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चाँद : मनुष्य की स्मृतियों का सबसे पुराना साथी

बचपन का चाँद, स्मृतियों का चाँद और मनुष्य का पहला आकाश 

आज चाँद कुछ अधिक सुंदर लग रहा है। मैं बहुत देर से उसे निहार रही हूँ। ऐसा नहीं कि आज पहली बार उसे देखा हो। बचपन से लेकर आज तक न जाने कितनी बार मैंने उसे निहारा है। कभी छत पर लेटे-लेटे, कभी गाँव की खुली पगडंडियों पर चलते हुए, कभी रेल की खिड़की से पीछे भागते हुए, तो कभी शहर की ऊँची इमारतों के बीच अचानक किसी कोने से झाँकते हुए। हर बार चाँद वैसा ही था, पर मैं बदलती रही। शायद इसीलिए हर मुलाक़ात में उसे एक नए अर्थ में तलाशती रही।

हमारे जीवन में कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो हमेशा रहती हैं, पर हर उम्र में उनका परिचय नया होता है। चाँद भी उन्हीं में से एक है। वह आकाश में जितना स्थिर दिखाई देता है, मनुष्य की स्मृतियों में उतना ही गतिशील है। वह हर पीढ़ी के साथ एक नया जन्म लेता है। बच्चे की आँखों में वह खिलौना है, किशोर के मन में कौतूहल, प्रेमी के लिए प्रतीक्षा, कवि के लिए रूपक, वैज्ञानिक के लिए रहस्य और वृद्ध के लिए बीते हुए समय की उजली स्मृति।

शायद मनुष्य का पहला साहित्य भी इसी चाँद के बिंब से जन्मा होगा। जब भाषा नहीं रही होगी, तब भी किसी ने पहली बार उस उजले गोल चेहरे की ओर देखा होगा और विस्मय से भर उठा होगा। वही विस्मय आगे चलकर लोकगीत बना, कहानी बना, मिथक बना और फिर कविता बन गया। इसलिए चाँद केवल खगोलीय पिंड नहीं है; वह मनुष्य की कल्पना का सबसे पुराना सहयात्री है।

मुझे अक्सर लगता है कि हर मनुष्य के भीतर एक निजी चाँद रहता है। वही चाँद, जिसे वह दूसरों को दिखा नहीं सकता। वह स्मृतियों का चाँद होता है। मेरे भीतर भी ऐसा ही एक चाँद है—जिसमें बचपन की गर्मियों की रातें अब भी चमकती हैं। बिजली चली जाती थी, कभी आँगन में चारपाइयाँ बिछती थीं और कभी छत पर बिछावन। उस वक़्त आसमान असंख्य तारों से भर जाता था। उनमें चाँद सबसे शांत, सबसे धैर्यवान अतिथि की तरह हमारे बीच बैठ जाता था। दादी कहानियाँ सुनाती थीं। कभी ख़रगोश का चाँद, कभी चंदा मामा, कभी परियों का लोक। उन कहानियों की सच्चाई से अधिक महत्त्वपूर्ण उनका विश्वास था। हम उस विश्वास में ही अपना संसार बना लेते थे। “चंदा मामा दूर के, पुए पकाएँ गूर के...”— यह केवल एक लोरी नहीं, भारतीय लोक-संस्कृति की वह धुन है जिसने करोड़ों बच्चों का बचपन अपनी गोद में सुलाया है। माँ जब बच्चे को यह लोरी सुनाती है, तब वह वास्तव में चाँद का परिचय नहीं करा रही होती, बल्कि दुनिया से पहला भावनात्मक रिश्ता बनाना सिखा रही होती है। इसीलिए भारतीय समाज में चाँद कभी केवल आकाश का ग्रह नहीं रहा, वह रिश्तेदार भी है, मामा भी, सखा भी और मौन रक्षक भी।

