गणेश शंकर विद्यार्थी के उद्धरण
आदर्श का उपासक; निराशाओं के प्रति उपेक्षा की दृष्टि से देखता है, उसका जीवन युद्धमय है। समझौते का उपासक; व्यावहारिक कठिनता की दुर्दमनीयता का विकराल रूप देखकर घबराता है, वह अपने को चतुर और नीतिकुशल के नाम से पुकारता है—वह मरना नहीं जानता।
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उन तमाम हानिकर प्रभुत्वों को हटा देना चाहिए, जो लोगों की न्यायोचित आकाँक्षाओं का दमन करते हैं और उनको बंधनों में जकड़ कर रखने में मदद देते हैं।
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हिंदी के लेखक अँधेरे में भले ही भटकते हों, किंतु यह नहीं कह जा सकता कि युग-धर्म की जो पहेलियाँ अपने विश्लेषण के लिए सामने उपस्थित हैं, उनकीओर हिंदी का साहित्य क्षेत्र उदासीन है।
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यदि देश का प्रत्येक शिक्षित युवक, ऊँच-नीच के घृणित विचारों को छोड़कर; अपने आस-पास रहने वाले चार बालकों अथवा बालिकाओं को भी प्रतिवर्ष अशिक्षित से शिक्षित बना देने का संकल्प कर लेवे, तो परिणाम अत्यंत उत्साहवर्द्धक हो।
राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है, उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं।
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राजनीतिक दाँव-पेंच में पड़कर; हमें कम-से-कम इतना तो न भूलना चाहिए कि वर्तमान काल ही सब कुछ नहीं है—भूत और भविष्य काल भी कोई वस्तु है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बड़ी अच्छी चीज़ है, बड़ी अच्छी और अत्यंत ऊँची; परंतु राष्ट्र की स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए उसे संकुचित कर देना एक ऐसा त्याग है, जिसकी समता नहीं हो सकती, जो सब त्यागों में श्रेष्ठ है।
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सभ्य संसार के प्रत्येक स्थान में, किसी-न-किसी समय और किसी-न-किसी रूप में स्वतंत्रता की व्यापकता का बोल-बाला अवश्य हुआ।
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हिंदू-मुस्लिम विद्वेष या राजनीतिक विडंबना को दूर करने का प्रयत्न तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक कि प्रत्येक देशवासी, भारतवर्ष के वातावरण को सौहार्द और पारस्परिक औदार्य से परिप्लावित न कर देगा।
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मैं लड़ाई का पक्षपाती हूँ और टालस्टॉय और महात्मा गाँधी—पूर्ण अहिंसा को जिस अर्थ में धार्मिक सिद्धांत मानते हैं—उस अर्थ में मैं इस पर विश्वास नहीं करता। परंतु मैं सशस्त्र क्रांति करने पर; किसी को शारीरिक हानि पहुँचाने की हिंसा को भी, अपनी वर्त्तमान अवस्था में ठीक नहीं समझता।
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नगर जीवन ग़रीब को अधिकांश रूप से नीचे ही गिराने वाला है। यदि वह बेकार हो जाए, तो वह भिखमंगों की संख्या बढ़ाता है और यदि रोज़गार से लगा रहता है, तो कम-से-कम दुराचार अवश्य बढ़ाता है।
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अशिक्षा, अज्ञान या पराधीनता; भले ही किसी देश को बेबल बनाए रही हो, पर मनुष्यता की संतान ने अपने स्वत्वों और अधिकारों से वंचित होना कभी मंज़ूर नहीं किया।
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मनुष्य उसी समय तक मनुष्य है, जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऐसा ऊँचा आदर्श है, जिसके लिए वह अपने प्राण तक दे सके।
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सत्य न छूटे; स्पष्टवादिता में कमी न होने पावे, कार्य न छोड़ा जाए, परंतु सत्यकथन में शिष्टता, सभ्यता और औचित्य को तिलांजलि न दी जाए।
कोई भाषा मनुष्य जाति को उतना ऊँचा उठाने, मनुष्य को यथार्थ में मनुष्य बनाने और संसार को सुसभ्य और सद्भावनाओं से युक्त बनाने में उतनी सफल नहीं हुई, जितनी कि आगे चलकर हिंदी होने वाली है।
जो शिक्षा हमें प्राचीन संस्थाओं तथा प्राचीन विचारों में ही फाँसे रखती हो, वह शिक्षा अर्वाचीन समय में शिक्षा कहलाने के योग्य नहीं है।
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मज़हबी कर्मकांड तथा रस्मो-रिवाज की रक्षा करने के स्थान पर देश तथा राष्ट्र की रक्षा करना, अपनी तथा मनुष्य जाति की उन्नति के लिए कहीं अधिक आवश्यक है।
जिन भावों की जड़ें हिल गई हैं, यदि उनका स्थान ग्रहण करने को अन्य उपयोगी भावों को अवसर न दिया गया तो हृदय, हृदय नहीं रह जाएगा।
जिन्होंने रक्त की जगह पसीना भी न बहाया हो, जो स्वयं निरंकुश हों और जिन्होंने करोड़ों भाई-बहनों को ग़ुलामी की बेड़ी से जकड़ रखा हो, उन्हें हाथ-पैर हिलाए और ऊँचे उठे बिना आशा भी नहीं रखनी चाहिए कि संसार कि संसार उन्हें मनुष्य भी समझेगा।
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बिना कष्टसहन तथा स्वार्थत्याग के, संसार का कोई भी महान कार्य सिद्ध नहीं हो सकता।
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स्थिति के अनुसार रूप में परिवर्तन करना पड़ता है, जिनमें परिस्थिति के अनुसार बनने का गुण नहीं रहा, वे बिगड़ गए।
