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अनुवाद कर्म से जुड़ी जटिलताएँ

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी (30 सितंबर 1935–25 दिसंबर 2020) आधुनिक उर्दू साहित्य के उन समादृत रचनाकारों में हैं जिन्होंने एक साथ आलोचक, इतिहासकार, कवि, कथाकार, उपन्यासकार, संपादक, अनुवादक और दास्तान के मर्मज्ञ अध्येता के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनका जन्म प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया। भारतीय डाक सेवा में दीर्घ प्रशासनिक जीवन के समानांतर उनका साहित्यिक जीवन निरंतर सक्रिय रहा। 1966 में उन्होंने उर्दू की अत्यंत प्रभावशाली साहित्यिक पत्रिका ‘शबख़ून’ का प्रकाशन आरंभ किया, जिसने उर्दू में आधुनिकतावादी साहित्यिक चेतना को व्यापक मंच प्रदान किया और कई दशकों तक नई कविता, कहानी तथा आलोचना के लिए एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक हस्तक्षेप का काम किया।

फ़ारूक़ी साहब की साहित्यिक महत्ता का सबसे बड़ा आधार उनकी आलोचनात्मक दृष्टि और उर्दू की शास्त्रीय काव्य-परंपरा की पुनर्व्याख्या है। उन्होंने पश्चिमी साहित्यिक सिद्धांतों को यांत्रिक रूप से उर्दू पर आरोपित करने के बजाय अरबी, फ़ारसी और उर्दू की अपनी काव्यशास्त्रीय परंपराओं, अरूज़, बयान, अलंकारिक संरचनाओं और सांस्कृतिक संदर्भों के भीतर साहित्य को समझने का आग्रह किया। इस दृष्टि से वह उर्दू आधुनिकतावाद के प्रमुख वैचारिक निर्माताओं में गिने जाते हैं। उनकी आलोचनात्मक पुस्तकों में ‘नए नाम’, ‘लफ़्ज़-ओ-मानी’, ‘फ़ारूक़ी के तब्सिरे’, ‘शेर, ग़ैर-शेर और नस्र’, ‘अरूज़, ‘आहंग और बयान’, ‘तनक़ीदी अफ़कार’, ‘इस्बात-ओ-नफ़ी’, ‘अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है’, ‘ग़ालिब पर चार तहरीरें’, ‘उर्दू ग़ज़ल के अहम मोड़’, ‘ख़ुर्शीद का सामान-ए-सफ़र’, ‘हमारे लिए मंटो साहब’ तथा ‘उर्दू का इब्तिदाई ज़माना’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

उनकी आलोचना की सर्वोच्च उपलब्धियों में ‘शेर-ए-शोर-अंगेज़’ का नाम लिया जाता है। यह मीर तक़ी मीर (1723–1810) की शायरी पर केंद्रित चार खंडों में विराट आलोचनात्मक अध्ययन है, जिसमें फ़ारूक़ी ने मीर के काव्य को केवल व्याख्यायित ही नहीं किया, बल्कि उसके पीछे मौजूद भाषिक, सांस्कृतिक, काव्यशास्त्रीय और बौद्धिक संसार का व्यापक पुनर्निर्माण किया। इस कृति के लिए उन्हें 1996 में सरस्वती सम्मान प्राप्त हुआ। इसी क्रम में ‘तफ़हीम-ए-ग़ालिब’ उनके ग़ालिब-अध्ययन की महत्त्वपूर्ण कृति है, जिसमें ग़ालिब की काव्यभाषा और काव्य-दृष्टि को गहराई से समझने का एक मुकम्मल प्रयास स्पष्ट रूप से दिखता है।

फ़ारूक़ी साहब के साहित्यिक अवदान का दूसरा अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्षेत्र दास्तान-साहित्य और विशेषतः ‘दास्तान-ए-अमीर हमज़ा’ का अध्ययन है। उन्होंने इस विशाल मौखिक-लिखित आख्यान-परंपरा का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन किया और लगभग पचास खंडों को पढ़कर ‘साहिरी, शाही, साहिब-ए-क़िरानी : दास्तान-ए-अमीर हमज़ा का मुतालआ’ जैसी महत्त्वपूर्ण कृति तैयार की। दास्तान की कथन-प्रणाली, कल्पना, भाषा, चरित्र-निर्माण और आख्यानात्मक संरचना को समझने में यह कार्य मील का पत्थर माना जाता है। दास्तानगोई की आधुनिक पुनर्स्थापना में भी फ़ारूक़ी की वैचारिक भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही।

वह केवल आलोचक नहीं थे; उन्होंने कविता और कथा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय रचनाएँ कीं। उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में ‘गंज-ए-सोख़्ता’, ‘सब्ज़ अंदर सब्ज़’, ‘चार सम्त का दरिया’ और ‘आसमाँ मेहराब’ शामिल हैं। उनकी समग्र कविताएँ ‘मजलिस-ए-आफ़ाक़ में परवाना-साँ’ शीर्षक से प्रकाशित हुईं।

