सुमन कल्याणपुर : स्वर और स्वर-भ्रम
नवीन रांगियाल
02 जून 2026
अँग्रेज़ी में एक कहन है : people who show you new music are important. मैं अक्सर अपने मित्रों और परिचितों को नए गीत भेजता रहता हूँ, कभी रेयर तो कभी कोई अनरिलीज़्ड गाना—इस गुमान के साथ कि मैं संगीत के बारे में कितना कुछ जानता-समझता हूँ। लेकिन एक रात ऐसी भी थी कि मैं लता मंगेशकर और सुमन कल्याणपुर के कंठ में भेद नहीं कर पाया! मैं एक ऐसी समानता का शिकार हो गया, जिसमें कोई भेद नहीं था—हालाँकि वे दो कंठ थे, दो आवाज़ें और दो अलग ज़िंदगियाँ।
आँखें और पैर थके हुए हैं। देह टूटी हुई है। मैं उनींदी शक्ल लिए बेलौस एक बेपरवाह प्रतीक्षा में प्लेटफ़ॉर्म पर यहाँ से वहाँ भटक रहा हूँ। जूतों में पैर सुन्न हैं—बर्फ़ की तरह ठंडे। मेरा दिमाग़ बिल्कुल शिथिल है और ज़ेहन शून्य। कोई विकल्प नहीं है। अब रेलगाड़ी आएगी तो बैठ जाएँगे—नहीं आई तो सुबह जो होगा वही होगा।
मैं वेटिंग-हॉल में चला आता हूँ। एक ख़ाली कुर्सी देखकर पसर जाता हूँ। आस-पास लोग ऊँघ रहे हैं, झपकियों से गर्दनें लुढ़क गई हैं। बच्चों ने अपनी देहों को कुछ दूसरी बड़ी देहों के हवाले कर दिया है। हर कोई नींद में गुम है... जैसे नींद का देवता अभी-अभी नशा बाँटकर गया हो।
सामने टीवी है—अभी-अभी श्वेत-श्याम (दो आँखें बारह हाथ) ख़त्म हुई है। अगली फ़िल्म (दिल ने फिर याद किया) शुरू हुई है। वही इंडियन रोमांटिक ड्रामा। एक ग़लतफ़हमी और याददाश्त चले जाने वाला एंगल। यह कहानी बढ़ती जा रही है और मेरी पूरी थकी हुई देह सिर्फ़ एक ख़्याल पर सिमट आई है। मेरा ज़ेहन और फ़िल्म की कहानी दोनों साथ-साथ बहने लगे हैं। यह फ़िल्म क्लाइमेक्स के क़रीब है और टाइटल सॉन्ग ‘दिल ने फिर याद किया बर्क़-सी लहराई है...’ किसी धीमे झोंके की तरह शुरू होता है—नदी के पानी की लय में अपनी लय को मिलाता हुआ... नाव के साथ बहता हुआ गीत। पूरी फ़िल्म को दरकिनार करता हुआ मैं एक बार फिर से लता मंगेशकर की आवाज़ की गिरफ़्त में आ जाता हूँ। एक बार फिर मुझे यह गुमान जकड़ लेता है कि मैं लता जी का बहुत भावुक प्रशंसक हूँ। मुझे लगता है कि अगर मैं कभी लता मंगेशकर से मिलता तो मिलते ही वह मुझे पहचान लेतीं। मुझे लगता है कि जिस तरह से मैं लता को सुनता हूँ, शायद ही कोई दूसरा सुनता होगा; जिस तरह से मैं लता मंगेशकर से प्रेम करता हूँ, कोई नहीं करता है।
यह सब सोचते हुए इस गाने को मैं अपनी प्लेलिस्ट में दर्ज कर लेता हूँ। यह गीत पहले भी सुन चुका था; किंतु अनजान शहर, नींद में डूबे हुए प्लेटफ़ॉर्म, रात के दृश्य, रेल न आने की उकताहट और एक अनिश्चित प्रतीक्षा के बीच जिस तरह से यह गीत आधी रात को ऊँघते हुए लोगों के बीच बज रहा था... वैसा फिर कभी नहीं होगा। उस वक़्त को कभी दोहराया नहीं जा सकेगा। ज़िंदगी हर क्षण नई है, किंतु हमारी आँखें सदियों पुरानी हैं। देह नई है, किंतु याददाश्त प्राचीन है। मैं काँप उठा हूँ—लता की आवाज़ पर। मेरी स्मृति में लता मंगेशकर हैं, जबकि यह आवाज़ सुमन कल्याणपुर की है। मैं अपनी याददाश्त का शिकार हो चुका था और मैंने पूरी रात लता के एक ग़लत रूमानी ख़याल में गुज़ार दी।
इस फ़िल्म और गीत के साथ स्मृति में मुझे एक पूरी चिड़चिड़ी रात मिली थी, रेलवे-स्टेशन का एक दृश्य मिला था... हज़ारों उनींदी आँखें, थकी-माँदी देह, खीझ से भरी एक प्रतीक्षा, तमाम चिल्ल-पों, बग़ैर किसी विकल्प के रेल का इंतिज़ार करने का माद्दा और कुछ भी सह लेने की बेशर्मी मिली थी।
