कहानी : एक मर्मांतक चाहना
मुमताज़ इक़बाल
08 मई 2026
बर्फ़ धीरे-धीरे गिर रही थी, जैसे नींद किसी उदास आदमी की पलकों से सरक जाती है; और बर्फ़ केवल बर्फ़ नहीं थी, यह रौशनी से ख़ाली स्मृतियों का एक साया था जो शहर पर मंडरा रहा था। शहर, जो वक़्त की क़ब्र का एक सियाह पत्थर बन चुका था, जिसमें असीम बेमानीपन की गूँज थी। रात का आख़िरी पहर था और चाँदनी एक फीका-सा धब्बा थी जो दुख को अपनी ही तरह से प्रदर्शित कर रही थी। चाँदनी, रौशनी नहीं थी, यह महज़ एक गहरे दुख का दस्तावेज़ था जो हर इमारत, हर गली, दरिया में बहते सर्द पानी में लिखा जा चुका था।
प्राग एक पुराने ख़्वाब की तरह अपने अंदर किसी हादसे की कहानी छुपाए हुए था, एक ऐसी कहानी जो कभी झूठी नहीं हो सकती थी, और जो गिरती हुई बर्फ़ के ज़र्रे-ज़र्रे में गवाह बनकर बिखर रही थी। इस शहर की सड़कें रास्ता नहीं थीं, वह तो दरअस्ल एक किताब थीं जो बरसों से बे-आवाज़ पढ़ी जा रही थीं, जिसमें कला, शिल्प और रस से ख़ाली कहानियाँ लिखी गई थीं। यह वह किताबें थीं जिसमें प्यार के बारे में अधूरे वाक्य थे, जिसमें हर क्षण एक ऐसी चीज़ को ढूँढ़ता रहा जो कभी दरयाफ़्त ही नहीं की जा सकती थी। हर शराब-ख़ाना एक हवा थी, जिसे महसूस तो किया जा सकता था, मगर ठिकाना या अता-पता नहीं था। वल्तावा, जिसने शहर के मौसमों का हर दौर देखा था—आज आधा जमा, आधा बहता हुआ, एक पुराने आईने की तरह गर्द से अटा हुआ था। यह एक दरिया नहीं था, एक पुराना एल्बम था जो बस उन पलों को दिखा सकता था जो कभी लौट कर नहीं आएँगे। पानी बहता था, मगर इसलिए नहीं कि दरिया ज़िंदा था, बल्कि इसलिए कि यादों का बोझ इतना ज़्यादा था कि दरिया मर नहीं सकता था। उसकी लहरें हर आते-जाते मुसाफ़िर के दुख को अपनी तहों में ले जाकर गुम कर आती थीं। यह दरिया बस बहता नहीं था, यह रोते हुए समय का एक लोकगीत था, एक ऐसी पुरानी ग़ज़ल जो सूखे होंठों ही के लिए लिखी गई थी।
शहर की इमारतों की छतें बर्फ़ के बोझ से झुक गई थीं, मगर यह बर्फ़ का बोझ नहीं था जो इन इमारतों को दबाए हुए रखता था। यह बोझ उन कहानियों का था जो कभी किसी ने सुनाई नहीं, जो हवाओं में गूँजती रहीं, जो उन खिड़कियों से टकराकर वापस लौट आईं जिनमें कभी रौशनी रक़्स करती थी। हर इमारत एक स्मृति थी, जो बस प्रतीक्षा करती रही कि कब कोई वापस आएगा, मगर कोई नहीं आया। हर इमारत एक ऐसी आँख थी, जिसमें मुद्दतों से आँसू ख़ुश्क हो चुके थे, मगर आँखों से बहकर, चेहरों से गिरकर, ज़मीन में भी अवशोषित नहीं हो सकते थे।
और गलियाँ? वे गलियाँ जो रास्तों में गिनी ही नहीं जाती थीं, एक अज़ाब थीं। वे गलियाँ जो इमारतों के मध्य नहीं, दुखों के बीच चलती थीं। इन गलियों में जो क़दमों के निशान थे, वे क़दम नहीं, हज़ारों मुकम्मल कहानियाँ थीं जो अधूरी रह गई थीं। वे आख़िरी मुलाक़ातों के नक़्श थे, वे बिछड़ने वालों के अवशेष थे। वे रास्ते नहीं थे, वे तो दास्तानें थीं जो हर शाम नाराज़ मौसमों के हाथों से लिखी जाती थीं और हर सुबह बर्फ़ की मोटी परतों में दबा दी जाती थीं।
