प्रस्तुत नहीं : अकेलापन कोई चुनता नहीं, वह दे दिया जाता है
प्रदीप अवस्थी
03 अक्तूबर 2026
कितना कुछ घट रहा है। दुनिया में, देश में, मुझ में। बहुत उलझन में हूँ। बहुत सारी बातें एक साथ सोच रहा हूँ। अपने मस्तिष्क में हर चीज़ का, हर स्थिति का हिसाब लगाने की कोशिश करता हुआ—घर के एक कोने से दूसरे कोने तक तेज़ी से चल रहा हूँ। बैठे-बैठे तो दिमाग़ फटने को होता है। फिर अचानक बैठता हूँ और उगल देता हूँ, अधूरा-सा कुछ :
जब बहुत दुखी होगा एक व्यक्ति
तो शायद रो पड़ेगा
जब दुःख असहनीय हो जाएगा
तो शायद चिल्ला पड़ेगा
जब दुखी होगा वह दूसरों का दुःख देखकर
निकल पड़ेगा घर से कि कुछ तो कर सकूँ किसी के लिए
आख़िर मैं भी हिस्सा हूँ इस संसार का
लेकिन दुःख ख़त्म नहीं होगा
तब चुप पड़ जाएगा एक व्यक्ति
कि नहीं है मेरे पास कोई उपाय
इस दुनिया के दुःख कम करने का
और कोई रास्ता नहीं
कि रोज़ ज़िंदा से लाशों में बदलते लोगों को
मुझे तब तक देखना ही है
जब तक मेरी बारी ना हो
इस लिखे हुए को ठीक या पूरा करने की कोशिश नहीं करता। क्या फ़र्क़ पड़ता है? बल्कि मुझे तो कविताओं का अधूरा छूट जाना ही अच्छा लगता है। रात के तीन बजे हैं। रूटीन भी तो ठीक करना है। लेकिन ख़याल पीछा नहीं छोड़ते।
मैंने संवेदनशीलता या प्यार ज़ाहिर करना या यह ज़ाहिर करना कि याद आती है, ऐसा करना बंद कर दिया। उस तरफ़ से भी ऐसा कोई जवाब आएगा, इसका भरोसा नहीं। जब वैसी ही गर्माहट लौटकर आने का कोई भरोसा ना हो, बल्कि लौटकर न आने का पूरा भरोसा हो, तो दुःख होता है, तकलीफ़ होती है। उस तकलीफ़ से बचने के लिए कोई क्या करता है? वह ज़ाहिर करना बंद कर देता है। मैंने ज़ाहिर करना बंद कर दिया था। कुछ समय ऐसे रहने के बाद, ज़ाहिर करना क्या होता है, यह मैं भूल ही गया। लेकिन मन में तो होता है, जिन लोगों के प्रति होता है। फिर वे लोग नींद में सपने में आकर सवाल पूछते हैं कि आख़िर हुआ क्या? सुबह उठकर जब रात का सपना याद आता है तो उनसे कहने का मन होता है कि गर्माहट लौटकर नहीं आएगी। मैं और ज़ख़्मी होने को प्रस्तुत नहीं।
अपनी एक कविता में मैंने इन प्यारे लोगों को नींद के घुसपैठिए कहा। कविताएँ एक लंबे बेरहम समय का सहारा बनीं। मैं सोचता हूँ और पाता हूँ कि मेरी जड़ें कहीं नहीं हैं। इसलिए सब कुछ मुझे अपने भीतर ही ढूँढ़ना पड़ता है। मैं कभी किसी शहर को अपना नहीं कह पाया, किसी गाँव को भी नहीं। मुझे किसी ऐसी जगह की याद नहीं आती जहाँ वापस लौटने का मन करे। कुछ लोग हैं बस मेरे अपने। इतने अपने कि रोज़ रात को सोने से पहले उनका चेहरा आँखों के सामने आ जाता है। हम सबके अंदर हमारी रहस्यमय दुनिया है जिसमें कोई शामिल नहीं। वहाँ हम अकेले ही हैं। शायद हम सब इस उम्मीद में रहते हैं कि जिस बेचारगी से हम ख़ुद को देखते हैं, ख़ुद को समझते हैं, उसी तरह कोई देखे, समझे। लेकिन जहाँ से जैसा मुझे दिखता है, वैसा सिर्फ़ मुझे ही दिख सकता है। जहाँ से जैसा किसी और को दिख सकता है, वैसा सिर्फ़ उसे ही दिख सकता है। हमारी अपनी-अपनी अदालतें हैं जिनमें हम ख़ुद को बरी करते रहते हैं।