कथाकार के रूप में फ़ारूक़ी साहब की विशिष्टता उनकी ऐतिहासिक चेतना और अतीत के सांस्कृतिक पुनर्निर्माण में दिखाई देती है। उनका कहानी-संग्रह ‘सवार और दूसरी कहानियाँ’ अठारहवीं सदी की दिल्ली और उत्तर भारत की सांस्कृतिक दुनिया को केंद्र में रखता है। मीर, ग़ालिब, मुसहफ़ी तथा तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के माध्यम से फ़ारूक़ी उस युग को किसी जड़ या पतनशील अतीत के रूप में नहीं, बल्कि बहुल, गतिशील और गहरी हिंदुस्तानी तहज़ीब से निर्मित संसार के रूप में देखते हैं।

इसी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक दृष्टि का सबसे विराट रचनात्मक रूप उनका उपन्यास ‘कई चाँद थे सरे आसमाँ’ है, जो 2006 में प्रकाशित हुआ। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं सदी के आरंभिक दौर की दिल्ली को केंद्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास वज़ीर ख़ानम के जीवन के साथ-साथ तत्कालीन मुग़ल समाज, दरबारी संस्कृति, स्त्री-जीवन, संगीत, शायरी, प्रेम, सत्ता और सामाजिक परिवर्तन का व्यापक आख्यान प्रस्तुत करता है। उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषताओं में उसकी भाषा, ऐतिहासिक शोध और उस समय की सांस्कृतिक स्मृति का अत्यंत सूक्ष्म पुनर्सृजन शामिल है।

उनका दूसरा महत्त्वपूर्ण उपन्यास ‘क़ब्ज़े ज़माँ’ है, जिसमें इतिहास, स्मृति, समय और मनुष्य के संबंधों को विशिष्ट कथा-शिल्प के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। फ़ारूक़ी की मृत्यु के बाद प्रकाशित ‘फ़ानी बाक़ी’ उनके अंतिम रचनात्मक कार्यों और उस साहित्यिक संसार की ओर भी संकेत करता है, जिसे वे अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक-सांस्कृतिक दृष्टि से देख रहे थे।

फ़ारूक़ी साहब का योगदान केवल लेखन और आलोचना तक सीमित नहीं था। वह स्वयं भी सक्रिय अनुवादक थे। उन्होंने अरस्तू की ‘Poetics’ का पुनः उर्दू अनुवाद किया, जिसे ‘शेरियत’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने यूरोपीय तथा अन्य भाषाओं के साहित्य को उर्दू पाठकों तक पहुँचाने में भी भूमिका निभाई। ‘शबख़ून’ के माध्यम से उन्होंने फ़्रांसीसी, रूसी, बंगाली, मराठी, गुजराती तथा अन्य भाषाओं की रचनाओं के अनुवाद प्रकाशित करवाए और साहित्य को भाषाई सीमाओं से मुक्त करने की कोशिश की।

उनकी रचनात्मकता का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि उन्होंने उर्दू के अतीत को संग्रहालय की वस्तु बनाने के बजाय वर्तमान साहित्यिक चेतना का सक्रिय हिस्सा बनाने का प्रयास किया। मीर, ग़ालिब, अकबर इलाहाबादी, दास्तान-ए-अमीर हमज़ा और अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी की हिंदुस्तानी संस्कृति पर उनका काम इसी व्यापक परियोजना का हिस्सा है। वह आधुनिकता के विरोधी नहीं थे; बल्कि वे ऐसी आधुनिक आलोचनात्मक चेतना के पक्षधर थे जो अपनी भाषिक और सांस्कृतिक परंपरा को समझे बिना आधुनिकता को अधूरा मानती है।

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी को साहित्य अकादेमी पुरस्कार, सरस्वती सम्मान और पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। उनके निधन के साथ उर्दू साहित्य ने एक ऐसे बहुआयामी विद्वान को खो दिया जिसकी दृष्टि में साहित्य केवल रचना नहीं, बल्कि भाषा, इतिहास, संस्कृति, स्मृति और सौंदर्यबोध की एक समग्र संरचना था। फ़ारूक़ी की स्थायी महत्ता इसी में है कि उन्होंने उर्दू की शास्त्रीय विरासत को आधुनिक आलोचना की रोशनी में पुनः पढ़ा और आधुनिक उर्दू साहित्य को उसकी गहरी ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का अविस्मरणीय काम किया।

एक

तो यहाँ मैं आख़िर कहना क्या चाहता हूँ? क्या मेरा मतलब यह है कि—“एक ज़बान की कठिनाइयों को दूसरी ज़बान में ले जाना या स्थानांतरित करना”? या फिर—“अनुवाद की कठिनाइयाँ”? मेरा मतलब यक़ीनन इन दोनों से है, लेकिन उर्दू या हिंदी में एक ही तरह का जुमला गढ़ पाना मुमकिन नहीं है। पार्टिसिपल (कृदंत) को संज्ञा (क्रियावाचक संज्ञा) की तरह इस्तेमाल करने की तरकीब कुछ लैटिन मूल की भाषाओं में पाई जाती है; हमारी भाषा में यह सुविधा मौजूद नहीं है।

लिखना आसान है; अनुवाद करना मुश्किल।

मामला और ज़्यादा पेचीदा हो जाता है, जब जिस क्रिया (verb) से gerund (क्रियावाचक संज्ञा) बनाया गया हो, उसके दो मानी (अर्थ) हों—जैसा कि अमेरिकी भाषाविद् नोम चोम्स्की (Noam Chomsky) की मशहूर मिसाल में है : Flying planes can be dangerous.

