श्री अरविंद के उद्धरण
मानव को अपने राष्ट्र की सेवा के ऊपर किसी विश्व-भावना व आदर्श को पहला स्थान नहीं देना चाहिए।... देशभक्ति तो मानवता के लक्ष्य विश्वबंधुत्व का ही एक पक्ष है।
सारा जीवन धर्म-क्षेत्र है और संसार भी धर्म है। केवल आध्यात्मिक ज्ञान की आलोचना और भक्ति का भाव ही धर्म नहीं है, कर्म भी धर्म है। हमारे सारे साहित्य में यही उच्च शिक्षा अति प्राचीन काल से सनातन भाव से व्याप्त हो रही है।
काल के प्रति साधक की आदर्श मनोवृत्ति यह होनी चाहिए कि वह अनन्त धैर्य धारण करे, मानो उसके पास अपनी परिपूर्णता के लिए काल सनातन और अनन्त होकर विद्यमान है। किंतु फिर भी वह ऐसी शक्ति का विकास करे, जो मानो अभी आत्म-सिद्धि प्राप्त कर लेगी। यह शक्ति द्रुत गतिमयता की प्रभुता और प्रभाव के साथ नित्य वर्धित होती रहनी चाहिए, जब तक कि यह परम दिव्य रूपांतर का चमत्कृतिपूर्ण तात्क्षणिक मुहूर्त न बन जाए।
सारा धन भगवान का है और यह जिन लोगों के हाथ में है, वे उसके रक्षक हैं, स्वामी नहीं।
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मनुष्य का बाह्य व्यक्तित्व जिस पूर्ण पूर्णता को उपलब्ध करने में सक्षम है, वह भी उसके भीतर विद्यमान आत्मा की सनातन पूर्णता की सिद्धि ही है।
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योग जीवन से बहुत दूर तक भिन्न और विमुख हो गया है और प्राचीन पद्धतियाँ, हमारे वैदिक पूर्वज, जिन्होंने जीवन को अंगीकार करने का यत्न किया था, हमसे बहुत दूर हो गए हैं।
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बिना संसिद्धि के हमारा मानसिक विश्वास एक क्रियाशील वास्तविकता नहीं बन सकता; यह अभी भी ज्ञान का आकार लिए रहेगा। एक जीवंत सत्य का नहीं; एक विचार मात्र रहेगा, तब भी एक शक्ति नहीं।
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साधक को सर्वप्रथम अपने वैयक्तिक संकलप द्वारा; अहंकारपूर्ण शक्तियों पर अधिकार करके—उन्हें प्रकाश एवं जो सही है—उसकी ओर मोड़ना होगा। एक बार मुड़ जाने पर भी उसे उन्हें प्रशिक्षित करना होगा कि वे सदा उस प्रकाश और सच्चाई को पहचानें, सदा स्वीकारें तथा सदा उसका अनुसरण करें।
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पूर्णयोग का गुरु जितनी दूर तक संभव है, हमारे भीतर विद्मान गुरु की प्रणाली का अनुसरण करेगा।
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योगसिद्धि अर्थात् योग-अभ्यास से प्राप्त की जाने वाली पूर्णता, चार महान साधनों की संयुक्त क्रिया से सर्वोत्तम रूप से संपन्न रूप से संपन्न की जा सकती है। इन साधनों में प्रथम है शास्त्र, अर्थात् उन सत्यों का, सिद्धांतों, शक्तियों और प्रक्रियाओं का ज्ञान, जो सिद्धि को प्रभावित एवं निर्धारित करते हैं। दूसरा साधन है उत्साह, अर्थात् शास्त्र द्वारा प्राप्त ज्ञान द्वारा प्रस्तुत एवं नियत रूपरेखाओं पर किया जाने वाला धीर और स्थायी अध्यवसाय। तीसरा साधन है गुरु, शिक्षक का प्रत्यक्ष सुझाव, दृष्टांत और प्रभाव तथा उसकी मध्यस्थता या उसका हस्क्षेप, जो हमारे ज्ञान एवं प्रयत्न को आध्यात्मिक क्षेत्र में समुन्नत करता है। अंत में आती है समय की सहायता—काल; क्योंकि समस्त वस्तु एवं घटनाओं में उनका एक क्रिया-चक्र है, और ईश्वरीय गति की एक विशेष अवधि होती है।
