कहानी : कुछ रह गया
उम्मे हबीबा
20 सितम्बर 2026
सूरज की पहली किरण उसके कमरे में दाख़िल हुई। दीवार से टकराकर वह उसके चेहरे पर ठहर गई। ठंडी हवा का एक झोंका उसकी पलकों को हल्के से छू गया, मानो रात भर उसे दर्द में लिपटा देख यह सुबह अपना सारा स्नेह उस पर उड़ेल देना चाहती हो।
उसकी पलकें भारी थीं। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। भीतर अब भी अँधेरा पसरा था। वह सकबकाकर उठ बैठी। रात के साथ उसकी तकलीफ़ें भी जैसे किसी कोने में सिसककर सो गई थीं, लेकिन आँख खुलते ही वे फिर उसकी भीतरी तहों को चीरने लगीं। उसे लगा जैसे ज़मीन ने उसे अपनी आग़ोश में समेटकर ऊपर से मिट्टी की चादर बिछा दी हो।
रिया की नज़र दरवाज़े पर पड़ी। खुला हुआ दरवाज़ा उसे भीतर तक हिला गया। वह कुछ क्षण स्तब्ध खड़ी उसे देखती रही। फिर उसकी आँखों में पानी उतर आया।
वह बिस्तर से उठी और धीरे-धीरे बाहर की ओर बढ़ी। हर क़दम मानो अपने साथ एक अदृश्य बोझ उठाए हुए था।
तभी पीछे से किसी अनकही आहट ने उसके क़दम रोक दिए। वह पलटी। वहाँ कोई नहीं था। उसने एक बार पूरे कमरे पर नज़र दौड़ाई, फिर भी कुछ नहीं।
लेकिन कमरे में एक अजीब-सा खालीपन था, जबकि हर चीज़ अपनी जगह मौजूद थी।
बस... एक ख़ाली कुर्सी।
उसके पास पड़ी अधजली सिगरेट अब भी सुलग रही थी और सुबह की ताज़ा हवा में धुआँ घोल रही थी। जैसे कमरे की हर वस्तु उसकी रूहानी कैफ़ियत का बयान कर रही हो।
रिया भारी क़दमों से रसोई की ओर चली गई। उसने चाय चढ़ाई। उठती भाप धीरे-धीरे उसके भीतर उतरने लगी। तभी स्मृतियों की धुँध से एक बात उभरी—उसे चाय पसंद नहीं थी, फिर भी वह उसके साथ बैठकर चाय पी लिया करता था।
कप निकालने के लिए उसने अलमारी खोली। एक कप हाथ में लिया और तुरंत दरवाज़ा बंद कर दिया, जैसे किसी सवाल को उठने से पहले ही दफ़्न कर देना चाहती हो। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसे लगा, ये बेजान चीज़ें भी उससे कुछ पूछ रही हैं।
चाय का पहला घूँट उसके भीतर उतरा और एक पुरानी सुबह जाग उठी...
“जल्दी नाश्ता ख़त्म करो, रिया। हमें देर हो रही है। लौटकर घर भी आना है या वहीं रहने का इरादा है?”
रिया जल्दी-जल्दी सामान थैले में रखने लगी।
“पानी की बोतल रखना मत भूलना। और हाँ, खाना बनाकर रख लिया है न?”
“हाँ, मीर! जब तुम मुझे लेने निकले थे, तभी सारा काम निपटा लिया था।”
शाम ढलते-ढलते दोनों हँसते-बतियाते घर लौटे। रिया की हँसी जैसे घर के हर कोने में फैल गई।
“मीर, तुम भी न! उन लोगों को जवाब देने की क्या ज़रूरत थी? चुप भी तो रह सकते थे। हर बार महान् बनने की कोशिश क्यों करते हो?”
