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कार्ल मार्क्स की मृत्यु : एक गुप्त इश्तिहार

कितनी तीखी ठंड है, एंगेल्स! कैसी गहरी निस्तब्धता की ओर बढ़ती जा रही है यह पृथ्वी! फिर भी देखो, दिसंबर की मृत्यु को भुलाकर, जनवरी की जड़ता को पीछे छोड़कर, लंदन की सड़कों पर एक नई चेतना जन्म ले रही है। जैसे कोई प्रतीक्षा हो किसी अनिवार्य परिवर्तन की। शायद भयंकर प्रलय, या फिर एक शाश्वत शांति—प्रशांति! पर बताओ, यह विद्रोह आएगा कैसे? यह शांति उतरेगी कैसे? और यह गुप्त इश्तिहार आख़िर लिखा जाएगा किस भाषा में? क्या तुम्हारे पास वैसा कोई काग़ज़ है, जिस पर मार्क्स फिर से जीवित हो उठें? या कोई ऐसा प्रेम, जो सब कुछ हिला दे?

समय की धूल से उठकर युग के सामने खड़ा हूँ फिर से। जैसे किसी भूले हुए विचार की फिर से वापसी हो। मैं देख रहा हूँ कि दुनिया के राष्ट्र दिन-ब-दिन और अधिक सख़्त, अधिक सतर्क, और अधिक नियंत्रक बनते जा रहे हैं। राज्य अब केवल एक संस्था नहीं रहा; वह एक जटिल शक्ति-तंत्र में बदल चुका है... नियंत्रण, भय और व्यवस्था का नाम लेकर दमन को सामान्य बना दिया जाता है।

इस दुनिया को कौन बचाएगा, फ़्रेडरिक?
कोई नहीं... सचमुच कोई नहीं! 

मुझे आश्चर्य नहीं होता, पर एक गहरी विडंबना महसूस होती है... इतने संघर्षों, क्रांतियों और बलिदानों के बाद भी श्रम का मूल्य आज भी कम आँका जा रहा है। जो राज्य स्वयं को ‘लोकतांत्रिक’ कहते हैं, वही अक्सर मज़दूरों की आवाज़ को दबाते हैं, किसानों के रास्ते रोकते हैं और विरोध को अपराध में बदल देते हैं। क्या यही वह स्वतंत्रता है, जिसके लिए हमने लड़ाई लड़ी थी?

तुम इसे विकास कहते हो फ़्रेडरिक? तुम चुप क्यों हो? मैं इसमें पूँजी का केंद्रीकरण देख रहा हूँ। मैं इसमें श्रमिक अधिकारों का क्षरण देखता हूँ। नई आर्थिक नीतियाँ और कॉरपोरेट शक्तियों का विस्तार; दरअस्ल उसी पुराने ढाँचे का नया रूप हैं, जहाँ संपत्ति कुछ हाथों में सिमटती जाती है और बहुसंख्यक लोग असुरक्षा में जीते हैं।

तुम इतने निश्चयी, इतने कठोर कैसे हो सकते हो, फ़्रेडरिक? 

हम सब एक ढलती हुई चेतना और फिसलती हुई व्यवस्था में जी रहे हैं। जब तक झूठ हमें ढाँपे हुए है, तब तक हमारा गिरना केवल समय की बात है। आज का राज्य केवल बल प्रयोग से ही दमन नहीं करता; वह सूचना को नियंत्रित करता है, विचारों को आकार देता है और सत्य को ढक देता है। इंटरनेट बंद किया जाता है, समाचारों को नियंत्रित किया जाता है और लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि यही सामान्य है, यही आवश्यक है।

आज मेरे इस जर्जर, रोगग्रस्त शरीर में कोई आशा जन्म नहीं लेती, बल्कि आशा अब ज़हर की तरह लगती है। इस दुनिया के लिए जो मैंने सोचा था, हर इंसान को जो सोचना चाहिए... पृथ्वी का हृदय कब से इतना ज़हरीला हो गया, फ़्रेडरिक?

