृत्यु : एक गुप्त इश्तिहार

कार्ल मार्क्स की मृत्यु : एक गुप्त इश्तिहार

कितनी तीखी ठंड है, एंगेल्स! कैसी गहरी निस्तब्धता की ओर बढ़ती जा रही है यह पृथ्वी! फिर भी देखो, दिसंबर की मृत्यु को भुलाक

01 मई 2026

हिंदियाँ : लोक-भाषा के विस्तार का आयोजन

हिंदियाँ : लोक-भाषा के विस्तार का आयोजन

‘हिन्दवी’ द्वारा आयोजित यह विशेष कार्यक्रम ‘हिंदियाँ’ साहित्य और सिनेमा में लोक-भाषा की भूमिका और उसके विस्तार को केंद्र

30 अप्रैल 2026

अपने-अपने कबीर

अपने-अपने कबीर

कबीर आज इतने समय बाद भी प्रासंगिक हैं। उनकी मौजूदगी के माध्यम बदल गए हैं, लेकिन वह आज भी किसी न किसी रूप में अन्य कवियों