साहित्य और संस्कृति की घड़ी
21 फरवरी 2026
छठी कड़ी से आगे... सात अरुण कमल ‘कविता की राजनीति’ को उसी रिपोर्टर के निगाह से तौलते और फिर बोलते हैं जिसमें उन्हें फ़ायदा ज़्यादा दिखता है। काफ़ी गंभीरता से दिया गया वक़्तव्य है, जहाँ अपने को स
O Romeo, Romeo! wherefore art thou Romeo?—ओ रोमियो, रोमियो! तुम रोमियो क्यों हो? शुरुआत के पाँच मिनट उलझन में नहीं बीते। बहुत सीधा-सादा कथानक आदित्य धर या सिद्धार्थ आनंद सरीखे डायरेक्टरों की फ़िल्म
20 फरवरी 2026
पाँचवीं कड़ी से आगे... छह कविता में निजी स्पेस का या घर-परिवार का कम होना, लगता है जानबूझकर है या फिर विचारधारा या किसी ख़ास मानसिकता का परिचायक। अरुण कमल के पास एक ख़ास तरह की काव्य-भाषा है जो
19 फरवरी 2026
चौथी कड़ी से आगे... पाँच अरुण कमल क़स्बे की मानसिकता वाले पटने के कवि हैं। एक ख़ास पटनिया आग्रह है उनकी कविता में। अरुण कमल की कविता में एक पटना-टोन लगातार उपस्थित है, जैसे राजेश जोशी में भोपाल
19 फरवरी 2026
हमारे सामने एक विकट प्रश्न खड़ा हो गया है। क्या हमारे परिवार ख़त्म हो जाएंगे? इस मामले में नहीं कि हमारे परिवार के लोग एक-दूसरे से दूर रहने लगे हैं, दूर नौकरियाँ करने लगे हैं और कभी-कभी ही मिल पाते ह
18 फरवरी 2026
तीसरी कड़ी से आगे... चार 2019 में प्रकाशित अरुण कमल की एक कविता है—‘एक वृद्ध की रात’। एक बूढ़ा है जो जानता है कि ‘कुछ तो है जो मुझे खड़ा कर रहा इस उम्र में’। जिस उम्र में लोग तीर्थ पर निकल जाते ह
इस साल हमारे नवोदय विद्यालय [जवाहर नवोदय विद्यालय छिंदपाली, महासमुंद (छत्तीसगढ़)] को पच्चीस बरस पूरे हो रहे हैं। 1 नवंबर 2000 को दो बड़ी घटनाएँ इतिहास में घटी थीं। पहला यह कि इस दिन हिंदुस्तान का दिल
प्रिय सेबास्टिओं, प्रेरणा के अमिट स्रोत शांति और सामंजस्य के दूत विविधता के उपासक, प्रकृति के अद्भुत सहचर आज से 12 साल पहले मेरे एक फ़ोटोग्राफ़र मित्र अमन ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया था।
17 फरवरी 2026
दूसरी कड़ी से आगे... तीन मेरे लिए वे कविता का ककहरा सीखने के दिन थे। कवि-मित्र प्रकाश के सहारे यह संग्रह ‘अपनी केवल धार’ पढ़ गया। यह ‘धार’ कविता दिमाग़ में बैठ गई थी। मैंने उन दिनों अपने मित्रों
16 फरवरी 2026
पहली कड़ी से आगे... दो कभी-कभी एक कहानी, एक उपन्यास और एक कविता भी आपको अमर कर सकती है। अरुण कमल की यह रोमांटिक, उधार वाली कविता इस श्रेणी की कविता है। कभी तुलसीदास ने लिखा था, “नहिं दरिद्र सम