ललित कार्तिकेय के उद्धरण
आत्मघाती प्रवृत्तियाँ अंततः अमानवीय सामाजिक परिस्थितियों की ही मानस-उत्पाद हैं।
संवेदना, सरोकार और सौंदर्य की आकांक्षा के अभाव में सृजन संभव ही नहीं है।
वे जो स्वयं को भद्र, सम्मानित और सुसंस्कृत मानने और मनवाने का पाखंड करते हैं, उनके व्यवहारों में छिपी या कभी-कभी कतई प्रकट हिंसा—संभवतः सबसे भयावह और सूक्ष्म हिंसा है।
मानवीय समाज के शायद अन्य किसी भी समूह के हिस्से में इतनी लंबी ग़ुलामी नहीं आई है, जितनी यह औरत के हिस्से में आई है।
मध्यवर्ग में बढ़ता भ्रष्टाचार, अपराधीकरण—दरअसल इच्छा-जगत में बने रहने की हड़बड़ाई कोशिशें भर हैं। इच्छा-जगत को यथार्थ में बदलने का एक अयथार्थ तरीक़ा।
किसी धड़धड़ाते अफ़सर की बजाय; एक लड़खड़ाते मुक्तिबोध मुझे ज़्यादा बेहतर मनुष्य लगते हैं, जिनके भीतर अपने वर्ग का बहिष्कृत अपराध-बोध मुखरित होता है और अपने व्यक्तित्व को रूपांतरित करने की आकांक्षा और संघर्ष।
जो नृत्य केवल दैहिक, यौन से निकला नृत्य है—वह मनुष्यों का नृत्य नहीं।
चीज़ों को गंभीरता से न विचारने के जोखिम से बचने का एक बारीक तरीक़ा है—आत्म-निंदा में लिप्त हो जाना।
पूर्णता सिर्फ़ स्वप्न है; जो देखा जाना चाहिए, जिसे संसार में मूर्तिमान बनाने की कोशिश करनी चाहिए। जो पूर्णता को अपनी मुट्ठी में जकड़ लेना चाहता है; हमेशा के लिए, उसको मृत्यु ही अपनानी होगी, क्योंकि पूर्णता एक अनंत प्रक्रिया है—वह मुक़ाम नहीं है।
देह श्रम करती है, सुख भोगती है तो दुःख भी भोगती है। देह में अदेह भी है—मनुष्य की अमूर्त जिज्ञासा, द्वंद्व, संघर्ष, सपने, न जाने कितना कुछ। इन्हीं से मिलकर मनुष्य का एक समूचा और वास्तविक संसार बनता है। जब तक मनुष्य की यौन-भाषा इस समूचेपन में स्थित नहीं की जाती, तब तक वह अश्लील भाषा ही है।
लोकतंत्र का सवाल आर्थिक, राजनीतिक सवाल भी है, पर अब वह एक बुनियादी नैतिक और सांस्कृतिक सवाल भी है।
दरअसल विकास का कोई भी विचार; जो अपने समाज के बहुसंख्यक लोगों की ज़रूरतों को मद्देनज़र रखकर नहीं बनाया गया, कोई भी मॉडल जो मुट्ठी भर लोगों को आकांक्षाओं-भर को अभिव्यक्त करता है; अंततः ऐसी ही सड़क होगा, जिस पर विकास का ट्रैफ़िक जाम हो जाए।
देह है तो यौन-भाषा भी होगी और उसके होने भर से न कविता अश्लील होती है, न चित्र, न नृत्य। लेकिन वह देह का एक कर्मभर है, कुल कर्म नहीं। देह के अन्य कर्म भी हैं, और जहाँ यौन इन सब की सक्रिय संगति में घटित नहीं हो रहा, वहाँ यह निस्संदेह अश्लील है।
एक-दूसरे के लिए आत्मिक आकुलता की दैहिक अभिव्यक्ति, संभवतः संसार का पवित्रतम दृश्य निर्मित कर सकती है।
पॉलिटिकली करेक्ट होने के उथले, उम्र दुराग्रह ने समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की उड़ने और ग़ोताख़ोरी करने की क्षमता को बाधित किया है। एक अच्छी किताब अपनी 'पॉलिटिकल करेक्टनैस' अपने आंतरिक तर्कों से अर्जित करती है।
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लोगों के जीवन में जब बदहाली होती है, असुरक्षा होती है, तब गोडसे के बग़ैर भी गोडसे पैदा हो जाते हैं।
जिस कविता का अर्थ शब्दों में ही मौजूद है और पाठक को उसे ग्रहण-भर करना होता है, वे कविताएँ कविता का उपभोक्तावाद पैदा करती हैं—पाठक को सृजनशील नहीं बनातीं।