मुझे कभी-कभी लगता है कि आधुनिक जीवन ने हमसे चाँद को नहीं छीना, बल्कि उसे देखने का अवकाश छीन लिया है। पहले लोग चाँद निकलने का इंतज़ार करते थे, आज मौसम का हाल मोबाइल बताता है और चाँद का फ़ोटो सोशल मीडिया। पहले लोग चाँद के साथ बैठते थे, अब उसकी तस्वीर लेकर आगे बढ़ जाते हैं। अनुभव की जगह प्रदर्शन ने ले ली है। हम चाँद को देखते कम हैं, उसे साझा अधिक करते हैं। यही कारण है कि हमारी स्मृतियाँ भी पहले जैसी गहरी नहीं रहीं। फिर भी चाँद अपनी आदत नहीं बदलता। वह हर रात उसी धैर्य से आता है। उसे कोई जल्दी नहीं। वह जानता है कि मनुष्य चाहे जितना भी आधुनिक हो जाए, किसी न किसी रात उसकी थकान उसे फिर आकाश की ओर देखने को विवश करेगी। शायद इसलिए दुनिया की लगभग हर सभ्यता ने चाँद को अपने मिथकों, गीतों और कथाओं में जगह दी है। कहीं वह प्रेम का देवता है, कहीं समय का प्रहरी, कहीं ऋतुओं का संकेत, तो कहीं ईश्वर की सबसे शांत रचना। इन दिनों भारत में चाँद (चंद्रयान के सफल परीक्षण के बाद) तकनीकी शक्ति का मामला भी बन गया है।

आश्चर्य होता है कि हम पृथ्वी पर रहते हैं, फिर भी अपनी सबसे कोमल उपमाएँ पृथ्वी से नहीं, चाँद से लेते हैं। सुंदर चेहरा हो तो ‘चाँद-सा’, मासूम बच्चा हो तो ‘चाँद का टुकड़ा’, प्रियजन दूर हो तो ‘एक ही चाँद देख रहे होंगे’—मानो मनुष्य ने अपनी सबसे निर्मल भावनाओं का निवास उसी में बना दिया हो। इसीलिए मैं आज भी जब चाँद को देखती हूँ, तो केवल उसे नहीं देखती। उसके साथ अपना बचपन, अपनी माँ की आवाज़, दादी की कहानियाँ, गाँव की रातें, पेड़ों की छाया और उन लोगों के चेहरे भी लौट आते हैं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। मैं आज भी अपने छत से माँ के साथ चाँद को देखती हूँ और पुरानी स्मृतियों को दोहराती हूँ। चाँद हर बार मुझे यह याद दिलाता है कि समय बीत जाता है, लेकिन स्मृतियाँ अपना प्रकाश बचाए रखती हैं।

हो सकता है कि इसी क्षण दुनिया के करोड़ों लोग उसी चाँद को देख रहे हों। कोई कवि उसकी रोशनी में अपनी कविता की पहली पंक्ति खोज रहा होगा। कोई प्रेमी अपने बिछड़े हुए प्रिय को याद कर रहा होगा। कोई किसान खेत से लौटते हुए उसकी उजास में घर का रास्ता पहचान रहा होगा। कोई बच्चा रेलगाड़ी की खिड़की से उँगली उठाकर पूछ रहा होगा—“माँ, चाँद हमारे साथ-साथ क्यों चलता है?” और कोई वृद्ध बरामदे में बैठा चुपचाप उसे देख रहा होगा, जैसे अपने बीते हुए जीवन के पन्ने पलट रहा हो।

एक ही चाँद है, लेकिन उसके अर्थ अनगिनत हैं। शायद इसी में उसकी सबसे बड़ी सुंदरता छिपी है। कई बार उसकी कालिमा में चरित्र के दाग़दार होने का भी पता चलता है।

