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जमाल

1545 - 1605

भक्तिकाल और रीतिकाल के संधि कवि। शब्द-क्रीड़ा में निपुण। भावों में मार्मिक व्यंजना और सहृदयता। दृष्टकूट दोहों के लिए स्मरणीय।

भक्तिकाल और रीतिकाल के संधि कवि। शब्द-क्रीड़ा में निपुण। भावों में मार्मिक व्यंजना और सहृदयता। दृष्टकूट दोहों के लिए स्मरणीय।

जमाल की संपूर्ण रचनाएँ

दोहा 186

गज बर कुंभहिं देखि तनु, कृशित होत मृगराज।

चंद लखत बिकसत कमल, कह जमाल किहि काज॥

हाथी के कुंभस्थल को देखकर, सिंह दुबला क्यों हो रहा है? और चंद्रमा को देखकर कमल क्यों विकासत हो रहा है? इन विपरीत कार्यों का क्या कारण है? अभिप्राय यह है कि नायिका के हाथी के कुंभस्थल समान स्तनों को बढ़ते देखकर सिंह अर्थात् कटि प्रदेश दुबला हो गया है। नायिका के चंद्रमुख को देखकर, नायक के कमल रूपी नेत्र विकसित हो जाते हैं।

जमला ऐसी प्रीत कर, ज्यूँ बालक की माय।

मन लै राखै पालणौ, तन पाणी कूँ जाय॥

प्रीति तो ऐसी करो जैसी एक माता अपने बालक से करती है। वह जब पानी भरने जाती है तब अपने मन को तो झूले में पड़े बालक के पास ही छोड़ जाती है। ( उसका तन तो उसकी संतान से दूर रहता है पर मन उसी में लगा रहता है)।

जमला लट्टू काठ का, रंग दिया करतार।

डोरी बाँधी प्रेम की, घूम रह्या संसार॥

विधाता ने काठ के लट्टू को रंगकर प्रेम की डोरी से बांधकर उसे फिरा दिया और वह संसार में चल रहा है।

अभिप्राय यह है कि पंचतत्त्व का यह मनुष्य शरीर विधाता ने रचा और सजाकर उसे जन्म दिया। यह शरीर संसार में अपने अस्तित्व को केवल प्रेम के ही कारण स्थिर रख रहा है।

स्याम पूतरी, सेत हर, अरुण ब्रह्म चख लाल।

तीनों देवन बस करे, क्यौं मन रहै जमाल॥

हे प्रिय, तुम्हारे नयनों ने तीनों देवताओं को जब वश में कर लिया है, तब मेरा मन क्यों तुम्हारे वश हो जाएगा? नेत्रों की श्याम पुतली ने विष्णु को, श्वेत कोयों ने शिव को और अरुणाई ने ब्रह्मा को मोह लिया है।

जमला ऐसी प्रीत कर, जैसी मच्छ कराय।

टुक एक जल थी बीछड़े, तड़फ-तड़फ मर जाय॥

प्रीत तो ऐसी करनी चाहिए जैसी मछली जल से करती है। जल से यदि वह थोड़ी देर भी अलग हो जाती है तो तड़प-तड़पकर मर जाती है।

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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