प्रेम पर दोहे

प्रेम के बारे में जहाँ

यह कहा जाता हो कि प्रेम में तो आम व्यक्ति भी कवि-शाइर हो जाता है, वहाँ प्रेम का सर्वप्रमुख काव्य-विषय होना अत्यंत नैसर्गिक है। सात सौ से अधिक काव्य-अभिव्यक्तियों का यह व्यापक और विशिष्ट चयन प्रेम के इर्द-गिर्द इतराती कविताओं से किया गया है। इनमें प्रेम के विविध पक्षों को पढ़ा-परखा जा सकता है।

कहि रहीम इक दीप तें, प्रगट सबै दुति होय।

तन सनेह कैसे दुरै, दृग दीपक जरु दोय॥

रहीम कहते हैं कि जब एक ही दीपक के प्रकाश से घर में रखी सारी वस्तुएँ स्पष्ट दीखने लगती हैं, तो फिर नेत्र रूपी दो-दो दीपकों के होते तन-मन में बसे स्नेह-भाव को कोई कैसे भीतर छिपाकर रख सकता है! अर्थात मन में छिपे प्रेम-भाव को नेत्रों के द्वारा व्यक्त किया जाता है और नेत्रों से ही उसकी अभिव्यक्ति हो जाती है।

रहीम
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फूलति कली गुलाब की, सखि यहि रूप लखै न।

मनौ बुलावति मधुप कौं, दै चुटकी की सैन॥

एक सखी दूसरी सखी से चटचटा कर विकसित होती हुई कली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि, इस खिलती हुई गुलाब की कली का रूप तो देखो न। यह ऐसी प्रतीत होती है, मानो अपने प्रियतम भौंरे को रस लेने के लिए चुटकी बजाकर इशारा करती हुई अपने पास बुला रही हो।

मतिराम

लाल लली ललि लाल की, लै लागी लखि लोल।

त्याय दे री लय लायकर, दुहु कहि सुनि चित डोल॥

लाल को लली से और लली को लाल से मिलने की इच्छा है। दोनों मुझे कहते हैं, अरी तू उससे मुझे मिलाकर विरहाग्नि को शांत कर। इनकी बातें सुनते-सुनते मेरा भी चित्त विचलित हो गया है।

दयाराम

प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकना चूर।

छके रहे घूमत रहैं, सहजो देखि हज़ूर॥

सहजोबाई कहती हैं कि जो व्यक्ति ईश्वरीय-प्रेम के दीवाने हो जाते हैं, उनके मन की सांसारिक वासनाएँ-कामनाएँ एकदम चूर-चूर हो जाती हैं। ऐसे लोग सदा आनंद से तृप्त रहते हैं तथा संसार में घूमते हुए परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं।

सहजोबाई

प्रेम पंथ की पालकी, रैदास बैठियो आय।

सांचे सामी मिलन कूं, आनंद कह्यो जाय॥

रैदास कहते हैं कि वे प्रेम−मार्ग रूपी पालकी में बैठकर अपने सच्चे स्वामी से मिलने के लिए चले हैं। उनसे मिलने की चाह का आनंद ही निर्वचनीय है, तो उनसे मिलकर आनंद की अनुभूति का तो कहना ही क्या!

रैदास

तो पर वारौं उरबसी, सुनि, राधिके सुजान।

तू मोहन कैं उर बसी, है उरबसी-समान॥

हे सुजान राधिके, तुम यह समझ लो कि मैं तुम्हारे रूप-सौंदर्य पर उर्वशी जैसी नारी को भी न्यौछावर कर सकता हूँ। कारण यह है कि तुम तो मेरे हृदय में उसी प्रकार निवास करती हो, जिस प्रकार उर्वशी नामक आभूषण हृदय में निवास करता है।

बिहारी

‘तुलसी’ सब छल छाँड़िकै, कीजै राम-सनेह।

अंतर पति सों है कहा, जिन देखी सब देह॥

गोस्वामी जी कहते हैं कि सब छल-कपटों को छोड़ कर भगवान् की सच्चे हृदय से भक्ति करो। उस पति से भला क्या भेदभाव है जिसने सारे शरीर को देखा हुआ है। भाव यह कि जैसे पति अपनी पत्नी के सारे शरीर के रहस्यों को जानता है वैसे ही प्रभु सारे जीवों के सब कर्मों को जानता है।

तुलसीदास

माथे तिलक हाथ जपमाला, जग ठगने कूं स्वांग बनाया।

मारग छाड़ि कुमारग उहकै, सांची प्रीत बिनु राम पाया॥

ईश्वर को पाने के लिए माथे पर तिलक लगाना और माला जपना केवल संसार को ठगने का स्वांग है। प्रेम का मार्ग छोड़कर स्वांग करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होगी। सच्चे प्रेम के बिना परमात्मा को पाना असंभव है।

रैदास

रैदास प्रेम नहिं छिप सकई, लाख छिपाए कोय।

प्रेम मुख खोलै कभऊँ, नैन देत हैं रोय॥

रैदास कहते हैं कि प्रेम कोशिश करने पर भी छिप नहीं पाता, वह प्रकट हो ही जाता है। प्रेम का बखान वाणी द्वारा नहीं हो सकता। प्रेम को तो आँखों से निकले हुए आँसू ही व्यक्त करते हैं।

रैदास

चकमक सु परस्पर नयन, लगन प्रेम परि आगि।

सुलगि सोगठा रूप पुनि, गुन-दारू दूड जागि॥

चकमक के सदृश नेत्र जब आपस में टकराते हैं तो उनसे प्रेम की चिनगारियाँ निकलती हैं। फिर रूप रूपी सोगठे (रूई) पर इनके गिरने से आग सुलग जाती है, किंतु पूर्णतया प्रज्वलित तभी होती है जब उसका संयोग गुण रूपी शराब से होता है।

दयाराम

सायक-सम मायक नयन, रँगे त्रिबिध रंग गात।

झखौ बिलखि दुरि जात जल, लखि जलजात लजात॥

कवि कह रहा है कि नायिका की आँखें ऐसी हैं कि मछलियाँ भी उन्हें देखकर पानी में छिप जाती हैं, कमल लजा जाते हैं। नायिका के मादक और जादुई नेत्रों के प्रभाव से कमल और मछलियाँ लज्जित हो जाती हैं। कारण, नायिका के नेत्र संध्या के समान हैं और तीन रंगों—श्वेत, श्याम और रतनार से रँगे हुए हैं। यही कारण है कि उन्हें देखकर मछली दु:खी होकर पानी में छिप जाती है और कमल लज्जित होकर अपनी पंखुड़ियों को समेट लेता है। सांध्यवेला में श्वेत, श्याम और लाल तीनों रंग होते हैं और नायिका के नेत्रों में भी ये तीनों ही रंग हैं। निराशा के कारण वे श्याम हैं, प्रतीक्षा के कारण पीले या श्वेत हैं और मिलनातुरता के कारण लाल या अनुरागयुक्त हो रहे हैं।

बिहारी

मुसलमान सों दोस्ती, हिंदुअन सों कर प्रीत।

रैदास जोति सभ राम की, सभ हैं अपने मीत॥

हमें मुसलमान और हिंदुओं दोनों से समान रूप से दोस्ती और प्रेम करना चाहिए। दोनों के भीतर एक ही ईश्वर की ज्योति प्रकाशित हो रही है। सभी हमारे−अपने मित्र हैं।

रैदास

जमला लट्टू काठ का, रंग दिया करतार।

डोरी बाँधी प्रेम की, घूम रह्या संसार॥

विधाता ने काठ के लट्टू को रंगकर प्रेम की डोरी से बांधकर उसे फिरा दिया और वह संसार में चल रहा है।

अभिप्राय यह है कि पंचतत्त्व का यह मनुष्य शरीर विधाता ने रचा और सजाकर उसे जन्म दिया। यह शरीर संसार में अपने अस्तित्व को केवल प्रेम के ही कारण स्थिर रख रहा है।

जमाल

मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।

जा तन की झाँई परैं, स्यामु हरित-दुति होइ॥

इस दोहे के तीन अलग-अलग अर्थ बताए गए हैं।

बिहारी

रक्खइ सा विस-हारिणी बे कर चुम्बिवि जीउ।

पडिबिम्बिउ-मुंजालु जलु जेहिं अडोहिउ पीउ॥

वह पनिहारिन अपने उन दोनों हाथों को चूमकर जी रही है, जिनसे मुंज- प्रतिबिंबित जल प्रिय को पिलाया था।