रात का आख़िरी पहर था और उस शहर की रात महज़ एक ख़ाली महफ़िल थी, एक ऐसी महफ़िल जिसमें उन लोगों की आवाज़ें थीं जो कभी लौटकर नहीं आएँगे। हवा चलती थी, मगर इसलिए नहीं कि मौसम बदल रहा था, बल्कि इसलिए कि दुख अपनी जगह बदल रहा था। एक दुख जो एक रास्ते से उठकर दूसरे रास्ते पर बिना शोर किए बैठ जाता था। हर सड़क, हर गली, हर झरोखा एक प्रतीक्षा थी, जो कभी पूरी नहीं होगी।
बर्फ़ गिरती रही। यह बर्फ़ एक मौसम का हिस्सा नहीं थी, यह एक दास्तान का आख़िरी पन्ना थी जो गिरने-पड़ने के लिए ही लिखा गया था। एक पुराना गीत जो हर साल इसी तरह गाया जाता था, एक पुरानी ग़ज़ल जिसमें तन्हाई का बयान लफ़्ज़ और मानी के अंतरालों में कहीं खोया हुआ था। यह शहर ज़िंदा था, मगर इसलिए कि यादों का सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ था। बर्फ़ गिरती-पड़ती रही।
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(मैं, जो कहानी लिख रहा हूँ, ख़ुद भी परिवर्तन की प्रक्रिया से गुज़र रहा हूँ, और कहानी को बदलने से कौन रोक सकता है भला!) जब रायना रैमान उस अजनबी शहर में क़दम रखती है, तो उसे ऐसा महसूस होता है, गोया कि वह एक पुराने, जर्जर स्मृतियों के खंडहर में क़दम रख रही हो। एक ऐसी स्मृति, जो अतीत के फटते हुए पन्नों पर लिखी गई हो, मगर कभी पूरी तरह मिट न सकी हो। यह शहर उसके लिए नया था, मगर उसकी आत्मा उसे पहले ही महसूस कर चुकी थी। गलियाँ, लोगों से हर वक़्त आबाद रास्ते, बर्फ़ से ढके दरख़्त हमेशा से उसके अंदर मौजूद थे। उसने वियाना को छोड़ा था, मगर वह किसी ख़ास दिशा की तलाश में नहीं थी, बल्कि वह किसी ऐसी जगह की खोज में थी, जहाँ वह ख़ुद को खो सके, या शायद अपने आपसे बच सके।
वह बहुत समय से चल रही थी, रास्तों के साए में छुपकर, अपने क़दमों की आवाज़ सुनकर, मगर कुछ भी नहीं बदला। वक़्त मानो उसके अंदर जकड़कर रह गया था, एक ख़ामोश दरिया, जिसका पानी बहने की बजाय गहराता जा रहा हो। उसका बेटा, मीता, जो ज़िंदगी के एक नए सफ़र में खोया हुआ था, उसे पीछे छोड़ गया था, मगर ऐसा नहीं कि उनका प्यार ख़त्म हो गया था, बल्कि शायद समय ने उन्हें अलग रास्तों पर डाल दिया था। वह उसे वैसे छोड़ आया था कि एक पक्षी शाम-समय अपने पुराने, ख़स्ता-हाल, पतझड़ की मार से तहस-नहस पेड़ को छोड़ देता है। कोई शिकवा नहीं, कोई वज़ाहत नहीं, बस एक चुप थी—जिसमें सब कुछ विलीन हो गया था।
