प्रेम पर सवैया

प्रेम के बारे में जहाँ

यह कहा जाता हो कि प्रेम में तो आम व्यक्ति भी कवि-शाइर हो जाता है, वहाँ प्रेम का सर्वप्रमुख काव्य-विषय होना अत्यंत नैसर्गिक है। सात सौ से अधिक काव्य-अभिव्यक्तियों का यह व्यापक और विशिष्ट चयन प्रेम के इर्द-गिर्द इतराती कविताओं से किया गया है। इनमें प्रेम के विविध पक्षों को पढ़ा-परखा जा सकता है।

अपने नहिं होत पराए पिया

ठाकुर बुंदेलखंडी

रोज न आइयै जौ मन मोहन

ठाकुर बुंदेलखंडी

रस ही रस में रसबाद कछू

चंद्रशेखर वाजपेयी

आदि ते सोम कहो कबहूँ

रघुनाथ बंदीजन