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ललित कार्तिकेय

1958 - 2012 | फ़रीदाबाद, हरियाणा

सुपरिचित आलोचक। 'सामने का समय' शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित। असमय दिवंगत।

सुपरिचित आलोचक। 'सामने का समय' शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित। असमय दिवंगत।

ललित कार्तिकेय के उद्धरण

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पॉलिटिकली करेक्ट होने के उथले, उम्र दुराग्रह ने समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की उड़ने और ग़ोताख़ोरी करने की क्षमता को बाधित किया है। एक अच्छी किताब अपनी 'पॉलिटिकल करेक्टनैस' अपने आंतरिक तर्कों से अर्जित करती है।

किसी किताब से प्रेम किए बिना सच्चे अर्थों में उसका अनुवाद संभव नहीं।

प्रेम का संभवतः सर्वाधिक उदात्त स्तर है—करुणा, पर-आत्मा प्रवेश।

जिन लोगों ने वास्तविक प्रेम नहीं किया, उन्हें कभी पता नहीं लगेगा कि वह भी एक तरह का परिश्रम ही है। एक करुणामय, धैर्य भरा परिश्रम।

हम पर्याप्त, बल्कि औसत तौर पर अति-मुखरता के अभ्यस्त है। हम चाहते है कि शब्द अर्थ का संपूर्ण वक्तव्य हो, अर्थ का संकेत नहीं।

हिंदी में सामाजिक यथार्थवाद का एक फूहड़ रूप, एक अचल मानक की तरह स्वीकृत है।

बिना एम्पॅथी के एक अनुवाद, किसी किताब के लेखक के सिर को अपने कंधों पर नहीं ढो सकता। वह तब कुली हो सकता है, लेखक का जुड़वाँ नहीं।

बुरे अनुवादों के पीछे जितना हाथ प्रतिभाहीनता का है, उतना ही अनुवादक और पुस्तक के बीच बनने वाले अ-प्रेम के रिश्ते का भी।

एक अनुवादक में प्रेम करने की, करुणा की बहुत क्षमता होनी चाहिए। उसमें प्रेम करने का परिश्रम, धैर्य और समझदारी होनी चाहिए।

एक अच्छी किताब अपनी माया से आपको सिड्यूस ही करती है।

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