और उसका पति? वह एक भूले हुए शेर की तरह था, लफ़्ज़ तर्तीब से याद नहीं आते थे। कभी रिश्तों में गर्मी थी, मगर अब? अब कुछ नहीं था। बस एक ख़ामोश-सुनसान कमरा (वियाना में) था, जहाँ वक़्त बस बीत रहा था। मोहब्बत शायद वहाँ नहीं थी, मगर यादें कभी पूरी तरह से नहीं मिटाई जा सकतीं, वह बस अपने रूप और प्रभाव बदल लेती हैं, जैसे बर्फ़ कभी नर्म हो जाती है, कभी पूरी तरह जम जाती है। अतीत अब एक उपस्थिति का एहसास नहीं था; वह एक ख़ामोश, मद्धम गूँज बन चुका था। मोहब्बत, ग़ुस्सा और इस शहर की ख़तरनाक सर्दी, अब उसके ज़ेहन में उतने बचे भी नहीं थे। अब वह बस धुँधले साए की तरह रह गए थे, ख़ामोश और साकित, जो हमेशा मिटने के लिए तैयार रहते हैं, हालाँकि कभी नहीं मिट सकते। संभवतः वे एक आरामदायक एकांत में सुस्त हो गए हों, जहाँ से दुनिया दूर हो, मगर हमेशा हाथों की दस्तरस में हो।
इस नए शहर में, वह जवाब तलाश करने आई थी, मगर जो मिला वह एक और गहरा सवाल था। एक सवाल जिसका कोई साफ़ जवाब नहीं था। क्या वह अपने ही स्व की दिशा में दौड़ती जा रही थी, या महज़ सबसे दूर भाग रही थी? क्या यह सफ़र, यह आवागमन, उसे अपने आपके क़रीब लाए थे, या यह उस जीवन से पलायन था—जिसे वह अब अपने अंतर से समन्वित नहीं कर पाती थी? जवाब अस्पष्ट था। उसका ज़ेहन वियाना की स्मृतियों और उस शहर के विराट मौन के बीच चक्कर काट रहा था, जिसमें वह अब ख़ुद को महसूस कर रही थी। क्या यह उसका पलायन था या केवल उसका भाग्य।
ज्यों-ज्यों दिन गुज़रते गए, शहर की सर्दी उसकी हड्डियों में गहराई तक रिसने लगी; मगर इसके साथ-साथ कुछ ऐसा भी खुल रहा था जो उसने लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया था। वियाना में वह माँ और पत्नी थी। वह किरदार जो कभी उसके लिए शांति का कारण बने हुए थे। मगर यहाँ, इस सर्द, सुनसान शहर के अंदर, वह अपने लिए बस ख़ुद ही थी। और यह शायद सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात थी।
यहाँ कोई तवक़्को नहीं थीं, किसी से कोई माँग नहीं थी, न किसी को दिखावा करने की ज़रूरत थी। वह इस शहर में अकेली हो सकती थी और फिर भी अपने अतीत का बोझ इतनी शिद्दत से महसूस कर रही थी, जितना पहले कभी न कर सकी थी। वह उन ख़ाली गलियों में चल सकती थी और सिवाए अपनी साँसों की आवाज़ के कुछ न सुन सकती, हवा के झोंखों के अपने चेहरे से टकराते हुए और दूर से गरजते हुए गिरजा के घंटों की आवाज़ सुनती हुई। इस फैले हुए ख़ालीपन में, उसे यह एहसास हुआ कि यह शहर अजनबी नहीं था, वह तो ख़ुद वही थी जो अजनबियत का शिकार हो चुकी थी।
उसका दिमाग़ अक्सर अपने अपने बेटे मीता की तरफ़ चला जाता। कई साल हो चुके थे, जब दोनों ने बात की थी, उसे गले लगाया था। वह उसे बेहद याद (चाहा) करती थी, मगर उसके साथ कुछ और भी था, कुछ और ज़्यादा गहरा, जो उसके दिल को कस कर मुट्ठी में जकड़ लेता था। इस बात का आभास कि वह उसे पुराने एक रिश्ते की तरह स्वीकार कर चुका था, कि उनके बीच का रिश्ता इस तरह से बदल चुका था, जिसे कभी वापस नहीं पलटाया जा सकता था। वे रास्ते जो कभी उन्होंने एक साथ चले थे, अब दो अलग दिशाओं में बँट चुके थे और उस समय को वापस पलटाने का कोई तरीक़ा नहीं था।
