श्री अरविंद की संपूर्ण रचनाएँ
कविता 26
उद्धरण 63
काल के प्रति साधक की आदर्श मनोवृत्ति यह होनी चाहिए कि वह अनन्त धैर्य धारण करे, मानो उसके पास अपनी परिपूर्णता के लिए काल सनातन और अनन्त होकर विद्यमान है। किंतु फिर भी वह ऐसी शक्ति का विकास करे, जो मानो अभी आत्म-सिद्धि प्राप्त कर लेगी। यह शक्ति द्रुत गतिमयता की प्रभुता और प्रभाव के साथ नित्य वर्धित होती रहनी चाहिए, जब तक कि यह परम दिव्य रूपांतर का चमत्कृतिपूर्ण तात्क्षणिक मुहूर्त न बन जाए।
योगसिद्धि अर्थात् योग-अभ्यास से प्राप्त की जाने वाली पूर्णता, चार महान साधनों की संयुक्त क्रिया से सर्वोत्तम रूप से संपन्न रूप से संपन्न की जा सकती है। इन साधनों में प्रथम है शास्त्र, अर्थात् उन सत्यों का, सिद्धांतों, शक्तियों और प्रक्रियाओं का ज्ञान, जो सिद्धि को प्रभावित एवं निर्धारित करते हैं। दूसरा साधन है उत्साह, अर्थात् शास्त्र द्वारा प्राप्त ज्ञान द्वारा प्रस्तुत एवं नियत रूपरेखाओं पर किया जाने वाला धीर और स्थायी अध्यवसाय। तीसरा साधन है गुरु, शिक्षक का प्रत्यक्ष सुझाव, दृष्टांत और प्रभाव तथा उसकी मध्यस्थता या उसका हस्क्षेप, जो हमारे ज्ञान एवं प्रयत्न को आध्यात्मिक क्षेत्र में समुन्नत करता है। अंत में आती है समय की सहायता—काल; क्योंकि समस्त वस्तु एवं घटनाओं में उनका एक क्रिया-चक्र है, और ईश्वरीय गति की एक विशेष अवधि होती है।