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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

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अनुभव करो; किंतु अभिभूत मत हो पड़ो, अन्यथा चल नहीं पाओगे। यदि अभिभूत होना है, तो ईश्वरप्रेम में हो जाओ।

मेरे काम-क्रोधादि नहीं गए, चिल्लाने से वे कभी नहीं जाते। नहीं गए कहकर ऐसा कर्म, ऐसी चिंता का अभ्यास कर लेना चाहिए, जिसमें काम-क्रोधादि की गंध भी नहीं रहे—मन जिससे उन सबको भूल जाए।

तुम्हारे चरित्र के किसी भी उदाहरण से यदि किसी का मंगल हो, तो उससे उसको गुप्त मत रखो। तुम्हारा सत्स्वभाव कर्म में प्रस्फ़ुटित हो, किंतु अपनी भाषा में व्यक्त हो, नज़र रखो।

आगे बढ़ो, किंतु माप कर देखने जाओ कि कितनी दूर बढ़े हो। ऐसा करने से पुनः पीछे रह जाओगे।

जभी अपने कुकर्म के लिए तुम अनुतप्त होगे, तभी परमपिता तुम्हें क्षमा करेंगे और क्षमा मिलने पर ही समझोगे, तुम्हारे हृदय में पवित्र सांत्वना रही है और तभी तुम विनीत, शांत और आनंदित होगे।

अपना दोष जानकर भी यदि तुम उसे त्याग नहीं सकते, तो किसी भी तरह उसका समर्थन कर दूसरे का सर्वनाश करो।

मन-मुख एक होने पर भीतर मलिनता नहीं जम सकती, गुप्त मैल भाषा के ज़रिए निकल पड़ते हैं। पाप उसके अंदर जाकर घर नहीं बना सकता।

संकोच ही दुःख है, और प्रसारण ही है सुख। जिससे हृदय में दुर्बलता आती है, भय आता है—उसमें ही आनंद की कमी है और वही है दुःख।

ऊपर-ऊपर देखकर ही किसी चीज़ को छोड़ो या किसी प्रकार का अभिमत प्रकाश करो। किसी चीज़ का शेष देखे बिना उसके संबंध में ज्ञान ही नहीं होता है, और बिना जाने तुम उसके विषय में क्या अभिमत प्रकाश करोगे?

चाह की अप्राप्ति ही है दुःख। कुछ भी चाहो। सभी अवस्थाओं में राजी रहो, दुःख तुम्हारा क्या करेगा?

तुम्हारी भाषा यदि कुत्सा-कलंक जड़ित ही हो; दूसरे की सुख्याति नहीं कर सके, तो किसी के प्रति कोई भी अभिमत प्रकाश करो। मन ही मन तुम अपने स्वभाव से घृणा करने की चेष्टा करो, एवं भविष्य में कुत्सा-नरक त्यागने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ बनो।

जो अनुतप्त होकर भी पुनः उसी प्रकार के दुष्कर्म में रत होता है, समझना कि वह शीघ्र ही अत्यंत दुर्गति में पतित होगा।

स्मरण करो तुम साहसी हो, स्मरण करो तुम शक्ति के तनय हो, स्मरण करो तुम परमपिता की संतान हो। पहले साहसी बनो; अकपट बनो, तभी समझा जाएगा धर्मराज्य में प्रवेश करने का तुम्हारा अधिकार हुआ है।

दुःख भी एक प्रकार का भाव है, सुख भी एक प्रकार का भाव है। अभाव का या चाह का भाव ही है दुःख।

सभी मत ही हैं साधना विस्तार के लिए, पर वे नानाप्रकार के हो सकते है और जितने विस्तार में जो होता है—वही है अनुभूति, ज्ञान। इसीलिए धर्म है अनुभूति पर।

तुम लाख़ गप करो; किंतु प्रकृत-उन्नति नहीं होने पर, तुम प्रकृत-आनंद कभी भी लाभ नहीं कर सकते।

किसी भी मत के साथ किसी मत का प्रकृत रूप में कोई विरोध नहीं, भाव की विभिन्नता, प्रकारभेद है। एक का ही नानाप्रकार से एक ही तरह का अनुभव है।

जो तुम नहीं जानते हो, ऐसे विषय में लोगों को उपदेश देने मत जाओ।

तुम्हारा 'मै' पन जाते ही अदृष्ट ख़त्म हुआ। दर्शन भी नहीं, अदृष्ट भी नहीं।

यदि मंगल चाहते हो तो ज्ञानाभिमान छोड़ो, सभी की बातें सुनो और वही करो, जो तुम्हारे हृदय के विस्तार में सहायता करे।

तुम चाहे जो भी क्यों देखो, अंतर सहित सब से पहले उसकी अच्छाई देखने की चेष्टा करो, और इस अभ्यास को तुम मज्जागत कर लो।

सृष्टितत्व, गणितविद्या, रसायनशास्त्र आदि की आलोचना से काम-रिपु का दमन होता है।

अनुताप करो, किंतु स्मरण रखो जिससे पुनः अनुतप्त होना पड़े।

जो शक्तिमान हैं, वे चाहे जो भी करें, उनकी नज़र रहती है निराकरण की ओर। जिससे उन सभी अवस्थाओं में कोई विध्वस्त हो, प्रेम के साथ उसके ही उपाय की चिंता करना—बुद्धदेव को जैसा हुआ था—वही है सबल हृदय का दृष्टांत।

