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जब नाव नदी को पहली बार स्पर्श करती है

सुना और पढ़ा था कि जिस दिन नदी में नाव उतारी जाती है; वह दिन नाविक के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण दिन होता है, लेकिन इस घटना को अपनी आँखों से मैंने देखा नहीं था। साल 2012 से मैं इसकी तलाश में था। मैं जब भी गंगा कि किनारे जाता तो वहाँ कोई एक नई घटना घट रही होती, लेकिन नदी में नाव को उतरते नहीं देख सका। जब भी नाव को देखा तो किनारे बनते हुए, मरम्मत होते हुए या ध्वस्त अवस्था में पड़े हुए।

आदमी या जानवर नदी में—चाहे वह गहरी हो या सुतार—पहला क़दम रखते हैं तो छप् की आवाज़ आती है। नाव जब नदी के जल को पहली बार स्पर्श करती है तो कैसी आवाज़ आती होगी, इसे देखने की मन में एक साध थी। इस बार पूरी हुई।

इस प्रसंग में प्रस्तुत हैयह लगभग आधे दिन की डायरी... 

सुबह के साढ़े सात बज रहे हैं। जून का दूसरा सप्ताह चल रहा है। सराय मोहाना, वाराणसी के पास गंगा के बाएँ तट पर रामप्रकाश सहनी से तीसरी या चौथी बार मिलता हूँ। दुआ-पैलगी के बाद एक अनौपचारिक बातचीत नाव के बारे में शुरू हो जाती है। कुछ समय बाद, वह अपने भाई की नाव की तरफ़ इशारा करते हुए बताते हैं कि आज शाम को चार बजे आइए। आज यह गंगा में उतारी जाएगी।

उनकी अपनी नाव बन रही है। वह और उनका बेटा हथौड़ी, रूखान, बसूला और बिजली से चलने वाला बरमा लिए महीनों से जुटे हैं कि उनकी चालीस फ़ुट लंबी और लगभग सोलह-सत्रह फ़ुट चौड़ी नाव बन जाए। इसमें पचास से ऊपर लोग बैठ सकते हैं।

बनारस में अब इस विशेष प्रकार की नाव को ‘बजरा’ कहते हैं। पहले इसे ‘भौलिया’ कहा जाता था, लेकिन अब ‘बजरा’ नाम चल पड़ा। यहाँ अब का मतलब पिछले साठ-सत्तर सालों से।

तो नाव आज उतारी जानी है और लग रहा है कि सूरज ज़मीन पर बारह बजे तक ही उतर आएगा। सुबह के साढ़े दस बज रहे हैं। गर्मी बढ़ चली है। मैं सोचता हूँ कि सराय मोहाना ही रुका रहूँ, कुछ और फ़ील्ड-वर्क करूँ; तभी हरेंद्र का फ़ोन आता है। कुछ इधर-उधर की बातों के बाद विद्यापीठ के पास रीजनल आर्काइव्स चला आता हूँ।

वहाँ से साढ़े तीन बजे फिर उसी जगह वापस। बरगद के पेड़ नीचे तख़्त पड़ी है। कोई नहीं है। एक बालक है। उससे ही पूछता हूँ कि आज नाव उतारी जाने वाली थी?

“वह तो शाम के पाँच-छह बजे नदी में गिरेगी। अभी धूप है। इस धूप में भला कैसे होगा?”

मैं तख़्त पर लेट जाता हूँ।

धीरे-धीरे लोग आ रहे हैं। रामप्रकाश जी भी आते हैं। उनके भाई भी आते हैं, जिनकी नाव बनकर तैयार है। घर और पड़ोस की स्त्रियाँ आ रही हैं। बच्चे आ रहे हैं। रामप्रकाश जी के भाई की बिटिया-दामाद और उनकी संतानें आई हैं। उनकी दोनों दौहित्रियाँ डी.फार्मा और नीट की तैयारी कर रही हैं। इन लड़कियों को देखकर मेरी आँखों में जुगनू चमकते हैं कि एक दिन ये दोनों अपने परिवारों को आगे ले जाएँगी।

