विनोबा भावे के उद्धरण
अपने सुख में सुखी होने की और अपने दु:ख में दु:खी होने की तन्मयता कवि को हो, तो वह कवि नहीं बन सकता।
साहित्यिक द्रष्टा है। वह किसी रंग से रंगा हुआ नहीं रहता। वह किसी रंग से रंगा हुआ हो, तो सृष्टि को न्याय नहीं दे सकेगा।
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साहित्यशक्ति, शब्द-शक्ति मनुष्य तभी प्रकट कर सकता है, जब वह सामान्य मन से ऊपर उठकर जनता के मानस की तरफ़ देखे।
भाषा एक बात है और वाणी दूसरी। साहित्य का संबंध वाणी से आता है। मनुष्य की वाणी जितनी विकसित होगी, उतना उसका जीवन विकसित होगा। कुल जीवन का आधार वाणी है।
जो संप्रदाय में बद्ध हैं, वे चिरंतन साहित्यिक नहीं होते हैं। वे तो तात्कालिक साहित्यिक होते हैं। चिरंतन साहित्यिक तो वे होते हैं, जो सब पंथ, संप्रदाय वग़ैरह से भिन्न होते हैं, परे होते हैं।
वाणी जिसका उच्चारण करती है, वह वाङ्मय है। उसमें कुत्ते का भुँकना भी आएगा। लेकिन जनता के पापों को जो शब्द धोएगा, वही सारस्वत होगा। पापों को धोनेवाला जो शब्द सरस्वती की कृपा से निकलेगा, वह वाग्विसर्ग सारस्वत है।
साहित्यिक में अनासक्ति नहीं होगी, तो वह दुनिया को नाप नहीं सकेगा। साहित्यिक को संसार के खेल में द्रष्टा होना चाहिए।
आज जो अच्छे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे अच्छे हैं। जो बुरे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे बुरे हैं। अच्छे लोग ज़्यादा हैं और बुरे कम हैं। अच्छे में सच्चे कम हैं और बुरे में सच्चे बहुत कम हैं। कुल मिलाकर सच्चे लोग बहुत कम हैं।
काव्य का स्वरूप लेखक की मर्ज़ी पर नहीं, रसिक की मर्ज़ी पर ही निर्भर रहता है।
दीखने में जो होता है, प्रकट होता है; उससे न दीखने में जो होता है, वह बहुत बड़ा होता है। साहित्य दीखता नहीं। उसका जितना सूक्ष्म चिंतन करेंगे, उतना वह हमें व्यापक दर्शन देगा।
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जिसे विश्वानुभूति हुई है और जो सर्वभूत हृदय होगा, जिसके मन में संकुचितता नहीं होगी—वही साहित्यिक होगा।
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काव्य सत्य का प्रयोग है। जिसके जीवन में जितना सत्य उतरा होगा, उतना ही काव्य उसमें प्रकट होगा।
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विज्ञान-शक्ति, आत्मज्ञान-शक्ति, साहित्य-शक्ति—समाज को मोड़ देने में इन्हीं तीन शक्तियों से विशेष मदद मिलती है। इन्हीं की छाप समाज और व्यक्ति के हृदय पर पड़ती है।
महाकवि वह हो सकता है, जिसके हृदय में इतना काव्य भर गया है कि वह प्रकट ही नहीं कर सकता।
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साहित्य में हृदय-प्रवेश करने की जो अप्रत्यक्ष शक्ति है, वह है मधुरता में, मार्दव में, अहिंसा में, नम्रता में और प्रत्यक्ष शक्ति है, सत्य में। सत्य और अहिंसा के बिना वाणी समर्थ साबित नहीं होगी।
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विज्ञान, आत्मज्ञान और वाक्-शक्ति, मनुष्य का जीवन बदलती हैं। विज्ञान से स्थूल रूप बदल जाता है, और मन पर असर डालनेवाली परिस्थिति पैदा होती है।
साहित्यिक किसी संप्रदाय के नहीं होते। साहित्यिकों का लक्षण ही यह है कि वे संप्रदायातीत होते हैं।
कवि की इच्छा जो रहे, रसिक अपनी रुचि का अर्थ उस काव्य में से निकाल लेता है।
तृष्णा, क्रोध और भय—इन तीनों वृत्तियों के नष्ट हो जाने पर प्रज्ञा स्थिर होती है।
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वाणी में सत्य रहेगा, तो उस वाणी का फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है। जहाँ नहीं बोलना है, वहाँ मौन की शक्ति होनी चाहिए। ऐसी शक्ति नहीं होगी, तो वहाँ शब्द व्यर्थ जाएगा।
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लोकजीवन पर असर डालनेवाली एक तीसरी शक्ति है, और वह है साहित्य की शक्ति। वह विज्ञान और आत्मज्ञान की शक्ति को जोड़नेवाली शक्ति है।
