राहुल सांकृत्यायन के उद्धरण
घुमक्कड़-धर्म ब्राह्मण-धर्म जैसा संकुचित धर्म नहीं है, जिसमें स्त्रियों के लिए स्थान नहीं हो। स्त्रियाँ इसमें उतना ही अधिकार रखती हैं, जितना पुरुष।
स्नेह जहाँ पुरुष-पुरुष का है; वहाँ वह उसी निराकार सीमा में सीमित रह सकता है, लेकिन पुरुष और स्त्री का स्नेह कभी प्लेटोनिक प्रेम तक सीमित नहीं रह सकता।
घुमक्कड़ी-धर्म छुड़ाने के लिए ही पुरुष ने बहुत से बंधन नारी के रास्ते में लगाए हैं। बुद्ध ने सिर्फ़ पुरुषों के लिए घुमक्कड़ी करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि स्त्रियों के लिए भी उनका वही उपदेश था।
कवि, लेखक और कलाकार यदि ज्ञान में टुटपुँजिए हों, तो उनकी कृतियों में गंभीरता नहीं आ सकती।
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घुमक्कड़ प्रकृति या मानवता को तटस्थ दृष्टि से नहीं देखता, उनके प्रति उसकी अपार सहानुभूति होती है और यदि वह वहाँ पहुँचता है; तो केवल अपनी घुमक्कड़ी प्यास ही पूरा नहीं करता, बल्कि दुनिया का ध्यान उन पिछड़ी जातियों की ओर आकृष्ट करता है।
घुमक्कड़ी, लेखक और कलाकार के लिए धर्म-विजय का प्रयाण है। वह कला-विजय का प्रयाण है और साहित्य-विजय का भी।
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महान् लक्ष्य को लेकर चलने वाले पुत्र को, दुराग्रही पिता की कोई परवाह नहीं करनी चाहिए और सब छोड़कर घर से भाग जाना चाहिए।
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यदि आदिम-पुरुष; एक जगह नदी या तालाब के किनारे गर्म मुल्क़ में पड़े रहते, तो वह दुनिया को आगे नहीं ले जा सकते थे।
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यौन-संसर्ग को उसके स्वाभाविक रूप तक में लेना कोई वैसी बात नहीं है, लेकिन आध्यात्मिक सिद्धि का उसे साधन मानना—यह मनुष्य की निम्न कोटि की प्रवृत्तियों से अनुचित लाभ मात्र है, मनुष्य की बुद्धि का उपहास करना है।
चौबीस तक घर से निकल जाना चाहिए; नहीं तो आदमी पर बहुत-से कुसंस्कार पड़ने लगते हैं, उसकी बुद्धि मलिन होने लगती है, मन संकीर्ण होने लगता है—शरीर को परिश्रमी बनाने का मौक़ा हाथ से निकलने लगता है।
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यदि जीवन में कोई अप्रिय वस्तु है, तो वह वस्तुतः मृत्यु नहीं है—मृत्यु का भय है।
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जिन धर्मों ने अधिक यश और महिमा प्राप्त की है, वह केवल घुमक्कड़-धर्म ही के कारण।
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मनुष्य में परावलंबी बनने की जो प्रवृत्ति, शिक्षित माता जागृत करना चाहती हैं—मैं समझता हूँ, उसकी शिक्षा बेकार है।
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शत्रु आदमी को बाँध नहीं सकता और न उदासीन व्यक्ति ही। सबसे कड़ा बंधन होता है स्नेह का और स्नेह में यदि निरीहता सम्मिलित हो जाती है, तो वह और भी मज़बूत हो जाता है।
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हरेक तरुण और तरुणी को घुमक्कड़-व्रत ग्रहण करना चाहिए। इसके विरुद्ध दिए जाने वाले सारे प्रमाणों को झूठ और व्यर्थ का समझना चाहिए। यदि माता-पिता विरोध करते हैं, तो समझना चाहिए कि वह भी प्रह्लाद के माता-पिता के नवीन संस्करण हैं।
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यदि कोई तरुणी-तरुण घुमक्कड़-धर्म की दीक्षा लेता है—यह मैं अवश्य कहूँगा कि यह दीक्षा वही ले सकता है, जिसमें बहुत भारी मात्रा में हर तरह का साहस है।
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जनकला दरअसल उपेक्षणीय चीज़ नहीं है। जनकला के संपर्क के बिना उस्तादी नृत्य-संगीत निर्जीव हो जाता है।
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बुद्ध और महावीर से बढ़कर यदि कोई त्याग, तपस्या और सहृदयता का दावा करता है, तो मैं उसे केवल दंभी कहूँगा।
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जितनी ही कोई जाति ज्ञानक्षेत्र से दूर होगी, उतनी ही वह घुमक्कड़ के लिए दर्शनीय होगी।
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जिस व्यक्ति को अपनी, अपने देश और समाज की प्रतिष्ठा का ख़याल होता है, उसे लज्जा और संकोच करना ही होता है।
