अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-9
निशांत
15 फरवरी 2026
आठवीं कड़ी से आगे...
नौ
‘अपनी केवल धार’ जो देखने में छोटी पर अरुण कमल की कीर्ति का आधार-स्तंभ है कि तरह मेरी एक और प्रिय छोटी-सी कविता है जिसका शीर्षक है—‘थूक’ : “जब वह ग़ुंडा प्राचार्य मान बहादुर सिंह को / उनके कक्ष से खींच घसीटे जा रहा था / तब हज़ारों विद्यार्थी जमा थे चारों तरफ़ / और वह ग़ुंडा अकेला था और मानबहादुर अकेले कॉमरेड सुधीर ने घटना बताते हुए कहा था / अगर सब लोग केवल थूक देते एक साथ / तो ग़ुंडा वहीं डूब जाता / यही तो कहते रहे कवि मानबहादुर जीवन भर / पर कितना कम थूक है अब इस देश के कंठ में।” (मैं वो शंख महाशंख, पृष्ठ : 53)
महान् फ़्रांसीसी उपन्यासकार फ्लॉबे ने एक जगह लिखा था कि यह समाज पीकदान (थूकदान) में डूबने योग्य है। अरुण कमल ने इस बात को ‘गोलमेज़’ के पृष्ठ : संख्या 171 पर कोट भी किया है। इस बात को भाषा के इतने लास्यमय तरीक़े से यहाँ कविता में तब्दील कर दिया है कि यह छोटी-सी कविता बड़ी दिखती है। कभी रवींद्रनाथ टैगोर ने विद्यापति-जयदेव से भाव-भाषा लेकर ‘भानुसिंघेर पदावली’ लिखी थी, ठीक उसी तरह। लेकिन रवींद्रनाथ ने अपना नाम बदलकर लिखा था। ख़ैर...
यहाँ कविता कॉमरेड सुधीर की बताई हुई घटना को लिपिबद्ध करती है। कभी मानबहादुर सिंह के व्यक्तित्व को दर्शाती है और अरुण कमल के व्यक्तित्व को भी। कवि दूसरे के मुँह से सुनी हुई घटना को लिपिबद्ध कर सकता है। अरुण कमल यही तो करते हैं। कविता में दृश्य चित्र या बिंब की उपस्थिति ज़्यादा, कवि की उपस्थिति कम से कम। अरुण कमल बिंबों के कवि हैं, एक्टिविस्ट कवि नहीं। बिहार में रहते हुए आज़ादी के कुछ साल बाद जन्मे (1954 ई. अरुण कमल का जन्म वर्ष है) कवियों में जो एक अपने समय-समाज के प्रति विद्रोह या मोह भंग होना चाहिए था, वह बहुत कम है अरुण कमल के यहाँ। मलयज के शब्दों में अरुण कमल का—“अधिकांश लेखन बल्कि विद्रोह की मुद्राएँ भी क्यों शाब्दिक लगती हैं? इसलिए नहीं कि उसके पीछे अनुभूति की प्रामाणिकता नहीं है या वह भोगे हुए यथार्थ से नहीं उपजा है, बल्कि इसलिए कि संवेदना और उसकी धारक भाषा के बीच कार्यरत तनाव ढीला पड़ गया है या बिखर गया। ऐसा होने पर संवेदना के रहने पर भी शब्द मुर्दार पड़ जाते हैं और प्रामाणिक लेखन साधारण लेखन बन जाता है। कहना न होगा कि संवेदना और भाषा के बीच कार्यरत उस तनाव को ख़ुराक स्नायुविक ऊर्जा से ही मिलती है।” (कहाँ किधर से : पहचान सीरीज़, संपादक : अशोक वाजपेयी, पृष्ठ : 213-14)
कहना न होगा कि इस तरह की कविता के शब्द मुर्दार पड़ जाते हैं। ‘यह आज़ादी झूठी है’ या ‘तिरंगा सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है’ या ‘गोली दाग़ो पोस्टर’ आदि भावावेग की कविता अरुण कमल के यहाँ नहीं है। हाँ ‘डायरी : मार्च 78’ शीर्षक से तीन कविताएँ हैं—‘अपनी केवल धार’ में जहाँ राजनीतिक चेतना है, भावावेग नहीं। यह काफ़ी ठंडी-ठंडी राजनीतिक चेतना है। उनके बारे में ठीक ही लिखा है—“वह प्रोगेसिव अवश्य हैं, किंतु अग्रेसिव कदापि नहीं।” (पूर्वग्रह, पृष्ठ : 204)