मैं उन गगनचुंबी इमारतों की लाल और पीली रोशनियों को देखता हूँ और समझ जाता हूँ। हाँ, वही पीली, जैसे कारख़ानों के ज़हरीले धुएँ में दम तोड़ती आँखें धीरे-धीरे पीली पड़ जाती हैं। अभी ‘विकास’ एक ऐसा शब्द बन गया है, जिसके भीतर असमानता छिपी रहती है। ऊँची इमारतों और चमकती सड़कों के पीछे, श्रमिक का पसीना अदृश्य कर दिया जाता है। देखो, अधिकारों का क्षरण, श्रम का अवमूल्यन और मनुष्य का धीरे-धीरे एक संख्या में बदल जाना।

कोई उम्मीदहीन उम्मीद में जीते लाखों-लाखों मज़दूर अब सिर्फ़ नंबर बनकर पहचाने जाते हैं... मुर्ग़ा बनाए हुए आदमी आख़िर कहाँ जाएगा!

एंगेल्स! इस समय तो शहर की गलियों में वसंत उतर आना चाहिए था। चेरी के फूलों की ख़ुशबू से सड़कों का कोना-कोना भर जाना चाहिए था! दुनिया को अब तक बदल जाना चाहिए था! आज सब कुछ में इतनी देर क्यों! क्यों सब कुछ टूटा हुआ! बिखरा हुआ!

क्या अब भी हमारे जागने का समय नहीं आया? क्या अब भी हमारे भीतर की मानवता को जागने की फ़ुर्सत नहीं हुई? क्या अब भी हमारी मनुष्यता सोई हुई है? चेरी ब्लॉसम के हल्के गुलाबी और श्वेत रंगों का यह अद्भुत मिलन... क्या हमें फिर से निराशा और मृत्यु के अँधेरे से बाहर बुला नहीं रहा?

चेरी सचमुच एक रहस्यमय फूल है, एंगेल्स! देखो, मार्च की गहराइयों में चलते-चलते कैसे यह सूखी, कठोर सड़कों में जीवन और उल्लास भर देता है! अगर तुम इस कड़ाके की ठंड को नज़रअंदाज़ कर बाहर निकलो, और लौटकर मुझे उस चेरी-फूलों से भरे शहर की धड़कन सुनाओ, तो शायद मेरा यह क्षीण, बीमार शरीर थोड़ी-सी शांति पा सके!

मुझे विश्वास है इस वर्ष कुछ बदलेगा। कुछ अलग! दुनिया जागेगी। मज़दूर जागेंगे, किसान जागेंगे, और वे भी जागेंगे जो सबसे साधारण, सबसे उपेक्षित हैं झुग्गियों में रहने वाले लोग...

तुम्हें क्या लगता है, फ़्रेडरिक, क्या अब तक ‘दास कैपिटल’ हर घर तक पहुँच चुका है? क्या लोगों को उसका अस्ल अर्थ, उसका मूल्य मिला है? क्या युवाओं के साथ-साथ युवतियाँ, वृद्धाएँ, और हाशिए पर खड़े लोग भी ‘मैनिफ़ेस्टो’ हाथ में लेकर सड़कों पर उतर आए हैं? इस दुनिया को मनुष्यों के लिए बनाना होगा... एक ऐसी दुनिया, जहाँ मनुष्य सचमुच जी सके।

मैं जानता हूँ, हर दमन के भीतर प्रतिरोध की एक चिंगारी होती है। वह चिंगारी कभी किसी खेत में भड़कती है, कभी किसी फ़ैक्ट्री के फाटक पर, कभी किसी सड़क पर बैठे लोगों के नारों में। 

तुम इस तरह, इतनी निरासक्ति और असहाय दृष्टि से मेरी ओर क्यों देख रही हो, जेनी? क्या तुम्हें मैं एक दुर्बल, लाचार, चिड़चिड़ा और असफल वृद्ध लगता हूँ आजकल? या आज इस आरामकुर्सी पर धँसकर बैठा हूँ इसलिए तुम्हें लगता है कि मैं पूँजीवादी हो गया हूँ? मुझे... मुझे ज़मीन पर लिटा दो... मिट्टी में मिल जाने से पहले, मुझे उस मिट्टी की गंध एक बार महसूस करने दो...

उदास मत हो, एंगेल्स! मृत्यु के बाद ही तो लोग और अधिक जागते हैं, फ़्रेडरिक! तब शायद वे हमारे विचारों पर और अधिक सोचेंगे... है न? तुम आजकल इतने मौन क्यों हो? देखो, लंदन की ये सड़कें हमें एक नए उत्साह की ओर ले जा सकती हैं! लेकिन तुम्हारे भीतर यह विरक्ति कब से जन्म लेने लगी, फ़्रेडरिक? क्या तुम भी मेरी बेटी और दामाद की मृत्यु की तरह कठोर हो गए हो? इतने ठंडे... इतने निस्पंद! कुछ कहते क्यों नहीं?