उसके पति की ग़ैर-मौजूदगी नेपथ्य में एक साए की तरह छाई रहती थी, एक ख़ामोश मौजूदगी जो कभी कहीं गई ही नहीं थी। वह उसकी तन्हाई का साथी था, हमसफ़र था—वह आदमी जो उसके ख़्वाबों, ख़ौफ़ों, ख़ुशियों और ग़मों में साथ था। और फिर भी, कहीं न कहीं, वह अजनबी हो गया था, न मोहब्बत की कमी की वजह से, बल्कि समय के क्रूर परिवर्तन की बदौलत। जो गहरा रिश्ता कभी था, वह धीरे-धीरे टूटकर बिखर गया था, वर्षों के, मुसलसल गुज़रने के असर से। वह अब एक ही जगह पर नहीं थे, न वह सोच, न वह नज़रिये, न वह जीवन। जो बचा था, वह उनकी एक स्मृति थी, मगर अब वह सुकून का कारण नहीं थी। बल्कि अब वह एक बोझ बन चुकी थी, एक याद-दिहानी कि जो कुछ वे खो चुके थे।
मगर रायना अब अतीत में नहीं रह सकती थी। वह यहाँ कुछ ढ़ूँढ़ने आई थी, चाहे वह न जानती हो कि क्या? शहर, अपनी ठंडी सड़कों और ख़ामोश गलियों के साथ, तन्हा करने का वादा करता था। और फिर भी, इस तन्हाई में एक नाक़ाबिल-ए-बयान सुकून था। एक सुकून जो भूल जाने से नहीं, बल्कि क़ुबूल करने से आता था। ये समझने से कि कभी-कभी सबसे गहरी हक़ीक़तें तब सामने आती हैं, जब आप अकेले होते हैं, जब कोई नहीं होता जो आपको बताए कि आपको क्या सोचना है, क्या महसूस करना है, या आपको कैसा होना है?
बर्फ़ नर्म होकर बरसती थी, शहर को एक ख़ामोश सुकून में ढाँपते हुए। घंटियाँ फिर से बजी, दूर से मगर वाज़िह, जैसे याद-दिहानी हो कि वक़्त गुज़र रहा है, कि ज़िंदगी आगे बढ़ रही है, चाहे वह उसे न देख पाए। रायना के क़दम बर्फ़ पर आहिस्ता से घिसट रहे थे, और उन्हें इस शहर से, इस सर्दी से, इस ख़ामोशी से एक अजीब-सा तअल्लुक़ महसूस हो रहा था। इस शहर-ए-तन्हाई में, उसे आख़िरकार अपने आपको एक ऐसी रौशनी में जानने का मौक़ा मिला था जो कभी नहीं मिली थी। आया यह एक नए सफ़र का आग़ाज़ था या महज़ उसकी कहानी का एक और पड़ाव, यह सवाल बदस्तूर बग़ैर जवाब के रहा। मगर पहली बार, वह उसे जानने की ज़रूरत महसूस नहीं कर रही थी। वह बस चलती रही, यादों के साए उसके साथ चलते हुए, उसके क़दम कभी न रुकने वाले...
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इंडी—यह नाम निर्मल वर्मा ने उसके लिए चुना था। एक आदमी अपनी पुरानी कहानी से अपनी खोई हुई असलियत को फिर से पा रहा हो, और बीते समय के टुकड़ों से अपनी एक नई हक़ीक़त बना रहा हो। एक यात्रा करता हुआ, अजनबी शहर में खोया हुआ मुसाफ़िर, जो ऐसे जज़्बात अपने साथ लेकर चलता था जो कभी पूरी तरह अपना आकार नहीं पा सकते थे। वह चार्ल्स यूनिवर्सिटी में लिंग्विस्टिक्स की पढ़ाई कर रहा था, लेकिन अंदर से वह बस एक यात्री था, समय के उस अनंत सफ़र में अपनी जगह तलाशता हुआ।
उनकी पहली मुलाक़ात होटल के एक पुराने कमरे में हुई थी। रायना ने उसे देखा—एक स्टूडेंट, जो आर्थिक तंगी से परेशान था। उसका चेहरा एक अजीब बेचैनी से भरा हुआ था, जैसे वह हर अक्षर, हर शब्द को गहराई से महसूस कर रहा हो, एक पुर-असरार गुफ़्तुगू करते हुए, जिसे केवल वह ही समझ सकता था। वह उसका चेहरा नहीं पढ़ रहा था; वह उसे महसूस कर रहा था, उसके शब्दों में अपनी ज़िंदगी जीने की कोशिश कर रहा था, जैसे वह लड़की किसी ऐसी ज़बान में बात कर रही हो जिसे वही जानता हो।
