साहित्य और संस्कृति की घड़ी
05 जून 2026
आज के दौर में साम्यवाद-समाजवाद का झंडा उठाने वाले लोग जो ख़ुद को सबसे बड़ा समतावादी दिखाने पर उतारू हैं; उन्हें देखकर कुछ सीख पाएँ या न सीखें, लेकिन उन्हें क़रीब से देखने पर यह ज़रूर पता चलता है कि वे
Every word is like an unnecessary stain on silence and nothingness. ~ Samuel Beckett एक लगातार अशांत रह रही आत्मा विचित्र भाषाऍं सीख लेती हैं। ~ स्वदेश दीपक किचन में नंगे खड
26 मई 2026
स्लावोज ज़िज़ेक प्रसिद्ध दार्शनिक और सांस्कृतिक आलोचक हैं। वह मार्क्सवाद, मनोविश्लेषण और हीगेल के विचारों से लेकर सिनेमा, पॉप कल्चर, पॉपुलर घटनाओं का इस्तेमाल करके समकालीन समय का क्रिटिक पेश करते हैं
सुख्यात लेखक निर्मल वर्मा के लेखन को पढ़ना अक्सर किसी शांत, धुँधले पहाड़ी रास्ते पर चलने जैसा अनुभव देता है, जहाँ दृश्य जितना सामने होते हैं, उससे कहीं अधिक ओझल भी। उनके यहाँ कथ्य से अधिक महत्त्व
इस दफ़ा फ़ुटबॉल विश्वकप की मेज़बानी अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको संयुक्त रूप से कर रहे हैं और दबी-दबी-सी चर्चा है कि भारत में कोई भी ब्रॉडकास्टर इसके प्रसारण अधिकार ख़रीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा ह
मुज़म्मिल के लिए एक बग़ीची के पास पानी का नहीं, प्रतिध्वनियों का एक कुआँ था। जब स्वल्प-वासी उसमें झाँकता, तो उसे अपना चेहरा नहीं, अपनी आवाज़ दिखाई देती—धीरे-धीरे उतरती हुई, गहराई में। वह सुनता
तुम्हारा मेरा साथ जैसे आँख में धँसा कोई काँटा एक मछली पकड़ने का काँटा एक खुली आँख कनाडियन कवि-लेखिका मारग्रेट एटवुड की ये कविता पढ़ते हुए एक लिखती हुई स्त्री और उसके परिवेश के बीच का संबंध बहु
कभी-कभी मैं यह भूल जाती हूँ कि यह इक्कीसवीं सदी है और हम ‘स्क्रीन’ में जी रहे हैं। हमारा पूरा जीवन एक ‘स्क्रीन’ के आस-पास ही बीत रहा है। वैसे जहाँ जीवन आता है, वहाँ तरह-तरह के लोग भी आते हैं और जहाँ
वैशाख की इस अलस-दुपहरी में जहाँ मैं नहीं हूँ; सोचता हूँ, दाँवरि के बाद वहाँ अलसाने के दिन आ गए होंगे। परदेशियों की याद में ग्राम्यवधुएँ छत पर लत्ते-सी सूख रही होंगी और जम्हाई लेते हुए रसिक मनफेरवट से
वाक्य किसी भी समाज के साहित्य का अभिन्न अंग रहे हैं। इन वाक्यों के बिना कोई हुकूमत नहीं चल सकती थी और आज भी इन वाक्यों के बिना सरकार नहीं चल सकती। कैसे-कैसे कालजयी वाक्य इस देश में संभव हुए हैं :