Font by Mehr Nastaliq Web

प्रसिद्ध पर उद्धरण

अज्ञात होना, प्रसिद्धि का नया चलन है।

चक पैलनिक

जो सर्वजनों के लिए लभ्य होगी; सर्वजनों को स्पर्श कर सकेगी, वही श्रेष्ठ कला है।

विनोबा भावे

एक समय आत्मा को ईश्वर की पदवी प्राप्त थी, फिर यह मनुष्य बनी और अंत में यह केवल एक बाज़ारू जमघट बनकर रह गई है।

फ़्रेडरिक नीत्शे

कला को कभी भी लोकप्रिय बनने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।

ऑस्कर वाइल्ड

जूते खा गए—अज़ब मुहावरा है। जूते तो मारे जाते हैं। वे खाए कैसे जाते है? मगर भारतवासी इतना भुखमरा है कि जूते भी खा सकता है।

हरिशंकर परसाई

गिरे हुए आदमी की उत्साहवर्धक भाषण देने की अपेक्षा सहारे के लिए हाथ देना चाहिए।

हरिशंकर परसाई

जनमत और लोकाभिरुचि बनाने का ठेका जहाँ उच्च-सम्पन्न वर्गों ने ले लिया है; वहाँ किसी भी बात की परिभाषा जो उनकी दी हुई होती है, ख़ूब चलती है। और उस परिभाषा को विश्वविद्यालयों से लेकर छोटे-मोटे प्रकाशकों तक में इस तरह स्वीकृत कर लिया जाता है कि जिससे उसी के माप-मान चल पड़ते हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध

शासन का घूँसा किसी बड़ी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है, पर जाने किस चमत्कार से बड़ी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूँसा पड़ जाता है।

हरिशंकर परसाई

शिक्षक दिवस तो इसलिए चल रहा है ज़बरदस्ती कि डॉ. राधाकृष्णन राष्ट्रपति रहे। अगर वे सिर्फ़ महान् अध्यापक मात्र रहते, तो शिक्षक दिवस नहीं मनाया जाता।

हरिशंकर परसाई

कुत्ते भी रोटी के लिए झगड़ते हैं, पर एक के मुँह में रोटी पहुँच जाए जो झगड़ा ख़त्म हो जाता है। आदमी में ऐसा नहीं होता।

हरिशंकर परसाई

दूसरे के मामले में हर चोर मजिस्ट्रेट हो जाता है।

हरिशंकर परसाई

प्रतिभा पर थोड़ी गोंद तो होनी चाहिए। किसी को चिपकाने के लिए कोई पास से गोंद थोड़े ही ख़र्च करेगा।

हरिशंकर परसाई

हर लड़का बाप से आगे बढ़ना चाहता है। जब वह देखता है कि चतुराई में यह आगे नहीं बढ़ सकता तो बेवकूफ़ी में आगे बढ़ जाता है।

हरिशंकर परसाई

24-25 साल के लड़के-लड़की को भारत की सरकार बनाने का अधिकार तो मिल चुका है, पर अपने जीवन-साथी बनाने का अधिकार नहीं मिला।

हरिशंकर परसाई

कोट आदमी की इज़्ज़त भी बचाता है। और क़मीज़ की भी।

हरिशंकर परसाई

मुसीबत का यही स्वभाव है कि आदमी को अपने ही से लड़ने के लिए शक्ति दे देती है।

हरिशंकर परसाई

जनता कच्चा माल है। इससे पक्का माल विधायक, मंत्री आदि बनते है पक्का माल बनने के लिए कच्चे माल को मिटना ही पड़ता है।

हरिशंकर परसाई

ख्याति मिलने की कुंठा भीतर-भीतर विरोधी बना देती है।

देवीशंकर अवस्थी

सिर नीचा करके चोर की नज़र डालने की अपेक्षा, माथा, ऊँचा करके, ईमानदारी की दृष्टि डालना, अधिक अच्छा है।

हरिशंकर परसाई

मूर्ख से-मूर्ख आदमी तब बुद्धिमान हो जाता है जब उसकी शादी पक्की हो जाती है।

हरिशंकर परसाई

वोट देने वाले से लेकर साहित्य-मर्मज्ञ ता जाति का पता पहले लगाते हैं।

हरिशंकर परसाई

अगर तुम पूर्णता की तलाश करोगे, तो तुम्हें कभी संतोष नहीं मिलेगा।

लेव तोलस्तोय
  • संबंधित विषय : सच

हम केवल इतना ही जान सकते हैं कि हम कुछ नहीं जानते। और यही मानवीय ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है।

लेव तोलस्तोय
  • संबंधित विषय : सच