भर्तृहरि के उद्धरण
बड़ाई, पंडिताई, विवेकता और कुलीनता—ये सब मनुष्य के देह में तभी तक रहती हैं, जबतक शरीर में कामागिन नहीं प्रज्वलित होती। जब तक आदमी कामपीड़ित नहीं होता, तभी तक उसे अपने गौरव, विद्वत्ता, उच्च कुल की उत्पत्ति और सदाचार का ज्ञान रहता है।
स्त्रियाँ जब प्रेम में आकर सही या ग़लत कुछ भी ठान लेती हैं, तो उनको ऐसा करने से ब्रह्मा भी नहीं रोक सकता है।
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फूलों के गुच्छों के समान स्वाभिमानी मनस्वी पुरुषों की भी दो तरह की स्थिति होती है, या तो समाज में सर्वोपरि स्थान प्राप्त करते हैं, या समाज से दूर रहकर एकांत में अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
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कहीं सत्य, कहीं असत्यवादी, कहीं कठोर, कहीं प्रियभाषिणी, कहीं हिंसा करने वाली, कहीं दयालु, कहीं लोभी, कहीं उदार, कहीं नित्य प्रति बहुत द्रव्य व्यय करने वाली और कहीं बहुत से संचय करने वाली यह राजनीति—वेश्या के सामान अनेक रूप से रहती है।
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संसार-बंधन के दुःखों की रचना को विध्वंस करने हेतु; प्रलयाग्नि के सदृश ब्रह्मानंद पद में प्रवेश के उद्योग के बिना ,और बाक़ी सब वणिग्व्यापार है। प्रयोजनवाली बात केवल ब्रह्म का चिंतन है।
जब कोई परिक्षीण अर्थात् दरिद्री होता है, तब एक पसर यव की इच्छा करता है और वही मनुष्य जब सर्वसंपन्न अर्थात् धनिक अवस्था में हो जाता है, तब पृथ्वी को तृण के समान गिनता है, इस कारण यही दोनों चंचल अवस्थाएँ; पुरुष को गुरु और लघु बनाती हैं, वस्तुओं को भी फैलाती और समेटती हैं।
तरुणी के वेषवाली, कामदेव को उदित करने वाली, जातिपुष्प के सुगंध को विकसित करने वाली, जिसके पुष्ट पयोधर के उभार उन्नत हैं—ऐसी वर्षाऋतु किसको नहीं हर्षित करती है।
नवीन यौवन को देखकर विरला ही कोई महात्मा होगा, जिसको काम विकार न होगा।
जंगली फल आदि के द्वारा जीवन व्यतीत करना सफल है, परंतु खल के साथ निवास अच्छा नहीं।
दान, भोग और नाश—यही तीन धन की गति है। जिसने दान नहीं दिया और न अपने भोग में लाया, उसके धन की नाशरूप तीसरी गति होती है।
किलकिंचित विलास से शिथिल हो प्रियतमा के संग रहना, कान से कोकिला के शब्द की कलकलाहट सुनना और चाँदनी का सुख उठाना—ऐसी सामग्री से चैत्रमास की विचित्र रातें, किसी पुण्यवान् के हृदय और नेत्रों को सुख देती हुई बीतती हैं।
जैसे फल लगने से वृक्ष नम्र हो जाते हैं; जैसे नवीन जल भरने से मेघ भूमि पर झुक जाते है, वैसे ही सत्पुरुष भी संपत्ति प्राप्त कर के उद्धत नहीं होते, किंतु नम्र हो जाते हैं।
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नीति जानने वाले चाहे निंदा करें, चाहे स्तुति और लक्ष्मी चाहे घर में बहुत सी आवे, चाहे चली जाए, प्राण चाहे अभी जाए, चाहे कल्पांत में, परंतु धीर लोग न्याय का मार्ग छोड़कर एक पग भी उससे बाहर नहीं चलते।
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साहित्य और संगीतशास्त्र तथा कला से जो मनुष्य हीन है—वह पूँछ और सींगरहित पशु है।
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स्त्री तभी तक अमृतमय है कि जब तक नेत्र के सामने है, नेत्र से जैसे दूर हुई कि विष से भी अधिक कष्टकारी हो जाती है, अर्थात् विरह से संताप देती है।