यह दुनिया एक अजीब-सा यूटोपिया है, फ़्रेडरिक! तुम बस कल्पना में प्रवेश करो, देखोगे, चारों ओर सब कुछ कितना वास्तविक हो उठता है। जानते हो, कल रात भी जेनी मेरे सपने में आई थी। ठंडी, पर चमकती हुई उसकी नीली आँखें, नयनतारा की तरह, काफ़ी देर तक मुझे देखती रहीं। 

उफ़्, जेनी! तुम्हारे हर सपने को मैं पूरा करना चाहता था। मैं चाहता था, हाथों में हाथ डाले, केवल तुम्हारे पास एक हरे पत्ते की तरह बन जाऊँ, एक ऐसा पत्ता, जो यौवन की रोशनी में हमेशा दमकता रहे। तुम्हारे जीवन के हर कटु सत्य को मिटाकर, सुबह के उगते सूरज की तरह कोमल और सुंदर बना दूँ। तुम एक स्त्री हो, पर तुम्हें सबसे पहले एक मनुष्य के रूप में सम्मान मिले! स्त्री और पुरुष... दोनों ही मनुष्य बन सकें!

इन सबको सोचते-सोचते, विरोधों के बीच लड़ते-लड़ते जब मैं थक गया था... जब सबने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह एक अवास्तविक कल्पना है... जब मैं धीरे-धीरे पागलपन की ओर बढ़ रहा था... तब तुमने मुझे उस तरह क्यों देखा, जेनी? तुमने अपने शांत, सरल अस्तित्व को मेरी उलझी हुई दुनिया में क्यों उतार दिया? मैं तुम्हें क्या दे सका! उल्टा, तुमने ही मुझे पूर्ण कर दिया। तुम ही मेरा आश्रय बन गई।

जेनी, आजकल तुम्हारी वे शांत, फिर भी कठोर नीली आँखें, क्या संकेत देती हैं? एक अशांत दुनिया का? समाज का? पूँजीवाद का? युद्ध का? मनुष्य के हाथों मनुष्य के रक्त का? साम्राज्य का? आधिपत्य का? या यह सब केवल एक भ्रम है?

जेनी, अब तुम मुझे मेरी उसी यूटोपिया-सी लगती हो... जैसे अभी, इसी क्षण, मैं तुम्हारे साथ, उस स्वप्निल छाया के साथ, किसी लंबी यात्रा पर निकल पड़ूँ। फिर से उसी यौवन के उन्माद में डूब जाऊँ। सपने देखूँ... तुम्हें सुनाऊँ इस दुनिया के सबसे गहरे प्रेम की कथा... तुम्हारे लिए रचूँ एक अद्भुत प्रेम-कविता! या फिर एक विद्रोह की कविता! क्योंकि तुम जानती हो, जेनी, इस दुनिया के सारे विद्रोह वास्तव में प्रेम से ही जन्म लेते हैं। प्रेम के बिना कोई विद्रोह संभव नहीं।

लेकिन आजकल... उफ़्! चारों ओर कितनी कठोर सच्चाइयाँ हैं और झूठ का कितना विशाल, भयावह प्रदर्शन! राष्ट्र हमसे डरता है—हमारी एकता से, हमारी चेतना से। इसलिए वह तुम्हें बाँटता है, तुम्हें अलग-अलग ख़ेमों में रखता है, ताकि तुम अपनी सामूहिक शक्ति को भूल जाओ। पर याद रखो, इतिहास का पहिया कभी स्थिर नहीं रहता। वह उन्हीं हाथों से घूमता है, जो मेहनत करते हैं, जो सवाल उठाते हैं, जो बदलाव की कल्पना करते हैं।

जेनी, फिर भी हम एक अजीब-सा अस्त्र लेकर जन्मे हैं... प्रेम! प्यार! माया! दया! और आँसुओं की लहर... इस दुनिया में शक्ति कभी सर्वोच्च नहीं हो सकती, चाहे उसके पास कितनी ही पूँजी हो, हथियार हों, बारूद हो...

