विस्थापन पर कविताएँ

अपनी जगहों को छोड़कर

दूसरी जगहों पर मजबूरन, जबरन या आदतन जाना युगों से मानवीय जीवन का हिस्सा रहा है; लेकिन निर्वासन या विस्थापन आधुनिक समय की सबसे बड़ी सचाइयों में से एक है। यह चयन उन कविताओं का है जिन्होंने निर्वासन या विस्थापन को अपने विषय के रूप में चुना है।

ऊँट

कृष्ण कल्पित

बहुत बुरे हैं मर गए लोग

चंडीदत्त शुक्ल

शहर

अंजुम शर्मा

जा रहे हम

संजय कुंदन

यात्रा

अरुण कमल

दलाई लामा

घनश्याम कुमार देवांश

शरणार्थी

प्रभात

बेदख़ली

प्रभात

निर्वासन

देवी प्रसाद मिश्र

रायपुर बिलासपुर संभाग

विनोद कुमार शुक्ल

डूब मरो

कृष्ण कल्पित

एक आदमी आदेश देकर

पंकज चतुर्वेदी

तिब्बत

उदय प्रकाश

नींद ही है कि सच है

आदित्य शुक्ल

मैंने देखा है

सौरभ अनंत

कलकत्ता रिटर्न

सिद्धेश्वर सिंह

बाबू को ख़त

अखिलेश सिंह

पलायन

परमेश्वर फुंकवाल

घर लौटते मज़दूर

कृष्ण कल्पित

सुनो भिक्षु

प्रदीप सैनी

देश

विनोद दास

हीरोइन

हरि मृदुल

बीस बरस

अच्युतानंद मिश्र

जा रहा हूँ

निलय उपाध्याय

कोरोना में वसंत

वंशी माहेश्वरी

ज़िंदगी का नया गीत

गुलज़ार हुसैन

जा पाते तो

बोधिसत्व

वो स्साला बिहारी

अरुणाभ सौरभ