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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

14 फरवरी 2025

‘भाषा के घर में क्या है!’

‘भाषा के घर में क्या है!’

भाषा पर बात करते हुए मुख्यतः चार रुझान या रवैये दिखाई देते हैं। • व्युत्पत्ति : शब्द की उत्पत्ति, विकास और परिवर्तन का इतिहास ढूँढ़ना। • विधानवाद (Prescriptivism) :  भाषा के ‘शुद्ध’ या ‘सही’ रूप

13 फरवरी 2025

कहानी : लुटेरी तवायफ़ें

कहानी : लुटेरी तवायफ़ें

शादियों का सीज़न आते ही रेशमा तैयारी करना शुरू कर देती। मेकअप से थोड़ा घबराती थी, लेकिन उम्र छुपाने की जद्दोजहद रहती थी हमेशा। चेहरे को कैसे सवारें, क्या करें, क्या न करें—ये सब परपंच उसे समझ नहीं आते।

12 फरवरी 2025

स्त्रियों के संसार में ही घिरती है रात

स्त्रियों के संसार में ही घिरती है रात

ये उसकी सुबह थी पीठ पर धक्का मारते पुलकित के नन्हें पैर सुबह की अलसाई नींद के गवाह थे। इससे पहले वह इस आनंद में डूबती, भागते समय की हक़ीक़त एक कुशल ग़ोताख़ोर की तरह उसे अप्रतिम सुख की नदी से बाहर

11 फरवरी 2025

अजातशत्रु : आस्था के आगे मौत क्या चीज़ है!

अजातशत्रु : आस्था के आगे मौत क्या चीज़ है!

भारत रंग महोत्सव में के. के. रैना द्वारा निर्देशित और इला अरूण द्वारा अनूदित नाटक ‘अजातशत्रु’ की बेहतरीन प्रस्तुति हुई। यह नाटक का प्रभाव था या फिर के. के. रैना और इला अरूण के नाम का प्रभाव; प्रेक्षा

10 फरवरी 2025

ड्रैगन फ़्रूट, कीवी के ज़माने में सिंघाड़ों का सुख

ड्रैगन फ़्रूट, कीवी के ज़माने में सिंघाड़ों का सुख

शीत की साग-सब्ज़ियों से अटी पड़ी सब्ज़ी मंडियों के बाहर अत्यक्त भाव से बिकते सिंघाड़ों को देखकर जी करुणा से भर आया। ऐसे सरस फल को कैसे इतनी जल्दी बीते दिनों की बात बना हम आगे बढ़ गए। कार्तिक महीने

07 फरवरी 2025

कभी न लौटने के लिए जाना

कभी न लौटने के लिए जाना

6 अगस्त 2017 की शाम थी। मैं एमए में एडमिशन लेने के बाद एक शाम आपसे मिलने आपके घर पहुँचा था। अस्ल में मैं और पापा, एक ममेरे भाई (सुधाकर उपाध्याय) से मिलने के लिए वहाँ गए थे जो उन दिनों आपके साथ रहा कर

03 फरवरी 2025

'सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक'

'सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक'

सुरेन्द्र वर्मा का जन्म सन् 1941 को झाँसी में हुआ, वह हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। उनका नाटक ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ सन् 1972 में प्रकाशित हुआ। उपन्यास ‘मुझे चाँद चाहिए’

02 फरवरी 2025

रविवासरीय : 3.0 : हम आपके डिजिटल डिटॉक्स की कामना करते हैं

रविवासरीय : 3.0 : हम आपके डिजिटल डिटॉक्स की कामना करते हैं

• 1 फ़रवरी से 9 फ़रवरी के बीच नई दिल्ली के प्रगति मैदान [भारत मंडपम] में आयोजित विश्व पुस्तक मेले की स्थिति जानने की उत्कंठा जैसे आप सबको है, वैसे ही धृतराष्ट्र को भी है। वह अपनी इस आकांक्षा की पूर्ति

31 जनवरी 2025

शैलेंद्र और साहिर : जाने क्या बात थी...

शैलेंद्र और साहिर : जाने क्या बात थी...

शैलेंद्र और साहिर लुधियानवी—हिंदी सिनेमा के दो ऐसे नाम, जिनकी लेखनी ने फ़िल्मी गीतों को साहित्यिक ऊँचाइयों पर पहुँचाया। उनकी क़लम से निकले अल्फ़ाज़ सिर्फ़ गीत नहीं, बल्कि ज़िंदगी का फ़लसफ़ा और समाज क

30 जनवरी 2025

ज़िंदगी के रंगों को धुँधला करता ख़ालीपन

ज़िंदगी के रंगों को धुँधला करता ख़ालीपन

ज़िंदगी—ख़ालीपन को भरने का दूसरा नाम भी है। हर व्यक्ति को अपनी ज़िंदगी में पूरा सम्मान और प्रेम पाने की आकांक्षा होती है लेकिन ज़िंदगी कुछ भी पूरा नहीं देती। कुछ अधूरा-सा छूट जाता है। इस ‘कुछ अधूरा-स