दूसरी बार जब वे मिले, तो यह मुलाक़ात कैफ़े स्लाविया के एक सुकून भरे कोने में हुई थी, एक अनजानी मुलाक़ात। उन्होंने एक-दूसरे से अपना नाम तक नहीं पूछा, न ही कोई औपचारिक परिचय हुआ। उनका संवाद धीरे-धीरे बह रहा था, जैसे चाँदनी की रौशनी, जो बर्फ़ के एक परदे पर अपनी रौशन छाप छोड़ रही हो। वे कला, शहर के खोए हुए रंगों, और उस उदासी के बारे में बात कर रहे थे जो प्राग की गलियों पर एक साया बन कर छाई हुई थी। लेकिन अस्ल बात, जो उन्होंने बिन बोले शब्दों में कही थी, वह थी तन्हाई, और वे अनकहे शब्द जो दिल के गहरे कोनों में अपना घर बनाते हैं।
इंडी का सोचना एक हक़ीक़त पर आधारित था। वह एक प्रैक्टिकल आदमी था, अपने एक ख़ास मक़सद पर, जो सिर्फ़ एक मंज़िल तक पहुँचने का था। उसका सफ़र, उसके लिए, एक अकादमिक सफ़र था, और प्राग बस एक छोटा-सा पड़ाव था, जहाँ कुछ समय के लिए अपने ख़यालों को इकट्ठा कर आगे बढ़ना था। मगर रायना सिर्फ़ एक और स्त्री भर नहीं थी उसके लिए। वह कुछ और थी—वह भी एक सफ़र करने वाली थी, जैसे उसकी ज़िंदगी भी एक अनंत रास्ता हो, हर क़दम बे-हिसाब सवालों और जवाबों के साथ। उनकी मुलाक़ात सिर्फ़ एक संयोग का पल नहीं थी; वह एक ऐसा लम्हा था जो समय की अनकही ज़बान से परिचय करवा रहा था, दो रूहें जो एक शहर में अपनी टकराहट पर आशचर्य कर रही थीं, जिसे उस शहर ने अपनी ज़िंदगी की एक मिसाल समझ कर देख लिया था।
इंडी का मक़सद साफ़ था। उसकी नज़र में एक मंज़िल थी, एक गोल था—और प्राग बस एक ऐसी जगह थी जहाँ वह कुछ क्षणों के लिए अपने ख़यालों को एक साथ कर सकता था। लेकिन फिर भी, कुछ था इस शहर में, कुछ था रायना में, जो उसे बेचैन कर रहा था। प्राग की गलियाँ, जो इतिहास में डूब चुकी थीं, उन्हें ऐसे महसूस हो रही थीं, जैसे वह एक ख़्वाब हो जिसे वह पूरी तरह से समझ नहीं पा रहा था। उसका प्रैक्टिकल दिमाग़, उस जज़्बात की वज़ाहत नहीं कर पा रहा था जो वह रायना के साथ महसूस कर रहा था। वह ख़ामोशी के लम्हे, जब वे कला और खोए हुए रंगों की बात करते, उन लम्हों में कुछ ऐसा था जो उन्हें जोड़ रहा था—कुछ जो न तो शब्दों से समझाया जा सकता था, न समय या कारण से बाँधा जा सकता था।
रायना, दूसरी तरफ़, एक ऐसी जगह में रहती थी जहाँ कोई मक़सद नहीं था। वह किसी मंज़िल की तलाश में नहीं थी; वह किसी छुपी हुई राह को ढूँढ़ने की कोशिश नहीं कर रही थी। वह बस महसूस कर रही थी, ज़िंदगी को अपने आस-पास होते हुए देखकर। उसकी मौजूदगी में इंडी को अपनी ख़ुद की सोच पर सवाल उठाते हुए महसूस होता था। क्या यह शहर, यह छुपी हुई मुलाक़ात, उसके सफ़र का हिस्सा थी, या फिर उसने उसके अंदर कुछ बदल दिया था? क्या कोई रास्ता था जो अब तक उसने नहीं देखा था?