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कवियों की सीमाओं के विस्तार और उनके काव्य-संस्कार की समृद्धि में बहुत बड़ी भूमिका उस वातावरण की भी होती है, जिसमें प्रखर आलोचनात्मक विवेक की अनिवार्य उपस्थिति होती है।
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जो मृत्यु-बोध महज़ कातरता और लिप्ति की ओर ले जाए, वह मृत्यु का अहंकारवादी बोध है—व्यक्तित्व में बद्धमूल व्यक्तिवादिता के साँचे में ढला हुआ।
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संकीर्णता से पैदा आत्मविश्वास और मात्र मूर्तताओं में घटित होती आशावादिता के मुकाबले, मुझे किसी निराला की हताशा ज़्यादा महत्त्वपूर्ण लगती है।
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यह ज़रूर होता है कि किसी दौर में कुछ विधाएँ (अ) रचनाकारों का भीड़-भरा मंच बन जाएँ। लघुकथा और ग़ज़ल हिंदी में दो ऐसे ही मंच हैं। यहाँ काफ़ी सारा हास्यास्पद उत्साह और अतिरेक और अतिरंजनाएँ हैं। जिनका यथार्थ बोध 'लघु' है, वे लघुकथाएँ बना रहे हैं; जिनके यथार्थ-बोध में हवाईपन है, वे ग़ज़लें।
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जिस समाज में पूँजी का वर्चस्व हो, वहाँ सिनेमा अनिवार्य रूप से उसकी जकड़बंदियों में ही ज़्यादा फँसा रहता है।
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जनता को अगर नेताओं, विचारकों, संस्कृतिकर्मियों द्वारा मुग़ालते में डालना एक सचाई है, तो यह भी एक काफ़ी बड़ी सचाई है कि जनता उनको इससे ज़्यादा मुग़ालते में डालने की ताक़त रखती है।
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'साहित्यकारों' की एक ख़ास प्रजाति लघुकथाओं और ग़ज़लों का उत्पादन करती है। यह प्रजाति ही या तो काफ़ी आबादी रखती है या फिर यह अति-उत्पादन करती है कि हिंदी की तमाम गंभीर पत्रिकाओं ने एक घोषणा ही अपने पृष्ठों पर देनी शुरू कर दी—कृपया हमें लघुकथाएँ और ग़ज़लें न भेजें।
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जाम की अराजकता की संस्कृति से हर्षद मेहता पैदा होते हैं, चंद्रास्वामी पैदा होते हैं, सुशील शर्मा पैदा होते हैं। अंततः वह हत्यारों, लुटेरों, डकैतों, उचक्कों, लंपटों की संस्कृति होती है।
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सहिष्णुता, उदारता और करुणा के सामाजिक आधारों को मज़बूत किए बग़ैर, मात्र कानूनी प्रतिबंधों की माँग करना—एक खोखला और पाखँडी प्रतीकवाद भर है।
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कल्चर के साथ दिक्कत यह हैं कि वह होती है, हमारी माँस-मज्जा में रची-बसी। वह रिश्वत के पैसे की तरह एकाएक नहीं आ जाती। उसे कार, सूट, कॉस्मेटिक्स की तरह ख़रीदकर नहीं लाया जा सकता।
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जीवन के हाथों जो ख़ुद बाँसुरी की तरह बजना नहीं जानता, वह बाँसुरी को बजाना भी नहीं जान सकता।
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एक अच्छी कविता शब्दों से ज़्यादा शब्दों के पीछे के अनदिखेपन में मौजूद होती है।