प्रेम, कविता और लोकजीवन की अनंत यात्रा

यदि मनुष्य के इतिहास से चाँद को निकाल दिया जाए, तो शायद उसकी आधी कविताएँ, आधे प्रेम-पत्र, आधे लोकगीत और आधे सपने अधूरे रह जाएँ। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मनुष्य ने जितनी बार प्रेम किया है, उतनी ही बार उसने किसी-न-किसी रूप में चाँद को याद किया है। और जब प्रेम नहीं भी किया, तब भी उसने अकेलेपन, प्रतीक्षा, विरह, आशा और स्मृति के क्षणों में चाँद को अपना मौन साथी बना लिया। आकाश में चमकता वही चाँद है, लेकिन पृथ्वी पर उसे देखने वाली आँखें अलग-अलग हैं। यही कारण है कि चाँद का कोई एक अर्थ नहीं है। वह हर मनुष्य के अनुभव के साथ बदलता रहता है। प्रेमी के लिए वह प्रिय का चेहरा है, किसान के लिए खेतों की रात का दीपक, नाविक के लिए दिशा का संकेत, कवि के लिए उपमा, चित्रकार के लिए रंगों का संतुलन और एक अकेले मनुष्य के लिए चुपचाप उसके पास बैठा हुआ मित्र।

मुझे हमेशा लगता है कि प्रेम ने चाँद को उतना सुंदर नहीं बनाया, जितना चाँद ने प्रेम को बनाया है। जब मनुष्य के पास अपने भावों को व्यक्त करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं, तब वह प्रकृति से उधार लेता है। वह कहता है—“तुम चाँद जैसी हो।” यह उपमा केवल चेहरे की सुंदरता के लिए नहीं होती, उसमें शीतलता, उजास, दूरी, रहस्य और आकांक्षा—सब कुछ समाया होता है। संसार की लगभग हर भाषा में चाँद प्रेम का प्रतीक बन गया। हिंदी हो, उर्दू, बांग्ला, संस्कृत, तमिल, फ़ारसी या अँग्रेज़ी—हर साहित्य में चाँद किसी-न-किसी रूप में उपस्थित है। ऐसा लगता है कि भाषा बदलती है, पर चाँद की संवेदना नहीं बदलती।

भारतीय लोकजीवन में चाँद का प्रवेश किसी पुस्तक से नहीं, जीवन से हुआ है। गाँव की रातों में जब बिजली नहीं होती थी, तब चाँद ही सबसे विश्वसनीय प्रकाश था। वह चाँदनी रात उजियार की रात बनती है। कई बार कवि उसकी शीतलता और प्रकाश में सपने बुनता है। छायावादी कवि प्रसाद ने लिखा है—“उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ/ उन मधुर चाँदनी रातों की/ खिलखिला कर हँसते होने वाली उन बातों की/ मिला कहाँ वह सुख/ जिसका स्वप्न देख मैं जाग गया/ आलिंगन में आते-आते मुस्कुराकर जो भाग गया।”

अक्सर खेत से लौटते किसान, नदी से आती नावें, चौपाल पर बैठी बातचीत, आँगन में सोते बच्चे—इन सबके बीच चाँद केवल दृश्य नहीं था, जीवन का हिस्सा था। वह हमारे शब्दों की आँख था। जिसे उसके उजाले में सहज और आत्मीय अर्थ मिलता था। शायद इसी कारण हमारे लोकगीतों में चाँद इतनी सहजता से आता है कि उसका उल्लेख कभी बनावटी नहीं लगता।

उत्तर भारत की लोकधुनों में नवविवाहिता अपने परदेस गए पति को याद करते हुए चाँद से संदेश भेजती है। राजस्थान के रेगिस्तान में वही चाँद विरह की आग को और गहरा कर देता है। बंगाल में कोजागरी पूर्णिमा की रात चाँद समृद्धि और कृपा का प्रतीक बन जाता है। ईद का चाँद केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की सामूहिक प्रसन्नता का क्षण होता है। करवा चौथ में वही चाँद पति-पत्नी के विश्वास का साक्षी बनता है। शरद पूर्णिमा की रात वही चाँद अमृत-वर्षा का प्रतीक माना जाता है। आश्चर्य होता है कि एक ही चाँद कितनी विविध संस्कृतियों में अलग-अलग अर्थ धारण कर लेता है, फिर भी उसका अपनापन कहीं कम नहीं होता।