जितना वे बात करते गए, उतना रायना सिर्फ़ एक आम मुलाक़ाती नहीं रही, बल्कि वह कुछ थी जो इंडी ने अपने अंदर छुपा रखा था। शायद यह उसका ख़ामोशी से ज़िंदगी को जीने का तरीक़ा था, कुछ बदलने की कोशिश न करते हुए, बस जो कुछ था उसे अपनाना। वह अपनी ज़िंदगी को एक नाम, एक कहानी से डिफ़ाइन करने की कोशिश नहीं कर रही थी। वह बस थी—और उसकी मौजूदगी में, इंडी को कुछ बदलता हुआ महसूस होता था। यह पहले धीरे से, जैसे बारिश की पहली बूँद जो ख़ामोशी से गिरती है, फिर धीरे-धीरे यह एहसास और गहरा हो गया। शहर, जिसमें इतिहास के रंग धुँधले हो गए थे, अचानक एक ऐसी कहानी का मंज़र बन गया था—एक कहानी जो उन्होंने मिल कर लिखना शुरू की थी, अपने बिन बोले शब्दों के बीच।
इंडी का साफ़ सोचना, उसकी रैशनल अप्रोच, धीरे-धीरे धुँधला गई थी। उसका एक समय तक का ज़िंदगी का सफ़र अब वैसे ही नहीं लग रहा था। वह सिर्फ़ एक स्टूडेंट नहीं था जो डिग्रियों के पीछे दौड़ रहा हो, या एक मुसाफ़िर जो शहरों से गुज़र रहा हो। वह अब एक ऐसी कहानी का हिस्सा था, जो आगे चलकर ख़ुद को और अपनी मंज़िलों को समझने की कोशिश कर रही थी। रायना, अपनी ख़ामोशी में जो गहराई थी, उसने उसके अंदर कुछ बदल दिया था। शहर बस एक जगह नहीं, एक आइना बन गया था, जो उसके अंदर के सब सवालों, ख़्वाहिशों, और बिन कहे जज़्बात को दिखा रहा था जो उसने अपनी प्रैक्टिकल सोच के नीचे दबा रखे थे।
उस कैफ़े में, प्राग की शाम की मद्धम रौशनी के नीचे, उनकी बात अब शहर, कला या सर्दी के बारे में नहीं थी। अब वह कुछ और था, एक रिश्ता था जो शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता था, बस महसूस किया जा सकता था। और उस ख़ामोशी में, जब समय एक पल के लिए रुक सा गया था, इंडी ने महसूस किया कि शायद उसका सफ़र सिर्फ़ मंज़िल तक पहुँचने का नहीं था। शायद यह सफ़र उन लम्हों में जीने का था, जो मंज़िलों के बीच होते हैं, वह पल जहाँ शहर और उसके लोग एक अनुभव बन कर एक-दूसरे में खो जाते हैं। और रायना, जो उसकी ज़िंदगी में एक धीमी-सी हवा की तरह आई थी, वह थी जिसने उसे इस हक़ीक़त का एहसास दिलाया था।
इंडी का सफ़र अब सिर्फ़ समय के गुज़रने का नहीं था; यह एक सफ़र था जो अपने आप को समझने, रिश्तों को समझने का था। और इस अजनबी शहर के दिल में, रायना के साथ, इंडी ने अपने आप से सवाल किया कि वह कहाँ जा रहा है, बल्कि क्या बन रहा है। आगे का रास्ता अभी साफ़ नहीं था, लेकिन शायद, पहली बार, यह असमंजस एक बोझ नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत थी।
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जो रास्ते कभी अजनबी मुसाफ़िरों के क़दमों के लिए बनाए गए थे, वे वक़्त के साथ एक नई कहानी का हिस्सा बन गए थे। चार्ल्स ब्रिज के नीचे बहने वाला दरिया, जो अब बर्फ़ के नर्म आबशार में मुंजमिद था, इस कहानी का गवाह बन चुका था। एक समय था जब यह एक पल की बात थी, एक कम-उम्र मौसम, एक बे-मक़सद दुख की मानिंद। मगर प्राग एक शहर नहीं था, यह एक कहानी थी, और यह कहानी, जो सरगोशियों में छुपी थी, पहले ही बहुत गहराई तक, भूली हुई कानों में पहुँच चुकी थी।