अकेलापन कोई चुनता नहीं। वह दे दिया जाता है। फिर बस स्वीकार करना पड़ता है। बहुत कम उम्र में मैंने पाया कि मैं जो बोल रहा हूँ वह सामने वाले तक पहुँच नहीं रहा। इस तरह मैंने सुनना सीखा कि कोई कुछ कहे तो मुझ तक पहुँचे। यूँ भी लगता है कि लोग एक-दूसरे को ठीक से सुनना शुरू कर दें तो दुनिया की आधी समस्याएँ ख़त्म हो जाएँ। कभी लिखा था :
मैं जीतता तो वे दयनीय
मैं हारता तो वे दुश्मन
मुझे चैन चाहिए
न मैं जीतना चाहता था, न हारना। इन्हीं दुविधाओं के अलग-अलग छोरों पर मैं फड़फड़ा रहा था। चैन नहीं था। बेचैनी थी। अब भी है शायद। फिर यूँ भी लगता कि अपने चैन की कहाँ तक बात करूँ? पूरा समाज ही बेचैन है। कोई अपनी बेचैनी में चुप है, तो कोई चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि देखो मेरी तरफ़। इसी बेचैनी में भटकते रहना और इसका मतलब ढूँढ़ने में सफल या असफल होते हुए लगातार एक कोशिश में रहना ही नियति है शायद। हर समय का एक सच होता है, उसकी एक कहानी होती है। किसी एक समय में जो घटनाएँ हमारे अस्तित्व को बुनती हैं, कुछ समय बाद उनका लेशमात्र भी नहीं बचता। ज़िदें पीछे छूट जाती हैं, छटपटाहटें कम हो जाती हैं और भीतर उठते सवाल अपनी मौत मरने लगते हैं। घटनाएँ ज़रूर पीछे छूट जाती हैं, उनका असर नहीं छूटता। जितने अच्छे से, जितना संयम रखते हुए और जितनी शालीनता से हम खोना सीख जाएँ, उतना बेहतर। अपने जीवन का बीता हुआ खंगालने के लिए मैंने कविताओं का रुख़ किया। जिन बातों ने मेरे व्यक्तित्व को चुनौती दी, जिन बातों ने जीना मुश्किल किया, वही मेरी कविता में ज़्यादा आईं। जब-जब रातों में नींद नहीं आई, बात करने को कोई नहीं मिला, सुबहें उदासी में बीतीं, पुरानी बातों ने सपनों में आकर डराया, मैं अपनों से मायूस हुआ, मेरे अपने मुझसे मायूस हुए, रुलाई फूटी, आँखें दुखी, सड़कों पर रात-रात भर पैदल घूमा, तब-तब कविताएँ लिखीं। जब-जब गला भर आया और साँस आनी बंद-सी महसूस हुई, कविताओं के सहारे जीया। यह दुःख था, अकेलापन और चुप्पी थी, ऐसी स्थितियाँ थीं, जिनमें आप असहाय होते हो, जो कविताओं में व्यक्त हुईं।
जब रोना आता है, तब यह यक़ीन पुख़्ता हो जाता है कि मैं अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ हूँ और इस यक़ीन में बहुत सुकून छुपा है।
मेरा अंदर ग़ुस्सा था। लेकिन कभी नहीं हुआ कि मेरा ग़ुस्सा मुझसे बाहर कहीं भी ज़रा भी छलका हो। मेरा ग़ुस्सा मुझे भीतर से जलाता था। इस समय ने ज़ब्त करना सिखाया और सिखाया कि तुम्हारी छटपटाहटें सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारी हैं। याददाश्त अजीब खेल खेलती है। यथार्थ और भ्रम भी। घटनाएँ जैसे होती हैं और जैसे हम उन्हें याद रखते हैं, हमें पता भी नहीं चलता कब इनमें अंतर आने लगता है। सब कुछ अपने भीतर समतल करते हुए चलना पड़ता है। कुछ काल्पनिक बातें हम इतनी बार सोचते हैं कि वह फिर बहुत बाद में, घटे हुए सच की तरह याद आती हैं। मार्केज़ का कथन है—Just as real events are forgotten, some that never were can be in our memories as if they happened.