कवियों ने भी चाँद को केवल देखा नहीं, अपने-अपने समय और मनःस्थिति के अनुसार उसे नया अर्थ दिया। किसी ने उसमें प्रेम देखा, किसी ने विरह, किसी ने सौंदर्य और किसी ने अनंत का मौन। महादेवी वर्मा की कविता पढ़ते समय लगता है कि वो चाँद को केवल खगोलीय पिंड नहीं मानती बल्कि विरहिणी के शृंगार का दर्पण, उसकी प्रतीक्षा का साक्षी और उसकी वेदना का मौन सहचर भी मानती हैं। उनके अनुसार चांदनी जितनी बाहर फैली हुई है, उतना ही भीतर विरह का अंधकार गहरा होता जाता है। उनकी कविता “क्यों वह प्रिय आता पार नहीं” में चाँद हर क्षण उनके साथ मौजूद है और वह विरहिणी की हर आँसू और प्रतीक्षा में ख़ुद शामिल है।

“शशि के दर्पण देख देख,
मैंने सुलझाये तिमिर-केश;
गूँथे चुन तारक-पारिजात,
अवगुण्ठन कर किरणें अशेष”

दूसरी ओर सुमित्रानंदन पंत के यहाँ चाँद प्रकृति की लय का हिस्सा है—सौंदर्य का ऐसा बिंब, जिसमें मनुष्य और प्रकृति अलग-अलग नहीं रहते। ‘कला और बूढ़ा चाँद’ कविता-संग्रह की कविता ‘बूढ़ा चाँद’ में वह बताते हैं कि उनके लिए चाँद कभी पूराना नहीं होता है बल्कि वह दिन-ब-दिन अनुभवी होता चला जाता है। वह जीवन, प्रेम और कला की तरह कभी भी बूढ़ा नहीं होता। पूराना चाँद आगे चलकर नई आशा, नया प्रकाश और पूर्णिमा की तरह पूर्णता का रूप धारण करता है।

“पतझर की ठूंठी टहनी में
कुहासों के नीड़ में
कला की कृश बांहों में झूलता
पुराना चाँद ही
नूतन आशा
समग्र प्रकाश है!”

उर्दू शायरी ने तो चाँद को मानो अपना स्थायी पात्र बना लिया। कभी महबूब का चेहरा चाँद हो गया, कभी चाँद को भी महबूब के सामने फीका बता दिया गया। यहाँ चाँद केवल आकाश में नहीं चमकता, वह प्रेमी की आँखों में उतर आता है। जब गुलज़र कहते हैं—

“शाम के साए बालिश्तों से नापे हैं
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में”

वहीं मोमिन कहते हैं—

“चाँद चाँद में तू नज़र आया था मुझे
मैंने महताब नहीं देखा था”

सिनेमा ने भी चाँद को नई लोकप्रियता दी। कितने ही गीत हैं जिनमें चाँद प्रेम की भाषा बनकर आता है। पीढ़ियाँ बदलती रहीं, संगीत बदलता रहा, पर चाँद गीतों से कभी ग़ायब नहीं हुआ। चाहे वो मोहम्मद रफ़ी के गाने ‘चौदहवीं का चाँद हो’ या फिर ‘चाँद-सा रौशन चेहरा’, अलका याग्निक और उदित नारायण का गाना ‘चाँद छिपा बादल में’ या ‘गली में आज चाँद निकला’, मुकेश का गाना ‘चाँद-सी महबूबा हो मेरी कब’ जैसे गीत हैं जो कभी पूराने नहीं होते। ऐसा लगता जैसे कि मनुष्य चाहे जितना आधुनिक हो जाए, उसके गीतों और भावनाओं की शब्दावली में चाँद हमेशा बना रहेगा। लेकिन क्या चाँद केवल सुंदर है? क्या उसकी भूमिका केवल प्रेम और सौंदर्य तक सीमित है? यह प्रश्न मुझे बार-बार बेचैन करता है। क्योंकि हर युग का कवि एक जैसा नहीं देखता। एक कवि चाँद में अपनी प्रेयसी का चेहरा देखता है, तो दूसरा उसी चाँद में समय की विडंबना पढ़ता है। एक कवि उसकी चाँदनी में जीवन की मधुरता खोजता है, तो दूसरा उसी उजाले में समाज के अँधेरे को और स्पष्ट देख लेता है। यहीं से चाँद की यात्रा एक नए मोड़ पर पहुँचती है।

