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वे बंगाली लड़कियाँ आततायी नहीं थीं!

वे अनपेक्षित बाढ़ की तरह आती रहीं। उनका पानी मैला नहीं था, न ही उतना साफ़। वे मेरे भीतर बने घर को—जो पहले से खंडहर था और खंडहर करती चली गईं। वे खुला मैदान चाहती थीं, जिसमें वे अपने मुताबिक़ खेलना और अपने हिसाब से घर बनाना चाहती थीं। जब तक फूटते-टूटते हुए मैं मैदान हुआ, वे जा चुकी थीं। कुछ ऐसी थीं वे बंगाली लड़कियाँ।

कभी झाँसी में वे रेलवे कॉलोनी के झूलों पर उड़ती हुईं, अठखेलियाँ करती हुईं, शिशु की तरह रहीं। कानपुर ने मेरे भीतर एक हिस्सा उनके प्रति बचाकर रखा; कभी तिलक नगर, कभी लाल बंगला, कभी काली बाड़ी मंदिर के इर्द-गिर्द मैं उन्हें ढूँढ़ते हुए भटकता रहा।

उत्तर भारत के कुछ मतवालों को अपने से अलग गंध पसंद न आई, वे उसे दुर्गंध बताते रहे। सिर्फ़ बंगाल ही नहीं, पहाड़ी-रहवासी उनके लिए ठीक न थे, मलयाली उनके लिए ठीक न थे और पूर्वोत्तर के लोगों को देखकर उन्होंने चीन की तरफ़ इशारा किया। मैं ये सभी आरोप होश-ओ-हवास में उन मतवालों पर लगाना चाहता हूँ।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर चिपके हुए ग़लीज़ पोस्टर—बाबा बंगाली वशीकरण स्पेशलिस्ट गोल्ड मेडलिस्ट, लव मैरिज, मनचाहा प्यार, गृह कलेश, जादू-टोना, मुठकरनी, शादी में अड़चन, रूठे को मनाना, पति-पत्नी में अनबन, सौतन व दुश्मन से छुटकारा, गड़ा धन निकलवाना आदि; छल-कपट के कार्य करने के लिए भी इन अज्ञात धोख़ेबाज़ों को बंगाल का सहारा लेना पड़ा। बाद में पता चला कि कोई इतने काम करवाने वाला बाबा बंगाली, कोई बंगाली नहीं था; वह शराब को बदनाम करने वाला नालायक़ शराबी था। 

उत्तर भारत के लोग अपनी नस्ल, जाति और धर्म से इस तरह बँधे हुए थे कि वे पूर्ण जीव रहते हुए भी अधकटे जीव थे। इन सब के बाहर न तो वे प्रेम करना चाहते थे और न किसी को करने देते थे।

कुछ बिना डिग्री वाले बंगाली डॉक्टर ग्रामीण क्षेत्रों की तत्काल स्वास्थ्य सेवा बने रहे, जो अब भी लगातार श्रमरत हैं। वे कुत्ता, बिल्ली, भैंस, पुरुष, महिला, किन्नर सबका इलाज करते थे। इमरजेंसी में बकरी देख लेने का भी उन्हें भरपूर अनुभव था। वे पता नहीं क्या थे, वे दूर-दराज़ से पलायन करके आए थे। वे कोलकाता से आए थे। मुर्शिदाबाद, मालदा, हुगली, कूच बिहार के होकर भी, वे बताते रहे कि वे कोलकाता से हैं। उत्तर भारत को भ्रम है कि बंगाल यानी कोलकाता। उत्तर भारत के लोग सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग को नहीं जानते थे। वे बस कोलकाता को जानते थे।

ख़ुद मेरे बड़े भाई, जो अमेरिका की किसी आईटी कंपनी में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर के रूप में खट रहे हैं—वह आईआईटी खड़गपुर में चार साल रहे, मुझसे ज़्यादा बंगाल को वह पहचानते थे; एक दिन अनायास उन्होंने मुझसे कहा, “तुम अगर बंगाली लड़की से शादी करोगे तो मैं तुम्हारी शादी में नहीं आऊँगा।” मेरे भीतर भूकंप आ चुका था। दिल्ली के माहौल व बंगाली लड़कियों ने मुझे खुला मैदान बना दिया था। मैं कुछ भी सुन सकता था, कुछ भी सोच सकता था। उनका अतीत बंगाल में कुछ ठीक नहीं रहा था। मैंने इस बात को वहीं छोड़ देना ठीक समझा।

तब तक मैं दिल्ली आ चुका था, धरना देते हुए जेल जा चुका था, अथाह प्रेम में था। सच कहूँ तो कुछ हद तक बंगाल में डूब चुका था। फिर से बाढ़ का एहसास हुआ, लेकिन उसका पानी थमा नहीं। न मेरे बाज़ू में इतनी ताक़त थी कि उनसे बाँध का निर्माण कर लूँ और पानी रोक लूँ।

