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रील रसाचार्य : मेट्रो में रील

“अगला स्टेशन न्यू अशोक नगर है। दरवाज़े...”

“ये लड़की बहुत बोलती है, ज़रा चुप रहोगी?”

पहली आवाज़ मेट्रो के अनाउसमेंट की है, दूसरी आवाज़ किसी रील की। दोनों आवाज़ें इस तरह गुत्थमगुत्था हुईं कि मैं समझ ही नहीं पाया, दरवाज़े किस ओर खुलेंगे! मुझे ‘न्यू अशोक नगर’ उतरना नहीं था, पर यह जानना ज़रूरी था कि दरवाज़े किस तरफ़ खुलेंगे। मेट्रो में यह जानकारी उतनी ही ज़रूरी होती है, जितनी किसी युद्ध में रसद-आपूर्ति की दिशा। उसी हिसाब से अपनी रणनीति बनाकर मुझे ऐसी जगह पहुँचना था, जहाँ से मैं चढ़ने-उतरने वालों की हलचल से अप्रभावित रह सकूँ।

थोड़ी देर पहले ही घोषणा हुई थी कि दिल्ली मेट्रो में रील बनाना मना है, तेज़ आवाज़ में देखना भी शायद। कुछ वक़्त पहले तक मेट्रो में रील बनाना आम कल्चर बन गया था। हम दुनिया भर की मेट्रो में बनी रीलें देखते ही हैं। वहाँ आबादी कम है, इसलिए भीड़ कम रहती है, रील सुंदर दिखती है और बनाने की जगह भी ख़ूब मिल जाती है... पर भारत जैसे देश में मेट्रो के भीतर रील बनाने लायक़ जगह बहुत कम है। उस पर इस देश की शराफ़त को मेट्रो में गाली-गलौज और झगड़े से उतनी चोट नहीं पहुँचती, जितनी किसी लड़की के नाच लेने से पहुँच जाती है। गाली देना यहाँ सामान्य व्यवहार है, नाचना सांस्कृतिक संकट। 

ख़ैर, न्यू अशोक नगर गुज़र चुका है और अब उस लड़के की रील में नब्बे के दशक का एक गाना बज रहा है, जो आजकल ट्रेंड में है। जो गाना कभी कैसेट में घिसता था, वह अब एल्गोरिदम में चमक रहा है।

थोड़ी दूर एक सज्जन बैठे रील देख रहे हैं और उनके सामने की तरफ़ बैठे हर शख़्स को उनके मोबाइल की स्क्रीन पीछे लगे शीशों में दिख रही थी। नज़ारा यह था कि वह रील देख रहे थे और हम उन्हें। उन्हें इसकी ख़बर तक नहीं थी कि उनकी निजी फ़ीड इस वक़्त पूरे डिब्बे की सार्वजनिक प्रदर्शनी बन चुकी है। उनकी रीलों में एक अद्भुत वैराइटी है। जिसे इस देश की बहुसंख्या का सैंपल साइज़ समझा जा सकता है। एक-दो रीलों में वह लड़कियों को नाचते देख रहे थे, फिर अचानक ‘धर्म की रक्षा’ और ‘देश को भीतर के दुश्मनों से ख़तरा’ टाइप रीलों पर पहुँचे। उसके बाद सीधे कुमार सानू और फिर उनकी फ़ीड में ज्योतिष की एक रील आ गई। कमाल यह कि इन सारी रीलों में हर जानकारी किसी न किसी महिला के माध्यम से दी जा रही थी। ज्योतिष वाली महिला की रुचि ज्योतिष से ज़्यादा मॉडलिंग में लग रही थी। न जाने किस पियर प्रेशर में उसे यह शुक्र-शनिचर करना पड़ रहा था।