अब वह केवल लोकगीतों का चंदा मामा नहीं रहता। अब वह प्रश्न बनता है। प्रतिरोध बनता है। व्यवस्था पर टिप्पणी करता है। अब उसकी गोलाई में दरार दिखाई देने लगती है। अब उसका चेहरा वैसा निष्कलंक नहीं लगता जैसा सदियों से कवियों ने देखा था। और यहीं से हम आधुनिक हिंदी कविता के उस विलक्षण कवि की ओर बढ़ते हैं, जिसने पहली बार पूरी निर्भीकता से कहा—‘चाँद का मुँह टेढ़ा है।’ यह केवल एक कविता का शीर्षक नहीं था, यह पूरे समय को देखने की एक नई दृष्टि थी। यह चाँद का अर्थ विस्तार है।

टेढ़ा चाँद, बदलता समय और मनुष्य की नई दृष्टि

चाँद को सदियों तक मनुष्य ने सौंदर्य का सबसे निर्मल प्रतीक माना। उसने प्रेमियों की आँखों में जगह बनाई, कवियों की उपमाओं में चमका, बच्चों की लोरियों में मुस्कराया और लोकगीतों में आत्मीय रिश्तेदार बनकर उतर आया। लेकिन साहित्य का सौंदर्य केवल उजाले में नहीं बसता। एक समय ऐसा भी आया जब कवि ने उसी चाँद को संदेह की दृष्टि से देखा। उसने उसके उजाले से अधिक उसके पीछे फैले अँधेरे को पढ़ना शुरू किया। यहीं से चाँद की यात्रा बदल जाती है। बीसवीं शताब्दी का मनुष्य उन्नीसवीं शताब्दी वाले मनुष्य से भिन्न था। उसने दो विश्वयुद्ध देखे, विभाजन देखा, भूख, विस्थापन, राजनीतिक छल और नैतिक विघटन देखा। आज का चाँद रोमांटिक परंपरा से भिन्न भूमि पर भी खड़ा है, जहाँ कल्पना की उड़ान यथार्थ की जमीन पर लैंडिंग करने लगा है। जीवन की जटिलताओं ने चाँद के मिथ को तोड़ा भी है। ऐसे समय में केवल चाँद की चाँदनी का गुणगान करना शायद ईमानदार साहित्य नहीं रह जाता। कवि के सामने प्रश्न था—क्या वह केवल सौंदर्य देखे या उस समाज को भी देखे जहाँ करोड़ों लोग अँधेरे में जी रहे हैं? यहीं गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ हिंदी साहित्य में एक निर्णायक मोड़ बनकर सामने आती है।

मुक्तिबोध ने चाँद को नकारा नहीं, उन्होंने उसकी परंपरागत छवि पर प्रश्न उठाया। उन्होंने बताया कि यदि समाज की संरचना टेढ़ी हो जाए, यदि व्यवस्था अन्याय से भर जाए, यदि मनुष्य अपनी नैतिक दृष्टि खो दे, तो चाँद भी पहले जैसा निष्कलंक दिखाई नहीं देता। तब उसके चेहरे पर भी समय की विकृतियाँ उभर आती हैं। दरअस्ल, मुक्तिबोध का ‘टेढ़ा चाँद’ आकाश का नहीं, हमारी चेतना का चाँद है। वह हमें आईना दिखाता है।

हम सोचते हैं कि चाँद बदल गया है, जबकि बदल तो हमारी आँखें गई हैं। हमारी सभ्यता का चेहरा बदल गया है। हमारी संवेदनाएँ बदल गई हैं। हमारे मूल्य बदल गए हैं। इसलिए चाँद का चेहरा टेढ़ा नहीं हुआ, हमारी दृष्टि ने उसकी सीध को खो दिया। यही साहित्य का सबसे बड़ा काम है—वह परिचित वस्तुओं को भी नए अर्थ देता है। इसीलिए एक ओर चाँद लोकगीतों का चंदा मामा है और दूसरी ओर मुक्तिबोध का टेढ़ा चाँद। दोनों एक-दूसरे का विरोध नहीं करते, वे मनुष्य के दो अलग-अलग अनुभवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। बचपन को चाँद कहानी देता है, जबकि यथार्थ से जूझते मनुष्य को वही चाँद प्रश्न देता है।