ब्रह्मज्ञानी अपने सद्विचारों के कारण असाधारण कार्य करते हैं। वह सभी समय में भोगों की, धन की इच्छा निःस्पृह भाव से त्याग देते हैं।
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आलस्य मनुष्यों के शरीर में महाशत्रु है और उद्योग के समान दूसरा कोई बंधु नहीं है, जिसके करने से दुःख नहीं आता।
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यह असार संसार; जिसकी अंत अवस्था अतिचंचल है, उसमें पंडितों के लिए दो ही सुलभ गति हैं कि या तो तत्त्वज्ञानरूपी अमृत रस में स्नान करने वाली निर्मल बुद्धि से उनका काल अच्छा व्यतीत होता रहे, अथवा सुंदरकामिनी जो कि पुष्ट स्तन और जघन से भोग में सुखदायी हैं; उनके शरीर पर हाथ दिए, चंचलता से उद्योग में तत्पर रहते हुए उनका काल भली-भाँति व्यतीत होता रहे।
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मन की प्रसन्नता को छोड़कर, अन्य अनेक कार्यों से कल्याणप्राप्ति की आशा केवल निराशा मात्र है।
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प्रेयसी समीप में रहने पर बड़ी प्यारी लगती है। जब वह अलग हो जाती है, तो उसका वियोग बड़ा ही दुःख देता है।
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वे श्रेष्ठ निश्चित ही विपरीत समझवाले हैं, जिन्होंने स्त्रियों का नाम अबला रखा है; क्योंकि जिनकी चंचल पुतलियों के कटाक्ष से इंद्रादिक भी हार मानते हैं, भला कहो, वे अबला कैसे हैं?
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संपत्ति में महात्मा लोगों का चित्त कमल से भी कोमल रहता है, और आपत्ति में पर्वत की बड़ी शिला के समान कठोर हो जाता है।
शीघ्र खिलनेवाली मालती की कलियों की माला गले में पहिने हों, केसरयुक्त चंदन अंग में लगाए हों और सुंदर प्यारी स्त्रियों को छाती से लिपटाए हों—तो यह जानो कि शेष स्वर्ग का भोग यहाँ प्राप्त हुआ है।
मित्र को पाप करने से वर्जित करे और उसके हित की बात उसे उपदेश करे, उसकी गुप्त बात को छिपावे, गुणों को प्रकट करे, आपत्तिकाल में साथ न छोड़े और समय पर यथाशक्ति द्रव्य आदि का सहयोग भी करे—संतों ने अच्छे मित्रों का यह लक्षण कहा है।
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लोभ जिसमें है, फिर उसमें अन्य अवगुण क्या चाहिए? जो कुटिल है, उसे और पातक करने की क्या आवश्यकता है? सत्यवक्ता को तप का क्या प्रयोजन है? जिसका मन शुद्ध है, उसे तीर्थ करने से क्या अधिक फल होगा? जो सज्जन हैं, उन्हें मित्र और कुटुंब की क्या कमी है? यशस्वी पुरुषों के लिए यश से बढ़ कर क्या भूषण है।
सूर्य के उदय-अस्त होने से दिन-दिन आयुष्य घटती जाती है, अनेक कार्यों के भार के कारण व्यापार में व्यतीत काल जाना नहीं जाता; और जन्म, वृद्धापन, विपत्ति तथा मृत्यु देखकर भी त्रास नहीं होता, इससे यह निश्चित हुआ कि मोहमयी प्रमादरूपी मदिरा पीकर जगत् मतवाला हो रहा है।
इस संसार में पराया हित करने से अधिक अन्य पुण्य नहीं, और कमलनयनी स्त्रियों से अधिक दूसरी सुंदर वस्तु नहीं।
शास्त्रोक्त शब्दों से जिनकी वाणी सुंदर है; और शिष्यों के पढ़ाने योग्य जिनकी विद्या है और वे स्वयं भी प्रसिद्ध हैं, ऐसे कवि-विद्वान् जिस राजा के देश में निर्धन रहते हैं, तो यह उस राजा की मुर्खता ही है।
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जिनके पास विद्या, तप, दान, शील, गुण और धर्म नहीं है, वे इस नश्वर-संसार में मनुष्यों के रूप में भार होकर, विचरण करते हुए साक्षात् पशु ही हैं।
