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गणेश शंकर विद्यार्थी

1890 - 1931 | इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से संबद्ध प्रखर पत्रकार, लेखक और सुधारवादी नेता। ‘प्रताप’ पत्रिका का संपादन।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से संबद्ध प्रखर पत्रकार, लेखक और सुधारवादी नेता। ‘प्रताप’ पत्रिका का संपादन।

गणेश शंकर विद्यार्थी के उद्धरण

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मानव स्वत्व मिला नहीं करते। उन्हें लेना पड़ता है। बल चाहिए- बल।

सभ्य संसार के प्रत्येक स्थान में, किसी-न-किसी समय और किसी-न-किसी रूप में स्वतंत्रता की व्यापकता का बोल-बाला अवश्य हुआ।

आदर्श का उपासक; निराशाओं के प्रति उपेक्षा की दृष्टि से देखता है, उसका जीवन युद्धमय है। समझौते का उपासक; व्यावहारिक कठिनता की दुर्दमनीयता का विकराल रूप देखकर घबराता है, वह अपने को चतुर और नीतिकुशल के नाम से पुकारता है—वह मरना नहीं जानता।

उन तमाम हानिकर प्रभुत्वों को हटा देना चाहिए, जो लोगों की न्यायोचित आकाँक्षाओं का दमन करते हैं और उनको बंधनों में जकड़ कर रखने में मदद देते हैं।

यदि देश का प्रत्येक शिक्षित युवक, ऊँच-नीच के घृणित विचारों को छोड़कर; अपने आस-पास रहने वाले चार बालकों अथवा बालिकाओं को भी प्रतिवर्ष अशिक्षित से शिक्षित बना देने का संकल्प कर लेवे, तो परिणाम अत्यंत उत्साहवर्द्धक हो।

राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है, उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता बड़ी अच्छी चीज़ है, बड़ी अच्छी और अत्यंत ऊँची; परंतु राष्ट्र की स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए उसे संकुचित कर देना एक ऐसा त्याग है, जिसकी समता नहीं हो सकती, जो सब त्यागों में श्रेष्ठ है।

जो शिक्षा हमें प्राचीन संस्थाओं तथा प्राचीन विचारों में ही फाँसे रखती हो, वह शिक्षा अर्वाचीन समय में शिक्षा कहलाने के योग्य नहीं है।

मज़हबी कर्मकांड तथा रस्मो-रिवाज की रक्षा करने के स्थान पर देश तथा राष्ट्र की रक्षा करना, अपनी तथा मनुष्य जाति की उन्नति के लिए कहीं अधिक आवश्यक है।

जिस प्रकार प्रातःकाल की लालिमा का मंद समीर; आगे प्रस्फुटित होने वाले प्रकाशमान दिनमणि के पूर्ण तेज़ का सूचक होता है, उसी प्रकार आदर्शवादी का आशामय जीवन; अपने इष्ट की मूर्ति को अपने हृदय में रखता हुआ, संसार के विपुल तेजमय कल्याण का सूचक होता है।

बिना कष्टसहन तथा स्वार्थत्याग के, संसार का कोई भी महान कार्य सिद्ध नहीं हो सकता।

स्थिति के अनुसार रूप में परिवर्तन करना पड़ता है, जिनमें परिस्थिति के अनुसार बनने का गुण नहीं रहा, वे बिगड़ गए।

जिन भावों की जड़ें हिल गई हैं, यदि उनका स्थान ग्रहण करने को अन्य उपयोगी भावों को अवसर दिया गया तो हृदय, हृदय नहीं रह जाएगा।

मैं लड़ाई का पक्षपाती हूँ और टालस्टॉय और महात्मा गाँधी—पूर्ण अहिंसा को जिस अर्थ में धार्मिक सिद्धांत मानते हैं—उस अर्थ में मैं इस पर विश्वास नहीं करता। परंतु मैं सशस्त्र क्रांति करने पर; किसी को शारीरिक हानि पहुँचाने की हिंसा को भी, अपनी वर्त्तमान अवस्था में ठीक नहीं समझता।

आज राजा का राज्य उस समय तक है, जब तक वह प्रजा के अनुसार चलता है।

मनुष्य उसी समय तक मनुष्य है, जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऐसा ऊँचा आदर्श है, जिसके लिए वह अपने प्राण तक दे सके।

नगर जीवन ग़रीब को अधिकांश रूप से नीचे ही गिराने वाला है। यदि वह बेकार हो जाए, तो वह भिखमंगों की संख्या बढ़ाता है और यदि रोज़गार से लगा रहता है, तो कम-से-कम दुराचार अवश्य बढ़ाता है।

सत्य छूटे; स्पष्टवादिता में कमी होने पावे, कार्य छोड़ा जाए, परंतु सत्यकथन में शिष्टता, सभ्यता और औचित्य को तिलांजलि दी जाए।

तप-विहीन प्राप्ति मनुष्य को छोटा और ओछा, निर्बल और पतित बनाती है।

हम केवल यही चाहते हैं कि अपनी दशा भूलें, मृगतृष्णा हमें पथ से भ्रष्ट करे और हममें न्याय और अन्याय; साधु और असाधु के अंतर का ज्ञान, इसलिए जाग्रत रहे कि हम धोखा खाकर जातीय चरित्र और उन्नति का नाश करते रहें।

स्वतंत्रता का पवित्र आदेश है कि किसी को किसी के ऊपर स्वेच्छाचार करने का अधिकार नहीं, किसी को किसी का अधिकार छीनने का हक़ नहीं।

