साहित्य और संस्कृति की घड़ी
दिनांक : 18 सितंबर 2026 प्रतिष्ठा में, ‘जेन-ज़ी का तोता’ के लेखक श्री आनंद हर्षुल, यह पत्र इस आग्रह के साथ शुरू कर रहा हूँ कि आप मेरे संबोधन को स्वयं को एक कहानी विशेष के लेखक में परिसीमित करने
यह बात मान लेनी चाहिए कि हम अपने अतीत से कितना स्नेह रखते हैं। हम वहाँ सुखद अनुभूति करते हैं, सुरक्षित महसूस करते हैं। अतीत हमारे वर्तमान की ख़ाली जगहों को भरता है। वह बार-बार याद आता है, बावजूद इसके
11 सितम्बर 2026
आदरणीय ममता कालिया जी, नमस्कार! “रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों।” विद्यानिवास मिश
किसी लोकतांत्रिक देश में विरोध-प्रदर्शन वहाँ की जनता का मूलभूत अधिकार होता है। इसी अधिकार के सहारे वह लोकतांत्रिक देश फल-फूल रहा होता है, अन्यथा सरकार सर्वाधिकारवादी व्यवस्था के रूप में बदलने लगती है
काफ़ी समय से कॉकरोच जनता पार्टी के हालिया आंदोलन की चर्चा है। इस आंदोलन के कारण शिक्षा मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा। कई लोग इसका श्रेय जेन ज़ी को दे रहे हैं, क्योंकि इस आंदोलन में इस पीढ़ी की भागीदार
इसे कोई सामान्य लेख नहीं, बल्कि एक माफ़ीनामा समझिए। यह माफ़ीनामा मेरी ही नहीं, मेरी पूरी पीढ़ी की ओर से उस पीढ़ी के नाम है, जिसे आज हम ‘जेन-ज़ी’ [Gen Z] कहते हैं। इधर कुछ दिनों में इस पीढ़ी ने अपन
मुझे अपनी पीढ़ी से बहुत उम्मीद नहीं बची थी और जेन-ज़ी से तो शायद उससे भी कम। मुझे लगता था कि इंस्टाग्राम, रील्स और अपने छोटे-से डिजिटल संसार में मस्त इस पीढ़ी की ज़िंदगी में सार्वजनिक सवालों के लिए बह
आख़िरकार, इस देश की जनता कुछ जागी हुई-सी महसूस होती है। वह अराजनीतिकता का चोला उतारकर मूक से मुखर होती प्रतीत होती है। लेकिन जब हम कहते हैं कि इस देश की सरकार गूँगी, बहरी और अपने उत्तरदायित्व से भागन
पता नहीं, यह बात कहना कितनी तर्कसंगत होगा और इसमें कितनी ही बौद्धिक या साहित्यिक संभावना होगी कि यूरोप का वर्चस्ववाद बार-बार इस्लामिक एवं अफ़्रीकी संप्रभुता को सीमित करने की कोशिश करता है और हर दफ़ा ख
एक दुबला-पतला आदमी अलंकार मिश्रा! बीड़ी (या...) पीते हुए रील्स में दिखता है। गाँव-क़स्बे जैसा बैकग्राउंड, बिना माइक की आवाज़, मुँह से धुँआ निकल रहा है। वीडियो इंटरेस्टिंग लगता है। हम उस पर रुकते हैं।