समय के साथ चाँद का एक और रूप हमारे सामने आया—विज्ञान का चाँद। जिस चाँद तक पहुँचने के लिए कभी कवि केवल कल्पना का सहारा लेता था, वहाँ मनुष्य ने अपने यान उतार दिए। दूरबीनों ने उसकी सतह को पढ़ा, अंतरिक्ष अभियानों ने उसकी मिट्टी का अध्ययन किया और वैज्ञानिकों ने उसके भूगोल को समझना शुरू किया। भारत के चंद्रयान अभियानों ने करोड़ों भारतीयों के मन में यह विश्वास जगाया कि कल्पना और विज्ञान विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जिन बच्चों ने कभी ‘चंदा मामा’ की कहानी सुनी थी, वही बड़े होकर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की खोज में योगदान देने लगे। यह केवल विज्ञान की उपलब्धि नहीं थी, यह कल्पना की भी विजय थी। फिर भी एक प्रश्न मेरे मन में बार-बार उठता है—क्या चाँद तक पहुँच जाना, चाँद को जान लेना है? शायद नहीं।

विज्ञान हमें बता सकता है कि चाँद पर पानी कितना है, उसकी चट्टानों की आयु क्या है, उसकी सतह कैसी है। लेकिन वह यह नहीं बता सकता कि किसी कवि ने उसे देखकर पहली कविता क्यों लिखी, किसी माँ ने उसे मामा क्यों कहा, किसी विरही ने उसे अपना संदेशवाहक क्यों बनाया, या किसी अकेले मनुष्य ने रात के सन्नाटे में उसे देखकर अपने आँसू क्यों पोंछे। ज्ञान और अनुभव के बीच यही दूरी मनुष्य को मनुष्य बनाती है।

आज का समय सबसे परिवर्तनकारी है। अब लोग चाँद को देखने से पहले मोबाइल निकालते हैं। पहले चाँद स्मृति में उतरता था, अब गैलरी में। पहले पूर्णिमा की रातें आँखों में बसती थीं, अब ‘स्टेटस’ पर दिखाई देती हैं। पहले लोग चाँद के नीचे बैठकर बातें करते थे, अब उसकी तस्वीर पर ‘फ़िल्टर’ लगाकर साझा करते हैं। यह परिवर्तन केवल तकनीक का नहीं, अनुभव का भी है। मैं तकनीक का विरोध नहीं करती। हर युग अपने उपकरण लेकर आता है। प्रश्न यह नहीं कि मोबाइल हमारे हाथ में है, प्रश्न यह है कि क्या अब भी कभी ऐसा होता है कि हम बिना कैमरा उठाए कुछ देर चुपचाप चाँद को देखें? यदि नहीं, तो हमने केवल देखने की आदत नहीं खोई, बल्कि ठहरने की क्षमता भी खो दी है। शायद इसीलिए आज मुक्तिबोध पहले से अधिक प्रासंगिक लगते हैं। उन्होंने हमें सिखाया था कि दुनिया को केवल उसकी चमक से मत देखो; उसके भीतर छिपे अँधेरे को भी पढ़ो। आज जब जीवन प्रदर्शन से भर गया है, तब उनका ‘टेढ़ा चाँद’ हमें बार-बार याद दिलाता है कि हर उजाला सत्य नहीं होता। वह किसी विचारधारा का नहीं, किसी सीमा का नहीं, किसी एक पीढ़ी का नहीं। वह हर रात एक नया प्रश्न लेकर आता है। शायद इसीलिए चाँद आज भी केवल आकाश में नहीं चमकता—वह मनुष्य की आत्मा में भी चमकता है।