जेनी, जब राढ़ की धरती के उस टेसू के फूल के रंग से मेरा परिचय हुआ, जब मैं धीरे-धीरे तुम्हारी गर्दन से बाल हटाकर एक हल्की-सी चुम्बन की आड़ में किसी अद्भुत दुनिया में प्रवेश कर रहा था, किसी गहरे, मनोहर बोध की ओर झुक रहा था... तब यह जो मैं हूँ, यह जो तुम हो, और सफ़ेद-लाल बहुवर्षजीवी फूलों की वर्षा... यही तो मेरे जीवन का वसंत है!

उफ़्! और वह टेसू! कितना तीखा, कितना प्रखर, प्रचंड लाल!

लेकिन तुम जानती हो, जेनी, यह युग जनसंहार का है, जमे हुए ख़ून की बीमारियों का... घुटन भरी साँसों के बीच भी जीते रहने की मजबूरी का... उत्पीड़ितों और शोषितों का...

फिर भी वह अजीब-सा अस्त्र सबसे शक्तिशाली है, उसका नाम है प्रेम!
क्या तुमने उसे भी लाल रंग दिया? रक्त गुलाब!

आज मार्च की चौदह तारीख़ है... कुछ ही देर में पूरब की दिशा में सूरज उगेगा। मैं तुम्हारे एक स्वप्न को तोड़कर दूसरे स्वप्न में प्रवेश कर जाऊँगा, जेनी... वे सब आएँगे... मुझे बिस्तर से उठाकर आरामकुर्सी पर बैठा देंगे। कहेंगे, अपने दुख, अपने शोक को भूल जाओ। डॉक्टर आएगा, मेरी नब्ज़ देखेगा। 

फ़्रेडरिक आएगा और कहेगा, “आओ, फिर से दुनिया को बदलने की योजना बनाएँ!”

और मैं, अपनी जर्जर, बूढ़ी, निराश छाया में तुम्हारी मृत्यु, अपनी बेटी और दामाद की मृत्यु सबको गड्ड-मड्ड कर दूँगा... तुम्हें भी, जेनी! उफ़्! जीवित लोगों के लिए मृत्यु एक गहरी, असहनीय पीड़ा है! हर कोई इससे मुक्त होना चाहता है... लेकिन...

फ़्रेडरिक, तुम आ गए? सुनो... 

जानते हो, उस दिन बेटी और दामाद की क़ब्र से लौटते समय मैं फिर उसी बूढ़े भिखारी के बारे में सोच रहा था। हम हर पल जो दया का नाटक करते रहते हैं, उसे नज़रअंदाज़ करना होगा! जब हम नाटक को भूल जाएँगे तब सब कुछ सही होगा मेरा जान! 

सबसे क्रूर चीज़ है हमारी यह दया! जो दया करता है, वह खुद को महान् और अहंकारी बना लेता है और जिस पर दया की जाती है, वह कमज़ोर और हीन हो जाता है। इस रेखा को मिटाना होगा! सीमाएँ बनाओ, पर ऐसी सीमाएँ नहीं, जो मनुष्य को बाँट दें!

फिर भी, मैंने पूरी ज़िंदगी दया को ही सर्वोच्च समझा... यह मेरी भूल थी! इस भूल के लिए मैं ख़ुद को कभी क्षमा नहीं कर पाता। मैंने बार-बार अपने ही भीतर ख़ुद को मारकर मृत्यु से बचने की कोशिश की है...

सोचो, फ़्रेडरिक, अगर दया न होती, तो क्रूरता होती! और शायद कमज़ोर की क्रूरता उसे पीड़ा और आघात से बचाने का एक साधन बन जाती!

फ़्रेडरिक, क्या इसे भी तुम यूटोपिया कहोगे? जानता हूँ...

आज, इतने सारे 14 मार्च पार करने के बाद, जब मैं देखता हूँ, इस दुनिया के घाव और गहरे हो गए हैं। और गहरे उतर गया है झूठ... श्रम में, श्रमिकों में, जन्म में, मृत्यु में... लोकतंत्र में... दया में... करुणा में...