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कला के सीखने में श्रम और लगन की आवश्यकता तो है ही, किंतु श्रम और लगन रहने पर भी; उस कला की स्वाभाविक क्षमता न होने पर आदमी सफल नहीं हो सकता।
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बाहरी जंजालों के अतिरिक्त, एक भीतरी भारी जंजाल है—मन की निर्बलता।
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आदमी जितना ही अधिक अपरिचित होता है, उसके प्रति उतनी ही अधिक सहानुभूति होती है।
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अल्पश्रुत व्यक्ति, देखी जाने वाली चीज़ों की गहराई में नहीं उतर सकते।
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शैव हो या वैष्णव, वेदांती हो या सिद्धांती—सभी को आगे बढ़ाया केवल घुमक्कड़-धर्म ने।
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तीस बरस से भारत से गए हुए एक मित्र जब पहली बार मुझे रूस में मिले, तो गद्गद् होकर कहने लगे—आपके शरीर से मुझे मातृभूमि की सुगंध आ रही है। हर एक घुमक्कड़ अपने देश की गंध ले जाता है।
प्रेम में स्वभावतः कोई दोष नहीं है। वह मानव-जीवन को शुष्क से सरस बनाता है, वह अद्भुत आत्म-त्याग का भी पाठ पढ़ाता है।
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आप अपना गाँव छोड़िए, हज़ारों गाँव स्वागत के लिए तत्पर मिलेंगे। एक मित्र और बंधु की जगह हज़ारों बंधुबांधव आपके आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप एकाकी नहीं हैं।
घर के पैसे के बल पर प्रथम या दूसरी श्रेणी का घुमक्कड़ नहीं बना जा सकता। घुमक्कड़ को जेब पर नहीं, अपनी बुद्धि, बाहु और साहस का भरोसा रखना चाहिए।
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सचमुच जो भावी घुमक्कड़ एक पुत्रा माँ के बेटे नहीं हैं, उनको तो कुछ सोचना ही नहीं चाहिए। भला दो अंगुल तक ही देखने वाली माँ को कैसे समझाया जा सकता है?
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घुमक्कड़ी किसी बड़े योग से कम सिद्धिदायिनी नहीं है, और निर्भीक तो वह एक नंबर का बना देती है।
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घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता।
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हमारे घुमक्कड़ असंस्कृत देश में संस्कृति का संदेश लेकर गए, किंतु इसलिए नहीं कि जाकर उस देश को प्रताड़ित करें। वह उसे भी अपने जैसा संस्कृत बनाने के लिए गए। कोई देश अपने को हीन न समझे, इसी का ध्यान रखते हुए उन्होंने अपने ज्ञान-विज्ञान को उसकी भाषा की पोशाक पहनाई, अपनी कला को उसके वातावरण का रूप दिया।
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रामानुज, मध्वाचार्य और दूसरे वैष्णवाचार्यों के अनुयायी मुझे क्षमा करें, यदि में कहूँ कि उन्होंने भारत में कूप मंडूकता के प्रचार में बड़ी सरगर्मी दिखाई।
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यदि जीवन में कोई अप्रिय वस्तु है तो वह वस्तुतः मृत्यु नहीं है, मृत्यु का भय है।
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घुमक्कड़ असंग और निर्लेप रहता है, यद्यपि मानव के प्रति उसके हृदय में अपार स्नेह है।
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वस्तुतः घुमक्कड़ी को साधारण बात नहीं समझना चाहिए, वह सत्य की खोज के लिए कला के निर्माण के लिए, सद्भावनाओं के प्रसार के लिए महान दिग्विजय है।
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भारत जैसी मातृभूमि पाकर कौन अभिमान नहीं करेगा? यहाँ हज़ारों चीज़ें हैं जिन पर अभिमान होना ही चाहिए।
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मातृभूमि का अभिमान पाप नहीं है, यदि वह दुरभिमान नहीं हो।
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असली घुमक्कड़ मृत्यु से नहीं डरता, मृत्यु की छाया से वह खेलता है लेकिन हमेशा उसका लक्ष्य रहता है, मृत्यु को परास्त करना—वह अपनी मृत्यु द्वारा उस मृत्यु को परास्त करता है।
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