रविवासरीय 4.0 : नवीन सागर : एक बेसँभाल असमाप्त
अविनाश मिश्र
03 मई 2026
• प्रवेश आसान होता है, अगर परिचय प्रगाढ़ हो। इस राह में परिचय की स्मृति और संदर्भ भी सहायक हो सकते हैं। यों भी न हो, तब भूमिकाएँ काम आती हैं। वे बताती हैं कि व्यक्ति जिसमें प्रवेश करने जा रहा है, वह व्यक्ति में भी प्रवेश कर सकता है। इस प्रकार एक किंचित जटिल संबंध निर्मित होता है, जिसमें संवाद बहुत सारी जगह ले लेता है। इस जगह में बहुत कुछ बार-बार आता है और बहुत कुछ के साथ बार-बार छूटता है, और इसमें ही अंततः संवादविमुख होने की इच्छा भी जन्म लेने लगती है।
• नवीन सागर की सारी कविताएँ उनकी प्रतिनिधि कविताएँ हैं... और यह बात प्रत्येक कवि के प्रसंग में नहीं कही जा सकती। एक भाषा और देश-काल में कुछ ही कवि होते हैं, जिनकी सारी कविताएँ उनकी प्रतिनिधि कविताएँ होती हैं। इस प्रातिनिधिकता का आधार इससे तय होता है कि काव्य-संभावना, काव्य-विकास और काव्य-चूड़ांत—एक कवि के समग्र प्रस्तुत-प्रकाशित काव्य-संसार में कैसे रल-मिल गए हैं। यह दुलर्भता हासिल हो सके; इसके लिए कवि को ख़ूब गहरी काट-छाँट, छील-छाल और धैर्य-संकोच लगते हैं। इसमें बहुत सारा इस प्रकार का अप्रकाशित लगता है, जो कभी प्रकाशित-चयनित-संकलित नहीं होता।
• नवीन सागर अपने कवि-व्यक्तित्व और काव्य-विशेषताओं यानी कवि-धर्म और गुण-धर्म से कभी भी कहीं भी विचलित होने वाले कवि नहीं हैं। यह व्यवहार इसलिए भी उल्लेख्य है कि इस अनुशासन में वह सख़्त और एकाकी नज़र आते हुए भी, ख़ामोश और परास्त नहीं हैं। यह होना ही उनकी कविताओं को प्रथमतः संवादात्मक बनाता है। यहाँ एक संवादशील इच्छा सतत आकार ले रही है। माँ, मित्र, पत्नी, बच्चे, बेटी, बेटा, पशु, पक्षी, रात, नींद, अनींद, आकाश, तारे, व्याकुलता और प्रकृति... कवि सबसे सतत संवाद में है। संसार, देश, समाज, शहर, सड़क, गली, मुहल्ला, मकान, घर, कमरे, छत, आँगन, खिड़की, दरवाज़े, दूरी, पुकार, अनसुनापन, अपरिचय, संकेत, संशय, आवाजाही, भूख, यक़ीन, प्रार्थना और प्रेम... कवि के संवाद-व्यास को सतत विस्तृत कर रहे हैं। यहाँ सब तरफ़ दस्तकें ही दस्तकें हैं और घर और रात और माँ और जन्म और मृत्यु बहुत और बार-बार हैं :
जीवन की इच्छा
जीवन का कारण बनी।
देखने की इच्छा
दृश्य का कारण!
