विनोबा भावे के उद्धरण
विज्ञान, आत्मज्ञान और वाक्-शक्ति, मनुष्य का जीवन बदलती हैं। विज्ञान से स्थूल रूप बदल जाता है, और मन पर असर डालनेवाली परिस्थिति पैदा होती है।
लोकजीवन पर असर डालनेवाली एक तीसरी शक्ति है, और वह है साहित्य की शक्ति। वह विज्ञान और आत्मज्ञान की शक्ति को जोड़नेवाली शक्ति है।
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सबके विचारों को परखने के लिए बुद्धि की तटस्थता, वाणी की निर्विकारता और अपने बारे में निरहंकारिता ज़रूरी है।
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वाणी विज्ञान से भी आगे जाकर सीधी हृदय पर असर करती है और हृदय तक पहुँच जाती है। आत्मज्ञान अंदर प्रकाश डालता है। विज्ञान बाहर रहता है, आत्मज्ञान अंदर रहता है, और इन दोनों के बीच में रहकर वाणी पुल बनती है।
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ब्रह्मांड में जो है; वह सब तो साहित्यिकों की वाणी में आता ही है, परंतु जो ब्रह्मांड में नहीं है—वह भी साहित्यिकों की वाणी में आता है।
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संबंधित विषय : साहित्य
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कवि का अर्थ दो-चार शब्द जोड़नेवाला नहीं है, कवि 'क्रांतदर्शी' होता है। उसे उस का दर्शन होता है।
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जो बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ हुई; उसके पीछे विचारक और साहित्यिक थे, जिन्हें क्रांतदर्शन था।
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सबसे अधिक योग्यता मैं उनकी मानता हूँ, जो मार्ग ढूँढ़नेवाले होते हैं। वे नए मार्ग खोजते हैं; बहुत हिम्मत से आगे बढ़ते जाते हैं, अपनी चीज़ नहीं खोते और दुनिया की मार खाते रहते हैं।
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संबंधित विषय : जिज्ञासा
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मनुष्य को वाणी की जो देन मिली है, वह बड़ी भारी शक्ति है। वह दुनिया को बनानेवाली तीसरी ताक़त है।
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दुनिया को बनानेवाली दूसरी ताक़त, जो जीवन को आकार देती है—आत्मज्ञान है।
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संबंधित विषय : आत्मज्ञान
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जीवन के सिद्धांतों को व्यवहार में लाने की जो कला या युक्ति है, उसी को 'योग' कहते हैं। सांख्य का अर्थ है— 'सिद्धांत' अथवा 'शास्त्र' और 'योग' का अर्थ है 'कला'।
कोई भी कर्म जब इस भावना से किया जाता है कि वह परमेश्वर का है तो मामूली होने पर भी पवित्र बन जाता है।
निष्काम कर्मयोगी तभी सिद्ध होता है जब हमारे बाह्य कर्म के साथ अंदर से चित्तशुद्धि रूपी कर्म का भी संयोग होता है।
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कर्म वही, परंतु भावना-भेद से उसमें अंतर पड़ जाता है। परमार्थी मनुष्य का कर्म आत्म-विकासक होता है, तो संसारी मनुष्य का कर्म आत्म-बंधक सिद्ध होता है।
यदि चित्त एकाग्र रहेगा, तो फिर सामर्थ्य की कभी कमी न पड़ेगी। साठ वर्ष के बूढ़े होने पर भी किसी नौजवान की तरह तुममें उत्साह और सामर्थ्य दीख पड़ेगी।
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संबंधित विषय : उत्साह
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तंत्र के साथ मंत्र होना चाहिए। केवल बाह्य तंत्र का कोई महत्त्व नहीं। केवल कर्महीन मंत्र का कोई महत्त्व नहीं।
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संबंधित विषय : महत्त्वपूर्ण
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जो ब्रह्मर्षि होते हैं; वे संसार को जीवन के तत्त्वज्ञान का चिंतनात्मक सार देते हैं, जिसमें जीवन की समस्याओं का हल रहता है।
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किसी में जीवन की प्रेरणा है तो उसका होना भी उसमें गुण होने का प्रमाण है। गुण है, इसलिए जीवन की आकांक्षा है।
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संबंधित विषय : जीवन
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सत्ता का अभिमान, संपत्ति का अभिमान, बल का अभिमान, रूप का अभिमान, कुल का अभिमान, विद्वत्ता का अभिमान, अनुभव का अभिमान, कर्तव्य का अभिमान, चारित्र्य का अभिमान—ये अभिमान के नौ प्रकार हैं। पर मुझे अभिमान नहीं है, ऐसा भास होने जैसा भयानक अभिमान दूसरा नहीं है
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शिष्य के ज्ञान पर सही करना, इतना ही गुरु का काम। बाक़ी शिष्य स्वावलंबी है।
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संबंधित विषय : ज्ञान
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जनता के हृदयों तक विचार पहुँचाने की कुशलता की शक्ति जिनमें होती है, उन्हें ‘देवर्षि’ कहते हैं।
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ख़ूब सीखना और ख़ूब सीखना। जिसे जो आता है, वह उसे दूसरे को सिखाए और जो भी सीख सके, सीखे।
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संबंधित विषय : सीखना
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जीवन का यह अंतिम सार मधुर निकले, अंत की यह घड़ी मधुर हो, इसी दृष्टि से मारे जीवन के उद्योग होने चाहिए। जिसका अंत मधुर, उसका सब मधुर।
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संबंधित विषय : जीवन
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कलियुग कहने वाले को तो 'अंध श्रद्धालु' समझकर आप हँसते हैं, पर पश्चिम वाले कल-युग कहते हैं, तो आप भी कहते हैं। काल हमारी इच्छा और प्रयत्न के अनुरूप बनेगा। काल को मोड़ने की सामर्थ्य तो आपके दृढ़ निश्चय में है।
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संबंधित विषय : समय
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मुझसे यदि कोई पूछे कि जीवन किसे कहते हैं तो मैं उसकी व्याख्या करूँगा-संस्कार-संचय।
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