चुपचाप बैठने से अधिकार कभी नहीं मिलते। बिना सच्चे आंदोलन के किसी भी राजनीतिक कार्य में कभी भी सफलता प्राप्त नहीं हुई है।

भारतवर्ष के समस्त कर्मक्षेत्र पर तपस्या का भाव स्पष्टता से अंकित है।

तनिक-तनिक सी बातों पर हर्ष से गद्गद हो जाना और अहसानमंदी के दरिया में बह जाना—ओछापन और अज्ञान, निर्बलता और चंचलता है।

कर्म-स्थल की क्रियाशीलता, प्रेरणाओं की स्फ़ूर्ति से कोई बच नहीं सकता।

स्वाधीन देश ही राष्ट्रों की भूमि है; क्योंकि पुच्छविहीन पशु हों तो हों, परंतु अपना शासन अपने हाथों में रखने वाले राष्ट्र नहीं होते।

जिस देश में सुधार की आवश्यकता नहीं, वह इस परिवर्तनशील संसार का भाग नहीं हो सकता।

धर्म ने ज्ञान-प्रचार का आदेश दिया, धार्मिक आडंबर ने घोर अज्ञान फैलाया। धर्म ने मनुष्य के सामने धर्म का सर्वश्रेष्ठ आदर्श रखा, धार्मिक आडंबरों ने उसे पग-पग पर पीछे धकेला।

दीपशिखा का प्रकाश उसी का मार्गदर्शक होगा, जिसके नेत्र खुले हों।

कोई महान कार्य, तप के बिना पूरा नहीं हो सकता। कोई आत्मा, तप के बिना महान नहीं हो सकती।

किसी वर्ग की सुविधा और लाभ के लिए, संसार के झोपड़ों में रहने वाले लोगों का शरीर और मन भेंट नहीं दिया जा सकता।

प्रत्येक युग का अपना संदेश होता है। संदेशों को वही सबसे पहले सुनते हैं, जो विश्व की उन्नति की ड्योढ़ी पर अपनी सबसे अधिक बहुमूल्य वस्तु की भेंट चढ़ाते हैं।

प्रत्येक राष्ट्र के जीवन-निर्वाह के लिए; यह आवश्यक है कि देश की प्राकृतिक संपत्ति की रक्षा की जावे, तथा उस संपत्ति को उन्नति देने के पूरे-पूरे प्रयत्न किए जाएँ।

जो अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं करता, उसे 'स्वत्व' की दुहाई देने तक का कोई स्वत्व नहीं, और जो अपने कर्तव्य की ओर पूरी और पक्की दृष्टि रखेगा, उसके स्वत्व को कोई बड़ी से बड़ी निरंकुश शक्ति भी नहीं छीन सकती।

जनता अपने भाग्य की आप मालिक है। वह अपने कामों को आप करेगी, व्यक्ति या समूह उस पर आज्ञा नहीं चला सकेंगे। उसकी आज्ञा के सामने सम्राट और भिखारी दोनों बराबर होंगे।

शिक्षा में किसी प्रकार की भी संकीर्णता, शिक्षा के वास्तविक लक्ष्य का नाश कर देती है।

उद्देश्य पर दृष्टि रखते हुए, किसी की भृकुटि के तनाव से मत डरो और किसी की मुस्कराहट की भी परवाह मत करो।

राष्ट्र के बालक तथा बालिकाएँ ही राष्ट्र की मानसिक तथा नैतिक संपत्ति हैं, और यह संपत्ति राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पत्ति की अपेक्षा, कहीं अधिक मूल्यवान तथा कहीं अधिक महत्त्व की है।

संसार की समस्त संस्थाएँ; चाहे वे आरंभ में कैसी भी लाभदायक रही हों, समय पाकर मनुष्य जाति की उन्नति में बाधा डालने लगती हैं और उस समय उनका विध्वंस कर देना ही बुद्धिमत्ता है।

विस्मृति उनके लिए हो सकती है, जो समर्थ हैं। विस्मृति का आडम्बर उनकी छवि बढ़ा सकता है; जो कूटनीति में प्रवीण हों, परंतु निर्बल और न्याय के प्यासों के लिए विस्मृति नहीं बनाई गई—वह उनके लिए विश्व का घूँट है।

प्रत्येक व्यक्ति को कुलीनता और अकुलीनता के भाव को अलग रखकर, अपनी उन्नति का पूरा अवसर मिलना चाहिए। किसी राजा का कुलीन का स्वार्थ, किसी की उन्नति का बाधक हो।

आकांक्षाएँ उत्पन्न हुए बिना नहीं रह सकतीं।

हमारी शिक्षा जहाँ तक संभव हो असांप्रदायिक, उदार तथा सस्ती होनी चाहिए।

स्मरण रहे, एकता, किसी भाव की भी एकता—राष्ट्रीय उन्नति का मूलमंत्र है।

वह शिक्षा शिक्षा कहलाने के योग्य है, जो हमें उदार तथा मनस्वी बनाती हो।

शांतिकाल की विजय अधिक स्थाई, अधिक गौरवप्रद और अधिक वास्तविक होती है।

जिस राजा का व्यवहार ऐसे प्रत्येक कार्य से भरा है, जो अत्याचार की व्याख्या है—वह स्वतंत्र जाति का शासक होने योग्य नहीं है।

संसार की प्रत्येक घटना, किसी दूसरी घटना का कारणस्वरूप होती है।

अपने कर्त्तव्य से अनभिज्ञ मनुष्य, कभी भी परोपकार-परायण या समाज-हितचिंतक नहीं कहा जा सकता।

स्वतंत्रता स्वेच्छाचार और अत्याचार का नाम नहीं।

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