यह ठंडी राजनीतिक चेतना उन्हें प्रेमचंद के कहे हुए वाक्य का मुखौटा उपलब्ध करवाता है कि कवियों-लेखकों को क़लम के माध्यम से अपनी बात कहनी चाहिए। वह इसे चेहरे पर लगा तो लेते हैं, पर मुखौटे के पीछे के लेखक की आत्मा को अरुण कमल नहीं पकड़ पाते। दरअस्ल, मुखौटा पहनता वही है जो अपनी पहचान छिपाना चाहता है। छिपाना वही चाहता है जिसके मन में चोर हो। जब जीवन में अनुभव कम होते हैं तो लोग विचारधारा के पीछे, पार्टी के पीछे, कला के पीछे, भाव के पीछे, फ़लाने-ढिमकाने के पीछे छिपते रहते हैं।
शमशेर के यहाँ भाव और विचार अर्थात् कला पक्ष और मार्क्सवाद का द्वंद्व है और इस द्वंद्व में अधिकतर समय कला-पक्ष जीतता हुआ हम पाठकों को लगता है। शमशेर की नारेबाज़ी टाइप की कविताओं से ज़्यादा कलात्मक कविताएँ हमें ज़्यादा अच्छी लगती है। अरुण कमल के यहाँ वह द्वंद्व नहीं है, इसलिए कलात्मक कविताएँ भी नक़ली कला का व्यापार करती प्रतीत होती है। शमशेर की आत्मस्वीकृति है कि “कविता में हम अपनी भावनाओं की सच्चाई खोजते हैं।” अरुण कमल कविता से भावनाओं का दोहन करते हुए प्रतीत जान पड़ते हैं। जब उनकी ‘धार’ कविता पढ़ते हैं या ‘संबंध’ या कोई अन्य कविता तो थोड़ी देर के लिए ‘धार’,’उधार’ और ‘संबंध’ इन कुछ शब्दों के सहारे हमारे व्यक्तिगत अनुभव के काफ़ी निजी क्षण भभककर आँखों के सामने नहीं आ जाते क्या? यह किसी की भी कविता के साथ हो सकती है और यही क्षण पाठकों को थोड़ी देर के लिए मोहाविष्ट कर लेती है। अरुण कमल इन क्षणों को ‘कैश’ करना जानते हैं। जो क्षण पाठकों को ‘भावनाओं की सच्चाई’ की तरफ़ ले जाती है, अरुण कमल के लिए वह कलात्मक काव्य-व्यापार है। अरुण कमल ने अपनी कविता के लिए मार्क्सवादी ‘कला-कवच’ विकसित कर लिया है। इसी कवच-कुंडल से वह हिंदी कविता के भवसागर में लगातार तैरते हुए दिखते हैं। कला और विचार के द्वंद्व के नहीं, वह कला की उपयोगिता के कवि हैं। विचारधारा उनके लिए खाने की पात पर किनारे पर रखा हुआ नमक है, जिसे बीच-बीच में कवि चाटता रहता है।
विचारधारा से लबरेज़ अरुण कमल की एक कविता है—‘छोटी दुनिया’—“ऐसी ही हो गई है दुनिया / कि यदि अल सल्वाडोर में लड़ता हुआ कोई गुरिल्ला खेत आए / तो अपना ही घर सूना लगेगा / और दूर मंगोलिया में कोई बच्चा जन्मे / तो अपने घर तक आएगा पहला रुदन / इतनी छोटी हो गई है दुनिया एक नक़्शे-भर / जब आप आराम से खाना खा रहे हैं / तो बिल्कुल पास में कोई भूख से दम तोड़ रहा है / चैन नहीं है कभी, सुख नहीं है अकेले-अकेले / सबके साथ ही सुख है, सबके दुख में दुख।” यह एक राजनीतिक कविता है और इस तरह की ढेर सारी राजनीतिक कविताएँ लिखकर अरुण कमल ने अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धताएँ प्रलेस के मार्फ़त भीष्म साहनी से लेकर नामवर सिंह और अब अशोक वाजपेयी तक को दिखलाई हैं, इसलिए अजय तिवारी ने लिखा है—“यह बात ज़ोर देकर कहने की है कि अरुण का यह निम्न मध्यवर्गीय वाचक-नायक उनके आत्म का प्रतिरूप नहीं है। उनके व्यक्ति सत्य और कवि सत्य में कलात्मक दूरी है। इसलिए उनकी कविता में मुक्तिबोध जैसा (और बहुत हद तक केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन जैसा) आवेग नहीं दिखता।” (हिंदी कविता आधी शताब्दी, पृष्ठ : 92)