हेमचंद्र

पूरी माँगति प्रेम सो, तजी कचौरी प्रीत।

बराबरी के नेह में, कह जमाल का रीत॥

वह नायिका कचोड़ी चाहकर पूरी मांगती है। बड़ा बड़ी (एक सूखी तरकारी) के प्रेम के कारण वह इस प्रकार क्यों आचरण कर रही है? अभिप्राय यह है कि नायिका अपने पति से पूरी (पूर्ण) प्रीति माँगती है, वह कचौरी (अधूरापन) नहीं चाहती। बराबरी के प्रेम में पूर्णता ही होती है।

जमाल

ख़ुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।

तन मेरो मन पीउ को, दोउ भए एक रंग॥

ख़ुसरो कहते हैं कि उसके सौभाग्य की रात्रि बहुत अच्छी तरह से बीत गई, उसमें परमात्मा प्रियतम के साथ जीवात्मा की पूर्ण आनंद की स्थिति रही। वह आनंद की अद्वैतमयी स्थिति ऐसी थी कि तन तो जीवात्मा का था और मन प्रियतम का था, परंतु सौभाग्य की रात्रि में दोनों मिलकर एक हो गए, अर्थात दोनों में कोई भेद नहीं रहा और द्वैत की स्थिति नहीं रही।

अमीर ख़ुसरो

आसिक मासूक ह्वै गया, इसक कहावै सोइ।

दादू उस मासूक का, अलह आसिक होइ॥

जब प्रेमी और प्रेमिका (प्रेम-पात्र) एक रूप हो जाते हैं, तो वह सच्चा इश्क़ कहलाता है। इस अद्वैत की स्थिति में स्वयं ईश्वर उसके प्रेमी और विरहिणी प्रेमिका (प्रेम-पात्र) बन जाते हैं।

दादू दयाल

सतगुरु मिल्यो तो का भयो, घट नहिं प्रेम प्रतीत।

अंतर कोर भींजई, ज्यों पत्थल जल भीत॥

संत केशवदास

प्रेम हरी को रूप है, त्यौं हरि प्रेम स्वरूप।

एक होइ द्वै यो लसै, ज्यौं सूरज अरु धूप॥

रसखान

प्रेम-रसासव छकि दोऊ, करत बिलास विनोद।

चढ़त रहत, उतरत नहीं, गौर स्याम-छबि मोद॥

ध्रुवदास

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।

भरे भौन मैं करत हैं, नैननु ही सब बात॥

सखी कह रही है कि नायक अपनी आँखों के इशारे से कुछ कहता है अर्थात् रति की प्रार्थना करता है, किंतु नायिका उसके रति विषयक निवेदन को अस्वीकार कर देती है। वस्तुतः उसका अस्वीकार स्वीकार का ही वाचक है तभी तो नायक नायिका के निषेध पर भी रीझ जाता है। जब नायिका देखती है कि नायक इतना कामासक्त या प्रेमासक्त है कि उसके निषेध पर भी रीझ रहा है तो उसे खीझ उत्पन्न होती है। ध्यान रहे, नायिका की यह खीझ भी बनावटी है। यदि ऐसी होती तो पुनः दोनों के नेत्र परस्पर कैसे मिलते? दोनों के नेत्रों का मिलना परस्पर रति भाव को बढ़ाता है। फलतः दोनों ही प्रसन्नता से खिल उठते हैं, किंतु लज्जित भी होते हैं। उनके लज्जित होने का कारण यही है कि वे यह सब अर्थात् प्रेम-विषयक विविध चेष्टाएँ भरे भवन में अनेक सामाजिकों की भीड़ में करते हैं।