मनुष्य इतना हिंसक क्यों है? इतना निर्मम क्यों? उन छोटे-छोटे बच्चों के प्रति भी? इन चेरी-फूलों जैसे मासूम बच्चों को कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं सत्ताधारी लोग, लोकतांत्रिक देशों के नेता, मंत्री, अधिकारी! जब जेफ़री एपस्टीन पैदा हुआ था, क्या मैं तब मर चुका था, एंगेल्स? इस विशाल दुनिया में क्या कोई एक भी ऐसा इंसान नहीं था, जो यह सब रोक पाता? तो हमने इतने समय तक क्या किया, फ़्रेडरिक? क्या एक भी सच्चा मनुष्य तैयार नहीं कर पाए?

बोलो...
कुछ तो बोलो...
मौन रहकर मुझे इतना हास्यास्पद मत बना दो...

मैं जानता हूँ, ‘धारणा’ और ‘धारण’ के बीच गहरा अंतर होता है। लेकिन क्या इसीलिए इस तरह मार दिया जाएगा सच्चे विचार को? इस तरह श्रम एक वस्तु में बदल दिया जाएगा? इस तरह तय की जाएगी बच्चे, स्त्री, नदी, मिट्टी, फ़स्ल और उपज की क़ीमत? अन्न के लोभ में सड़कों पर जलती रहेंगी अन्न उगाने वालों की लाशें और किसानों की आत्महत्या पर मीडिया मौन रहेगा? हर राजपथ बंद हो जाएगा कृषकों के लिए? यह कैसा राष्ट्र है? कैसा गणतंत्र? 

जेनी, मैंने तुमसे एक दिन कहा था, इस दुनिया में कुछ भी नहीं खो जाता। किसी-न-किसी रूप में अतीत फिर खोज लिया जाता है। कहीं-न-कहीं कोई जीवाश्म मिल ही जाता है और वहीं से फिर एक नया इतिहास जन्म लेता है। इस तरह न तो पूर्ण विनाश संभव है, न ही पूर्ण निर्माण! मनुष्य ही अपने समय का सर्जक है। और जब तक अन्याय है, तब तक संघर्ष भी रहेगा; और जब तक संघर्ष रहेगा, तब तक उम्मीद भी जीवित रहेगी।

लेकिन आजकल मैं अपनी मृत्यु को बहुत तीव्रता से महसूस करता हूँ... ठीक वैसे ही जैसे 13 मार्च की रात को किया था। मैंने अपने पिता की आत्मा को देखा था... तुम्हें... और अपने मृत बच्चों और प्रियजनों को भी...

और उसके ठीक अगले दिन...14 मार्च आया…

लेकिन उस समय मेरे लिए मृत्यु केवल शारीरिक थी। वह मृत्यु स्वप्नों से भरी हुई थी। मैं अपने नश्वर शरीर के स्थान पर एक अविनाशी चेतना को जन्म देने के स्वप्न में डूबा हुआ था। मैं अपनी मृत्यु को महसूस तो कर रहा था, पर दुखी नहीं था... क्योंकि मुझे लगता था कि मैं उस अमर विचार को जन्म दे चुका हूँ, जो आने वाली दुनिया का मानचित्र बनेगा।

अपने जीवन की लंबी यात्रा में एक समय ऐसा आया, जब मुझे लगा कि मैंने दो रास्ते खोज लिए हैं। वे रास्ते अलग दिखते थे, पर गहराई से देखने पर समझ में आता था कि वे अंततः एक ही दिशा में जाकर मिल जाते हैं। इतिहास के अनगिनत विवाद, विचारधाराएँ और तर्क... सब हमें अंततः एक बड़े प्रश्नचिह्न तक ले जाते हैं। हम प्रश्न करते हैं, तर्क खोजते हैं, अपने स्थान को समझने की कोशिश करते हैं... और तभी लगता है कि हम रास्ते के अंत तक पहुँच रहे हैं। 

और उसी क्षण अचानक समझ में आता है, अंत में केवल एक ही रास्ता बचता है...

एंगेल्स, मनुष्य अक्सर यह मानकर चलता है कि उसके पास मानचित्र है, और वह दिशा तय कर सकता है। मैं इसी भ्रम को तोड़ना चाहता था। मैंने उन्हें आकाश में उड़ते पक्षियों की ओर देखने को कहा सिर्फ पक्षियों की ओर...

मैं यह बताना चाहता था कि बिना किसी मानचित्र के भी वे कितने सच्चे और स्वाभाविक हैं!