सुख के समय थोड़ा-थोड़ा आँखों को बंद कर, जो सुख का अनुभव दो युवा प्रेमियों को होता है—वह वास्तव में कामदेव का पुरुषार्थ है।
ऐसे पुण्यवान् कवीश्वर सदा ही उत्कृष्टता के कारण विजयी हैं; जो रससिद्धि को पाए हैं, क्योंकि उनके यशरूपी शरीर में ज़रा-मरण का भय नहीं है।
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विघ्न के भय से नीचजन कार्य को आरंभ ही नहीं करते, और मध्यजन पहले आरंभ करके; पुनः विघ्न को देख कार्य को छोड़ कर बैठ जाते हैं, और उत्तमजन बारंबार विघ्न के आने पर भी, कार्य आरंभ करके उसका परित्याग नहीं करते अर्थात् उसको पूरा ही करके छोड़ते हैं।
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बिना विचारे अतिशीघ्रता से काम करने का फल, मरणपर्यंत हृदय को जलाता है और कंटक के समान खटकता है।
जिसमें आम के बौरों के केसरसमूह की सुगंध से दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, और मीठे-मीठे मकरंद का पान कर भ्रमर उन्मत्त हो रहे हैं—ऐसे ऋतुराज में किसे उत्कंठा नहीं होती।
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विपत्ति में अमृत भी विष की तरह हो जाता है।
अप्रियवचन से दरिद्र, प्रिय वचनों से संपन्न, अपनी ही स्त्री से संतुष्ट और पराई निंदा से रहित जो पुरुष हैं, उनसे कहीं-कहीं पृथ्वी शोभायमान है, अर्थात् ऐसे पुरुष सभी जगह नहीं मिलते।
मनुष्य बलपूर्वक मगर के मुख के डाढ़ों की नोक से मणि को निकाल सकता है; और चंचल तरंगों से भरे हुए समुद्र को तैरकर पार हो सकता है, और क्रोधित सर्प को फूल के समान सिर पर धारण कर सकता है, परंतु मूर्ख का चित्त जो असत्य वस्तु में लगा हुआ है, उसे कोई नहीं अलग कर सकता है।
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सत्पुरुषों को ज्ञान मानमदादि नष्ट करने हेतु होता है, और वही ज्ञान दुर्जनों को मदमान उत्पन्न करता है, जैसे एकांत स्थान; संयमी पुरुषों को मुक्ति साधन का हेतु होता है, और कामातुरों को कामसाधन का कारण होता है।
संसार सागर को पार करने के लिए ब्रह्मज्ञान ही एकमात्र नौका है।
उज्ज्वल घर, अच्छे हावभावयुक्त स्त्रीजन और श्वेत छत्रसहित शोभायमान लक्ष्मी तब ही स्थिरता से भोग में आती है, जब पुण्य की वृद्धि होती है।
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मौन अर्थात् चुप रहना, यह तो अपने आधीन है तथा और भी इसमें अनेक गुण हैं। विधाता ने इसे अज्ञानता को ढ़कने का उपाय बनाया है, और विशेषकर सर्वज्ञों की सभा में यह मूर्खों का भूषण है।
मेघों से व्याप्त आकाश और प्रफुल्लित पृथ्वी, नए-नए अंकुरों पर ओस के जल से पूर्ण तथा नवीन कुटज और कदंब के पुष्पों के समूह की सुंगधित वाले, और मयूरों के झुंड की सुंदर वाणी से रमणीय वन के प्रांतभाग—ये पदार्थ वर्षाऋतु में सुखी और दुःखी पुरुषों को उत्कंठा प्रदान करते हैं।
सांसरिक सभी वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं, किंतु काल का कभी नाश नहीं होता है।
सत्पुरुष वे हैं, जो अपना स्वार्थ छोड़ कर दूसरे के कार्य को साधते हैं, सामान्य पुरुष वे हैं; जो अपने और पराए दोनों के कार्यों को साधन करते हैं और मनुष्यों में राक्षस वे पुरुष हैं, जो अपने हित के लिए पराए के कार्य को नष्ट करते हैं और जो व्यर्थ पराए कार्य की हानि करते हैं।
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