बिहारी

इस्क-चमन महबूब का, जहाँ जावै कोइ।

जावै सो जीवै नहीं, जियै सु बौरा होइ॥

नागरीदास

अरे पियारे, क्या करौ, जाहि रहो है लाग।

क्योंकरि दिल-बारूद में, छिपे इस्क की आग॥

नागरीदास

पै मिठास या मार के, रोम-रोम भरपूर।

मरत जियै झुकतौ थिरै, बनै सु चकनाचूर॥

रसखान

अति सूक्षम कोमल अतिहि, अति पतरो अति दूर।

प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर॥

रसखान

इक अगी बिनु कारनहिं, इक रस सदा समान।

गनै प्रियहि सर्वस्व जो, सोई प्रेम प्रमान॥

रसखान

गंगा जमुना सुरसती, सात सिंधु भरपूर।

‘तुलसी’ चातक के मते, बिन स्वाती सब धूर॥

गंगा, यमुना, सरस्वती और सातों समुद्र ये सब जल से भले ही भरे हुए हों, पर पपीहे के लिए तो स्वाति नक्षत्र के बिना ये सब धूल के समान ही हैं; क्योंकि पपीहा केवल स्वाति नक्षत्र में बरसा हुआ जल ही पीता है। भाव यह है कि सच्चे प्रेमी अपनी प्रिय वस्तु के बिना अन्य किसी वस्तु को कभी नहीं चाहता, चाहे वह वस्तु कितनी ही मूल्यवान् क्यों हो।

तुलसीदास

ससि सौं अति सुंदर मुष, अंग सुंदर जान।

प्रीतम रहे बस भयौ, ऐसो प्रेम प्रधान॥

दौलत कवि

जो तेरे घट प्रेम है, तो कहि-कहि सुनाव।

अंतरजामी जानि है, अंतरगत का भाव॥

मलूकदास

तजि आसा तन, प्रान की, दीपै मिलत पतंग।

दरसाबत सब नरन कों, परम प्रेंम कौ ढंग॥

भिखारीदास

प्रीतम नहिं कछु लखि सक्यो, आलि कही तिय कान।

नथ उतारि धरि नाक तं, कह जमाल का जान॥

सखी ने नायिका के कान में जो कहा, उसको प्रिय जान सका नायिका ने अपने नाक की नथ को क्यों खोल दिया ? अभिप्राय यह है कि नायिका के अधरों पर नथ को झूलते देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो अधर रस की रक्षा के लिए ताला लगा हो। नथ अधर रस के पान में बाधक है, ऐसा भ्रम नायक को होते देखकर सखी ने नायिका से नथ हटा देने को कहा।

जमाल

लाल चलत लखि वाल के, भरि आए दृग लोल।

आनन तें बात कढ़ी, पीरी चढ़ी कपोल॥

रामसहाय दास

अद्भुत गत यह प्रेम की, बैनन कही जाइ।

दरस भूख वाहे दृगन, भूखहिं देत भगाइ॥

रसनिधि

प्रेम प्रेम सब कोए कहै, कठिन प्रेम की फाँस।

प्रान तरफि निकरै नहीं, केवल चलत उसाँस॥

रसखान

कहूँ किया नहिं इस्क का, इस्तैमाल सँवार।

सो साहिब सों इस्क वह, करि क्या सकै गँवार॥

नागरीदास

प्रेम ज्ञान जब उपजे, चले जगत कंह झारी।

कहे दरिया सतगुरु मिले, पारख करे सुधारी॥

दरिया (बिहार वाले)

सरस सुमिल चित-तुरंग की, करि-करि अमित उठान।

गोइ निबाहैं जीतियै, खेलि प्रेम-चौगान॥

एक सखी नायिका को प्रेम-निर्वाह का मर्म सिखा रही है। वह कह रही है कि चित्त रूपी सरस और सुमिल घोड़े के अनेक धावे कर-करके गुप्त प्रेम-निर्वाह करते हुए प्रेम रूपी चौगान खेल जीता जाता है। भाव यह है कि यदि तूने प्रेम-खेल ठीक तरह से नहीं खेला तो सफलता प्राप्त नहीं हो सकेगी। स्पष्ट शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि जिस प्रकार चौगान के खेल में सधे हुए पुष्ट और मिलकर चलने वाले अनेक प्रकार की छलांगें भरने वाले घोड़े गेंद को निश्चित सीमा तक खेलकर विजयी होते हैं, उसी प्रकार प्रेम के खेल में प्रेमिका को अपने सरस और मिले हुए हृदय से अनेक प्रकार की उमंगों से युक्त होकर छिप-छिपकर प्रेम-क्रीड़ा का निर्वाह करना चाहिए।

