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साहित्यिक चोरी चोरी नहीं होती!

आए दिन साहित्यिक रचनाओं की चोरी की घटनाओं की ख़बरें पढ़ने को मिल रही है। जिनकी रचनाएँ चोरी होंगी, वे हाय-तौबा मचाएँगे ही। और कुछ कर भी क्या सकते हैं? फ़ेसबुक पर एफ़आईआर दर्ज कर सकते हैं। साक्ष्य के रूप में रचनाओं का स्क्रीनशॉट लगाकर जनता की अदालत में पेश कर सकते हैं। इसको मुग़लकालीन भाषा में सनहा दर्ज कराना कहते हैं। क़ानून के जानकारों का कहना है कि आमतौर पर सनहा सूचनार्थ होती है, आवश्यक कार्रवाई के लिए नहीं। मैं भी एक अदना-सा लेखक हूँ। ऐसा मेरा मानना है। कभी-कभी ओवर कनफ़िडेंस में स्वयं को कवि भी कह देता हूँ। फिर अपने ही कथन पर उन्नीसवीं सदी की बहुओं की तरह थोड़ा सकुचा जाता हूँ। निगाहें नीची कर धरती की ओर देखने लगता हूँ। कभी-कभी मन में भरत जी की तरह ग्लानि होने लगती है, “अपनी समझ साधु शुचि को भा।”

कुछ मित्र आलोचक कहते हैं, “दिल छोटा नहीं करने का। लिखते रहो। एक दिन तुम भी महान् कवि के रूप में ख्यात हो जाओगे।”

जब वे पीठ पर हाथ रख देते हैं तो लगता है कि मुझे ज्ञानपीठ मिल गया है। इसी उत्साह में बोल पड़ता हूँ, “गुरुजी! आज तक दिल्लीवालों ने मुझे आईएसओ सर्टिफ़िकेट नहीं दिया।”

वह ढाढ़स बँधाते हैं, “इस बार पैनल में मैं हूँ और मानकर चलो कि फ़ाइनल में तुम्हारा नाम तय है।”

मैं बालक की तरह चहककर उनकी ओर देखने लगता हूँ, “गुरुजी! फ़िक्स मानूँ?”

गुरुजी कहते हैं, “महान् कोई पैदा नहीं होता, बनाया जाता है और तुम तो अगले भारत विभूषण हो।” मन ख़ुश हो जाता है, वैसी ही ख़ुशी जैसी विभीषण को लंकेश संबोधन सुनने के पश्चात हुई थी। सच है, भाइयो एवं बहनो! बिनु हरि कृपा तृण नहीं डोले।

मैंने कवि माने जाने की ख़ुशी में पागल होकर, स्वयं को जाना-माना कवि समझकर, एक कविता सचित्र शेयर करने हेतु मोबाइल उठाया ही था कि स्क्रीन पर कविता चोरी वाली ख़बर पुनः फ़्लैश कर गई। इस बार मैं थोड़ा सतर्क हुआ। जाति-बिरादरी वाली बात है। रचना किसी की हो, चोरी की घटना ठीक नहीं है। मैंने सहानुभूति वश कवि को फ़ोन मिलाकर बहुत समझाया। वैसे ही, जैसे गुरु वशिष्ठ ने भरत जी को समझाया था कि भावी प्रबल है और गए हुए के लिए शोक नहीं करना चाहिए, बिल्कुल अशोक रहना चाहिए। फिर भी उनका मन मानने को तैयार नहीं हुआ। तब मुझे भी थोड़ा ग़ुस्सा आया। कवि का स्वाभिमान कुछ ज़्यादा ही होता है। जैसे चोट खाया गेहुँअन साँप फुफकार मारता है, वैसे ही कवि जब ग़ुस्सा जाता है तो दुष्यंत से लेकर अदम गोंडवी के दर्जनों शेरों से प्रहार करता है। बेचारे कहानीकार को यह सुविधा प्राप्त नहीं है। मैंने उन्हें कहा, “प्रिय कवि! शेक्सपियर जैसे महान् लेखक कह गए हैं कि नाम में क्या रखा है? रचना तभी तक आपकी है, जब तक वह प्रकाशित नहीं हो जाती है। प्रकाशन के बाद वह सार्वजनिक संपत्ति हो जाती है। कवि को उदार होना चाहिए। आप ही बतलाइए, कबीर के पदों की इतनी बड़ी टेम्परिंग हो रही है। वे होते तो किस-किस पर एफ़आईआर करते? बंधु, यह आपका सौभाग्य है कि आपकी कविता इस योग्य है कि कोई उसे अपने नाम के साथ टाँक रहा है। जानते ही हैं कि कविताओं का भाव इन दिनों औंधे मुँह गिर चुका है। अच्छे-अच्छे कवि कविता-पथ से उतर कर कहानी-मार्ग पर चल पड़े हैं।”

परंतु वह कवि ही क्या जो तर्कों से परास्त हो। वह बोल पड़े, “मैं उस कविता-चोर को मुँह दिखाने लायक़ नहीं छोड़ूँगा। रोज़ एक पोस्ट लिखूँगा।”

