समस्या-उठाऊ शिक्षा क्रांतिकारी भविष्यता है।
चालबाज़ी करने, नारेबाज़ी करने, 'जमा' करने, निर्देश करने, और कठोर अनुशासन लागू करने से क्रांतिकारी आचरण नहीं बनता, क्योंकि इनसे तो प्रभुत्व का आचरण बनता है।
कोई भी क्रांतिकारी विचारक केवल इस कारण कवि नहीं होता कि वह नवीन चिंतन करता है, या उसके शब्द सत्य की गहन झलक प्रस्तुत करते हैं; बल्कि इसलिए भी कि उसकी भाषा में एक सहज लय विद्यमान होती है, जो शाश्वत संगीत की प्रतिध्वनि-सी प्रतीत होती है।
आलोचना और स्वतंत्र चिंतन, क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण होते हैं।
कवि का अर्थ दो-चार शब्द जोड़नेवाला नहीं है, कवि 'क्रांतदर्शी' होता है। उसे उस का दर्शन होता है।
वास्तव में हमारे देश के सभी राजनीतिक आंदोलनों में, जिन्होंने हमारे आधुनिक इतिहास में कोई महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई है—उस आदर्श की कमी रही है, जिसकी प्राप्ति उसका लक्ष्य था।
मंगल पांडे ने सत्तावन के इस क्रांतियुद्ध के लिए अपना उष्ण रक्त प्रदान किया था। किंतु इसके साथ ही साथ उसने अपना नाम भी अमिट रहने वाले अक्षरों में कर दिया। स्वधर्म और स्वराज्य हेतु लड़े गए 1857 के स्वातंत्र्य-समर में भाग लेने वाले सभी क्रांतिकारियों को भी इस क्रांति के शत्रुओं ने 'पांडे' नाम से संबोधित किया। प्रत्येक माता का यह पावन दायित्व है कि अपने बालक को इस पवित्र नाम का स्वाभिमान सहित उच्चारण करना सिखला दे।
सत्ता प्राप्त करना क्रांतिकारी प्रक्रिया का चाहे जितना निर्णायक क्षण हो, वह एक क्षण ही है।
क्रांतिकारी को गृहस्थी में पड़ कर अपनी शक्ति कम नहीं कर लेनी चाहिए अपितु सदैव अपनी शक्ति बढ़ाते रहने का प्रयत्न करना चाहिए, दिन पर दिन अपनी शक्ति को गहरा और विशाल बनाने का प्रयत्न करते रहना चहिए। इस काम के लिए पूरा समय चाहिए। क्रांतिकारियों को सदा दूसरों से आगे रहना चाहिए।
प्रामाणिक क्रांति उस यथार्थ के रूपांतरण का प्रयास करती है, जो यथार्थ अमानुषिक बनाने वाली स्थिति पैदा करता है।
जो कोई भी अपने आपको मार्क्सवादी क्रांतिकारी लेखक कहता हो और ख़ासतौर से जो लेखक कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य हो—उसे मार्क्सवाद-लेनिनवाद का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। लेकिन इस समय कुछ साथी मार्क्सवाद की बुनियादी धारणाओं से अनभिज्ञ हैं।
संसार में क्रांतिकारी शक्ति केवल मृत्यु है। वे शक्तियाँ क्रांतिकारी नहीं, जिन्हें हमने बनाया है।
कोई क्रांतिकारी किसी व्यक्ति-विशेष से चिपटकर नहीं रह सकता, किसी के साथ लगातार हाथ मिलाए हुए जीवन में नहीं चल सकता। ऐसा करे तो उसे अपने क्रांतिकारी विश्वास को कम और ढीला करना होगा।
क्रांति करने के लिए क्रांतिकारी नेताओं को निस्संदेह जनता के जुड़ाव की ज़रूरत होती है।
समाज का पुनर्निर्माण यांत्रिक ढंग से नहीं किया जा सकता। उसके लिए आधारभूत औजार है—क्रांति के द्वारा सांस्कृतिक रूप से पुनर्सृजित संस्कृति।
क्रांतिकारी समाज भी अपनी सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा बड़े सजग भाव से करते हैं।
लेनिन की प्रसिद्ध उक्ति है—"क्रांतिकारी सिद्धांत के बिना कोई क्रांतिकारी आंदोलन संभव नहीं।" इसका अर्थ यह है कि क्रांति न तो शब्दाडंबर से होती है, न सक्रियतावाद से। क्रांति होती है आचरण से।