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जो तटस्थ, निर्विकार होने पर भी, संसार में विचरने वाले सामान्यजनों के लिए अत्यंत प्रेम रखकर; चित्त में उनके लिए पक्षपात रखकर बरतेगा, वही सर्वोत्तम साहित्यिक होगा।
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भारत की संस्कृति, वैश्वानर संस्कृति है। अर्थात् दुनिया में जितनी विविधता है, उतनी सब भारत में है।
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निर्गुण-सगुण परस्पर पूरक हैं, परस्पर विरुद्ध नहीं। सगुण से निर्गुण तक की मंजिल तय करनी चाहिए और निर्गुण को भी चित्त के सूक्ष्म मल धोने के लिए, सगुण की आर्द्रता चाहिए।
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सबके विचारों को परखने के लिए बुद्धि की तटस्थता, वाणी की निर्विकारता और अपने बारे में निरहंकारिता ज़रूरी है।
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लोकजीवन बदलना या उस पर स्थायी असर डालना—उन्हीं से बन सका; जिन्होंने या तो कुछ आध्यात्मिक खोज की थी, या कुछ वैज्ञानिक खोज।
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पुरानी परंपरा का स्पर्श शक्ति प्रदान करता है, नया विचार माधुर्य उत्पन्न करता है।
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जो सर्वजनों के लिए लभ्य होगी; सर्वजनों को स्पर्श कर सकेगी, वही श्रेष्ठ कला है।
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जो केवल बुद्धि पर नहीं; हृदय पर अपनी कही हुई बातों का प्रभाव डालता है, उन्हें हृदय में पैठाता है—वही काव्य है, साहित्य है।
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वाणी विज्ञान से भी आगे जाकर सीधी हृदय पर असर करती है और हृदय तक पहुँच जाती है। आत्मज्ञान अंदर प्रकाश डालता है। विज्ञान बाहर रहता है, आत्मज्ञान अंदर रहता है, और इन दोनों के बीच में रहकर वाणी पुल बनती है।
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विचार का प्रकाशन वाणी से हो सकता है, लेकिन वाणी से भी गहरी चीज़ है—जीवन और आचरण। उसके ज़रिए भी विचार का प्रकाशन होता है।
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जहाँ हम अपने को भूल जाते हैं और समष्टि में लीन हो जाते हैं, वहाँ आनंद हासिल होता है। वह समष्टि जितनी संकुचित होगी, उतना आनंद ही संकुचित होगा।
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जिन्हें तालीम नहीं मिली है; ऐसे अपढ़ मनुष्य को जो अपना रस नहीं पहुँचा सकता, उसका ख़ुद का रस का झरना सूख गया है—ऐसा मैं तो मानता हूँ।
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मुझे तो ऐसे साहित्यिकों का विशेष आकर्षण है, जो अपूर्ण होते हुए भी पूर्ण के साक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील होते हैं।
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जो शाश्वत साहित्यिक होता है, उसकी विश्वव्यापी प्रतिभा होती है।
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कवि का चिंतन तो हमेशा अस्पष्ट होता है। उसके काव्य की गहराई को वह ख़ुद नहीं जानता।
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साहित्य वह है जो ईश्वर का, सत्य का ही यशोगान करे, जीवन का अर्थ समझाए, व्यवहार-शिक्षा दे और जीवन की, चित्त की शुद्धि करे।
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साहित्यिक, समाज से तटस्थ भी होने चाहिए और अभिमुख भी होने चाहिए। सृष्टि से तटस्थ भी और अभिमुख भी।
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जो मनुष्य तौला हुआ शब्द बोलेगा, जिस शब्द में अतिशयोक्ति नहीं होगी, सत्य हो, मधुरता हो, फिर भी कार्य की शक्ति हो और बोलनेवाले का चित्त अक्षोभ हो, तो वह शब्द कारगर होगा।
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