अपने लिए कुछ मत चाहो, देखोगे सभी तुम्हारे होते जा रहे हैं।

यदि साधना में उन्नति लाभ करना चाहते हो, तो कपटता त्यागो।

किसी के दुःख का कारण बनो, कोई तुम्हारे दुःख का कारण बनेगा।

पूर्ववर्ती को अधिकार करके ही परवर्ती का आविर्भाव होता है।

दुःख किसी का प्रकृतिगत नहीं, इच्छा करने से ही उसे भगा दिया जा सकता है।

तुम्हारा मन जितना निर्मल होगा; तुम्हारी आँखें उतनी ही निर्मल होगी, और जगत् तुम्हारे सम्मुख निर्मल होकर प्रकट होगा।

यदि परीक्षक बनकर अहंकार सहित सद्गुरु अथवा प्रेमी साधुगुरु की परीक्षा करने जाओगे, तो तुम उनमें अपने को ही देखोगे, ठगे जाओगे।

परनिंदा करना ही है, दूसरे के दोष को बटोर कर स्वयं कलंकित होना और दूसरे की सुख्याति करने के अभ्यास से, अपना स्वभाव अज्ञात भाव से अच्छा हो जाता है।

दुर्बल हृदय में प्रेम-भक्ति का स्थान नहीं।

अपने लिए जो भी किया जाए, वही है सकाम और दूसरे के लिए जो किया जाए—वही है निष्काम। किसी के लिए कुछ नहीं चाहने को ही निष्काम कहते हैं—केवल ऐसी बात नहीं है।

सत्य बोलो, किंतु संहार लाओ।

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मेरे विचार से हिंदुधर्म, मुसलमानधर्म, ईसाईधर्म और बौद्धधर्म इत्यादि बातें भूल हैं, बल्कि वे सभी मत हैं।

विफलता दुर्बलता नहीं है, बल्कि चेष्टा करना ही है दुर्बलता।

सत् में अपनी आसक्ति संलग्न करो, अज्ञात भाव से सत् बनोगे। तुम अपनी तरह से सत्-चिंता में निमग्न रहो, तुम्हारे अनुयाई भाव स्वयं ही फूट निकलेंगे।

सत् बात बोलना अच्छा है; किंतु सोचना, अनुभव करना और भी अच्छा है।

अमृतमय जल कपटी के लिए तिक्त लवणमय होता है, तट पर जाकर भी उसकी तृष्णा निवारित नहीं होती।

तुम्हारी नज़र यदि दूसरे का केवल 'कु' ही देखे, तो तुम कभी भी किसी को प्यार नहीं कर सकते। और जो सत् नहीं देख सकता, वह कभी भी सत् नहीं होता।

क्षिप्र बनो; किंतु अधीर होकर, विरक्ति को बुलाकर सब कुछ नष्ट मत कर दो।

असत्-चिंता जिस प्रकार दृष्टि में, वाक्य में, आचरण में, व्यवहार इत्यादि में व्यक्त हो जाती है, सत्-चिंता भी उसी प्रकार व्यक्त हो जाती है।

भारत! यदि भविष्यत्-कल्याण का आवाहन करना चाहते हो, तो संप्रदायगत विरोध को भूल कर; जगत् के पूर्व-पूर्व गुरुओं के प्रति श्रद्धासंपन्न रहो और अपने मूर्त्त एवं जीवंत गुरु या भगवान में आसक्त हो जाओ, एवं उन्हें ही स्वीकार करो जो उनसे प्रेम करते हैं

यह बिल्कुल ही सत्य बात है कि मन में जभी दूसरे के दोष देखने की प्रवृत्ति आती है, तभी वे दोष तुम्हारे अंदर आकर घर बना लेते हैं। तभी बिना कालविलंब किए, उस पाप-प्रवृत्ति को तोड़-मरोड़ एवं झाड़-बुहार कर साफ़ कर देने में निस्तार है, नहीं तो सब नष्ट हो जाएगा।

तुम्हारे दर्शन की, ज्ञान की सीमा जितनी है, अदृष्ट (भाग्य) ठीक उसके ही आगे है। देख नहीं पाते हो, जान नहीं पाते हो—इसीलिए अदृष्ट है।

जिस पर सब कुछ आधारित है, वही है धर्म और वे ही हैं परमपुरुष।

स्पष्टवादी रहो, किंतु मिष्टभाषी बनो। बोलने में विवेचना करो, किंतु बोलकर विमुख मत होना।

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जैसे अनार पकते ही फट जाता है; तुम्हारे अंतर में सतभाव परिपक्क होते ही स्वयं फट जाएगा, तुम्हें मुँह से उसे व्यक्त करना होगा।

काम करते जाओ, किंतु आबद्ध होना। यदि समझते हो कि विषय के परिवर्तन से तुम्हारे हृदय में परिवर्तन रहा है; और वह परिवर्तन तुम्हारे लिए वांछनीय नहीं है, तो ठीक जानो तुम आबद्ध हुए हो।

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