समय से परे, स्मृतियों के भीतर

इतनी लंबी यात्रा के बाद जब मैं फिर उसी चाँद की ओर देखती हूँ, तो लगता है कि वह बदला ही नहीं। बदल गए हैं तो केवल हम। हमारे शहर बदल गए, हमारे घर बदल गए, हमारी भाषाएँ बदल गईं, हमारे संबंध बदल गए, हमारी तकनीक बदल गई, लेकिन हर रात अपने नियत समय पर चाँद वैसे ही आकाश में चला आता है, जैसे उसने किसी अपने को मिलने का वचन दिया हो और ठीक प्रसिद्ध कहानीकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी का पहली कहानी ‘उसने कहा था’ के लहना सिंह की तरह, जो अंतिम समय तक अपने वचन को निभाता चलता है।

कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि पृथ्वी पर इतनी विविधताओं के बीच यदि कोई दृश्य लगभग सभी मनुष्यों ने साझा किया है, तो वह चाँद का दृश्य है। भाषा अलग हो सकती है, धर्म अलग हो सकते हैं, इतिहास अलग हो सकते हैं, पर पूर्णिमा की उजली रात में ऊपर उठती हुई आँखों का विस्मय लगभग एक-सा होता है। शायद इसीलिए चाँद किसी एक संस्कृति का नहीं, पूरी मानवता की साझा स्मृति है।

हम आने वाली पीढ़ी को संपत्ति दे सकते हैं, शिक्षा दे सकते हैं, संस्कार दे सकते हैं, लेकिन उनसे पहले हम उन्हें आकाश देते हैं। एक खुला आकाश और उसमें टंगा हुआ चाँद। यही मनुष्य की पहली पाठशाला है। बच्चा बोलना सीखने से पहले आकाश को देखना सीखता है। वह अपनी छोटी-सी उँगली उठाकर पूछता है—“वह क्या है?” और उसी क्षण संसार की पहली जिज्ञासा जन्म लेती है। शायद विज्ञान की शुरुआत भी यहीं से हुई होगी और कविता की भी।

मुझे लगता है कि चाँद मनुष्य का पहला शिक्षक है। उसने हमें समय का बोध कराया, ऋतुओं का क्रम सिखाया, प्रतीक्षा का अर्थ समझाया और यह भी बताया कि घटना और परिवर्तन प्रकृति के नियम हैं। अमावस्या से पूर्णिमा तक की यात्रा केवल चंद्रमा की यात्रा नहीं, मनुष्य के जीवन का रूपक भी है। हमारे भीतर भी उजाला और अँधेरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।

जीवन में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके साथ हमने कभी चाँद देखा था। आज वे हमारे साथ नहीं हैं। कोई दादी, जिसने चंदा मामा की कहानी सुनाई थी, कोई मित्र, जिसके साथ देर रात तक छत पर बातें की थीं, कोई प्रिय, जिसके साथ चाँद को देखते हुए भविष्य के सपने बुने थे। वे लोग समय की धारा में कहीं दूर चले गए, लेकिन जब भी पूर्णिमा की रात आती है, स्मृति अपने आप उनके नाम पुकारने लगती है। तब लगता है कि चाँद केवल प्रकाश नहीं लाता, वह अनुपस्थित लोगों की उपस्थिति भी साथ ले आता है। स्मृति की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह समय को पराजित कर देती है।

आज जब मैं एक माँ बनने की प्रतीक्षा में हूँ, तब चाँद मुझे पहले से कुछ अधिक आत्मीय लगता है। सोचती हूँ, जिस बच्चे ने अभी इस संसार को देखा भी नहीं, उसकी पहली लोरियों में भी चाँद होगा। उसकी पहली कहानी में भी चाँद होगा। वह भी एक दिन पूछेगा/पूछेगी—“चाँद मेरे साथ-साथ क्यों चलता है?” और तब शायद मैं भी मुस्कराकर वही करूँगी जो सदियों से असंख्य माताएँ करती आई हैं—मैं उसे कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं दूँगी,  मैं उसे एक कहानी सुनाऊँगी। क्योंकि मनुष्य केवल तथ्यों से नहीं, कल्पनाओं से भी बड़ा होता है। विज्ञान हमें चाँद तक पहुँचा सकता है, लेकिन चाँद से रिश्ता अब भी कहानी ही बनाती है।