यहाँ वाचक की जगह याचक पढ़े तो बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है। यहाँ अल सल्वाडोर का गोरिल्ला, मंगोलिया में जन्मा बच्चा, भूख से दम तोड़ रहा व्यक्ति और इन सब पर कविता लिख रहा कवि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता सिद्ध कर रहा है, मार्फ़त कविता। सिद्ध नहीं कर रहा बल्कि अपने समय के दूसरे कवियों के लिए सिद्धांत भी बना रहा है कि वे अराजनीतिक स्वरूप की कविता लिख रहे हैं। “धूमिल और उनके बाद हिंदी कविता स्पष्टत: राजनैतिक रही है। रघुवीर सहाय और मुक्तिबोध और श्रीकांत वर्मा भी। इधर की कविताएँ छोटे-छोटे विषयों और आशयों की कविताएँ हैं। राजनैतिक प्रश्नों का स्थान किन्हीं बड़े जीवन प्रश्नों ने नहीं लिया है। ये स्थिर, शांत और सौम्य हैं—घर-परिवार-गृहस्थी, प्रकृति-लोक-जीवन के सुकोमल दृश्य और बिंब जो दृश्य पटेल पर थोड़ा-सा ठहरकर विसर्जित हो जाते हैं, नए कवियों में लगातार बढ़ते गए हैं। कविता यहाँ ज़्यादा घरेलू और पालतू हो गई है। एक सीमा तक तो यह अच्छा है, पर यदि यही मुख्यधारा बन जाए तो माइनर पोएट्री का सृजन हो सकता है। ऐसा करना आसान है, इसलिए अधिकतर कवि कविता सृजन में विशेष यत्न से बच जाते हैं। इस प्रकृति ने कविता को अति सहज और सपाट बना दिया है। (कथोपकथन, पृष्ठ : 161)
यह आज से पचीस साल पहले अपने समय की कविता पर दिया गया वक़्तव्य है, जहाँ ‘अपनी काँख भी ढकी रहे और मुट्ठी भी उठी रहे’ जैसी राजनैतिक प्रतिबद्धता को उपरोक्त कविताओं के आधार पर स्थापित किया जा रहा है। यह सच है कि उस समय की कविताएँ अराजनीतिक स्वरूप, माइनर पोएट्री, छोटे विषयों और आयों की कविताएँ हैं, लेकिन यह सारी बातें अरुण कमल की कविता पर भी लागू होती हैं। दूसरी तरफ़ कविता में बिंबों पर ज़ोर देना, अपने हिसाब से मौक़ा देखकर कविता को राजनैतिक और घरेलू कह देना, धूमिल का नाम ले लेना और लिखते वक़्त उन्हें साइड लाइन कर देना आदि तमाम बातें उन्हें एक धसंदे कवि में तब्दील करती हैं। कविता में भूख-भूख, वियतनाम-वियतनाम चिल्ला देने या लिख देने से कोई राजनैतिक कवि नहीं हो जाता। मुक्तिबोध होते तो अरुण कमल से फिर एक बार पूछते—‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिमिक्स क्या है?’
वास्तव में 1970 के समय-काल में जब अरुण कमल 17-18 साल के हो रहे थे, तभी से वह—“मैं प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों में जाने लगा। यह बात 1970 तक की है।” (वही, पृष्ठ : 53)
यह प्रलेस की गोष्ठियों ने अरुण कमल को अरुण कमल बनाया। अरुण कमल ने ख़ुद माना है। कम उम्र में जब कोई बच्चा साधुओं की संगत करने लगता है तो बड़ा होकर वह महंत ही बनता है। महंत बनकर वह मठ और गढ़ पर क़ब्ज़ा करता है। फिर उन पर राज करता है। अपनी सफलता को भुनाता है। कम उम्र की सफलता ताउम्र आपका पीछा करती है। आप उससे उबर नहीं पाते। 2009 में अरुण कमल ने ‘उर्वर प्रदेश’ के अपने वक़्तव्य में लिखा है—“क्या यह सही नहीं है कि दुनिया के अधिकांश कवियों ने अपना सर्वोत्तम पैंतीस तक दे दिया? इसके अलावा यह भी हो सकता है और प्राय: होता ही है कि एक कम वय का कवि उस वक़्त अपनी भाषा के वृद्धतम या वरिष्ठ कवियों की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ठ हो और उसकी वह कविता जो केवल श्रेष्ठ युवा कविता कहकर प्रस्तुत की जा रही है वास्तव में सभी कविताओं को मिलाकर भी श्रेष्ठतर हो। (उर्वर प्रदेश, पृष्ठ : 24-25) यह श्रेष्ठताबोध, वही कम उम्र की सफलता है जो आज भी अरुण कमल का पीछा कर रही है। आज भी अरुण कमल अपनी उन्हीं दो श्रेष्ठ कविताओं को सब जगह गाते-गुनगुनाते रहते हैं। आज भी वह वहीं खड़े हैं।
आगे पढ़िए : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-10
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट