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दादू दयाल

1544 - 1603 | अहमदाबाद, गुजरात

भक्तिकाल के निर्गुण संत। दादूपंथ के संस्थापक। ग़रीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना के गुरु।

भक्तिकाल के निर्गुण संत। दादूपंथ के संस्थापक। ग़रीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना के गुरु।

दोहा 30

केते पारिख जौंहरी, पंडित ग्याता ध्यांन।

जांण्यां जाइ जांणियें, का कहि कथिये ग्यांन॥

कितने ही धर्म-शास्त्रज्ञ पंडित, दर्शनशास्त्र के ज्ञाता और योगी-ध्यानी रूपी जौहरी, ब्रह्मरूपी रत्न की परख करते हैं। लेकिन वे अज्ञेय ब्रह्म के स्वरूप को रंच-मात्र भी नहीं जान पाते। फिर वे ब्रह्म संबंधी ज्ञान को कैसे कह सकते हैं।

झूठे अंधे गुर घणें, भरंम दिखावै आइ।

दादू साचा गुर मिलै, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ॥

इस संसार में मिथ्या-भाषी अज्ञानी गुरु बहुत हैं। जो साधकों को मूढ़ आग्रहों में फँसा देते हैं। सच्चा सद्गुरु मिलने पर प्राणी ब्रह्म-तुल्य हो जाता है।

दादू बिरहनि कुरलै कुंज ज्यूँ, निसदिन तलफत जाइ।

रांम सनेही कारनैं, रोवत रैंनि बिहाइ॥

विरहिणी कह रही है—जिस प्रकार क्रौंच-पक्षी अपने अंडो की याद में रात-दिन तड़पता है, उसी प्रकार ब्रह्म के वियोग में मैं रात-दिन तड़प रही हूँ। अपने प्रियतम का स्मरण करते और रोते-रोते मेरी रात बीतती है।

भरि भरि प्याला प्रेम रस, अपणैं हाथि पिलाइ।

सतगुर के सदकै कीया, दादू बलि बलि जाइ॥

सद्गुरु ने प्रेमा-भक्ति रस से परिपूर्ण प्याले अपने हाथ से भर-भरकर मुझे पिलाए। मैं ऐसे गुरु पर बार-बार बलिहारी जाता हूँ।

मीठे मीठे करि लीये, मीठा माहें बाहि।

दादू मीठा ह्वै रह्या, मीठे मांहि समाइ॥

ब्रह्म-ज्ञान की मधुरता से युक्त संतों ने मधुर सत्संग का लाभ देकर साधकों को आत्म-ज्ञान और ब्रह्म-ज्ञान की मधुरता से युक्त कर दिया। जो साधक उस सत्संग का लाभ उठाकर मधुर हो जाता है, वह मधुर ब्रह्म में समा जाता है।

पद 5

 

सबद 5

 

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