यहाँ ज़बान की कोई ख़ास तक़वियत या अतिरिक्त ताक़त काम नहीं कर रही है; यह महज़ एक ऐसी मुश्किल है, जिसे किसी भी अनुवादक को पार करना मुश्किल होगा।

दो

हाल ही में मेरे एक दोस्त ने मुझसे पूछा : “क्या फ़ारसी में ﻕﻔﺷ (शफ़क़) के लिए कोई अलग लफ़्ज़ है?”
यह अरबी का शब्द है और उर्दू में इसका मतलब होता है—शाम की लालिमा, संध्या-प्रकाश, गोधूलि।

इसका मूल ﺵ-ﻑ-ﻖ (श-फ़-क़) है, जिसका बुनियादी अर्थ है—करुणा, मेहरबानी। यह अर्थ बदलकर, “शाम की लालिमा, संध्या, गोधूलि” कैसे बन गया, मैं ख़ुद नहीं कह सकता।

मैंने कहा, “नहीं। फ़ारसी में भी यही अरबी शब्द इस्तेमाल होता है।”

वह बोला, “मुझे यक़ीन नहीं होता कि फ़ारसी जैसी क़दीम और समृद्ध ज़बान में क़ुदरत के इतने आम और ख़ूबसूरत मंज़र के लिए कोई देसी लफ़्ज़ न हो।”

मैंने उससे कहा, “फ़रहंग-ए-मुईन—जो फ़ारसी की सबसे मुअतबर आधुनिक डिक्शनरी मानी जाती है—शफ़क़ (ﻕﻔﺷ) को कुछ इस तरह परिभाषित करती है : ‘सूरज डूबने के बाद आसमान की लालिमा।’ और साथ ही यह भी कहती है कि जो लोग इसे ﻖﻟﻔ (फ़लक़) के मानी में, यानी सूरज उगने से पहले की लालिमा के लिए इस्तेमाल करते हैं, वे ग़लत हैं।”

मेरा दोस्त क़ायल नहीं हुआ। तब मैंने उससे कहा, “उर्दू में हम शफ़क़ (ﻕﻔﺷ) का इस्तेमाल शाम और सुबह—दोनों वक़्त की लालिमा के लिए करते हैं।”

यह सुनकर वह हैरान रह गया कि अरबी और फ़ारसी में शफ़क़ सिर्फ़ एक ही लालिमा के लिए है, जबकि उर्दू में इसके दो मआनी हैं।

इस मिसाल में उर्दू, अरबी और फ़ारसी—दोनों से ज़्यादा समृद्ध साबित होती है। बल्कि भाषा के तौर पर अँग्रेज़ी से भी ज़्यादा समृद्ध दिखती है। क्योंकि अँग्रेज़ी में dusk सिर्फ़ “दिन और रात के बीच की आंशिक गोधूलि की हालत या अवधि” को कहते हैं। इसमें न शाम की लालिमा का ज़िक्र है, न सुबह की। Dusk का बुनियादी मतलब है—“गोधूलि का अँधेरा हिस्सा।” इसलिए dusky रंगत वही है, जिसे हम ﻻﻮﻧﺍﺴ (साँवला) कहते हैं। यहाँ भी ‘रोशनी’ का कोई ज़िक्र नहीं।

आप पूछते हैं, “अच्छा, तो twilight का क्या?”

अच्छा सवाल है। अँग्रेज़ी में twilight का मतलब है—“आसमान की वह मुलायम, फैली हुई रोशनी, जब सूरज क्षितिज के नीचे होता है—या तो सुबह सूर्योदय से पहले, या ज़्यादा आमतौर पर शाम को सूरज ढलने के बाद; और वह अवधि जिसमें यह रोशनी रहती है।”

आधुनिक अँग्रेज़ी से कुछ मिसालें देखिए :

It was hard to see him clearly in the thickening twilight.
These animals are most active during the hours of twilight around dawn and dusk.
We went for a walk along the beach at twilight.

पहली मिसाल साफ़ तौर पर शाम की रोशनी की तरफ़ इशारा करती है। दूसरी में बात वक़्त की है, रोशनी की नहीं। तीसरी में भी वक़्त का ज़िक्र है—सुबह या शाम तय नहीं—लेकिन अर्थ का दबाव शाम पर ही पड़ता है।

उर्दू में हमारे पास
ﺎﻧﻠﻭﮬﭜ ﻕﻓﺷ, ﺎﻧﻠﮬﮐ ﻕﻓﺷ, ﺎﻧﮣﻭﻫﭝ ﻕﻓﺷ (शफ़क़ फूलना, शफ़क़ खिलना, शफ़क़ फूटना) जैसे कई मुहावरे हैं। ये सब सुबह और शाम—दोनों की रोशनी की तरफ़ इशारा करते हैं, वक़्त की तरफ़ नहीं। जिन ज़बानों की यहाँ बात हो रही है, उनमें से किसी में भी इनके बराबर या इनके जैसे इस्तेमाल नहीं मिलते।

