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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

22 फरवरी 2025

‘प्लेटो ने कहा है : संघर्ष के बिना कुछ भी सुंदर नहीं है’

‘प्लेटो ने कहा है : संघर्ष के बिना कुछ भी सुंदर नहीं है’

• दयालु बनो, क्योंकि तुम जिससे भी मिलोगे वह एक कठिन लड़ाई लड़ रहा है। • केवल मरे हुए लोगों ने ही युद्ध का अंत देखा है। • शासन करने से इनकार करने का सबसे बड़ा दंड अपने से कमतर किसी व्यक्ति द्वारा

21 फरवरी 2025

स्मृति-कथाएँ : जो नहीं है, वो कहीं तो होगा

स्मृति-कथाएँ : जो नहीं है, वो कहीं तो होगा

जिल्द में बँधी पिता की याद दुनिया लुप्त हो रही थी। लोग भूल चुके थे—तितलियों के रंग, चिड़ियों की चहचहाहट। उनसे जब भी चिड़ियों का रंग पूछा जाता था तो एक यंत्र तलाशते थे और तस्वीरें तलाशने लगते थे। वह

17 फरवरी 2025

मीरा : ‘प्रेम-प्रेम सब कोई कहे प्रेम न बूझे कोई’

मीरा : ‘प्रेम-प्रेम सब कोई कहे प्रेम न बूझे कोई’

अनंत ऊर्जा-शक्ति से पैदा हुआ जीव अंततः उसी में समा जाता है। सात महत्त्वपूर्ण चक्रों से युक्त मानव देह में जब ऊर्जा का प्रवाह ऊर्ध्व दिशा में होने लगता है, तब व्यावहारिक, सांसारिक और व्यक्तिगत भार जैस

14 फरवरी 2025

भाषा के घर में क्या है!

भाषा के घर में क्या है!

भाषा पर बात करते हुए मुख्यतः चार रुझान या रवैये दिखाई देते हैं। • व्युत्पत्ति : शब्द की उत्पत्ति, विकास और परिवर्तन का इतिहास ढूँढ़ना। • विधानवाद (Prescriptivism) :  भाषा के ‘शुद्ध’ या ‘सही’ रू

13 फरवरी 2025

कहानी : लुटेरी तवायफ़ें

कहानी : लुटेरी तवायफ़ें

शादियों का सीज़न आते ही रेशमा तैयारी करना शुरू कर देती। मेकअप से थोड़ा घबराती थी, लेकिन उम्र छुपाने की जद्दोजहद रहती थी हमेशा। चेहरे को कैसे सवारें, क्या करें, क्या न करें—ये सब परपंच उसे समझ नहीं आते।

12 फरवरी 2025

स्त्रियों के संसार में ही घिरती है रात

स्त्रियों के संसार में ही घिरती है रात

ये उसकी सुबह थी पीठ पर धक्का मारते पुलकित के नन्हें पैर सुबह की अलसाई नींद के गवाह थे। इससे पहले वह इस आनंद में डूबती, भागते समय की हक़ीक़त एक कुशल ग़ोताख़ोर की तरह उसे अप्रतिम सुख की नदी से बाहर

11 फरवरी 2025

अजातशत्रु : आस्था के आगे मौत क्या चीज़ है!

अजातशत्रु : आस्था के आगे मौत क्या चीज़ है!

भारत रंग महोत्सव में के. के. रैना द्वारा निर्देशित और इला अरूण द्वारा अनूदित नाटक ‘अजातशत्रु’ की बेहतरीन प्रस्तुति हुई। यह नाटक का प्रभाव था या फिर के. के. रैना और इला अरूण के नाम का प्रभाव; प्रेक्षा

10 फरवरी 2025

ड्रैगन फ़्रूट, कीवी के ज़माने में सिंघाड़ों का सुख

ड्रैगन फ़्रूट, कीवी के ज़माने में सिंघाड़ों का सुख

शीत की साग-सब्ज़ियों से अटी पड़ी सब्ज़ी मंडियों के बाहर अत्यक्त भाव से बिकते सिंघाड़ों को देखकर जी करुणा से भर आया। ऐसे सरस फल को कैसे इतनी जल्दी बीते दिनों की बात बना हम आगे बढ़ गए। कार्तिक महीने

07 फरवरी 2025

कभी न लौटने के लिए जाना

कभी न लौटने के लिए जाना

6 अगस्त 2017 की शाम थी। मैं एमए में एडमिशन लेने के बाद एक शाम आपसे मिलने आपके घर पहुँचा था। अस्ल में मैं और पापा, एक ममेरे भाई (सुधाकर उपाध्याय) से मिलने के लिए वहाँ गए थे जो उन दिनों आपके साथ रहा कर

03 फरवरी 2025

'सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक'

'सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक'

सुरेन्द्र वर्मा का जन्म सन् 1941 को झाँसी में हुआ, वह हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। उनका नाटक ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ सन् 1972 में प्रकाशित हुआ। उपन्यास ‘मुझे चाँद चाहिए’