कला हमें मृत्यु के क़रीब ले जाती है!
आंशी अग्निहोत्री
28 सितम्बर 2026
मैं लाइब्रेरी में बैठी सामने लगे नोटिस बोर्ड को देख रही हूँ। बोर्ड के किनारे नारंगी रंग में रँगे चिनार के पत्तों से सजे हुए हैं। बाईं तरफ़ से एक डाल निकल रही है, जिसने बोर्ड को ऊपर की ओर से ढक रखा है। बोर्ड की सजावट मुझे पतझड़ में पीले पड़ चुके चिनार की याद दिलाती है। इसकी सजावट मैंने ही तैयार की थी। चिनार के रंगीन पत्ते मुझे हमेशा से ही आकर्षित करते रहे हैं। ऐसा लगता है, जैसे मैं इन्हें क़रीब से जानती हूँ।
बोर्ड के बीचों-बीच वर्जीनिया वुल्फ़ का एक निबंध ‘द डेथ ऑफ़ द मॉथ’ लगा हुआ है। यह निबंध उन्होंने अपनी मृत्यु से एक साल पहले लिखा था। फिर 1941 के एक दिन उन्होंने अपनी जेबों में भरे होंगे कुछ पत्थर और पानी में उतर गई होंगी। हम कितनी आसानी से कह देते हैं कि उन्होंने पानी में डूबकर अपनी जान ले ली।
मैं इस निबंध को घूर रही हूँ। वह तितली (पतिंगा) निकलकर मेरी आँखों में बैठ गई है। मैं उसे अपनी उँगलियों पर लेकर दरवाज़े के बाहर भाग जाना चाहती हूँ। इस बार उसे मरने नहीं देना चाहती मैं। पर जैसे ही मैं दरवाज़े को पार करती हूँ, वह मेरी उँगलियों से ग़ायब होकर खिड़की के उस पार पहुँच जाती है। मैं काँच के पीछे से उसे देख पा रही हूँ। वह खिड़की के काँच पर अपने पंख पटक रहा है, जैसे वर्जीनिया अपने हाथ पटक रही होंगी पानी की सतह के बीचों-बीच। मैं उस तक पहुँच नहीं सकती और न शायद कुछ बदल सकती हूँ।
मुझे लगा, अगर बोर्ड पर लगे उस पन्ने से ‘मॉथ’ शब्द को खुरच दूँ, तो वह शायद खिड़की के काँच से ग़ायब होकर बाहर निकल जाएगी।
मैं बेध्यानी में ही काग़ज़ पर डैफ़ोडिल बना रही थी। मैंने उसकी पंखुड़ी पर एक पतिंगा बैठा दिया और वह डैफ़ोडिल उसी निबंध के नीचे चिपका दिया। अगर वह उड़कर बाहर आ सके, तो ख़ुद को इस फूल पर बैठा पाए।
मैंने अपनी किताब खोली, जिसे मैं अभी कुछ देर पहले ही पढ़ रही थी। मेरे भीतर की स्थिरता कहीं ग़ायब हो गई थी। मैं चाहती थी, मेरा मन कहीं और भटक जाए। अब किताब पढ़ना बेईमानी लग रहा था। ऐसा लग रहा था—तितली का भूरा रंग मेरी उँगलियों पर अभी भी चिपका रह गया है। लग रहा था, वह यहीं आस-पास कहीं उड़ रही है और कह रही है—‘तुम मुझे आज़ाद नहीं कर पाई।’
लगा, वर्जीनिया की जगह मैं पानी में डूब रही हूँ। मुझे घुटन होने लगी।
मैं कमरे के चक्कर काटने लगी। कमरे का हर कोना मैंने कला और साहित्य से सजा रखा है। मैं सिल्विया प्लाथ के पास से होकर गुज़री। वह एक अमेरिकन लेखिका थीं। जीवन भर अपनी उदासी से जूझती रहीं और अंततः 1963 में उन्होंने ऑवन में अपना सिर डालकर अपनी जान ले ली। उन्हें मरणोपरांत ‘पुलित्ज़र’ पुरस्कार दिया गया। उन्होंने ‘डैडी’ और ‘मिरर’ जैसी कई कविताएँ लिखीं। उनके लेखन में उदासी सबसे ख़ूबसूरत दिखाई देती है। ऐसा लगता है, वह कविताओं के बीच अपने सुनहरे बालों को छितराए, आलस भरी अँगड़ाइयाँ ले रही हैं। जहाँ कहीं उसकी लचक में ज़ोर पड़ता है, दिल दुख जाता है।