[कारण]
• नवीन सागर की कविताओं का प्रतिनिधि चयन [राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण : सितंबर 2025] इन पंक्तियों के लेखक के संपादकत्व में आज से कुछ माह पूर्व अत्यंत विस्मरण, विलंब और प्रतीक्षा के बाद संभव हुआ। यों नवीन सागर की कवि-कथा की रचना अगर संभव हो, तो उसका शीर्षक सिर्फ़ ‘विस्मरणविषयक’ ही हो सकता है। हिंदी में अलक्षितों की अपनी एक अलग दुनिया और राजनीति है, जिसे साहित्य की कथित केंद्रीय व्यावहारिकता से गुज़रते हुए जन प्राय: भूले ही रहते हैं। यह व्यवहार ही नवीन सागर सरीखे साहिब-ए-उस्लूब कवियों के प्रसंग में विस्मरणविषयक रचता है।
• नवीन सागर के देहांत के लगभग पच्चीस वर्ष बाद प्रकाशित हुए उनकी कविताओं के प्रतिनिधि चयन को उनकी कविताओं का एकमात्र चयन कह सकते हैं। इस बीच एक लंबे समय से उनके कविता-संग्रह अनुपलब्ध रहे आए हैं और इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भी अप्राप्य-अनुपलब्ध ही बने हुए हैं, जबकि नवीन सागर के नाम की धूम एक अतिव्यस्त समसामयिकता में सोशल नेटवर्किग साइट्स के संसार में जमकर मची है। उनके रचनाकार ने इधर के कुछ वर्षों में अपने बिल्कुल नए मुरीद उत्पन्न किए हैं। ये मुरीद एकदम आती हुई पीढ़ी के हैं और उस जाती हुई पीढ़ी के लिए भरपूर अचरज का विषय हैं, जिसे नवीन सागर की यह देहांतोत्तर लोकप्रियता—प्रसन्नता और मलाल एक साथ दे रही है।
नवीन सागर के इस नितांत नए पाठ ने उन्हें एक नवीन बहुमत प्रदान किया है। इस स्थिति में उनकी प्रतिनिधि कविताओं का चयन उनके तीन कविता-संग्रहों—‘नींद से लंबी रात’ [आधार प्रकाशन, पंचकूला, प्रथम संस्करण : 1996], ‘जब ख़ुद नहीं था’ [कवि प्रकाशन, बीकानेर, प्रथम संस्करण : 2001] और ‘हर घर से ग़ायब’ [सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर, प्रथम संस्करण : 2006]—से चुनी गई कविताओं पर आधृत है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि इस चयन में ‘नींद से लंबी रात’ के बाद ‘हर घर से ग़ायब’ की कविताएँ रखी गई हैं और ‘हर घर से ग़ायब’ के बाद ‘जब ख़ुद नहीं था’ की। इस क्रम-प्रस्तुति में जीवन—मृत्यु—जीवन सरीखा एक विन्यास स्थापित करने का प्रयत्न है, यद्यपि नवीन सागर के अंतिम दोनों कविता-संग्रह उनके देहावसान के बाद प्रकाशित हुए। यहाँ यह भी एक अलग तथ्य है कि अपना दूसरा कविता-संग्रह [‘जब ख़ुद नहीं था’] वह जब थे, तब ही पूरी तरह से तैयार करके गए थे :
जब हम लोग—यानी मैं और नवीन मिलकर—‘जब ख़ुद नहीं था’ कविता-संग्रह बना रहे थे, तो कविताओं के चुनाव से लगाकर आवरण तक मिलकर बनाया था। ‘जब ख़ुद नहीं था’ की इस हस्तलिखित प्रति में नवीन के हाथ से लिखी चौंतीस कविताएँ इक्यावन पृष्ठों में फैली हैं। फ़्लैप-मैटर, परिचय, अनुक्रम, समर्पण, प्रकाशन तक के सारे ब्योरे अपनी-अपनी जगह दर्ज किए गए थे।
— छाया सागर [नवीन सागर की जीवन-संगिनी], ‘जब ख़ुद नहीं था’ की भूमिका ‘शेष जो बचा रहा’ में...
• मेरी मृत्यु से बना है
मेरा जीवन
मेरे न होने से
मेरा होना बना है।
[कविता क्यों नहीं है प्रकाश]
यहाँ ऊपर उद्धृत कविता-पंक्तियाँ कवि के प्रथम कविता-संग्रह से हैं, अंतिम या मरणोत्तर प्रकाशित कविता-संग्रहों से नहीं। इन्हें इस प्रसंग में यहाँ उद्धृत करने का आशय यह स्पष्ट करना है कि एक कवि अपने जीवन में अपने उत्तरजीवन को कैसे देखता-पाता है।
• एक समग्रता में नवीन-कविता-पाठ बहुत सहजता से इस बात को प्रकट करता है कि नवीन सागर जन्म और मृत्यु दोनों पर ही बहुत अधिकारपूर्वक कविताएँ संभव करते हैं। इस सृष्टि में प्रत्येक को अनिवार्य रूप से उपलब्ध इन दो सत्यों—जन्म और मृत्यु—को नवीन सागर अत्यंत अंतर्दृष्टिपूर्ण ढंग से समझते, स्वीकारते और व्यक्त की सीमा-असीमा तक ले जाते हैं। वह प्रत्येक जन्म में समाई मृत्यु और प्रत्येक मृत्यु में समाए जन्म को एक नवीन-काव्य-दर्शन सौंपते हैं :