आज का समय बहुत तेज़ है। लोग दौड़ रहे हैं, सूचनाएँ दौड़ रही हैं, बाज़ार दौड़ रहा है, तकनीक दौड़ रही है। इस दौड़ में सबसे अधिक जो चीज़ छूटती जा रही है, वह है—ठहरना। चाँद हमें ठहरना सिखाता है। वह किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करता। वह किसी को पीछे छोड़ने की जल्दी में नहीं है। वह बस आता है, अपनी रोशनी बिखेरता है और चुपचाप आगे बढ़ जाता है। प्रकृति का सबसे बड़ा ज्ञान शायद यही है—जो सबसे अधिक प्रकाश देता है, वह सबसे कम शोर करता है।

हमने पृथ्वी पर कितनी सीमाएँ खींच लीं—देश, प्रदेश, भाषा, जाति, धर्म, विचारधाराएँ। हमने अपने हिस्से बाँट लिए। लेकिन चाँद ने कभी किसी सीमा को स्वीकार नहीं किया। उसकी रोशनी किसी पासपोर्ट की मोहताज नहीं होती। वह सबका है, क्योंकि उसने कभी किसी एक का होने का दावा नहीं किया। और शायद इसी में उसकी सबसे बड़ी गरिमा है।

अब मुझे लगता है कि चाँद को देखने का अर्थ केवल ऊपर देखना नहीं है,  अपने भीतर देखना भी है। जिस रात हम सचमुच चाँद को देखते हैं, उस रात हम अपने भीतर बचे हुए उस बच्चे से भी मिलते हैं, जो अभी तक आश्चर्य करना नहीं भूला। उसी बच्चे के कारण हम कविता पढ़ते हैं, प्रेम करते हैं, प्रश्न पूछते हैं, सपने देखते हैं और जीवन को केवल जीते नहीं, महसूस भी करते हैं।

आज जब मैं फिर चाँद की ओर देखती हूँ, तो लगता है कि मैं उसे नहीं, अपने जीवन की पूरी यात्रा को देख रही हूँ। उसमें मेरा बचपन है, मेरी माँ की आवाज़ है, दादी की कहानियाँ हैं, मेरे पढ़े हुए कवि हैं, मुक्तिबोध का प्रश्न है, विज्ञान की उपलब्धियाँ हैं, आने वाले बच्चे की मुस्कान है और उन सबके बीच एक शांत, धैर्यवान चाँद है, जो सदियों से मनुष्य का इंतज़ार कर रहा है।

इस लंबे संवाद के बाद मैं एक बार फिर चाँद की ओर देखती हूँ, तो लगता है कि मैं केवल आकाश में टँगे एक खगोलीय पिंड को नहीं देख रही, बल्कि मनुष्य की हजारों वर्षों की स्मृतियों, कल्पनाओं, प्रेम, पीड़ा, आशा और जिज्ञासाओं को एक साथ देख रही हूँ। चाँद ने कभी मनुष्य से कुछ माँगा नहीं, कभी कोई उपदेश नहीं दिया, कभी किसी सीमा या सत्ता का पक्ष नहीं लिया। वह बस हर रात चुपचाप आता रहा और मनुष्य को यह याद दिलाता रहा कि जीवन की सबसे गहरी सच्चाइयाँ अक्सर मौन में जन्म लेती हैं। कई बार उसे देखते हुए लगा कि शताब्दियों से वह हमें उम्मीद से भर रहा है। इस अँधेरे समय में वह हमें रोशन कर रहा है। वह अपने साथ पूरी पृथ्वी का सुख-दुख सब चुपचाप ढो रहा है। चाँद की निरंतरता, प्रतिबद्धता और दुनिया को सुंदर बनाने की दृढ़ता हमें मनुष्यता का एक पाठ दे जाती है।

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