आजकल मुझे लगता है, इतिहास धुँधला और अनिश्चित है। कभी-कभी जो सत्य हम पाते हैं, वह मानो हिमखंड के नीचे दबे किसी हरे पत्ते के छोटे-से टुकड़े की तरह होता है। बहुत समय बाद, बहुत श्रम और अनगिनत खुदाइयों के बाद वह अचानक दिखाई देता है और इतिहास अनचाहे ही अपना नग्न रूप सामने रख देता है... श्रम का, वंचना का, प्रतिशोध का...

फ़्रेडरिक, आजकल मुझे ऐसा भी लगता है कि निस्तब्धता के भीतर भी इतिहास काम करता रहता है। हर वसंत में, जब मैं चेरी के फूलों को झरते और फिर से जीवित होते देखता हूँ... जब वे सदियों पुराने वृक्षों में बदलते हैं, तब लगता है कि कभी-कभी निस्तब्धता ही भविष्य के युद्धों का अंत कर सकती है।

जब मनुष्य बोलना बंद कर देता है, तब वह शायद अपने भीतर के सत्य के सामने खड़ा हो जाता है। और तब एक छोटे-से हरे पत्ते का टुकड़ा भी एक हरे फूल की पंखुड़ी बन सकता है... यानी सबसे छोटी संभावना भी एक नए अर्थ में बदल सकती है।

कल्पना, विचार और धारणा... यही हमें धारण करने की क्षमता देते हैं, फ़्रेडरिक! तुम्हें क्या लगता है, इतने मृत्यु-भरे वसंतों को पार करने के बाद मैं अभी भी पागल की तरह एक झूठे सपने में जी रहा हूँ?

जेनी, तुम फिर आ खड़ी हुई हो! फिर अपनी नीली आँखों की उस गहरी दृष्टि से मेरे सामने मेरी मृत्यु की मृदुता को समझाने लगी हो?

लेकिन सोचो जेनी, मनुष्य अक्सर दीवार पर बने किसी चिह्न को ही मानचित्र समझ लेता है; जबकि मैं जानता हूँ, मानचित्र का होना, हर जगह तक पहुँच पाने की गारंटी नहीं है। पृथ्वी और इतिहास उससे कहीं अधिक जटिल हैं।

अगर केवल मानचित्र के सहारे ही हर मंज़िल पाई जा सकती, तो मनुष्य बहुत पहले ही वहाँ पहुँच गया होता, जहाँ उसे पहुँच जाना चाहिए था।

आज इतिहास का जीवित रहना कठिन हो गया है। मनुष्य की मंज़िल भी अब उतनी स्पष्ट नहीं रही। इसीलिए चलते-चलते ही उसे अपने रास्ते का अर्थ खोजना पड़ता है। शायद इसी कारण मैं हमेशा कहता आया हूँ, मनुष्य अपना इतिहास स्वयं बनाता है, हालाँकि वह उसे ऐसे अव्यवस्थित हालात में बनाता है, जहाँ सब कुछ उसके पूर्ण नियंत्रण में नहीं होता।

फिर भी...

फिर भी, एंगेल्स… क्या हमें अपना काम करते नहीं रहना चाहिए? चाहे वे इसे ‘सपनों का जुनून’ कहकर कितना भी उपहास करें!

लेकिन आज, इतने-इतने चेरी फूलों के झर जाने के बाद मैं धीरे-धीरे समझने लगा हूँ कि समय किसी भी चीज़ को ढक कर नहीं रखता। मनुष्य चाहे इतिहास पर कितने ही परदे डाल दे, समय उसके भीतर के घावों को उजागर कर ही देता है। मैंने वर्षों तक एक स्वप्न की बात की है, एक ऐसे समाज की, जहाँ मनुष्य, मनुष्य का शोषण नहीं करेगा, जहाँ श्रम मुक्ति का मार्ग बनेगा। मैंने सोचा था, विकासशील देश आगे बढ़ेंगे, वे मनुष्य और श्रम के मूल्य को समझेंगे... उन्होंने समझा भी पर एक विकृत, उलटी दिशा में!