बिहारी

वाही की चित चटपटी, धरत अटपटे पाइ।

लपट बुझावत बिरह की, कपट-भरेऊ आइ॥

हे प्रियतम, तुम अपनी प्रेयसी के प्रेम-रंग में ऐसे रंग गए हो कि तुम्हारा इस प्रकार का आचरण तुम्हारे कपट भाव को ही व्यक्त कर रहा है। इतने पर भी मैं तुम्हारे कपट भावजनित मिलन को भी अपना सौभाग्य मानती हूँ। मेरे सौभाग्य का कारण यह है कि तुम कम-से-कम मेरे पास आकर दर्शन देते हुए मेरी विरह-ज्वाला को शांत तो कर रहे हो।

बिहारी

कटि सों मद रति बेनि अलि, चखसि बड़ाई धारि।

कुच से बच अखि ओठ भों, मग गति मतिहि बिसारि॥

हे सखी! यदि तू अपने प्रिय से मान करती है तो अपनी कटि के समान क्षीण (मान) कर, यदि प्रीति करती है तो अपनी चोटी के समान दीर्घ (प्रीति) कर, अगर बड़प्पन धारण करती है तो अपने नेत्रों-सा विशाल कर। पर अपने कुचों के समान कठोर (वचन), ओठों के समान नेत्रों की ललाई (क्रोध), भृकुटी के समान कुटिल (मार्ग पर गमन) और अपनी गति के समान (चंचल) मति को सदा के लिए त्याग दे।

दयाराम

बहके, सब जिय की कहत, ठौरु कुठौरु लखैं न।

छिन ओरै, छिन और से, छबि छाके नैन॥

नायिका कहती है कि नायक के सौंदर्य के नशे में छके हुए मेरे ये नेत्र बहककर ठौर-कुठौर को देखते हुए अर्थात् स्थान की उपयुक्तता-अनुपयुक्तता का विचार करते हुए मेरे मन की सारी गुप्त बातें कह देते हैं। इनकी स्थिति यह है कि ये क्षण भर में कुछ होते हैं और दूसरे ही क्षण कुछ और हो जाते हैं। अब तू ही बता कि ऐसी विवशता की स्थिति में मैं इन नेत्रों पर कैसे नियंत्रण रखूँ?

बिहारी
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दादू इसक अलह की जाति है, इसक अलह का अंग।

इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग॥

ईश्वर की जाति, रंग और शरीर प्रेम है। प्रेम ईश्वर का अस्तित्व है। प्रेम करो तो ईश्वर के साथ ही करो।

दादू दयाल

लखि गुरुजन-बिच कमल सौं, सीसु छुवायौ स्याम।

हरि-सनमुख करि आरसी, हियैं लगाई बाम॥

नायक ने नायिका को जब गुरुजनों के बीच में बैठा हुआ देखा तो उसने उपहारस्वरूप लाए कमल के पुष्प को अपने सिर से लगा लिया। वास्तव में ऐसा करके नायक ने नायिका से यह भाव व्यक्त किया कि दिन में ही तब तक और जहाँ कमल सिर चढ़ाने को प्राप्त होता रहे, अर्थात् उस सरोवर के पास जिसमें कमल खिले हों, वहाँ आकर वह उसे मिलन का सुख प्रदान करे। नायिका ने अपनी आरसी नायक के सम्मुख कर हृदय से लगा ली और ऐसा करके उसने यह सूचित कर दिया कि 'हरि' अर्थात् सूर्य के रहते हुए मैं आपको आरसी के सदृश्य अर्थात् कमलों वाले तालाब पर ही आकर हृदय से लगाऊँगी।

बिहारी

लोभ-लगे हरि-रूप के, करी साँटि जुरि, जाइ।

हौं इन बेची बीच हीं, लोइन बड़ी बलाइ॥

नायिका सखी से कहती है कि हे सखी, मेरे ये नेत्र एक दलदल की तरह हैं और इन्होंने मुझे बड़ी मुसीबत में डाल दिया है। मेरे ये नेत्र रूपी दलाल प्रियतम कृष्ण के सौंदर्य रूपी रुपए के लोभ में पड़कर उनसे साँठ-गाँठ कर बैठे हैं। इस प्रकार इन्होंने मुझे बीच में सौदा करके प्रिय को सौंप दिया है।