मैं विंसेंट वॉन गॉग के पास से होकर गुज़री। एक वक़्त मैं बहुत प्रभावित हुई थी इस हारे हुए कलाकार से। उन्हें जीते-जी कभी इतनी इज़्ज़त नहीं मिली। कभी प्यार नहीं मिला। उनकी ज़िंदगी गहरी उदासी में लिपटी रही। लगभग उनकी हर प्रेमिका ने आत्महत्या करने की कोशिश की और केवल एक ही उन कोशिशों से बच पाई। मैंने दो कविताएँ भी लिखी थीं विंसेंट के लिए—‘विंसेंट को मेरा ख़त’ और ‘सूरजमुखी’।
उन्होंने भी 1890 में ख़ुद को गोली मार ली। दीवार पर लगी ‘स्टारी नाइट’ मुझे अभी ख़ून के धब्बे जैसी दिख रही थी। इस तरह की अंत मेरे भीतर के कलाकार को झकझोरकर रख देते हैं।
एक बार किसी ने मुझसे कहा था, “कभी-कभी तुम्हें देखकर मर्लिन मुनरो की याद आ जाती है। आस-पास बहुत सारे लोग हैं, फिर भी नितांत अकेली।”
मैं भीतर से काँप उठी।
मर्लिन मुनरो एक अमेरिकन कलाकार थीं। वह एक बेहद आकर्षक अभिनेत्री थीं, जिनके चाहने वालों की संख्या करोड़ों से ज़्यादा थी। मुनरो अनिद्रा, अवसाद और चिंता से जूझती थीं। वह शराब और दवाओं की लत से भी जूझ रही थीं। आख़िरकार 1962 में बार्बिट्यूरेट ओवरडोज़ से उनकी मृत्यु हो गई।
मुझे कभी-कभी लगने लगता है, कहीं यह मेरी नियति तो नहीं बनती जा रही! कला क्या हमें मौत के और क़रीब खींच लाती है? फिर किसी दिन हम उसी खाई में ख़ुद को गिरते हुए देखते हैं और सब ख़त्म हो जाता है।
मुझे एक डर ने घेर लिया। मैंने पानी का एक घूँट पिया। ऐसे वक़्त में सिगरेट की तलब होने लगती है। मैंने अपनी कल्पना में एक सिगरेट सुलगाई और गहरा कश खींचा। मैं चाहती थी, पूरा कमरा धुएँ से भर जाए और सब कुछ दिखाई देना बंद हो जाए। मैं बैठे-बैठे कई सिगरेट सुलगा चुकी थी। उन सबकी रचनाओं से निकले भूत मेरे आस-पास मँडराने लगे। वे धुएँ की शक्ल में मेरे भीतर घुस रहे थे।
मैंने महसूस किया कि एक औरत ख़ुद को पन्नों में निहार रही है। उसकी साँसों के पन्नों पर पड़ने के कारण धुँध-सी छाने लगी। उसकी साँसें ठंडी थीं, पर उसने जो काग़ज़ पर लिख रखा था, वह अब भी जल रहा था।
अजीब बात थी कि कमरे में मौजूद लगभग हर कलाकार का अंत इसी तरह की त्रासदी में हुआ था। त्रासदी मुझे अपनी ओर आकर्षित करती है। यह मेरी कविताओं में भी दिखाई पड़ता है। मुझे लगा, दीवारों पर तमाम लाशें लटकी हुई हैं। हर लाश में एक-से ज़ख़्म हैं। वे सब अपनी-अपनी कहानी में एक ही उदासी लिख गई हैं। मेरे लिए इस कमरे में और बैठना मुश्किल हो रहा था। मैंने लगभग भागते हुए कमरे का दरवाज़ा खोला। मैं हर दीवार से दूर भाग जाना चाहती थी। हर कहानी से बहुत दूर।
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आंशी अग्निहोत्री को और पढ़िए : कहानी : फ़्रीडम
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