साहित्य और संस्कृति की घड़ी
कितना कुछ घट रहा है। दुनिया में, देश में, मुझ में। बहुत उलझन में हूँ। बहुत सारी बातें एक साथ सोच रहा हूँ। अपने मस्तिष्क में हर चीज़ का, हर स्थिति का हिसाब लगाने की कोशिश करता हुआ—घर के एक कोने से दूसर
श्रम काग़ज़ है। कर्म हस्ताक्षर। व्यक्ति को अपना काम करना चाहिए। मेहनत से। ईमानदारी से। समर्पण से। सजगता के साथ और अद्यतन कर्मठता से। लेकिन कर्म करने से पहले चुनाव करना ही चाहिए कि कौन-सा काम करने योग्य
बचपन का चाँद, स्मृतियों का चाँद और मनुष्य का पहला आकाश आज चाँद कुछ अधिक सुंदर लग रहा है। मैं बहुत देर से उसे निहार रही हूँ। ऐसा नहीं कि आज पहली बार उसे देखा हो। बचपन से लेकर आज तक न जाने कितनी बा
01 अक्तूबर 2026
धूप, हवा, पानी, ज़िंदगी इत्यादि—यह सब कुछ है तो है, इनकी एहमियत क्या है, इसका एहसास किसे है? हाँ, ये अपनी क़ीमत तब मालूम होने देंगी, जब ये नहीं होंगी। यह प्रकृति है। प्रकृति के नियम-क़ानून को इंसान स
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी (30 सितंबर 1935–25 दिसंबर 2020) आधुनिक उर्दू साहित्य के उन समादृत रचनाकारों में हैं जिन्होंने एक साथ आलोचक, इतिहासकार, कवि, कथाकार, उपन्यासकार, संपादक, अनुवादक और दास्तान के मर्
आज से क़रीब-क़रीब आठ बरस पहले जब साहित्य और अन्य किसी कला से मेरा शायद ही कोई नाता रहा हो, तो ऐसे में आजकल से ही किसी आम से दिन में मेरे मामा ने यूट्यूब पर एक वीडियो लगाया और कहा इसे देखो। वह वीडियो
मैं लाइब्रेरी में बैठी सामने लगे नोटिस बोर्ड को देख रही हूँ। बोर्ड के किनारे नारंगी रंग में रँगे चिनार के पत्तों से सजे हुए हैं। बाईं तरफ़ से एक डाल निकल रही है, जिसने बोर्ड को ऊपर की ओर से ढक रखा है
ज़रा सोचिए, एक ऐसी मशीन हो जो आपकी लगभग हर समस्या सुलझा सके। वह ऊर्जा के नए स्रोत खोज ले, इंसानों को लंबी उम्र जीने सकने में मदद करे और हमें दूसरे तारों तक पहुँचा दे। लेकिन इतनी तरक़्क़ी के बाद भी एक
सूरज की पहली किरण उसके कमरे में दाख़िल हुई। दीवार से टकराकर वह उसके चेहरे पर ठहर गई। ठंडी हवा का एक झोंका उसकी पलकों को हल्के से छू गया, मानो रात भर उसे दर्द में लिपटा देख यह सुबह अपना सारा स्नेह उस
पेपर ख़त्म होने के बाद मैं और मेरा दोस्त अपने हॉस्टल की ओर बढ़ रहे थे। पेपर के लिए जाते वक़्त सब कुछ अपनी व्यवस्थित स्थिति में क्रम से चल रहा था। लेकिन यह क्या, इतनी अफ़रा-तफ़री क्यों? लोग भाग-दौड़ क