बिहारी

जानराय! जानत सबैं, असरगत की बात।

क्यौं अज्ञान लौं करत फिरि, मो घायल पर घात॥

हे सुजान! तुम मेरे मन की सभी बातें जानती हो। तुम जानती हो कि मैं घायल हूँ। घायल पर चोट करना अनुचित है, इसे भी तुम जानती होंगी, सुजानराय जो ठहरीं। फिर भी तुम मुझ घायल पर आघात कर रही हो, यह अजान की भाँति आचरण क्यों कर रही हो! तुम्हारे नाम और आचरण में वैषम्य है।

घनानंद

फिरि फिरि चितु उत हीं रहतु, टूटी लाज की लाव।

अंग-अंग छबि झौंर में, भयौ भौंर की नाव॥

हे सखि, जिस क्षण से नायक को देखा है उसी क्षण से मेरा मन उस पर इतना अधिक रूपासक्त हो गया है कि उसने उस लज्जा रूपी डोरी को जिसके सहारे वह उसे नायक के पास से हटाती थी, तोड़ डाला है। अब यह चित्त नायक के अंग-प्रत्यंग की छवि के वात्याचक्र में उसी प्रकार फँसकर रह जाता है जिस प्रकार कोई नाव जो किनारे से बाँधने वाली रस्सी के टूट जाने पर भँवर में फँसकर रह जाती है।

बिहारी

पूस-मास सुनि सखिनु पैं, सांईं चलत सवारु।

गहि कर बीन प्रबीन तिय, राग्यौ रागु मलारु

जब पूस मास में नायिका को पता लगा कि उसका प्रिय परदेश जा रहा है तो संगीत विद्या में प्रवीण नायिका ने अपने हाथ में वीणा लेकर मल्हार राग अलापना शुरू कर दिया ताकि पानी बरसने लगे और उसके प्रिय का परदेश गमन रुक जाए।

बिहारी

तन मन तोपै बारिबौ, यह पतंग कौ नाम।

एते हूँ पै जारिबौ, दीप तिहारो हि काम॥

कवि दीपक को संबोधित करते हुए कहता है कि पतंग तो तुझ पर अपना तन और मन सब कुछ न्योछावर कर देता है। इतने पर भी अपने इस प्रेमी को जला देना। हे निष्ठुर दीपक! तेरा ही काम है।

रसनिधि

जुरे दुहुनु के दृग झमकि, रुके झीनैं चीर।

हलुकी फौज हरौल ज्यौं, परै गोल पर भीर॥

नायिका अपने परिवार के बीच बैठी हुई है। ठीक उसी समय नायक वहाँ जाता है। लज्जावश वह तुरंत घूँघट निकाल लेती है, किंतु काम भावना के अतिरेक के कारण वह नायक को देखना भी चाहती है और देखती भी है, इसी स्थिति का वर्णन करते हुए कवि कह है कि नायिका के नेत्र झमक कर नायक के नेत्रों से टकरा गए हैं जो नायिका के झीने घूँघट से स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। यह टकराना वैसे ही है जिस प्रकार आक्रमणकारी फौज द्वारा हरावल (सेना का अग्रभाग) फौज पर आक्रमण किए जाने पर उस पक्ष की फौज भी विपक्षी की फौज से टक्कर लेने लगती है। कहने का तात्पर्य यह है कि नायक-नायिका नेत्रों की सांकेतिक भाषा में प्रेम युद्ध करने लगे हैं।

बिहारी

तो पर वारौं उरबसी, सुनि, राधिके सुजान।

तू मोहन कैं उर बसी ह्वै उरबसी-समान॥

कृष्ण कहते हैं कि हे सुजान राधिके, तुम यह समझ लो कि मैं तुम्हारे रूप-सौंदर्य पर उर्वशी जैसी नारी को भी न्यौछावर कर सकता हूँ। कारण यह है कि तुम तो मेरे हृदय में उसी प्रकार निवास करती हो, जिस प्रकार उर्वशी नामक आभूषण हृदय में निवास करता है।

बिहारी