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हेमचंद्र

1088 - 1179 | अहमदाबाद, गुजरात

प्रसिद्ध जैन कवि-वैयाकरण। अनुमानित समय : 1088 ई. से 1179 ई. तक। ‘कलिकाल सर्वज्ञ’ और ‘अपभ्रंश के पाणिनि’ कहे गए।

प्रसिद्ध जैन कवि-वैयाकरण। अनुमानित समय : 1088 ई. से 1179 ई. तक। ‘कलिकाल सर्वज्ञ’ और ‘अपभ्रंश के पाणिनि’ कहे गए।

हेमचंद्र की संपूर्ण रचनाएँ

दोहा 56

अगलिअ-नेह-निवट्टाहं जोअण-लक्खु वि जाउ।

वरिस-सएण वि जो मिलइ सहि सोक्खहं सो ठाउ॥

अगलित स्नेह में में पके हुए लोग लाखों योजन भी चले जाएँ और सौ वर्ष बाद भी यदि मिलें तो हे सखि, मैत्री का भाव वही रहता है।

साव-सलोणी गोरडी नवखी वि विस-गंठि।

भडु पच्चलिओ सो मरइ जासु लग्गइ कंठि॥

सर्वांग सुंदर गोरी कोई नोखी विष की गाँठ है। योद्धा वास्तव में वह मरता है जिसके कंठ से वह नहीं लगती।

पाइ विलग्गी अन्त्रडी सिरु ल्हसिउँ खन्धस्सु।

तो वि कटारइ हत्थडउ बलि किज्जउं कंतस्सु॥

पाँव तक अँतड़ियाँ लटक रही हैं, सिर (कटकर) कंधे से झूल गया है, लेकिन हाथ कटारी पर है। ऐसे कंत की मैं बलि जाऊँ।

हियडा जइ वेरिअ घणा तो किं अब्भि चडाहुँ।

अम्हाहिं बे हत्थडा जइ पुणु मारि मराहुँ॥

हे मन, यदि दुश्मन बहुत हैं तो क्या बादल पर चढ़ जाऊँ? हमारे भी दो हाथ हैं, मार कर मरेंगे।

दिवेहि विढत्तउँ खाहि वढ़ संचि एक्कु वि द्रम्मु।

को वि द्रवक्कउ सो पडइ जेण समप्पइ जम्मु॥

हे मूर्ख, दिन-दिन कमाये धन को खा, एक भी दाम संचित मत कर। कोई भी ऐसा संकट पड़ेगा जिससे जीवन ही समाप्त हो जाएगा।

उद्धरण 1

जो सर्वज्ञ है, राग आदि दोषों को जीत चुका है, त्रिलोक में पूजित है, वस्तुएँ जैसी हैं उन्हें वैसी ही कहता है, वही परमेश्वर अर्हत् देव है।

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