फिर उर्दू और आधुनिक हिंदी में हमारे पास
ﺎﻧﻠﻭﮬﭝ ﮪﺠﻧﺍﺴ (साँझ फूलना) भी है, जो ख़ास तौर पर शाम की रोशनी के लिए आता है।

तो अब सवाल यह है कि ﻕﻓﺷ (शफ़क़) का अनुवाद अँग्रेज़ी, फ़ारसी या अरबी में कैसे किया जाए, जहाँ उर्दू वाला मआनी (अर्थ)—ख़ासकर सुबह की रोशनी—मौजूद ही नहीं हैं? उर्दू में यह शब्द एक साथ दो मआनी रखता है : एक—वक़्त, दूसरा—रोशनी की कैफ़ियत। और साँझ फूलना जैसे मुहावरों की तो बात ही छोड़ दीजिए—यह उर्दू (या उर्दू से निकली हिंदी) के सिवा किसी और ज़बान में मुमकिन ही नहीं।

मेरा दोस्त पूरी तरह मायूस हो गया। इतनी क़दीम ज़बान फ़ारसी में शफ़क़ के लिए कोई देसी लफ़्ज़ नहीं—दो मआनी होना तो दूर की बात है! अरबी में कम से कम दो अलग शब्द तो हैं :

सुबह के लिए ﻖﻟﻔ (फ़लक़),
और शाम के लिए ﻕﻔﺷ (शफ़क़)।

तीन

तब synonyms यानी पर्यायवाची शब्दों की एक बहुत बड़ी समस्या सामने आती है। उर्दू/हिंदी में ‘प्रेम/प्यार’ के लिए हमारे पास कई शब्द हैं—इश्क़, मुहब्बत, उल्फ़त, प्यार, लगाव, लगन, उन्स, चाहत, प्रेम, नेह, स्नेह, मोह, प्रीत, लग, हुब्ब, शौक़, लौ, मिहर वग़ैरह—और इनके अलावा प्रेम करने या मुहब्बत में होने की हालत को बयान करने वाले असंख्य मुहावरे हैं।

अब देखिए, अँग्रेज़ी में ‘love’ के लिए क्या है? Dictionary of Synonyms में कुछ शब्द मिलते हैं—
Affection, Fondness, Adoration, Devotion, Lust, Desire वग़ैरह।

आप ख़ुद देख सकते हैं कि इनमें से कई शब्द उन उर्दू शब्दों के लिए ठीक नहीं बैठते, जिनका मैंने ज़िक्र किया। कुछ शब्द, जैसे Adore, असल में जो व्युत्पन्न (derived) अर्थ रखते हैं—इनका मूल अर्थ ‘पूजा करना’ है, न कि ‘प्रेम’। कुछ शब्द, जैसे Affection, कामुक या इरॉटिक प्रेम के लिए बिल्कुल बेकार हैं; ‘इश्क़’ या ‘प्रीत’ जैसी तीव्रता को तो वे बिल्कुल नहीं पकड़ पाते।

अब उलटा देखिए। उर्दू में ‘नफ़रत’ के लिए कौन-से शब्द हैं?

नफ़रत, और… सच कहूँ तो इस वक़्त मुझे और कोई शब्द तुरंत याद नहीं आ रहा।

अब अँग्रेज़ी में ‘hate’ के लिए जो शब्द फ़ौरन ज़हन में आते हैं, वे हैं—Abominate, Abhor, Loathe, Detest, Execrate, Despise.

अँग्रेज़ी में ‘hatred’ के लिए पर्यायवाची शब्द कहीं ज़्यादा हैं। इसके अलावा कई ऐसे शब्द भी हैं जो ‘नफ़रत’ के अर्थ-क्षेत्र को छूते हैं, हालाँकि उनके अपने अलग शेड्स भी हैं—Decry, Detract, Demean, Vituperate, Disfavour वग़ैरह।

इस मामले में उर्दू अँग्रेज़ी से मुक़ाबला नहीं कर सकती। यह कठिनाई ऐसी है जिसे पार पाना लगभग नामुमकिन लगता है।

इससे जुड़ी एक और दिक़्क़त यह है कि उर्दू और हिंदी—ख़ास तौर पर उर्दू—में ‘अदबी’ या ‘साहित्यिक’ भाषा का एक साफ़ बोध है। उर्दू/हिंदी में ‘अदबी लफ़्ज़’ लेखन में, ख़ासकर रचनात्मक लेखन में, और यहाँ तक कि अकादमिक या विद्वतापूर्ण बातचीत में भी बेझिझक इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