मुझे प्यार होता रहा महाश्वेता देवी से, बेग़म रुक़ैया सख़ावत हुसैन से, तसलीमा नसरीन से, अरुंधति रॉय से, आशापूर्णा देवी से, श्रेया घोषाल से, अलका याग्निक से, कुमार सानू से, अभिजीत भट्टाचार्य से, कोंकणा सेन शर्मा से, रानी मुखर्जी से, सुष्मिता सेन से, सुचित्रा सेन से, ऋतुपर्णा सेनगुप्ता से और न जाने कितने लोगों से।

मुझसे कहा गया कि बंगालियों से दूर रहो, मुसलमानों से दूर रहो। मुझे इस तरह का उलाहना देने वाले लोगों को कहना चाहता हूँ कि ओ नालायक़ मूर्ख लोगो! मैं कैसे समझाऊँ तुम्हें कि ये मेरे जीवन की कुछ मज़बूत ईंटों में से एक हैं। ये मुझे जितना ढहा रहे थे, उतना ही बना रहे थे। मैं अपने आप को रोकते हुए भी इनसे मुहब्बत कर रहा था।

अनुराग वत्स की कुछ पंक्तियाँ मुझे याद आती हैं— हमें उन लड़कियों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्हें देखकर, मिलकर, बातें करते हुए या रेस्तराँ में साथ चाय/कॉफ़ी पीते हुए हमारे मन में एक हूक उठी थी : एक हिचकी जो अब शांत है, पर जिससे पहली दफ़ा अंदाज़ा हुआ था कि हम प्यासे हैं, हमें पानी की ज़रूरत है...

वे बंगाली लड़कियाँ कुछ ऐसी ही थीं। वह हिचकी अब भी बार-बार आ रही है, मुझे अपनी प्यास का अंदाज़ा बार-बार हो रहा। उनकी छाती नार्थ पोल की ठंडी परत थी जो मेरी गर्मी को ठंडक में बदल रही थी। उनके होंठ बादल की तरह थे, जो मेरे शरीर पर रेंगते हुए मेरी सूखी जड़ों को पानी दे रहे थे।

हिंदी बेल्ट में बेहद ख़तरनाक भ्रम फैल चुका था कि वे काला जादू करती हैं। जब भी भारतीय समाज में महिलाओं ने परंपरावादी व रूढ़िवादी ख़ेमे से जिरह की, उन्हें कभी डायन कह दिया गया, कभी बेहया तो कभी नीच। वे इन शब्दों के आस-पास ख़ूब मक़बूल रहीं। अगर बंगाली स्त्री ने समाज को हिलाने की कोशिश की तो जानबूझकर ये कह दिया गया कि वे काला जादू करती हैं।

रुकैया सख़ावत हुसैन ने अपनी कहानी ‘सुलताना का सपना’ में समाज को एकदम पलट कर रख दिया, पुरुषों को जनाने में क़ैद कर दिया और एक मल्लिका अब राज करती थी। पहले जहाँ औरत कठघरे में थी, अब उस जगह पुरुष को रख दिया गया; यानी औरत की हुकूमत। ‘सुल्ताना का सपना’ में मर्द कहीं नहीं हैं। मर्द घरों में बंद थे, वही औरत वाली चहारदीवारी में बंद।

शायद इस तरह का काला जादू पुरुषों को रास नहीं आ रहा था, इसीलिए वे चारों दिशाओं में चिल्लाते रहे कि बंगाली लड़कियाँ काला जादू करती हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर की एक लघु कहानी ‘स्त्रीर पत्र’ (अँग्रेज़ी में ‘द वाइफ़्स लेटर’) में मृणाल जो उस कहानी की नायिका है, विवाह के बाद उसका जीवन दमन, उपेक्षा और सीमाओं से घिर जाता है। वह जिस तरह शादी के बाद घर छोड़कर जाती है। समाज के बनाए गए क़ाइदे को लात मारती है। वह घर छोड़कर पुरी चली जाती है। वहीं से अपने पति को पत्र लिखती है, पत्र के अंत में मृणाल एक साहसिक निर्णय लेती है—वह साफ़ शब्दों में कहती है कि वह अब उस घर में वापस नहीं लौटेगी। यह निर्णय केवल व्यक्तिगत विद्रोह नहीं, बल्कि पितृसत्ता के विरुद्ध एक सशक्त घोषणा है। 

कहीं यही वह काला जादू तो नहीं जिससे पुरुष ख़ौफ़ खाते हैं। ख़ैर, मुझे इस देश के पुरुषों पर भरोसा नहीं रहा, यहाँ तक कि अपने आप को भी मैं उन्हीं पुरुषों में रखूँगा, अंततः मैं भी तो एक पुरुष ही हूँ।

वे बंगाली लड़कियाँ आततायी नहीं थीं, वे चमेली का फूल थीं। वे सदा याद दिलाती रहीं कि संभावनाओं को बदला जा सकता है। वे मेरे लिए कुछ वक़्त की निराशा ज़रूर थीं लेकिन उन्हें मालूम था कि निराशा उनकी ऊष्मा के सामने कुछ न थी। वे वक़्त पर ऊष्मा देती रहीं और एहसास दिलाती रहीं कि संभावनाएँ अल्पकालिक हैं, शाश्वत नहीं। वे पूर्ण विराम नहीं विस्मयादिबोधक चिह्न थीं।

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