साहित्य और संस्कृति की घड़ी
कबीर आज इतने समय बाद भी प्रासंगिक हैं। उनकी मौजूदगी के माध्यम बदल गए हैं, लेकिन वह आज भी किसी न किसी रूप में अन्य कवियों की तुलना में अधिक प्रभावी और जीवंत महसूस होते हैं। स्कूल की किताबों में दोहों क
28 अप्रैल 2026
पिछले दिनों गाँव में परफैरा हुआ, कुछ लोग मच्छी मार्केट लगाए बतिया रहे थे। वे क्या बात कर रहे थे और उसका अर्थ क्या था? कुछ नहीं सूझ रहा था! वे या तो गाली-गलौज कर रहे थे या फिर अर्थ पर ध्यान दिए बग़ैर
वह श्वेतवस्त्रधारिणी अचानक मेरे सामने उपस्थित हो गई। उस म्लानमुख, नतशीश नायिका ने आते ही आग्रह किया—“मुझे ग्रहण करें कवि!” मैंने अपरिचय की दीवार को ढाहने के उद्देश्य से प्रश्न किया—“पहले अपना नाम
हाल ही में मेरी मुलाक़ात एम डैश से हुई। बेहद परेशान, दुखी, चिंतित और बेचैन अवस्था में बैठा था। चेहरा भावप्रवण, अश्रु-भरे नयन, जगत के उलाहनों से क्षुब्ध। ख़ुद को भाषा और लेखन के प्रिय साथी से सिर्फ़ स
नशे से ‘नशा मुक्ति केंद्र’ तक का सफ़र सिर्फ़ दूरी का नहीं होता; यह एक ऐसे अँधेरे से गुज़रने जैसा होता है, जहाँ हर क़दम पर आदमी ख़ुद से थोड़ा-थोड़ा टूटता है... और मैं अब इस झूठ के साथ नहीं जीना चाहता कि
ख़ून कम कर अब कि कुश्तों के तो पुश्ते लग गए क़त्ल करते करते तेरे तीं जुनूँ हो जाएगा [अब ख़ून करना रोक, लाशों की लकीरें लग चुकी है। (वरना) क़त्ल करते-करते तू पागल हो जाएगा।] — मीर
रतन राजपुरोहित मेरा सहकर्मी है—युवा, उत्साही, पढ़ाकू और ज़बरदस्त लिक्खाड़। अगर लिखने से कैलोरी बर्न होती, तो वह देश का सबसे फिट आदमी होता। पिछले बुधवार की शाम को, शिफ़्ट ख़त्म होने के बाद उसने मुझसे स
कहते हैं कला आत्मा का फूल होती है। हाँ होती है, पर यह फूल किसी सरोवर में नहीं, किसी दलदल में, किसी कीचड़ में ही खिलता है। उसकी ख़ूबसूरती देखकर आप क़तई अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि वह किन परिस्थितियों में
आशा भोसले में एक चार्म है। वह छवि जो उनको सोचने से बनती है। वह जीवन के उस स्वरूप के अधिक निकट है जो इंसानी सुख-दुख, प्रेम-सौहार्द, ईर्ष्या-द्वेष जैसे मानवीय गुणों से मिलकर बनता है। यह उनकी बड़ी बहन [
वसंत। अहा! शब्द कान के पर्दों पर पड़ते ही हृदय को आह्लादित कर देता है। शरद की तीक्ष्ण शीतलहर प्रस्थान कर चुकी है। ग्रीष्म के आगमन की आहट भी अभी निकट नहीं है। न ठिठुरन है, न पसीने से भीगता बदन ही। अलाव