देखते-देखते सौ के क़रीब पुरुष इकट्ठा हो जाते हैं। नाव पर चढ़कर एक व्यक्ति ‘कथा की सामग्री’ रखता है। निषाद समुदाय का एक व्यक्ति पंडित की भूमिका में उपस्थित होता है। केला, मिठाई और पूड़ी प्रसाद के रूप में रखी गई है। गृहस्वामी और गृहस्वामिनी कथा सुन रहे हैं। इस कथा का नायक एक नाविक है। परंपरागत कथाओं से भिन्न। कथा समाप्ति की ओर है। एक बड़े-से बर्तन में चावल और हल्दी का लेप आया है। मायके आई बेटी अपने पंजों से छाप लगा रही है। उस छाप पर ही सिंदूर का टीका लगाया जा रहा है। जैसे विवाह का मंडप सजाया जाता है, वैसे ही नाव को बड़े मनोयोग से सजाया गया है। कथा समाप्त हो गई है। छापा लग गया है।

नाव बनाने वाले मिस्त्री की पूजा की जाती है। उसका बसूला पूजा जा रहा है। सगे-संबंधी और पड़ोसी नेगचार दे रहे हैं। एक आदमी आरती घुमा रहा है। थाली में कर्पूर जल रहा है। मैं भी अपनी जेब में से कुछ पैसे निकलकर डालता हूँ। हाथ जोड़ता है।

गंगा से जल आया है। नाव को अभिषिक्त किया जा रहा है। जल चढ़ाया जा रहा है। नाव के आगे, नाव के चारों ओर गंगा का जल गिराया जा रहा है। नाव में सबसे आगे लगने वाली लकड़ी ‘सिक्का’ के ठीक नीचे  पूजा हो रही है। पानी में शराब मिलाई जाती है। वह भी चढ़ाई जाती है।

पुरुष क़तारबद्ध हो गए हैं। उन्होंने नाव को रस्सों में बाँध दिया है। नाव के पेट के नीचे, उसके आगे बाँस बिछाया गया है। सबको सिंदूरी रंग का गमछा दिया जाता है। उन्हीं के घर का एक लड़का मेरे सिर पर गमछा बाँधता है। मैं मन ही मन बहुत ख़ुश होता हूँ।

जैसे बादल गरज रहे हो, ऐसी गड़गड़ाहट के साथ नाव जा रही है। चालीस के क़रीब लोग रस्सा खींच रहे हैं। नीचे बिछे बाँस की गाँठ चटकती है। साठ-सत्तर लोग नाव को उसकी दीवालों के साथ धकेल रहे हैं। फिर नाव फँसती है। एक आदमी नाव पर चढ़कर आवाज़ लगाता है—बोलो-बोलो-बोलो, गंगा मैया की जय। हर-हर महादेव। नाव फिर चलती है। कगार के पास तेज़ी से पहुँच गई नाव।

फिर उसे धीरे-धीरे नदी में उतार दिया जाता है। नाव पानी में लचक रही है। उसे चारों तरफ़ घुमाया जा रहा है। इसे झिझरी खेलाना कहते हैं।

गड़गड़ाहट के बीच, नाव के पार्श्व में, स्त्रियों के कोमल स्वर उभरते हैं—निमिया के डार मैया झूले ले झुलनवा... मुझे बरसों पहले देखी गई फ़िल्म ‘बाघ बहादुर’ की याद आती है। उसमें भी ऐसा ही गीत है। स्त्रियाँ कुछ गीत और गा रही हैं, जिसमें पुरुषों से मज़ाक़ भी चल रहा है।

नाव पानी में चली गई है। जो शराब पीता है, उसे शराब बाँटी जा रही हैं। श्लथ भुजाएँ शांत हो रही हैं। लोग अपने घर जाने से पहले प्रसाद ले रहे हैं।

साढ़े आठ बज रहे हैं। गंगा पर रात उतर रही है। मैं पैदल ही राजघाट की तरफ़ जा रहा हूँ। मुझे कुछ महीनों पहले कही गई एक नाविक मिस्त्री की बात याद आ रही है—“हम लकड़ी की नाव बनाते हैं, फिर पानी में जाकर नाव अमर हो जाती है।”

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रमाशंकर सिंह को और पढ़िए : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से उपजी भाषा और कथा | महाभारत : वीरता के आवरण में | शिमला डायरी : काई इस शहर की सबसे आदिम पहचान है | लोग क्यों पढ़ते हैं अंबेडकर को? | छोटी नदियों का बड़ा शोक

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