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बिहारी

1595 - 1664 | ग्वालियर, मध्य प्रदेश

रीतिसिद्ध कवि। ‘सतसई’ से चर्चित। कल्पना की मधुरता, अलंकार योजना और सुंदर भाव-व्यंजना के लिए स्मरणीय।

रीतिसिद्ध कवि। ‘सतसई’ से चर्चित। कल्पना की मधुरता, अलंकार योजना और सुंदर भाव-व्यंजना के लिए स्मरणीय।

बिहारी की संपूर्ण रचनाएँ

दोहा 30

अर तैं टरत वर-परे, दई मरक मु मैन।

होड़ा-होड़ी बढ़ि चले चित, चतुराई नैन॥

एक सखी दूसरी सखी से कह रही है कि ऐसा प्रतीत होता है कि कामदेव रूपी नायक की प्रेरणा से ‘चित-चातुरी’ और ‘नयन-विस्तार’ रूपी दूती और दूत में इस बात की स्पर्धा जगी हुई है कि नायिका के शरीर को कौन कितनी शीघ्रता से काम के प्रभाव से प्रभावित कर पाता है। वास्तविकता यह है कि नायिका के शरीर में यौवनोन्मेष के साथ-साथ उसके चित्त की चपलता और नेत्रों का विस्तार बढ़ता जा रहा है। इन दोनों अंगों में कौन अधिक बढ़ा है या गतिमय हुआ है, यह निर्णय करना कठिन हो गया है। यही कारण है कि बिहारी ने मनोगत चंचलता की वृद्धि और नेत्रों के विस्तार की गति में होड़ की कल्पना की है।

  • संबंधित विषय : आँख

खरी पातरी कान की, कौन बहाऊ बानि।

आक-कलीन रली करै अली, अली, जिय जानि॥

हे सखी, तू कान की बड़ी पतली अर्थात् कच्ची है। पता नहीं, तुझमें कौन-सी बुरी आदत है कि तू बिना सम्यक् विचार किए सबकी बातों पर यों ही विश्वास कर लेती है। मैं तुझे समझाते हुए यह कहना चाहती हूँ कि तू मेरी बात को निश्चित रूप से सत्य मान ले कि भ्रमर किसी स्थिति में आक की कली से विहार नहीं कर सकता है। अर्थात् तुम्हारा प्रेयस किसी अन्य स्त्री का संसर्ग कभी नहीं करेगा।

जुवति जोन्ह मैं मिलि गई, नैंक होति लखाइ।

सौंधे कैं डोरैं लगी अली, चली सँग जाइ॥

अभिसार के लिए एक नायिका अपनी सखी के साथ चाँदनी रात में जा रही है। आसमान से चाँदनी की वर्षा हो रही है और धरती पर नायिका के शरीर का रंग भी चाँदनी की तरह उज्ज्वल और गोरा है। ऐसी स्थिति में नायिका का शरीर चाँदनी में लीन हो गया है। सखी विस्मय में पड़ गई है कि नायिका कहाँ है? ऐसी स्थिति में वह केवल नायिका के शरीर की गंध के सहारे आगे बढ़ती जा रही है। इसी स्थिति का वर्णन करते हुए बिहारी कह रहे हैं कि नायिका अपने गौर और स्वच्छ वर्ण के कारण चाँदनी में विलीन हो गई है। उसका स्वतंत्र और पृथक् अस्तित्व दिखलाई नहीं दे रहा है। यही कारण है कि उसके साथ चलने वाली सखी नायिका के शरीर से आने वाली पद्म गंध का सहारा लेकर साथ-साथ चली जा रही है।

पाइ महावरु दैंन कौं नाइनि बैठी आइ।

फिरि फिरि, जानि महावरी, एड़ी मीड़ति जाइ॥

नाइन नायिका के महावर लगाने के लिए आई हुई है। वह पैरों में महावर लगाने के लिए आती है और नायिका के समक्ष बैठ जाती है। नाइन महावरी अर्थात् लाल रंग से सराबोर कपड़ा कहीं रखकर भूल जाती है और भ्रम से नायिका की एड़ी को ही महावरी समझ बैठती है, क्योंकि नायिका की एड़ी इतनी कोमल और लाल है कि नाइन को भ्रम हो जाता है और परिणाम स्वरूप वह बार-बार नायिका की एड़ियों को मींड़ती जाती है।

संपति केस, सुदेस नर नवत, दुहुति इक बानि।

विभव सतर कुच, नीच नर, नरम विभव की हानि॥

केश और श्रेष्ठ पद वाले व्यक्ति संपत्ति के कारण नम्र हो जाते हैं या झुकने लगते हैं, किंतु उरोज और नीच नर वैभवहीन होने पर ही झुकते हैं। कवि कह रहा है कि केश-वृद्धि प्राप्त करके झुकने लगते हैं। यही स्थिति अच्छे पद पर स्थित सत्पुरुषों की होती है। सत्पुरुष भी अच्छा पद प्राप्त करके या समृद्धि प्राप्त करके झुकने लगते हैं। नीच लोगों की स्थिति इसके विपरीत होती है। कुच और नीच मनुष्य वैभवहीन होकर ही झुकते हैं। उरोज यौवन का वैभव पाकर कठोर हो जाते हैं, किंतु वैभवहीन होते ही अर्थात् यौवन समाप्त होते होती ही वे शिथिल हो जाते हैं। यही स्थिति नीच मनुष्यों की होती है। वे ऐश्वर्य पाकर तो कठोर होते हैं, किंतु ऐश्वर्यहीन होकर विनम्रता धारण कर लेते हैं।

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