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पूर्णयोग की प्रक्रिया की तीन अवस्थाएँ हैं, जो वास्तव में स्पष्ट रूप में विशिष्ट या पृथक् नहीं हैं, किंतु कुछ अंशों में आनुक्रमिक अवश्य हैं। सर्वप्रथम प्रयत्नशील होना, कम-से-कम, एक प्रारंभिक और समर्थ बनाने वाला आत्म-उत्कर्ष प्राप्त करना और दिव्य सत्ता के साथ संपर्क। अगला है 'उसकी' ग्रहणशीलता, जो श्रेष्ठतम है ओर हमसे अतीत है तथा जिसके साथ स्वयं में अपनी समूची चेतन सत्ता के रूपांतरण के लिए हमने संसर्ग प्राप्त कर लिया है। अंतिम है, जगत में दिव्य केंद्र के रूप में अपनी रूपांतरित मानवता का उपयोग।
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काल उन अवस्थाओं एवं शक्तियों का एक क्षेत्र है; जो मिलकर एक परिणामकारी प्रगति के लिए कार्य कर रही हैं, जिनके पथ का यह मापांकन करता है।
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देशभक्त स्वदेश के लिए जीता है क्योंकि उसे जीना ही चाहिए, स्वदेश के लिए ही मर जाता है क्योंकि देश की यह माँग होती है।
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पूर्ण योग का सर्वोपरि शास्त्र है; सनातन वेद, जो प्रत्येक विचारशील और प्राणवंत मनुष्य के हृदय में गुप्त है।
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ज्ञान की प्रकाशनशीलता का सामान्य साधन शब्द है; जो श्रवण किया जाए, अर्थात् श्रुत शब्द। यह शब्द हमें हमारे भीतर से मिल सकता है, यह बाहर से हम तक आ सकता है।
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सर्वव्यापक और परात्पर को व्यक्ति स्वयं में किस रूप और प्रकार में स्वीकार करता है, उसके स्वीकरण की स्वतंत्र अनुकूलनशीलता मनुष्य में पूर्ण आध्यात्मिक जीवन की समुचित स्थिति है।
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संपूर्ण जगत स्वातंत्र्य के लिए लालायित है, तो भी प्रत्येक प्राणी अपनी शृंखलाओं से प्रेम करता है—यह है हमारी प्रकृति की विशिष्ट ग्रंथि और प्रथम विरोधोक्ति।
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पूर्णयोग के साधक के लिए यह स्मरण रखना आवश्यक है कि कोई भी लिखित शास्त्र, कितनी भी महान उसकी प्रामाणिकता या कितनी ही विशाल उसकी संचेतना क्यों न हो, सनातन ज्ञान की अंशभूत अभिव्यक्ति से अधिक नहीं हो सकता।
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जब मनुष्य को अपने भीतर विद्यमान किसी अदृश्य वस्तु में विश्वास करना कठिन लगे, तब उसे किसी ऐसी वस्तु में विश्वास करना सरल हो जाता है, जिसे वह अपने से बाहर रूपाकृत कर सकता है।
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प्रभाव द्रष्टांत की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होता है।
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उपदेश-निर्देश की अपेक्षा, द्रष्टांत अधिक शक्तिशाली है; किंतु जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, वह बाह्य कर्मों का या व्यक्तिगत चरित्र का द्रष्टांत नहीं है।
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जब ज्ञान से आलोकित तथा कर्म के द्वारा नियंत्रित और भीमशक्ति प्राप्त प्रबल स्वभाव परमात्मा के प्रति प्रेम एवं आराधना-भाव में उन्नत होता है, तब वही भक्ति टिक पाती है तथा आत्मा को परमात्मा से सतत संबद्ध बनाए रखती है।
संयोग की बिखरी हुई ईंटों से इस संसार का निर्माण नहीं हुआ है। कोई अंधा ईश्वर भाग्य-निर्माता नहीं है। एक सचेत शक्ति ने जीवन की योजना बनाई है। हर वक्रता और रेखा का अपना अर्थ है।
भूतकाल के साँचों को तोड़ डालो परंतु उनकी स्वाभाविक शक्ति और मूल भावना को सुरक्षित रखो, अन्यथा तुम्हारा कोई भविष्य ही नहीं रह जाएगा।