इसीलिए कई लोगों ने उस स्वप्न को ‘यूटोपिया’ कहकर ख़ारिज कर दिया। और आज, जब फिर 14 मार्च की सुबह सामने है, इस फीकी धूप को देखकर लगता है, वह यूटोपिया किसी बूढ़े वैद्य की तरह है, जो पुराने औषधियों की पोटली लेकर बैठा है, लोगों की बीमारी दूर करने के लिए... पर अब कोई उसके पास नहीं आता... कोई मुड़कर नहीं देखता... बस उपहास की एक हँसी फेंक कर दुनिया को और गहरे रोग की ओर धकेल देता है।

जेनी, अब कभी-कभी मुझे भी लगता है,  शायद यूटोपिया मेरी भूल थी... या शायद मैं उसे ठीक से धारण करना सिखा नहीं पाया।

आज मैं यह भी मानता हूँ, कि वह एक संभावना है, एक आकांक्षा, जिसे कभी पूरी तरह सुलझाया नहीं जा सकता। लेकिन फिर भी मैंने कभी उसे तोड़कर, काटकर, पूर्ण विश्लेषण में विखंडित करना नहीं चाहा; क्योंकि स्वप्न को पूरी तरह विश्लेषित कर दिया जाए, तो वह टूट जाता है, ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारा और मेरा अस्तित्व और अनस्तित्व के बीच का यह रहस्य! यह तीव्र उपस्थिति और फिर एक अनिवार्य विलय—यही तो जीवन और मृत्यु की अंतिम भाषा है।

फ़्रेडरिक, जीवन सचमुच एक अंतहीन दौड़ है—निर्वासन से निर्वासन तक, एक शहर से दूसरे शहर तक, एक अँधेरे से दूसरे अँधेरे की ओर। ट्रियर, पेरिस, ब्रुसेल्स, लंदन... हर शहर ने मुझे गढ़ा भी है, तोड़ा भी है। कुछ दिया, बहुत कुछ छीन लिया। दौड़ते-दौड़ते एक दिन समझ में आया, दौड़ना ही एक अवस्था है। मनुष्य अक्सर किसी मंज़िल के लिए नहीं, बल्कि केवल दौड़ते रहने के लिए दौड़ता है। जेनी, तुमने ही तो कहा था, रुक कर सड़ जाने से बेहतर है दौड़ते रहना...

इतिहास की इस अनवरत गति में अगर एक क्षण को भी ठहराव आ जाए, तो शायद मैं उन शब्दों को सुन सकूँ, जो कभी बोले नहीं जाते। वे निस्तब्ध शब्द, जो मज़दूरों की थकी साँसों में, बस्तियों के अंधकार में, कारख़ानों के शोर के भीतर दबे रहते हैं।

आजकल मैं उन्हें साफ़-साफ़ सुनता हूँ। देखता हूँ, तेज़ बुद्धि वाले युवा, बारह रुपये के डिलीवरी बॉय बनते जा रहे हैं! श्रम बचा है, पर उसका अर्थ नष्ट हो चुका है। देखता हूँ, ‘गिग’ की दुनिया का कठोर प्रभुत्व, एल्गोरिद्म के जाल में फँसी हुई एक विवश मानव-व्यवस्था...

और ठीक उसी क्षण तुम्हारा प्रिय मार्क्स मृत्यु की ओर झुकने लगता है, जेनी...

फ़्रेडरिक, उसी क्षण आरामकुर्सी पर सहेजकर बैठाए गए तुम्हारे प्रिय मित्र, तुम्हारे अपने मार्क्स का सिर एक ओर ढल जाता है... धीरे-धीरे... जैसे जीवन की अंतिम साँस भी अब किसी व्यवस्था का हिस्सा नहीं रही...

मैं आज एक कठोर सत्य के सामने खड़ा हूँ समय! किसी शहर से लंबे समय तक प्रेम नहीं किया जा सकता। शहर भी मनुष्यों की तरह बदलते हैं और कभी-कभी मनुष्यों से भी अधिक निर्मम ढंग से। हम उन्हें अपनी कल्पनाओं के प्रकाश से सजाते हैं और एक दिन वही शहर हमारी कल्पनाओं पर हँसते हैं, उन्हें तोड़ देते हैं, उपहास में बदल देते हैं। जो शहर कभी शरण थे, वे ही अंततः निर्वासन की स्मृतियाँ बन जाते हैं।

दरअस्ल, मनुष्य भागना चाहता है—अपनी विफलताओं से, अपने इतिहास से, अपने ही बनाए हुए सच से... और राष्ट्र उस भागते हुए मनुष्य को भय और नियंत्रण से बाँध देना चाहता है। पर क्या अब भी कोई ऐसा स्वप्नदर्शी बचा है, जो सचमुच चाहता हो, कि यह सब बदल जाए?