कभी यूँ भी लगता था कि मुझे तकलीफ़ों में रहना अच्छा लगने लगा था। लगातार अभावों में रहते हुए अभावों के ख़त्म होने का डर हावी था। क्या बचेगा जब जीवन बेहतर होने लगेगा! एक-एक दिन को आगे सरकाते हुए मैं रोज़ ख़ुद को रोक लेता था—और रुककर देखते हैं कुछ दिन। यह ठीक नहीं था। परेशान दिमाग़ जितना बेचारा होता है, उतना ही ताक़तवर भी। वह ख़ुद को पीड़ा पहुँचाने वाले खेल खेलता है। एक दूसरी बात यह भी थी कि यह सब भ्रम भी लगता था जिसे मैं अपनी कमियों को ढँकने के लिए गढ़ता था। ऐसा करके ख़ुद को बचाया जा सकता था।
अब तो शायद ठीक से याद भी नहीं कि कितनी तरह के जीवन थे, कितनी तरह के भटकाव (बाहरी नहीं भीतरी), जिनसे गुज़रकर, जिनसे टकराते हुए मैं लेखन तक पहुँचा। मेरे पास कुछ नहीं था उस समय। न साहित्य से कोई वास्ता, न किताबों से। दूर-दूर तक परिवार या जानने वालों में भी कोई नहीं इस दुनिया का। यह बहुत धीरे-धीरे हुआ कि रास्ते में बहुत कुछ आज़माते हुए मुझे शब्दों में शरण मिली। यह मैं चौबीस की उम्र की बात कर रहा हूँ। मैं सपने देखने लगा था। मुझे अपना रास्ता ढूँढ़ना था। बीच में इतना लेट कौन बदलता है अपना जीवन पूरी तरह, वह भी तब जब उम्र ज़िम्मेदारियाँ सँभालने की हो, उम्मीदें पूरी करने की हो। किससे कहता कि अभी ठीक-ठीक नहीं पता कि क्या करना है लेकिन जो कर रहा हूँ यह नहीं करना। तब तक का सब पीछे छोड़ दिया और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। आगे भी तब कुछ था नहीं ऐसा जो दिखे। डर थे कि क्या होगा। सब के सवाल थे जो मुझे जायज़ ही लगते थे लेकिन जवाब मेरे पास नहीं थे। मुझे ढूँढ़ने थे। मिल ही जाएँगे, यह भरोसा भी कच्चा था। बहुत उथल-पुथल थी भीतर जिसको मुझे समझना था, जिसे अपनाना था।
पिता सीआरपीएफ़ में थे। रिटायरमेंट लेकर घर लौट रहे थे। एक गाड़ी पर हमला हुआ। छह और आदमियों के साथ पिता भी उसमें थे। पिता को गोलियाँ लगीं, कहीं-कहीं शरीर से चमड़ी हट गई थी, शायद बम भी इस्तेमाल हुए थे। वे नहीं रहे, तब इक्कीस का था। माँ को स्कित्ज़ोफ़्रीनिया ने अपनी गिरफ़्त में जब लेना शुरू किया, तब चौदह-पंद्रह का था। बी.पी. चढ़ा, पारा बढ़ा, स्कित्ज़ोफ़्रीनिया का वह रौद्र रूप जीवन भर के लिए आपके अंदर बहुत कुछ तोड़ देने और उस माहौल में बड़े होते बच्चे के मन को जीवन भर के लिए अप्रत्याशित स्थितियों में बेचैन रखने के काफ़ी है। मैं देख रहा था। मेरे अंदर अपनी एक दुनिया पनप रही थी। तो फिर तो यह एक क्लासिक केस हुआ ना कि मुझे क़िस्सों, कहानियों और फ़िल्मों की दुनिया की तरफ़ आकर्षित होना ही था। मुझे किताबों और फ़िल्मों में पनाह मिली। मैं अपने सपनों को बहुत लोगों से, बहुत सारे अपने क़रीबियों से, बचाकर लाया बहुत दूर तक। लेकिन ये सपनों-वपनों की बातें तो मन के भीतर की बातें हैं, दुनिया को भला इनसे क्या मतलब! दुनिया की, लोगों की ठंडक से टकराकर वे सूखने लगे। मैं किसी तरह उन्हें ज़िंदा रखने की जद्दोजहद में लगा रहा। यही पहली लड़ाई बन गई थी। ज़िंदा रह पाते, तब तो पूरे होते। फिर बीच में वह समय भी आया जब लगातार पढ़ता, लगातार लिखता, दुनिया भर की फ़िल्में देखता। ख़ुद से कहता कि यह नींव पक्की करने का समय है। यह 2014 से 2019 का समय था जब ख़ूब कविताएँ लिखीं और एक उपन्यास भी।