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कविता का अनलिखा अर्थ और उसकी व्यापकता, कविता पर निर्भर करने के साथ-साथ कविता पढ़ने वाले के मानस की व्यापकता पर भी निर्भर करती है।
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हाशिए पर जाए बग़ैर; आप एक श्रेष्ठ मनुष्य और कलाकार हो ही नहीं सकते, क्योंकि मुख्यधारा एक विराट गंदा नाला है।
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हिटलर या गोडसे जिन परिस्थितियों की कोख से पैदा होते हैं, यदि आप उन परिस्थितियों को बना रहे हैं या बनने दे रहे हैं, तो फिर प्रतिबंधों भर के बूते गोडसे का गौरवान्विकरण नहीं रोका जा सकता। तब तो गोडसे के गीत गाए ही जाएँगे!
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जिन लोगों को कविता पढ़ने की तमीज़ है, वे जानते होंगे कि हर अच्छी कविता में जो लिखा हुआ है; वह हमें उस तरफ़ ले जाता है जो नहीं लिखा हुआ है, लेकिन जो उस कविता का अनिवार्य हिस्सा है।
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मानवीय संबंधों के बिना अनुभवहीनता स्वाभाविक है, और अनुभवहीनता के बंजर में स्मृतियों की कोंपलें नहीं फूटतीं।
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वस्तु बना दिया गया मनुष्य, केवल वस्तुओं के संदर्भ में ही जीता-मरता है। ग़ुलाम बनाए गए मनुष्य को केवल मालिक-ग़ुलाम की वर्णमाला में अपने आखर लिखने आते हैं।
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जीवन से संवेदनशील, ग्रहणशील और सक्रिय संबंध बनाए रखने का संघर्ष करती हुई चेतना न स्मृतिहीन होती है, न स्मृतिजीवी।
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हम पर्याप्त, बल्कि औसत तौर पर अति-मुखरता के अभ्यस्त है। हम चाहते है कि शब्द अर्थ का संपूर्ण वक्तव्य हो, अर्थ का संकेत नहीं।
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जीवन से रागमय, संघर्षमय संबंध के अभाव में अनुभवों का अभाव भी होता है। असल संस्कृति और स्मृति उसी से बनती है।
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जिन लोगों ने वास्तविक प्रेम नहीं किया, उन्हें कभी पता नहीं लगेगा कि वह भी एक तरह का परिश्रम ही है। एक करुणामय, धैर्य भरा परिश्रम।
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जिनकी आँखों में सिर्फ़ काले और सफ़ेद के दो रंग हैं—वे दरअसल अंधे हैं या उल्लू।
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इतिहास विश्वसनीय नहीं होते। विश्वसनीय होती है अपने मन पर किसी कृति की वह खरोंच, जो हमेशा टीसती रहती है।
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एक बुरी कविता शायद अनात्म होती है, उसमें आंतरिकता नहीं होती। उसके भीतर मौन के वे क्षेत्र नहीं होते, जो पाठकीय संस्पर्श से मुखर हो जाएँ। वह उपभोक्ता दोपायों की तरह ही एकायामी होता है, क्योंकि वह उन्हीं के लिए है।
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लोक-मानस की संवेदना छुईमुई ढंग की नहीं होती, न उसमें एक अतिरिक्त आत्म-सचेतता होती है। सत्ता के प्रति उसमें तीखा व्यंग्य-भाव भी होता है।
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