अँग्रेज़ी के शब्दकोश भी कुछ शब्दों या प्रयोगों को Literary (साहित्यिक) या Formal (औपचारिक) बताते हैं, लेकिन ऐसे शब्द बहुत कम हैं; और ‘Literary’ या ‘Formal’ का ठप्पा अपने आप में एक चेतावनी बन जाता है—अगर हो सके तो इस शब्द का इस्तेमाल मत करो। ऐसे शब्द या प्रयोग, मानक और बोलचाल की अँग्रेज़ी से धीरे-धीरे ग़ायब होते जा रहे हैं। मिसाल के तौर पर, ‘hate’ के ये शब्द Literary या Formal बताए जाते हैं—Abhor, Dislike, Detest.  ‘I dislike’ कहना, ‘I don’t like’ से ज़्यादा औपचारिक माना जाता है।

फिर कुछ बोलचाल के मुहावरे हैं, जिन्हें ‘अदबी’ या ‘औपचारिक’ लेखन या भाषण में टाला जाता है—Can’t bear…, Can’t stand… (इनमें पहला थोड़ा ज़्यादा शिष्ट और औपचारिक है।)

Loathe लगभग सबसे ज़्यादा सख़्त शब्द है, लेकिन इसे अनौपचारिक तौर पर कम अहम चीज़ों के लिए भी इस्तेमाल कर लिया जाता है, जहाँ इसका मतलब बस ‘बहुत ज़्यादा नापसंद करना’ होता है। मिसाल : “You may love him or loathe him, but you can’t deny his force.” यहाँ ‘love’ और ‘loathe’, ‘like’ और ‘hate’ से भी कमज़ोर पड़ जाते हैं।

तो कुल मिलाकर हालात बड़े उलझे हुए हैं। उर्दू/फ़ारसी में ‘नफ़रत’ के लिए इतने सारे शब्द और मुहावरे, इतने अलग-अलग अर्थ-छायाओं के साथ, ढूँढ़ पाना लगभग नामुमकिन है। अरबी में शायद हों, लेकिन मुझे यक़ीन नहीं।

इसका एक कारण यह भी है कि अँग्रेज़ी के मुक़ाबले उर्दू इतनी विविध परिस्थितियों में, और इतने बड़े पैमाने पर, साक्षर—वाक़ई साक्षर—लोगों द्वारा नहीं बोली जाती। जब तक हम उर्दू को उपलब्ध शब्दों के ज़्यादा और लगातार इस्तेमाल से समृद्ध नहीं करेंगे, तब तक उनमें नए अर्थ-विस्तार पैदा नहीं होंगे।

एक और समस्या यह है कि उर्दू से अनुवाद करने वाले अनुवादकों के पास कई क्रियाओं के लिए तैयार शब्दावली नहीं होती। उदाहरण के लिए دامن (दामन)—जिसका मतलब है ‘ऊपरी कपड़े का किनारा’। इससे बने मुहावरे बहुत-सी स्थितियों में ‘बचना’, ‘नज़रअंदाज़ करना’, ‘किनारा करना’, ‘दूर रहना’, ‘टालना’ जैसे अर्थ देते हैं। कुछ उदाहरण देखिए—

ﻥﻣﺍﺩ ﺎﻧﺎﭽﺑ   (दामन बचाना)
ﻥﻣﺍﺩ ﺎﻧﺍﮌﮬﭼ  (दामन छुड़ाना)
ﻥﻣﺍﺩ ﺎﻧﮌﺍﮬﺠ (दामन झाड़ना)
ﻥﻣﺍﺩ ﺎﻧﻛﮢﮪﺟ (दामन झटकना)
ﻥﻣﺍﺩ ﺎﻧﭨﻳﻣﺴ (दामन समेटना)
ﻥﻣﺍﺩ ﺎﻧﭨﻳﭙﻟ  (दामन लपेटना)
ﻥﻣﺍﺩ ﺎﻧﺭﻜ ﮦﺗ (दामन तह करना)

हमारा बड़ा फ़ायदा यह है कि ये सारे प्रयोग एक साथ पूरी तरह बोलचाल के भी हैं और पूरी तरह अदबी (साहित्यिक) भी। ध्यान देने की बात यह है कि जहाँ दामन फ़ारसी से आया हुआ शब्द है, वहीं ये सारे क्रियात्मक रूप अपनी जड़ें देशज, प्राकृत-आधारित भाषाई परंपरा में रखते हैं।

चार

भाषा संस्कृति की अभिव्यक्ति होती है। किसी संस्कृति में जो चीज़ें या कर्म नापसंद किए जाते हैं, उनके लिए सामान्यतः अभिव्यक्तियों की संख्या भी कम होती है। यह बात कहते हुए मैं कविता और गद्य के बीच कोई भेद नहीं कर रहा। बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दार्शनिकों, विचारकों और निबंधकारों में गिने जाने वाले आइज़ाया बर्लिन [Isaiah Berlin (1909 –1997)] रूसी और अँग्रेज़ी—दोनों में पूरी तरह द्विभाषी थे। जर्मन और फ़्रेंच पर भी उनकी प्रशंसनीय पकड़ थी, संभव है कि स्पैनिश पर भी। लेकिन जब उन्होंने यह कहा, तो वे कुछ हद तक भोलेपन का शिकार थे : “मैं शायद कुछ ज़्यादा जल्दबाज़ी में यह दावा करना चाहूँगा कि किसी लयात्मक कविता के अनुवाद में किसी भी इंसान ने कभी सचमुच प्रतिभा की मौजूदगी का अनुभव नहीं किया है।”

यह कथन तुरंत एक और सवाल खड़ा करता है : लयात्मक कविता (lyrical poetry) आख़िर है क्या? मान भी लें कि पश्चिमी काव्य-परंपरा में लयात्मक कविता की कोई स्वीकृत परिभाषा है, तब भी कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं—क्या ग़ज़ल एक लिरिक (lyric) है? क्या मुक्तिबोध की कविताएँ गीतात्मक कविताएँ हैं? क्या जापानी हाइकु को लिरिक (lyric) की श्रेणी में रखा जाना चाहिए?