फूल जो कल
इस धरती पर
खिला हुआ था
आज धरती में है
कल जन्म लेने को आतुर।
[फूल]
• नवीन सागर ने बच्चों-किशोरों के लिए भी कविताएँ संभव कीं, जिनका एक संग्रह ‘तुम भी आना’ [जुगनू प्रकाशन (इकतारा ट्रस्ट की प्रकाशन छाप), प्रथम संस्करण : 2020] शीर्षक से फ़िलहाल प्रकाशित और उपलब्ध है। नवीन सागर की कविताओं के प्रतिनिधि चयन में इस संग्रह से कोई कविता नहीं ली गई है। हालाँकि संपादक ने ‘तुम आना’, ‘तारे’, ‘इच्छा’, ‘तुम ऐसे क्यों हो!’ और ‘ऐसा कैसा’ नामधारी पाँच कविताएँ इस चयन के लिए चुनी थीं; लेकिन अंतत: वह इस चयन के आदि-मध्य-अंत के सौंदर्य में कहीं अँट नहीं पाईं। यों भी लगा कि इन्हें शामिल करने के लिए इस चयन के संगीत, तनाव और गमन को बाधित करना होगा।
• एक कवि के प्रसंग में आज यह कहना कि उसने कविता रची नहीं, कविता जी... एक रूढ़, साधारण और मुहावरेदार बात लग सकती है; लेकिन यह समझना होगा कि एक कवि-व्यक्तित्व का निर्माण सिर्फ़ बेहतर कविताएँ संभव करने से ही नहीं होता। उसमें कुछ और तत्त्व भी लगते हैं, जो सर्वथा जीवनगत होते हैं। इस जीवन में स्वयं को कविता-योग्य बनाए रखने के संघर्ष में सतत सक्रिय रहना पड़ता है। इसके लिए व्यक्ति बराबर संकट उठाता है। एक कवि होने के लिए उसने क्या-क्या दाँव पर लगाया हुआ है, यह उसका जीवन देखकर साफ़-साफ़ नज़र आता है। जीवन और कविता और कवि और व्यक्ति के बीच का अंतराल और द्वैत जब लुप्त हो जाता है, तब एक कवि-व्यक्तित्व का जन्म होता है। नवीन सागर ने अपनी ज़िंदगी और मृत्यु से अपने कवि-व्यक्तित्व को जन्म दिया। यह यों ही नहीं है कि उनकी कविता-सृष्टि में कविता पर कविताएँ लगभग-लगभग नहीं हैं, जीवन और उसके आयामों-तनावों पर बहुत हैं। वह रचना-प्रक्रिया को काव्य-वस्तु मानकर उसे शब्द नहीं देते हैं। उनकी कविता में कविता कैसे होती है, इस पर एकाध स्थान को छोड़कर कोई विशेष विचार नहीं है; जहाँ है भी, वहाँ उसका स्वरूप व्यंग्यास्पद है।
नवीन सागर की कविता-सृष्टि में ‘कविता’ शब्द के प्रयोग के बग़ैर एक होती हुई या हो चुकी कविता नज़र आती है। इस कविता में भारतीय सामाजिक जीवन की उधेड़बुन बिना किसी नारेबाज़ी के दर्ज है। इसमें अभिव्यक्त आवाज़ दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराने वाली प्रवृत्ति और निष्क्रियता से पूर्णतः मुक्त है। इस कविता में कवि एक शहीद की तरह नहीं, एक सहते हुए संघर्षयुक्त मनुष्य की तरह मौजूद है। वह यहाँ अकेला है, पर अकेला पड़ना नहीं चाहता। एक सामूहिकता की आकांक्षा से भरे इस अकेलेपन में स्थितियों को बदलने का स्वप्न है, शोर नहीं।
नवीन सागर की काव्य-संरचना इस समाज में व्यक्ति के पतन के रेखांकन से आधारयुक्त होती है। इस अस्तित्व में दबाव नहीं है, देखना है—घृणा नहीं, फ़िक्र के साथ देखना—गहरी फ़िक्र के साथ। इस फ़िक्र में भय की एक नियामक भूमिका है और मुक्ति की एक करुण सदिच्छा सतत व्यक्त हो रही है। यहाँ आक्रोश, अवसाद और अंतर्विरोध; प्रतिरोध, प्रतिकार और प्रतिशोध एक अन्यतम रीति में हैं। यह नवीन-रीति सत्काव्य में प्रार्थना के शिल्प को उलट-बदलकर रख दे रही है :
जिसने मुझे मारा
उसे सब देना
मृत्यु न देना
[देना]