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हमारे लिए तो ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या कहने की अपेक्षा ब्रह्म को सत्य और जगत को ब्रह्म कहना अधिक उचित और हितकर है।
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हमें, दो माता! प्राण में, मन में असुर की शक्ति, असुर का उद्यम। दो माता! हृदय में, बुद्धि में देवता का चरित्र, देवता का ज्ञान।
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अपनी आत्मा को जानो, अपने वास्तविक आत्मा को ईश्वर जानो और उसे अन्य सब के आत्मा के साथ एक जानो।
सबसे पहले भारतीय बन जाओ। अपने पूर्व-पुरुषों की पैतृक संपत्ति को फिर से प्राप्त करो। आर्य-विचार, आर्य अनुशासन, आर्य चरित्र और आर्य जीवन को पुनः प्राप्त करो। वेदांत, गीता और योग को फिर से प्राप्त करो। उन्हें केवल बुद्धि या भावना से ही नहीं, अपितु जीवन द्वारा पुनः जीवित कर दो।
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ईश्वरीय पुकार दुर्लभ है परंतु वह हृदय जो उस पर ध्यान देता है, दुर्लभतर है।
पैग़म्बर सत्य को परमात्मा की वाणी या आदेश के रूप में घोषित करता है और वह स्वयं संदेशवाहक होता है। कवि हमें सत्य को उसकी सौंदर्य-शक्ति में, उसके प्रतीक या बिंब में दिखाता है या प्रकृति के कार्यों या जीवन के कार्यों में उसे प्रकट करता है—उसका स्पष्ट वक्ता बनने की उसे आवश्यकता नहीं होती।
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स्वभाव में शक्ति, मन में बुद्धि, हृदय में प्रेम—ये भव्य मानवता का त्रिक पूरा करते हैं।
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माता दुर्गे! तुम्हारी संतान हैं हम। हम तुम्हारे प्रसाद से, तुम्हारे प्रभाव से महत् कार्य के, महत् भाव के उपयुक्त हो जाएँ। विनाश करो क्षुद्रता का, विनाश करो स्वार्थ का, विनाश करो भय का।
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आख़िर ईश्वर है क्या? एक शाश्वत बालक जो शाश्वत उपवन में शाश्वत क्रीड़ा में लगा हुआ है।
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ब्रह्मचर्य से हम जितना अधिक तप, तेज, विद्युत और ओज का भंडार बढ़ा सकेंगे, उतना ही हम स्वयं को शरीर, हृदय, मन और आत्मा के कार्यों के लिए चरम शक्ति से भर लेंगे।
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भगवान् को सर्वभावेन जानना यह जानना है कि वे ही एक भगवान् आत्मा में हैं, व्यक्त चराचर जगत् में हैं और समस्त व्यक्त के परे हैं, और यह सब एकीभाव से और एक साथ हैं।
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भक्ति और कर्म तब तक पूर्ण व टिकाऊ नहीं हो सकते, जब तक वे ज्ञान पर आधारित न हों।
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पराधीनता की ख़ास नींव अपने धर्म का नाश और दूसरे के धर्म की सेवा करने से पड़ती है।
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यदि तुम्हारा लक्ष्य महान हो और तुम्हारा साधन सामान्य हो तो भी कार्य करो क्योंकि केवल कार्य के द्वारा ही तुम्हारे साधनों में वृद्धि हो सकती है।
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प्रत्येक सद्ग्रंथ में दो तरह की बातें हुआ करती हैं, एक सामयिक, नश्वर, देशविशेष और कालविशेष से संबंध रखनेवाली और दूसरी शाश्वत, अविनश्वर, सब कालों और देशों के लिए समान रूप से उपयोगी और व्यवहार्य।
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