बहरहाल, इस बिंदु पर आइज़ाया बर्लिन बेशक जल्दबाज़ी कर रहे थे। लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि संस्कृतियाँ जितनी अनोखी होती हैं, उतनी ही कई मामलों में एक-दूसरे से मिलती-जुलती भी होती हैं। अनुवादक को इन्हीं समानताओं तक पहुँचना होता है। मैं सहज रूप से मानता हूँ कि अँग्रेज़ी कविता के, या यहाँ तक कि फ़ारसी कविता के, मेरे कुछ अत्यंत प्रिय अंश उर्दू में संतोषजनक ढंग से नहीं आ सकते। लेकिन समानताओं को खोज निकालना असंभव नहीं है। मैं शीघ्र ही एक उदाहरण दूँगा, पर उससे पहले प्रेमचंद के संदर्भ में एक और बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ।

मेरा पहला दावा यह है कि प्रेमचंद का कोई भी अनुवाद अँग्रेज़ी में तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक अनुवादक उनकी उर्दू और हिंदी—दोनों पर समान सहजता और सुघड़ता (felicity) के साथ अधिकार न रखता हो, ख़ासकर वहाँ जहाँ दोनों संस्करण स्वयं प्रेमचंद ने तैयार किए हों, या कम-से-कम उनकी प्रत्यक्ष निगरानी में बने हों।

एक उदाहरण ‘गोदान’ (1936) का है। भाषा-विज्ञानी और उर्दू साहित्य के महत्त्वपूर्ण विद्वान मसूद हुसैन ख़ान (1919 –2010) ने कई वर्ष पहले, भारी विवाद और हड़कंप के बीच, यह दावा किया था कि ‘गोदान’ उर्दू की रचना नहीं है, क्योंकि उर्दू पाठ हिंदी से काफ़ी अलग है, और संभवतः उर्दू पाठ प्रेमचंद की मृत्यु के बाद तैयार किया गया। इसके विपरीत अमृत राय ने कहा कि उन्हें बचपन में अपने पिता की मेज़ पर एक मोटी पांडुलिपि याद है, जिसके शीर्षक-पृष्ठ पर ‘गोदान’ साफ़ उर्दू लिपि में लिखा हुआ था।

इससे भी ज़्यादा उलझाने वाला उदाहरण प्रेमचंद का उर्दू उपन्यास ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ (1921) है, जिसे उन्होंने पहले उर्दू में लिखा। इलाहाबाद से जुड़े एक प्रमुख उर्दू कवि, आलोचक और विद्वान जाफ़र रज़ा (1939 – 2022) का दावा है कि इसका हिंदी रूप ‘सेवासदन’ कोई मौलिक हिंदी उपन्यास नहीं है, बल्कि प्रेमचंद द्वारा स्वयं अपनी उर्दू रचना ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ का किया हुआ अनुवाद मात्र है। मैं उनके तर्कों में नहीं जाऊँगा। वह यह ज़रूर दिखाते हैं कि उर्दू और हिंदी पाठ (text) काफ़ी भिन्न हैं, लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि यह अनुवाद—या कहें रूपांतरण—स्वयं प्रेमचंद ने किया था।

फिर भी जाफ़र रज़ा साहब द्वारा उद्धृत हिंदी टेक्स्ट में कुछ अजीब बातें मिलती हैं, जो यह संकेत देती हैं कि शायद प्रेमचंद मानक हिंदी के प्रति बहुत सजग नहीं थे, और हिंदी मुहावरे को उतनी अहमियत नहीं देते थे। उदाहरण के लिए, प्रसिद्ध उर्दू मुहावरा ख़ून खौलना हिंदी टेक्स्ट में रक्त खौलना बन जाता है। मुझे नहीं मालूम कि ‘रक्त खौलना’ वास्तव में हिंदी में प्रचलित है भी या नहीं।

प्रेमचंद का ‘रजिस्टर’ (भाषा का रूप या शैली) बहुत व्यापक और विविध है। चूँकि उनके पात्र अधिकतर भोजपुरी-भाषी इलाक़ों से आते थे, इसलिए वह लगातार उनके संवादों को भोजपुरी से उर्दू/हिंदी में रूपांतरित करते रहते थे—इस बात का ध्यान रखते हुए कि भाषा बनावटी या कृत्रिम न लगे।
इसीलिए मेरा यह कहना है कि प्रेमचंद का कोई भी अनुवाद तब तक सफल होने की आशा नहीं कर सकता, जब तक अनुवादक भोजपुरी की लय और प्रवाह से परिचित न हो।