मैंने कहा, “अब मान भी जाइए। आप तो जानते ही हैं कि कवि, व्यभिचारी और चोर की मति-गति एक होती है। ये सब के सब ‘आनक धन से धनवंती कुब्जा भेल रानी’ बनकर बैठे हुए हैं। हम कवि भी मधुमक्खी की तरह हैं। मधुमक्खी सैकड़ों फूलों का रस चूस कर मधु बनाती है। एक कवि भी वही करता है—‘सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार।’ मौलिक जैसा कुछ नहीं होता। यह मिक्स नहीं, रीमिक्स का दौर है और आप सिंधु घाटी सभ्यता के उत्खनन में लगे हुए हैं। इतने पर भी शंका हो तो एक वृत्तांत और सुन लीजिए। कोयल अपने अंडे को कौवे के घोंसले में डाल देती है। बच्चे जब तैयार होते हैं तो कोयल की बोली ही बोलते हैं। धैर्य रखिए। समझिए कि आपके बच्चे को पड़ोसियों का प्यार मिल रहा है। यक़ीन मानिए, आपकी प्रसव-वेदना से प्रसूत रचना देर-सबेर रंभाती हुई गाय की तरह शाम तक आपके पास लौट आएगी। मुझे तो अफ़सोस है अब तक मेरी एक कविता की चोरी नहीं हुई। शायद ये रोते हुए बच्चों की तरह हैं, इन्हें कौन गोद में बिठाएगा?”

इतने प्रबोधन के बाद भी कवि को अबोध की तरह हरकतें करते देख मैं एक बार फिर उन्हें इस तरह संबोधित करने लगा जैसे कुरुक्षेत्र में कृष्ण, अर्जुन को निष्काम कर्म-योग का पाठ पढ़ा रहे थे। मैंने उन्हें कहा कि यह मान कर चलिए कि कवि के लिए फ़ेसबुक ही कुरुक्षेत्र है। यहाँ स्वजनों से ही लड़ना है। अपना कर्म कीजिए। विजय प्राप्त कर राज भोगिए या वीर गति प्राप्त कर स्वर्ग के सुख का उपभोग कीजिए। यहाँ सब काल के शिकार हैं। निस्पृह और निरपेक्ष भाव से अर्जुन जैसे तीर चलाते थे, वैसे ही कविता पोस्ट करते रहिए। यही आपका धर्म है। यह मत देखिए कि कौन आहत हो रहा है। यह मत सोचिए कि कौन स्वजन और कौन सज्जन-दुर्जन है। कविताओं की क्षति और चोरी की बारे में मन में कभी अशुभ ख़याल मत लाया कीजिए। आप जानते ही हैं कि भारतेंदु लिख गए हैं—वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। वैसे ही मानकर चलिए कि साहित्यिक चोरी चोरी नहीं होती। यह तो कहिए कि इंटरनेट वाला ज़माना है। सब जगह सीसीटीवी लगा हुआ है और फ़ैक्ट चेक भी होता है। ये सब बचाव के उपाय हैं। बावजूद इनके ऐसी एकाध घटनाएँ हो रही हैं। यह बहुत चिंताजनक नहीं है। कुल मिलाकर स्थिति नियंत्रण में है। यह भी संतोष की बात है कि प्रसंगवश ही सही हमारे पूर्वज लेखकों ने चौर्य क्रम की बारीक़ियों के संबंध में अपनी कृतियों में भावपूर्ण वर्णन किया है। शायद इसीलिए मेरे शागिर्द कहा करते हैं कि चोरी एक कला है। वे यह भी कहते हैं कि चोरी करना गुनाह नहीं है, पकड़े जाना गुनाह है। मैं तो समझता हूँ रचनाएँ बच्चों की तरह हैं। पड़ोस में खेलने गए हैं, शाम तक लौट ही जाएँगे। दूसरी बात यह कि वयस्क बच्चों की कितनी पहरेदारी करेंगे? चोरी के लिए अश्क नहीं बहाया करते। मुझे संतोष है कि पहले की तरह डकैतियाँ तो नहीं हो रही हैं। थोड़ा-बहुत कट-पेस्ट चलता है भाई! बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी घटनाओं पर सोग नहीं मनाते।

मेरी तो दिली ख़्वाहिश है कि मेरी कविता न सही, कोई मेरा दिल ही चुरा ले लेकिन कोई भाव नहीं देता। मेरे पास उनके लिए इतने सुंदर-सुंदर भाव हैं, लेकिन उनके यहाँ तो अभाव ही अभाव है। मैं कोशिश करता हूँ  कि उनका ही दिल चुरा लूँ लेकिन वे चोर दरवाज़े से निकल जाते हैं। ऐसी स्थिति में स्वयं को कोसने और प्रतिक्रिया स्वरूप दनादन कविताएँ परोसने के सिवा क्या कर सकता हूँ?

उपर्युक्त संवाद से कवि जी का मन थोड़ा शांत हुआ तो उन्होंने सप्रेम अनुरोध किया कि मैं कई दिनों से भारी व्यथा में था। फलस्वरूप, कुछ छंद फूटे हैं, कहिए तो मोबाइल पर ही सुना दूँ? मेरे कान खड़े हो गए। मैंने कहा, “भैया, फ़ेसबुक पर ही डाल दीजिए। वहीं पढ़ लूँगा। दूसरे इसके एवज में आपको लाइक और व्यूज मिल जाएँगे। उनके स्वर से संतुष्टि का भाव ध्वनित हो रहा था। फ़ोन रखने के पूर्व उन्होंने अवश्य कहा कि आपके कमेंट का इंतज़ार रहेगा।

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