वह हँसते-हँसते दोहरी हो गई।
मीर मुस्कराया, कमरे में आकर कुर्सी पर बैठ गया और एक गहरी साँस ली। दिन भर की थकान जैसे उसी साँस के साथ कमरे में उतर आई। उसने जेब से रुमाल निकालकर माथे का पसीना पोंछा।
रिया पास रखा स्टूल खींचकर बैठने ही वाली थी कि मीर ने कहा, “एक गिलास पानी मिलेगा?” उसने दोनों पैर सामने रखी मेज़ पर फैला दिए। रिया पानी ले आई। गिलास उसकी ओर बढ़ाकर वह सामने बैठ गई और कुछ देर तक वह चुपचाप उसे देखती रही। उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी, लेकिन मीर के चेहरे पर थकान की महीन रेखाएँ साफ़ दिखाई दे रही थीं। रिया को लगा, जैसे वह कोई ऐसा बोझ उठाए हुए है जिसे शब्दों में नहीं रखा जा सकता। दोनों के बीच कुछ देर तक सिर्फ़ ख़ामोशी बैठी रही। फिर मीर ने घड़ी की ओर देखा।
“चलूँ अब। रात काफ़ी हो गई है। ठंड भी बढ़ रही है। देर हुई तो रास्ता मुश्किल हो जाएगा।” वह उठ खड़ा हुआ। “कल मिलते हैं, रिया।” रिया उसे दरवाज़े तक छोड़ने आई। वह बाहर निकला और धीरे-धीरे धुँध में घुलने लगा। कुछ ही क्षणों में उसका चेहरा ओझल हो गया। फिर उसका आकार भी। अंत में केवल कोहरा बचा रहा। रिया देर तक उसी दिशा में देखती रही।
घर के भीतर लौटते ही उसे लगा, जैसे अभी-अभी हँसी से भरा यह घर अचानक बहुत बड़ा और बहुत ख़ाली हो गया हो। तभी बाहर लगी घड़ी ने घंटा बजाया। वह चौंकी, कमरे में आई और समय काटने के लिए मेज़ पर रखी किताब उठाने को हाथ बढ़ाया। लेकिन उसकी नज़र वहीं ठिठक गई। मेज़ पर दो खाली चाय के कप रखे थे। उसने धीरे से एक कप छुआ। वह अब भी हल्का गरम था। रिया की उँगलियाँ ठिठक गईं। उसने मन ही मन पूछा, “अब भी... गरम?”
उस रात पर न जाने कितनी रातें बीत चुकी थीं। फिर भी... रिया कुछ देर तक वहीं खड़ी रही। कप उसके हाथ से छूटकर मेज़ पर लौट आया। उसने आगे बढ़ना चाहा, लेकिन लगा जैसे पाँव ज़मीन में धँस गए हों। वह दीवार का सहारा लेकर धीरे-धीरे वहीं बैठ गई। सामने दीवार पर एक तस्वीर टँगी थी। हवा के हल्के झोंकों से वह बार-बार हिलती और दीवार से टकराकर धीमी-सी आवाज़ करती—खट... खट... यह आवाज़ रोज़ उसके भीतर कहीं जाकर अटक जाती थी। वह उठी। लड़खड़ाते क़दमों से तस्वीर के पास पहुँची और काँपते हाथों से उसे कील से उतार लिया। तस्वीर उसके हाथ में थी।
दीवार पर अब सिर्फ़ एक फीका-सा निशान बचा था—वह जगह जहाँ बरसों तक तस्वीर टँगी रही थी। रिया उसी निशान को देखती रही। तस्वीर हट गई थी... पर उसका होना अब भी दीवार पर दर्ज था। उसे पहली बार लगा : कुछ चीज़ें चली नहीं जातीं। वे बस अपनी जगह से हटती हैं और अपने पीछे एक ऐसी अनुपस्थिति छोड़ जाती हैं, जो हर दिन दिखाई देती है। रिया ने तस्वीर को सीने से लगा लिया। उसकी आँखें बंद हो गईं। कमरे में अब कोई आवाज़ नहीं थी। सिर्फ़ दीवार पर बचा हुआ वह निशान था... और उसके भीतर... कुछ रह गया!
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बेला पॉपुलर
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