स्कित्ज़ोफ़्रीनिया या किसी भी मानसिक बीमारी के कारण अक्सर कहीं दूर नहीं होते, आस-पास ही होते हैं, घर-परिवार में ही। रिश्तों की आपसी शाब्दिक और मानसिक हिंसा मेरे पहले उपन्यास की नींव बनी, हालाँकि बिल्कुल अलग परिवेश में। शहरी जीवन जो मेरे आस-पास था, उसमें रिश्तों में शामिल वैसी ही शाब्दिक और मानसिक हिंसा को लिखकर बाहर रख देना मेरे लिए ज़रूरी हो गया था। यहाँ ख़ालीपन और इच्छाएँ ज़्यादा थीं, नैतिकताएँ कम।
आप अपने अंदर आग चाहते हैं और जब बहुत कोशिश करने पर भी नहीं ढूँढ़ पाते तो निढाल होकर गिर पड़ने को जी चाहता है। जिन लोगों में और दुःख सहने की क्षमता नहीं बचती, वे दुखों से डरने लगते हैं। हर पल चौकन्ने रहने लगते हैं तैयारी में कि उससे कैसे बचा जाए। वे कम बोलने लगते हैं, कम दिखते हैं, कम मिलते हैं, कम सुनते हैं। इस तरह कम जीने लगते हैं और अपने ही जीवन से ग़ायब होने लगते हैं। इस सब के ख़िलाफ़ एक तरह का विद्रोह है कविता लिखना। मैं जिन पलों का हिस्सा नहीं था, वे मुझे चुभे। जिनका हिस्सा था वे भी। इस तरह होने और नहीं होने का फ़र्क़ मिटता गया। चुनने और नहीं चुनने का भी। मैंने क़दम ना आगे बढ़ाए, ना पीछे हटाए। हर चुभने वाली बात पर जो चुप रह जाते हैं, वे ऐसा काँटा बन जाते हैं जो ख़ुद को ही लगकर लहुलुहान होते रहते हैं। हारूकी मुराकामी का कथन याद आता है—But we cannot simply sit and stare at our wounds forever.
कितनी सारी बातें हैं जो हम महसूस करते हैं, उनके बारे में लगातार सोचते हैं लेकिन कभी किसी से नहीं कहते। मैंने कविताओं में जो बातें लिखीं, वह इसलिए कि उन बातों को याद रख सकूँ, इसलिए भी कि उन्हें भूल जाऊँ। मेरी कविताओं में मेरे हिस्से का जीवन, उसे सँभाल पाने की कोशिशें, कभी ख़ुद से तो कभी अपने आस-पास की दुनिया से लगातार संवाद हैं। वे मेरी अनिश्चितताओं का व्याख्यान हैं। जीवन के बड़े फ़ैसलों की अनिश्चितताएँ भी और प्रतिदिन के सूक्ष्म संदेहों की अनिश्चितताएँ भी।
रात। यह अगली रात है। बाहर तेज़ आवाज़ होती है। बादल बहुत ज़ोर से गरज रहे हैं। नींद खुल जाती है। याद आता है कि जब लेटा था तो नींद आ गई थी झट से। एक समय था जब नींद ने कितना धोखा दिया। नेमत है कि आप सोना चाहें और नींद आ जाए। कुछ लिखना है। उठकर पानी पीता हूँ। घोर अँधेरा है। बारिश है। फ़ोन में टाइप करता हूँ :
डराने वाली रातें अब भी आती हैं
कोई एक कटार से मेरे दिल को रेत रहा होता है
मैं आगे की ओर हाथ बढ़ाता हूँ
पूरे भरोसे से और
सामने से कोई हाथ नहीं होता
पर अब पहले की तरह बदहवासी नहीं दबोचती
बहुत धीरे-धीरे ही सही
मैंने बाहें फैलाकर गले लगाना सीख लिया है डरों को
माथे पर सजा लिया है अवसाद को
आँखों में एक कोना रख लिया है जीवन भर की उदासी के लिए
चुप्पियों को हिस्सा बना लिया है
जीवन को
लगभग सँभाल लिया है
अगली किसी अनहोनी तक के लिए
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