• नवीन सागर की कविता-सृष्टि को अगर एक नाट्य-योजना के अंतर्गत सोचें, तब वहाँ दृश्यबंध के नाम पर होगा—एक घर, एक स्त्री, कुछ खेलते हुए बच्चे, कुछ रंग, कुछ मिट्टी, कुछ मिट्टी के बर्तन और कुछ खुले हुए दरवाज़े... इसमें प्रकाश-संरचना मटमैली होगी और प्रोजेक्टर पर रात्रि-दृश्य होंगे। इसमें घर—रात्रि-दृश्यों और एक धुँधलेपन को पार कर लौट आने का विकल्प है। स्त्री—प्रेम है। कुछ खेलते हुए बच्चे—जीवन से जुड़े रहने की ज़िद और संभावना हैं। कुछ रंग, कुछ मिट्टी, कुछ मिट्टी के बर्तन—रचनात्मक अवकाश नहीं, लगातार रचनाकाश हैं। कुछ खुले हुए दरवाज़े—शुभाशुभ संकेत हैं... जिन पर और स्त्रियाँ हैं—किंचित वृद्ध, जो किसी की माँ और किसी की पत्नियाँ हैं या हो सकती हैं। यहाँ मटमैली प्रकाश-संरचना में—अपने साथ किए गए अपराधों का रोना न रोने वाला एक अपराधबोधग्रस्त स्वर है, जिसमें माफ़ कर देने जैसा गौरव-भाव नहीं है। यहाँ अनिद्रा में अपमान की स्मृतियाँ हैं और कुछ इस प्रकार का असुरक्षा-बोध है; जो स्वयं के लिए नहीं, स्वयं से संलग्न के लिए चिंतित है। हत्या यहाँ एक शास्त्र की तरह है, शिक्षित मध्यवर्ग जिसमें दीक्षित हो चुका है।
• हिंदी की कथित समकालीन कविता एक नितांत मध्यवर्गीय कार्य-व्यापार है और रही आई है। उसके भय, साहस, संकट; उसकी चिंताएँ, कायरताएँ, समझदारियाँ; उसके शत्रु, विरोध, विद्रोह... सब कुछ बेहद मध्यवर्गीय हैं। इस कविता के कवियों के पास बहुत कुछ के फ़र्स्ट-हैंड अनुभव अब तक नहीं हैं; इसलिए इसके शून्य, शोक, मौन, समर्पण, सुख, उत्सव, अचरज, रहस्य, स्वप्न... सब कुछ अत्यंत प्रत्याशित हैं। इस दृश्य में यह बेहद दुखद है कि इस कविता से ससंशय गुज़रने और उसे जाँचने का कार्यभार हिंदी-आलोचना ने कई दशकों से तजा हुआ है।
इस प्रकार के दे दिए गए काव्य-व्यवहार में नवीन सागर की कविता-सृष्टि महज़ मध्यवर्ग का रंगमंच नहीं है। वह अपने वर्ग का अन्वेषण है। वह इसकी वास्तविकता-अवास्तविकता की पड़ताल है।
नवीन सागर की कविता जीवन और संसार में उपस्थित द्वंद्व को दे दिए गए चश्मों से देखने से इनकार करती है। इस अस्वीकार में वह एक विशाल स्वीकार की भाँति प्रकट होती है और नाटक की दुनिया को नाटक की तरह और दुनिया के नाटक को दुनिया की तरह अभिव्यक्त करती है :
तुम चीज़ों से
अलग होते हो
जब उन्हें देखते हो!
[शेर का अफ़साना]
नवीन सागर की कविताएँ सिर्फ़ ‘जिए चले जाने की ऊब’ के व्यर्थ हो जाने को ही नहीं जानतीं, वह यह भी जानती हैं कि जब इस व्यर्थ का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता, दुनिया में तब भी बहुत कुछ होता रहता है।
•••
~ यहाँ प्रस्तुत कथ्य बहुत कम बदलाव के साथ ‘प्रतिनिधि कविताएँ : नवीन सागर’ [संपादक : अविनाश मिश्र, प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, संस्करण : 2025] की भूमिका के रूप में पूर्व-प्रकाशित हो चुका है। यह चयन यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं : नवीन सागर की प्रतिनिधि कविताएँ
~ नवीन सागर के परिचय, कविताओं और कवितांशों से गुज़रने के लिए यहाँ देखिए : नवीन सागर का रचना-संसार
~ नवीन सागर पर रची गईं तीन बेहतरीन कविताएँ यहाँ पढ़िए : निर्मला गर्ग | नरेंद्र जैन | सुदीप सोहनी
~ नवीन सागर पर केंद्रित अशोक अग्रवाल का एक संस्मरण यहाँ पढ़िए : अपने भूले रहने की याद में जीवन
~ नवीन सागर की याद में नवंबर 2007 में प्रकाशित साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘कथादेश’ [संपादक : हरिनारायण] के ‘नवीन सागर विशेषांक’ [अतिथि संपादक : रामकुमार तिवारी] को पढ़ने और नि:शुल्क डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें : 'कथादेश' का नवीन सागर विशेषांक
~ अन्य रविवासरीय : 4.0 यहाँ पढ़ सकते हैं : ‘अब तुम भी जाने वाले हो सामान तो गया’ | एक बीस हज़ारिया बँधुए की दिल्ली-यात्रा | सुरेन्द्र मोहन पाठक के ख़िलाफ़ | साहित्य अकादेमी एक ऐसा पुरस्कार है | सेवासूक्त | पहला सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान | अविनाश मिश्र के ख़िलाफ़ | मेरी बहन की कविताएँ, एक प्लेलिस्ट की याद और थोड़ा-सा कानपुर
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