मेरा मूल तर्क यह है कि द्विभाषी या त्रिभाषी लेखकों को उन भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए, जिन्होंने उन्हें प्रभावित किया और उन भाषाओं के संदर्भ में भी, जिनमें उन्होंने वास्तव में अपना साहित्य रचा। आयरिश कवि, लेखक और नाटककार ऑस्कर वाइल्ड [Oscar Wilde (1854 –1900)] का चर्चित नाटक ‘सालोमे’ [Salomé (1891)] पहले फ़्रेंच में लिखा और मंचित किया गया था। यदि अँग्रेज़ी से उर्दू या हिंदी में अनुवाद करते समय फ़्रेंच पाठ को नज़रअंदाज़ किया जाए, तो यह ऑस्कर वाइल्ड के साथ अन्याय होगा। उर्दू के प्रमुख कहानीकार और आलोचक मजनूँ गोरखपुरी (1904–1988) को फ़्रेंच नहीं आती थी; उन्होंने ‘Salomé’ का उर्दू अनुवाद अँग्रेज़ी से किया, जिसके कारण ऑस्कर वाइल्ड के आशय में काफ़ी विकृति आ गई।

आयरिश लेखक, नाटककार और उपन्यासकार सैम्युअल बेकेट [Samuel Beckett (1906 – 989)] इसका एक और उदाहरण हैं। उन्होंने अपनी कई रचनाएँ अँग्रेज़ी और फ़्रेंच—दोनों में लिखीं। जब लेखक का अपना फ़्रेंच टेक्स्ट (text) उपलब्ध हो, तो केवल अँग्रेज़ी के आधार पर अनुवाद करना नासमझी होगी—कम-से-कम यह देखना तो ज़रूरी है कि वह फ़्रेंच में क्या कह रहे थे।

उर्दू से अनुवाद करने वाला कोई भी अनुवादक—विशेषकर बीसवीं सदी के पहले आधे हिस्से या उससे पहले की उर्दू रचनाओं का—तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक वह यह न समझे कि कम-से-कम बीसवीं सदी की पहली तिमाही तक अधिकांश उर्दू लेखक त्रिभाषी थे। उनके पास एक मातृभाषा (या कहें घरेलू भाषा) होती थी; उर्दू उनकी पहली साहित्यिक भाषा होती थी; फ़ारसी उनकी दूसरी समृद्ध भाषा होती थी और बहुतों के पास एक तीसरी समृद्ध भाषा भी होती थी।

उर्दू और फ़ारसी के महान् कवि, दार्शनिक और विचारक मुहम्मद इक़बाल (1877 – 1938) के मामले में—पंजाबी (घरेलू भाषा), उर्दू (पहली भाषा), फ़ारसी (दूसरी भाषा) उनकी मुख्य भाषाएँ थीं। वह अँग्रेज़ी में पूरी तरह दक्ष और प्रभावशाली थे; अरबी और संस्कृत का उन्हें अच्छा ज्ञान था; जर्मन में भी उनकी यथोचित पकड़ थी। अब आप ख़ुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनका अनुवाद करना कितना जटिल काम है।

उन्नीसवीं सदी में उर्दू और फ़ारसी के महानतम शायर मिर्ज़ा ग़ालिब (1797 – 1869) की भाषाएँ थीं—फ़ारसी (घरेलू और पहली भाषा), उर्दू (दूसरी भाषा), ब्रज (तीसरी भाषा), प्राचीन फ़ारसी (चौथी भाषा), अरबी (पाँचवीं भाषा)। उनके उर्दू ख़तों से पता चलता है कि उन्हें पंजाबी का भी थोड़ा-बहुत ज्ञान था। ग़ालिब ने अपनी शायरी में अरबी आदि का प्रत्यक्ष उपयोग भले न किया हो, लेकिन वे क्लासिकल फ़ारसी के प्रभाव और आकर्षण से भली-भाँति परिचित थे, और अरबी शब्दों की ताक़त और महत्व से भी। उनके फ़ारसी ख़त क्लासिकल फ़ारसी (साहित्यिक फ़ारसी) के अनेक शब्दों से भरे हैं, जिनमें से कई को उन्होंने पुनर्जीवित किया।

अंत में, मैं अपने उर्दू साहित्य पर किए गए आलोचनात्मक कार्य का ज़िक्र करना चाहूँगा, जिसे मैंने कभी अँग्रेज़ी में, कभी उर्दू में लिखा। मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझे अपनी उर्दू से अँग्रेज़ी में अनुवाद करना, अपनी अँग्रेज़ी से उर्दू में अनुवाद करने की तुलना में कहीं आसान लगा। यह समस्या शायद उन अन्य अनुवादकों के सामने भी आई, जिन्होंने मेरी आलोचना को उर्दू से अँग्रेज़ी में अनुवाद किया, या करने की कोशिश की।

