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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

01 फरवरी 2026

‘अरिजीत सिंह : पार्श्वगायन का बाणभट्ट’

‘अरिजीत सिंह : पार्श्वगायन का बाणभट्ट’

यह तुलना आपको विचित्र लग सकती है, लेकिन मेरे देखे वैश्विक स्तर पर भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय गायक अरिजीत को और किसी तरह परिभाषित किया जाना संभव नहीं है। वाणी बाणो बभूव ह! यह संस्कृत की एक प्रसिद्

30 जनवरी 2026

एक हिंदू द्वारा गांधी की हत्या; भारत स्तब्ध, विश्व शोकमग्न

एक हिंदू द्वारा गांधी की हत्या; भारत स्तब्ध, विश्व शोकमग्न

महात्मा गांधी की हत्या पर ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट नई दिल्ली, 30 जनवरी 1948 : मोहनदास के. गांधी आज एक हत्यारे

09 जनवरी 2026

‘घंटा’ फ़र्क़ नहीं पड़ता किसी कहानीकार के रहने या जाने से!

‘घंटा’ फ़र्क़ नहीं पड़ता किसी कहानीकार के रहने या जाने से!

कल के दिन की शुरुआत हुई कथाकार एवं ‘पहल’ पत्रिका के संपादक के रूप में समादृत ज्ञानरंजन के जाने की ख़बर से। 7 जनवरी की रा

07 जनवरी 2026

प्रेम की घर वापसी

प्रेम की घर वापसी

आज, अभी, इस दिन, इस क्षण की लंबान कितनी हो सकती है? इसका एक वाजिब जवाब है—विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास, ‘दीवार में एक खि

01 जनवरी 2026

एक साधक रचनाकार

एक साधक रचनाकार

मैं विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। उनके उपन्यासों ने जीवन को नए ढंग से देखना सिखाया है। यथार्थ

31 दिसम्बर 2025

वाक्य-विनोद-विन्यास-शुक्ल

वाक्य-विनोद-विन्यास-शुक्ल

वाक्य-विनोद-विन्यास-शुक्ल—मतलब विनोद कुमार शुक्ल का वाक्य-विन्यास। हालाँकि विनोद कुमार शुक्ल ख़ुद शायद ही कभी इस तरह की

31 दिसम्बर 2025

आज वर्षांत और कल होने वाले वर्षारंभ के बीच कोई विच्छेद नहीं है

आज वर्षांत और कल होने वाले वर्षारंभ के बीच कोई विच्छेद नहीं है

आने-जाने से ही मिलकर यह संसार बना है। इन दोनों के बीच कोई विच्छेद नहीं है। विच्छेद की कल्पना हम अपने मन में ही करते रहते

30 दिसम्बर 2025

वर्ष 2026 की ‘इसक’-सूची

वर्ष 2026 की ‘इसक’-सूची

सूचियाँ सर्वत्र व्याप्त अव्यवस्था में एक व्यवस्था गढ़ती हैं। पर यह उनकी नियति है कि वे प्राय: संदिग्ध होती हैं। इस दृश्य

30 दिसम्बर 2025

वह भाषा के ईश्वर हैं

वह भाषा के ईश्वर हैं

विनोद कुमार शुक्ल ने जैसी कविता लिखी है, वैसी किसी और ने नहीं लिखी है। यहाँ मुक्तिबोध की बात करें तो उनकी नक़ल संभव नहीं

29 दिसम्बर 2025

प्रत्यक्ष पृथ्वी की चाहना

प्रत्यक्ष पृथ्वी की चाहना

जाते-जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा और कुछ भी नहीं में सब कुछ होना बचा रहेगा विनोद कुमार शुक्ल