साहित्य और संस्कृति की घड़ी
ज़रा सोचिए, एक ऐसी मशीन हो जो आपकी लगभग हर समस्या सुलझा सके। वह ऊर्जा के नए स्रोत खोज ले, इंसानों को लंबी उम्र जीने सकने में मदद करे और हमें दूसरे तारों तक पहुँचा दे। लेकिन इतनी तरक़्क़ी के बाद भी एक
सूरज की पहली किरण उसके कमरे में दाख़िल हुई। दीवार से टकराकर वह उसके चेहरे पर ठहर गई। ठंडी हवा का एक झोंका उसकी पलकों को हल्के से छू गया, मानो रात भर उसे दर्द में लिपटा देख यह सुबह अपना सारा स्नेह उस
पेपर ख़त्म होने के बाद मैं और मेरा दोस्त अपने हॉस्टल की ओर बढ़ रहे थे। पेपर के लिए जाते वक़्त सब कुछ अपनी व्यवस्थित स्थिति में क्रम से चल रहा था। लेकिन यह क्या, इतनी अफ़रा-तफ़री क्यों? लोग भाग-दौड़ क
“फूल क्यों तोड़ रही हो?” पीछे से आई गार्डनर की कड़क आवाज़ पर हव्वा सकपका गई... “मालकिन रोज़ तुड़वाती है” कह ज़ब्ह के लिए तैयार मेमने सी तेज़-तेज पलकें झपकाने लगी। भ्रांति में पड़कर वह हमेशा ऐसा
मेरे देश का नाम है—घरघराहट! मेरा प्यारू देश है दुनिया का सबसे न्यारू देश और मेरे देश से बाहर जो भी हैं वे सब साले हैं झरझरालू देश। मेरा अपना पर्सनल नाम सुकुमार समस्या कुमार है। मेरे पैदा होने के ब
चाईं उर्फ निशू भाई के पास कमाल का गुण था—वह सड़क पर चलती, खड़ी, इठलाती, इतराती, मुस्काती लड़की को देखकर बता देता था, ‘यह गश्ती है, चल भाई लपक लिया जाए...’ अपने जादुई अनुमान पर वह कभी फ़ेल नहीं हुआ
इतनी रात को क्या कर रहे हो? इंतिज़ार... दोस्त का... दोस्त? हाँ, दोस्त ही तो... ट्रेन का इंतिज़ार करते, लास्ट मिनिट ब्लिंकइट ऑर्डर का इंतिज़ार करते, सेलरी का इंतिज़ार करते, किसी विशेष मैसे
यह दिसंबर की साँझ थी। पावर प्लांट की एक परिचित, ठंडी और गहराती साँझ। प्रशासनिक भवन के भीतर अभी भी रोशनी थी... हल्की, दूधिया, स्थिर, अलसाई हुई-सी जैसे ऑफ़िस की ट्यूबलाइटें भी पूरे दिन की गहमा-गहमी
‘हिन्दवी’ के वार्षिक आयोजन ‘हिन्दवी उत्सव’ [23 अगस्त 2026] के लिए ज्ञानेंद्रपति जी को बनारस से लेकर मेरा इलाहाबाद जाना तय हुआ था। मेरी एक कविता पर हिंदी समय-समाज आंदोलित था और मैं भीतर से बेतरह भरा ह
कुछ शहर देखे नहीं जाते, जिए जाते हैं। कुछ शहर ऐसे होते हैं जिन्हें देखने के बाद भी आप उन्हें पूरी तरह देख नहीं पाते, क्योंकि वे अपने दृश्य से कहीं अधिक अपने स्वभाव में बसे होते हैं। न्यूयॉर्क मेरे लि