मुझे फ्रांसीसी मानवविज्ञानी (Anthropologist) और संरचनावाद (Structuralism) के सबसे प्रमुख सिद्धांतकार क्लोद लेवी-स्ट्रॉस [Claude Lévi-Strauss (1908 – 2009)] की वह बात याद आती है, जो उन्होंने एक ऐसे लेख के बारे में कही थी, जिसे उन्होंने अँग्रेज़ी में लिखा था—फ़्रेंच में नहीं, जबकि फ़्रेंच उनकी मातृभाषा थी। उन्होंने कहा कि उस लेख में जो वह कहना चाहते थे, वह अँग्रेज़ी में बेहतर ढंग से व्यक्त हो सकता था; इसलिए उन्होंने अपनी मातृभाषा फ़्रेंच के बजाय अँग्रेज़ी को चुना।

पाँच

मैंने समानताओं (commonalities) की बात की थी। निष्कर्ष से पहले मैं दो छोटी, लेकिन मेरे ख़याल में महत्त्वपूर्ण बातों का संक्षेप में ज़िक्र करूँगा। अँग्रेज़ी में एक मुहावरा है—to give tongue.  इसका मूल प्रयोग शिकारी कुत्तों के संदर्भ में होता है, जब वे लोमड़ी की गंध पाकर ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगते हैं। समय के साथ इसका अर्थ-विस्तार हो गया और अब इसका मतलब होता है—ज़ोर से विरोध या शिकायत दर्ज करना; अपनी राय बुलंद आवाज़ में ज़ाहिर करना; हंगामा खड़ा करना।

अब उर्दू में एक मुहावरा है—ज़बान देना। आमतौर पर इसका अर्थ होता है—अपनी ज़बान देना, यानी वचन देना।

कभी-कभार उर्दू में ज़बान देना का मतलब यह भी हो सकता है कि किसी को बोलने की ताक़त देना, अभिव्यक्ति की शक्ति प्रदान करना। अब यह उम्मीद करना कुछ ज़्यादा ही दूर की कौड़ी लगती है कि उर्दू में ज़बान देना का अर्थ ‘ज़ोर से अपनी राय ज़ाहिर करना’, ‘हंगामा करना’ या ठीक-ठीक to give tongue जैसा भी हो सकता है। लेकिन मीर तक़ी मीर का यह शेर देखिए—

जो जानूँ तुझ में बुलबुल तह नहीं तो क्यों ज़बाँ देता
ज़बाँ कर बंद सारे बाग़ में मुझ को न रुस्वा कर

बुलबुल, मुझे तो लगता है कि तुम काफ़ी सतही क़िस्म के हो,
वरना तुम इतनी ज़ोर से क्यों बोलते?
अपनी ज़बान बंद रखो; पूरे बाग़ में मुझे रुस्वा (बदनाम) मत करो।

मेरा दूसरा उदाहरण ग़ालिब से है। अँग्रेज़ी में एक मुहावरा है—a little bird tells us, या a little bird whispers. यह मुहावरा ज़्यादातर पत्र-पत्रिकाओं में कॉलम लिखने वाले इस्तेमाल करते हैं, जब वे किसी ख़ुशगवार अफ़वाह की बात करते हैं—जैसे दो मशहूर लोगों के बीच शादी या रोमांस की संभावना।

ऑक्सफ़र्ड अँग्रेज़ी शब्दकोश हमें बताता है कि यह मुहावरा पहली बार 1833 में इस्तेमाल हुआ। उस वक़्त इसका रूप था—“A little bird has whispered its secret to me.”

अब ग़ालिब का एक मशहूर शेर है, जो 1851 में कहा गया—

आमद बहार की है जो बुलबुल है नग़्मा-संज
उड़ती सी इक ख़बर है ज़बानी तुयूर की

लगता है बहार आने वाली है, क्योंकि बुलबुल ख़ुशी-ख़ुशी गा रही है
यह जैसे उड़ती-सी कोई अफ़वाह है, जो परिंदों की ज़बानों से बह चली है

इस बात की कोई संभावना नहीं है कि अँग्रेज़ी का यह वाक्यांश 1850 के शुरुआती बरसों की दिल्ली में ग़ालिब तक पहुँचा हो। यह साफ़ तौर पर एक भावात्मक मेल है—लगभग एक दैवी संयोग। यहाँ आप congruence (अनुरूपता) और concordance (सामंजस्य) —दोनों की संभावनाएँ देख सकते हैं।

अब मैं आपसे बस इन्हीं शब्दों के साथ विदा लूँगा कि ग़ालिब ने एक भावुक और कुछ हद तक भोले वाक्य को भी स्वर्ग की घंटियों-सा मधुर बना दिया। उनका शे’र जटिल भी है और बेहद आनंददायक भी। यह हमें बताता है कि महान् कवि भाषा का इस्तेमाल किस तरह करते हैं।

(स्रोत: प्रस्तुत वक्तव्य शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी साहब द्वारा 20 मार्च 2012 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में आयोजित अनुवाद कार्यशाला में दिया गया था। यह पाठ (text) उर्दू की प्रख्यात विदुषी फ़्रांसेस डब्ल्यू. प्रिचेट (Frances W. Pritchett) की निजी वेबसाइट https://franpritchett.com/  से साभार लिया गया है।)

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