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लोकरुचि अथवा लोक-उक्तियों के अनुसार जो अपना जीवन-यापन करते हैं, वे अपने पड़ोसियों की प्रशंसा के पात्र भले ही बन जाएँ, पर उनका जीवन औरों के लिए नहीं होता है।
जिस प्रकार प्रातःकाल की लालिमा का मंद समीर; आगे प्रस्फुटित होने वाले प्रकाशमान दिनमणि के पूर्ण तेज़ का सूचक होता है, उसी प्रकार आदर्शवादी का आशामय जीवन; अपने इष्ट की मूर्ति को अपने हृदय में रखता हुआ, संसार के विपुल तेजमय कल्याण का सूचक होता है।
भारतवर्ष के समस्त कर्मक्षेत्र पर तपस्या का भाव स्पष्टता से अंकित है।
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कर्म-स्थल की क्रियाशीलता, प्रेरणाओं की स्फ़ूर्ति से कोई बच नहीं सकता।
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स्वाधीन देश ही राष्ट्रों की भूमि है; क्योंकि पुच्छविहीन पशु हों तो हों, परंतु अपना शासन अपने हाथों में न रखने वाले राष्ट्र नहीं होते।
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चुपचाप बैठने से अधिकार कभी नहीं मिलते। बिना सच्चे आंदोलन के किसी भी राजनीतिक कार्य में कभी भी सफलता प्राप्त नहीं हुई है।
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स्वतंत्रता का पवित्र आदेश है कि किसी को किसी के ऊपर स्वेच्छाचार करने का अधिकार नहीं, किसी को किसी का अधिकार छीनने का हक़ नहीं।
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हम केवल यही चाहते हैं कि अपनी दशा न भूलें, मृगतृष्णा हमें पथ से भ्रष्ट न करे और हममें न्याय और अन्याय; साधु और असाधु के अंतर का ज्ञान, इसलिए जाग्रत रहे कि हम धोखा खाकर जातीय चरित्र और उन्नति का नाश न करते रहें।
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तनिक-तनिक सी बातों पर हर्ष से गद्गद हो जाना और अहसानमंदी के दरिया में बह जाना—ओछापन और अज्ञान, निर्बलता और चंचलता है।
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जो लोग हिंदी को मातृभाषा मानते हैं; उनके सामने स्पष्ट ढंग से वह बात सदा रहनी चाहिए कि हिंदी की जो इधर उन्नति हुई, वह उसकी आगामी बाढ़ के लिए कदापि ऐसी नहीं है कि हम समझ लें कि अब गाड़ी चलती जाएगी, वह रुकेगी नहीं; अब हमें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हिंदी की स्वाभाविक गति के लिए तो अनेक बाधाओं के हटाने की आवश्यकता है।
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पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नक़ल करने का स्वभाव बना करके, उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है।
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कोई महान कार्य, तप के बिना पूरा नहीं हो सकता। कोई आत्मा, तप के बिना महान नहीं हो सकती।
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किसी भी अवस्था में कुछ आदमियों के अपराध पर, उनका पूरा वर्ग अपराधी नहीं माना जा सकता।
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भाषा जातीय जीवन और उसकी संस्कृति की सर्वप्रधान रक्षिका है। वह उसके शील का दर्पण है। वह उसके विकास का वैभव है।
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धर्म ने ज्ञान-प्रचार का आदेश दिया, धार्मिक आडंबर ने घोर अज्ञान फैलाया। धर्म ने मनुष्य के सामने धर्म का सर्वश्रेष्ठ आदर्श रखा, धार्मिक आडंबरों ने उसे पग-पग पर पीछे धकेला।
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जिस देश में सुधार की आवश्यकता नहीं, वह इस परिवर्तनशील संसार का भाग नहीं हो सकता।
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प्रत्येक युग का अपना संदेश होता है। संदेशों को वही सबसे पहले सुनते हैं, जो विश्व की उन्नति की ड्योढ़ी पर अपनी सबसे अधिक बहुमूल्य वस्तु की भेंट चढ़ाते हैं।
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धर्म और ईमान हो, मन का सौदा हो, ईश्वर और आत्मा के बीच का संबंध हो, आत्मा को शुद्ध करने और ऊँचे उठाने का साधन हो—वह किसी दशा में भी, किसी दूसरे व्यक्ति की स्वाधीनता के छीनने या कुचलने का साधन न बने।
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किसी वर्ग की सुविधा और लाभ के लिए, संसार के झोपड़ों में रहने वाले लोगों का शरीर और मन भेंट नहीं दिया जा सकता।
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प्रत्येक राष्ट्र के जीवन-निर्वाह के लिए; यह आवश्यक है कि देश की प्राकृतिक संपत्ति की रक्षा की जावे, तथा उस संपत्ति को उन्नति देने के पूरे-पूरे प्रयत्न किए जाएँ।
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युवकत्व का सबसे बड़ा प्रमाण ही यह है कि भावनाओं का वह पुंज हो और अखिल उत्साह का स्त्रोत।
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जनता अपने भाग्य की आप मालिक है। वह अपने कामों को आप करेगी, व्यक्ति या समूह उस पर आज्ञा नहीं चला सकेंगे। उसकी आज्ञा के सामने सम्राट और भिखारी दोनों बराबर होंगे।
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