रील चल रही थी और मेट्रो भी। मेट्रो पटरी पर, उँगलियाँ मोबाइल पर। मुझे लगा, यह एक रील-यात्रा नहीं, पूरे समाज का रेखाचित्र है। नाच, नफ़रत, नॉस्टैल्जिया और नक्षत्र, सब एक ही उँगली की एक ही सरक में। किसी पिछली चीज़ का अगली से कोई संबंध नहीं, लेकिन फिर भी एक साम्य। कोई रील पिछली रील से हिसाब नहीं करती। देखने वाला हर बार नए सिरे से मुस्कुराता है, भड़कता है, भरोसा करता है और भूल जाता है।

“अगला स्टेशन मयूर विहार एक्सटेंशन है।”

मुझे यहाँ भी नहीं उतरना।

रील देखने वाले सज्जन अब लगभग सिद्धावस्था को प्राप्त हो चुके हैं। वे भूल गए हैं कि रील उसके फ़ोन में है, फ़ोन उसके हाथ में है और वह उस मेट्रो में है जिसके दरवाज़े पर उतरने-चढ़ने वालों का मेला लगा है। यह इतना सामान्य हो चुका है कि दो स्टेशनों के बीच की दूरी रील से नापी जा सकती है। यह बोरियत को इतनी देर तक दूर रखता है कि कई बार लोग अपने स्टेशन से आगे निकल जाते हैं। पहले लोग मंज़िल से चूकते थे तो नींद को दोष देते थे, अब रील को देते हैं या शायद देते भी नहीं।

मैं मेट्रो में चला जा रहा हूँ और उस अकेले इंसान को देख रहा हूँ, जो मुझे किसी अजूबे की तरह लग रहा है। मेट्रो में किताब पढ़ता इंसान। उसके अजूबा लगने का कारण वह ख़ुद नहीं है, बल्कि उसके आस-पास हम सब लोग हैं, जो अपने-अपने मोबाइल में अंतहीन रील ही देख रहे हैं... और वह किताब पढ़ रहा है। उसके हाथ में स्क्रॉल नहीं है, सिर्फ़ पन्ना है, जो तभी पलटता है जब पढ़ने वाला तैयार हो। मैं रील देखने वालों पर नज़र दौड़ाता हूँ तो भारत की आबादी के हर आयु वर्ग का उपलब्ध प्रतिनिधि मिल जाता है। सब एक ही तन्मयता से रील देख रहे हैं। इस डिब्बे में किताब एक अल्पसंख्यक है और अल्पसंख्यक हमेशा थोड़ा अजूबा लगता है।

कुछ देर मैं यह भी सोचता रहा कि क्या उसे अपने अजूबा होने का अंदाज़ा है। शायद नहीं। वह अपने पन्नों में इतना डूबा है कि उसे न इस डिब्बे की फ़िक्र है, न अपने स्टेशन के छूट जाने का डर। उसकी दुनिया में सिर्फ़ एक आवाज़ है, जो लिखने वाले की है। बाक़ी सारी आवाज़ें, घोषणा हो या हँसी, उसके लिए शायद उतनी ही दूर हैं जितना किसी दूसरे शहर का स्टेशन। शायद इस पूरे डिब्बे में वही अकेला है, जिसे दरवाज़ों की दिशा से ज़्यादा अगले पन्ने की फ़िक्र है।

घोषणा होती है :

“यह मयूर विहार एक है। दरवाज़े...”

“ये लड़की बहुत बोलती है, ज़रा चुप रहोगी?”

एक युवा ने उद्घोषिका की आवाज़ को डाँटते हुए कहा और हँस दिया। अब पता नहीं, इस मेट्रो के दरवाज़े किस तरफ़ खुलेंगे... मुझे यहाँ उतरना था। 

फिर भी मेट्रो में रील देखना और रील में ही घुस जाना, अब भी दो अलग बातें हैं। इसीलिए मैं सोचता हूँ कि यह दुनिया, जो हर तरफ़ से रील द्वारा आक्रांत, अनूदित और व्याख्यायित की जा रही है; पल-पल बदलती इस दुनिया में, रील के इस महासागर के पार भी क्या किसी व्यवस्था का कोई व्याकरण है? क्या कोई ऐसी घोषणा है, जो इस शोर के बीच भी साफ़ सुनाई दे और बता सके कि दरवाज़े किस ओर खुलेंगे?

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