वह आदमी जिसकी रेल नहीं चूकती या जो दस-पंद्रह घंटे देरी से आने वाली रेल का प्लेटफ़ॉर्म पर इंतिज़ार नहीं करता, वह आदमी हक़ीक़त में किसी काम का नहीं। हर आदमी को अपनी ज़िंदगी में कोई न कोई चीज़ चूक जानी चाहिए। हर आदमी को किसी न किसी अज्ञात शै की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
बहरहाल, मेरे लिए यह भी काफ़ी नहीं था। मैं हर चीज़ को उसकी हर हद तक बर्दाश्त करना चाहता हूँ। ज़्यादा से ज़्यादा जानी-अनजानी शै को सहना और समझना चाहता हूँ। इसलिए मैं अपनी पसंद की हर चीज़, हर बात, हर घटना को अतिरेक में बरतता हूँ—ज़्यादातर संगीत में।
मैं सितार के एक टुकड़े पर ख़ुद की जान ले लेता हूँ। गले के एक घुमाव पर सारी रात गुज़ार देता हूँ। कंठ के रेशे पर महीनों ज़िंदा रहता हूँ। यही वजह है कि संगीत ने मेरी ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा और वक़्त बर्बाद कर दिया है। बर्बाद किए वक़्त को मैं कहीं ‘उचित’ ढंग से इस्तेमाल कर सकता था। इस बर्बादी से मुझे निजी और ज़ेहनी तौर पर जो मिला है, वो दुनिया के किसी काम का नहीं। एक नितांत अकेली ज़िंदगी कितनी भी गहरी और समृद्ध हो, वह शेष जमात के किसी काम नहीं आती।
‘दिल ने फिर याद किया’ ख़त्म होती है... यह साल 2022 की कोई शाम है। शाम को साढ़े सात बजे आने वाली रेल सुबह चार बजे आती है। मैं बर्थ पर लेटते ही स्पॉटीफ़ाई पर ‘दिल ने फिर याद किया बर्क़-सी लहराई है...’ गीत लगा लेता हूँ। इसके बाद कई दिनों तक यह गीत लूप में बजता रहता है। पहले मोहम्मद रफ़ी शुरू करते हैं, अंत में मुकेश की आवाज है और बीच में स्त्री-कंठ का वह हिस्सा... जिसे मैं अब तक लता मंगेशकर का समझता रहा।
1 जून 2026 की सुबह सुमन कल्याणपुर के निधन पर मुझे पहली दफ़ा पता चलता है कि यह लता मंगेशकर नहीं, सुमन कल्याणपुर की आवाज़ थी। मैं सोच रहा हूँ कि मुझे सुमन की आवाज़ ने धोखा दिया या ख़ुद मैंने अपने आपको?
लता और सुमन का कंठ एक नहीं हो सकता! वह है भी नहीं। यह समानता थी और समानता में ही भिन्नता है। समान का अर्थ ही है कि एक नहीं, वहाँ दो हैं।
यह तो क़ुदरत की ग़लती थी, उसने लता और सुमन को एक ही कालखंड में जन्म दिया और सुमन की आवाज़ का उजाला लता की आवाज़ के आलोक में कुछ मंद-सा रह गया। जैसे माइकल जैक्सन की मूनवॉक रोशनी में जॉर्ज माइकल की रूहानी आवाज कहीं खो गई थी। बावजूद इसके मेरे आस-पास बहुत से मूसीक़ीपसंद हैं; जो सुमन कल्याणपुर को लता के इक्वल मानते हैं और अगर में सुमन को कमतर कहता हूँ, तो वे मेरे साथ गाली-गलौज कर बैठते हैं। मैं सिर्फ़ यह कहता हूँ कि दोनों की अपनी-अपनी जगहें थीं।
मैं कभी नहीं चाहता हूँ कि मेरा मन लता के कंठ की दुनिया की किसी दूसरी आवाज़ से तुलना करे। हर कंठ का रेशा अलग है। हर कंठ की पीड़ा और चीख़ अलग है। हर कंठ का दुख और दुख की वजह भिन्न है। आवाज़ें अपने अतीत की स्मृतियों से उपजती हैं। मेरी आवाज़ मेरे बचपन की कहानी है। आपकी आवाज़ आपके किसी अतीत की कहानी या हिस्सा है। हम आवाज़ों की समीक्षाएँ नहीं कर सकते। आवाज़ ज़िंदगी है। जीवन का स्वर है। हर जीवन भिन्न है तो जीवन से उपजी ध्वनि भी भिन्न है। लता जी और सुमन जी की ज़िंदगी दो अलग-अलग सिरे, दो अलग-अलग स्मृतियाँ हैं। जिया अलग तो जीने का परिणाम भी अलग है।
यह मेरी अनभिज्ञता थी कि मैं सुमन कल्याणपुर को लता समझता रहा। मेरी सिंचित याददाश्त ने मुझे धोखा दिया और मैं अपनी प्राचीन स्मृति के हाथों मारा गया।
अब मैं कभी नहीं कहूँगा कि मैं आवाज़ों के बारे में सब कुछ जानता हूँ।
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बेला पॉपुलर
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