क्योंकि तभी 14 मार्च केवल मृत्यु की तारीख़ नहीं रहेगी, एक नए जन्म की संभावना भी बन सकेगी।

जेनी, आज हम ऊष्मा से डरते हैं। हम नहीं चाहते कि रंग गहरे हों, कि पत्ते झरें, कि समय हमारे भीतर की दरारों को उजागर कर दे। हम अपने ही नग्न सत्य से भयभीत हैं। पर हर परिवर्तन के साथ हमारी कमज़ोरी भी उजागर होती है।

देखो, एंगेल्स हमने कैसे कठोरता से जीना सीख लिया है! स्वीकार करना, सहना, चुप रहना... मनुष्य अपनी ही बनाई संरचनाओं का क़ैदी बन चुका है, क्योंकि वह स्वयं से डरता है। जब वह अपने भीतर झाँकता है, तो उसे अपनी सीमाएँ, अपनी असफलताएँ, अपने अधूरे स्वप्न... एक तीखी हँसी के साथ, नग्न दिखाई देते हैं!

यही सत्य है, जेनी—निर्मम, अनिवार्य, अटल। तुम चाहे इसे छिपा लो कुछ दिनों के लिए, इतिहास के पर्दों के पीछे; लेकिन सच्चाई यह है कि मार्क्स सचमुच मर चुका है—14 मार्च की उस गहरी दुपहर में...

मार्च की धूप में झुलसे हुए चेरी के फूलों की तरह धीरे-धीरे झरता हुआ और नंगी सड़कों ने बिना किसी शोर के उसे रौंद-पीसकर अपने भीतर समा लिया है।

लेकिन... शायद यही अंत नहीं है, फ़्रेडरिक!

क्योंकि हर कुचला हुआ फूल किसी अगली ऋतु में, किसी और वृक्ष पर, फिर से जन्म लेने की प्रतीक्षा करता है।

हमें सजग रहना है सिर्फ़! 

कार्ल मार्क्स 
1 मई 2026

(पुनश्च)

14 मार्च 1883  

लंदन शहर में कुछ लोगों के दिलों पर गहरी ठंडक छा गई थी। कार्ल मार्क्स ने ख़ुद को मौत की गोद में समर्पित कर दिया था। लेकिन यह ख़बर गुप्त रखी गई। किसी को भी उनकी मौत की सूचना नहीं दी गई। सारे शहर की भीड़ को सँभालना असंभव था। आम लोग बिल्कुल दिशाहीन और बेसहारा हो जाते, यह सोचकर कि उनका प्रिय कार्ल मार्क्स अब नहीं रहा! इसलिए कुछ बेहद क़रीबी रिश्तेदारों और दोस्तों को मजबूरन यह फैसला लेना पड़ा कि मार्क्स की मौत को छुपाकर रखा जाए... वरना लोगों के विशाल जनसमुद्र में मौत की निस्तब्धता कहीं खो जाती।

सभी काम पूरे होने के बाद, दफ़नाने के दो दिन बाद ही इस ख़बर को पूरे विश्व को बताया गया। 

लेकिन आज की इस दुनिया में कहाँ है वह सामूहिक चेतना की भावना? किसानों और मज़दूरों को कहाँ मिल रहा है उनका उचित सम्मान? कहाँ है उनकी मेहनत की सही मज़दूरी? और कहाँ है लोकतंत्र? अब राज्य ख़ुद एक डर का क्षेत्र बन गया है! अधिकार! यहाँ आम आदमी पूरी तरह उपेक्षित है! यह सचमुच मार्क्सवाद की मौत है!

कल्पना पर निर्भर होकर,  कार्ल मार्क्स ख़ुद अपने हाथों से अपनी मौत का इश्तिहार लिख रहे हैं। अपने देहांत के बाद से हर 13 मार्च की रात और 14 मार्च की सुबह वह बैठकर अपने जीवन के उत्थान-पतन, सफलताओं और असफलताओं के बारे में लिखते रहे हैं... वह पिछले 143 वर्षों से अकेले ही इस लिखाई को काटते-छाँटते-जोड़ते-तोड़ते चले आ रहे हैं। इस काम को ही हमारी आधुनिक दुनिया ‘एडिटिंग’ कहती है। यह सब अविश्वसनीय लगता है, फिर भी यही सच है! वह अपने लिए ख़ुद ही अपना आइना बन गए हैं...

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