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हिंदियाँ : लोक-भाषा के विस्तार का आयोजन

‘हिन्दवी’ द्वारा आयोजित यह विशेष कार्यक्रम ‘हिंदियाँ’ साहित्य और सिनेमा में लोक-भाषा की भूमिका और उसके विस्तार को केंद्र में रखेगा। इस आयोजन का आने वाले समय में भाषा, संस्कृति और रचनात्मक अभिव्यक्ति के संबंधों पर गंभीर संवाद की एक महत्त्वपूर्ण पहल साबित होने की उम्मीद है। यह आयोजन न केवल भाषाई विविधता की महत्ता को रेखांकित करता है, बल्कि इस बात पर भी विचार करता है कि किस प्रकार लोक-भाषाएँ हमारे सांस्कृतिक और रचनात्मक अनुभवों को समृद्ध करती हैं। कार्यक्रम को दो प्रमुख सत्रों—विमर्श और कविता-पाठ—में विभाजित किया गया है, ताकि विचार और सृजन दोनों स्तरों पर संवाद स्थापित किया जा सके।

यह कार्यक्रम थिएटर, इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में शनिवार, 2 मई 2026 आयोजित होगा। समय होगा शाम 6:30 से 9 बजे तक

कार्यक्रम के दो प्रमुख सत्रों में पहला सत्र विमर्श-सत्र है। सत्र का विषय है—‘साहित्य-सिनेमा में लोक-भाषा-विस्तार’। इस सत्र में आलोचक रविकांत और आलोचक अमरेन्द्र अवधिया अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। दोनों वक्ता इस बात पर चर्चा करेंगे कि किस प्रकार लोक-भाषाएँ साहित्य और सिनेमा में न केवल अभिव्यक्ति का माध्यम हैं, बल्कि वे सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक स्मृतियों और जनजीवन की जटिलताओं को भी सामने लाती हैं।

विमर्श में यह भी देखा जाएगा कि आधुनिक हिंदी सिनेमा में क्षेत्रीय बोलियों और लोक-भाषाओं के प्रयोग ने किस तरह कथानकों को अधिक प्रामाणिक और प्रभावशाली बनाया है। साथ ही, यह प्रश्न भी उठेगा कि क्या लोक-भाषा का विस्तार केवल शैलीगत प्रयोग है या यह सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व का एक ज़रूरी माध्यम भी है।

कार्यक्रम का दूसरा सत्र कविता-केंद्रित सत्र है। शाम 8:00 से 9:00 बजे तक होने वाले इस कविता-सत्र—‘कविताई’ में कवि गंगेश गुंजन, प्रकाश उदय और रामशंकर वर्मा अपनी-अपनी कविताओं का पाठ करेंगे। इन कविताओं के माध्यम से लोक-भाषा की सहजता, उसकी लयात्मकता और उसमें निहित संवेदनाओं का अनुभव श्रोताओं को मिलेगा।

कवियों की विविध आवाज़ें इस सत्र को बहुआयामी बनाएँगी—जहाँ एक ओर ग्रामीण जीवन की झलक होगी, वहीं दूसरी ओर शहरी अनुभवों और लोक-संवेदना के बीच संबंधों की खोज भी दिखाई देगी। यह कविता-पाठ श्रोताओं के लिए भाषा और भाव के एक जीवंत अनुभव का अवसर होगा।

पूरे कार्यक्रम का संचालन चंद्र प्रभा द्वारा किया जाएगा, जो अपने संतुलित और सहज अंदाज़ में सत्रों को एक-दूसरे से जोड़ते हुए कार्यक्रम की निरंतरता बनाए रखेंगी।

समग्र रूप से, यह आयोजन केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम भर नहीं होगा, बल्कि यह भाषा और संस्कृति के गहरे संबंधों को समझने और उन पर विचार करने का एक सशक्त मंच प्रदान करेगा। लोक-भाषाओं की उपस्थिति साहित्य और सिनेमा को अधिक जीवंत और प्रामाणिक बनाती है—इसी तथ्य को केंद्र में रखते हुए यह कार्यक्रम नए विमर्शों और संभावनाओं के द्वार खोलेगा।

इस प्रकार, ‘हिन्दवी’ का यह आगामी आयोजन—‘छंद-छंद पर कुमकुम’ और ‘अनंता’ के बाद—साहित्य, सिनेमा और लोक-भाषा के त्रिकोण में एक महत्त्वपूर्ण संवाद की संभावना लेकर सामने आ रहा है, जो भाषा के व्यापक और जीवंत स्वरूप को समझने में सहायक सिद्ध होगा।

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