मोहब्बत आई, एक ग़ैर मद्धम साज़ की तरह, ऐसी आवाज़ में जो बहुत नर्म, बहुत हिचकिचाहट वाली थी, और फिर भी इतनी मौजूद थी कि उसे नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। यह एक लफ़्ज़ नहीं थी; यह एक एहसास था, जो इतना तरल और इतना तेज़ था, जितनी एक छुरी जो मख़मल में लिपटी हो। यह फ़ासले से जन्म लेने वाली क़ुर्बत थी, एक ऐसी ज़िंदगी पर यक़ीन जो पहले ही गुज़र चुकी थी, एक लम्हे का तसलसुल जो छोड़ा जा सकता था, कभी मुकम्मल तौर पर नहीं देखा जा सकता, कभी मुकम्मल तौर पर नहीं समझा जा सकता।
और जब मोहब्बत आती है, वक़्त ख़ुद भी यूँ लगता है जैसे सुबह की पहली नर्म किरनें आसमान से नीचे आकर रात के किनारों को आहिस्ता-आहिस्ता मिटा देती हैं। ऐसा लगता है कि दुनिया लम्हे भर के लिए अपने ही रिधम को भूल जाती है, एक ऐसे जज़्बे में गिरफ़्तार होकर जो बयान से बाहर था, मगर इतना नाक़ाबिल-ए-इंकार था कि उससे बचा नहीं जा सकता।
आख़िरी रात, यानी वह रात जो दिल में एक दाग़ बन कर रह गई, एक ऐसा एहसास जो रूह से टपकता हुआ एक संगीन आँसू बन गया। वह अंतिम क्षण जब दोनों ने शहर के चाँद को अपनी बदन की रौशनी से मिला दिया। वह अंतिम क्षण जब मोहब्बत, अपनी ख़ालिस-तरीन सूरत में, एक ख़त बन गई, एक मुकम्मल लफ़्ज़ नहीं, बल्कि उनकी रूहों के बीच लटकता हुआ, जो ख़ुद को पूरी तरह बयान नहीं कर सका।
और जब प्राग शहर अपनी बर्फ़ की चादर में डूबा हुआ था, वैसे ही उनके दिल इस लम्हे में मुंजमिद हो गए थे, वह लम्हा जो वज़ाहत की सूरत में था। दुनिया, जो बर्फ़ से ढकी हुई थी, एक दूसरे की हक़ीक़त में जैसे गुम हो गई थी, जैसे वक़्त ने ख़ुद को रोक लिया था ताकि इस नाज़ुक ख़ूबसूरती की गवाही दे सके जो उनकी मुशतर्का ख़ामोशी में थी।
बर्फ़, जो नर्म और बेहद सुस्त-रफ़्तारी से गिरती थी, शहर में फैली थी और यादें जिनके लिए कोई जगह नहीं थी, जो ख़ाली गलियों में ही जाकर रुक गईं। वे उन गलियों में चल रहे थे, उनके क़दमों की आवाज़ शहर की नींद के शोर में मद्धम हो चुकी थी। हवा में एक क़िस्म की आरज़ू थी, एक ऐसी ख़्वाहिश जो न तो वे मुकम्मल तौर पर समझ पाए थे और न ही छोड़ पाए थे। इस ख़ामोशी में, मोहब्बत वह चीज़ नहीं थी जिसे वे हाथों में पकड़ सकें। यह एक ऐसी मौजूदगी थी जो उन्हें अपने आप खा रही थी, एक लम्हे की तरह जो अनंत था, गोया कि वह बर्फ़ जो बग़ैर किसी उम्मीद, बग़ैर किसी वजह के गिरती थी।
प्राग, अपनी सर्द साँसों और नर्म सरगोशियों के साथ, उनके इर्द-गिर्द घूम रहा था, ऐसा शहर जो अपनी तारीख़ को भूल चुका था लेकिन हर शख़्स की तारीख़ को याद रखता था जो यहाँ से गुज़रा था। और उन साअतों में, रात और सुबह के बीच, उनके जिस्म शहर बन गए, मुंजमिद, फिर भी ज़िंदगी से भरपूर; दूर, फिर भी गहराई से जुड़े हुए। हर क़दम जो उन्होंने उठाया, वह इस दुनिया से दूर जा रहा था जो उन्होंने जानी थी, फिर भी एक ऐसे रिश्ते के क़रीब जा रहा था जो वक़्त से बाहर था। यह रिश्ता न लफ़्ज़ों का था, न नामों का, बल्कि उस साझी समझ का था जो ज़बान, सक़ाफ़त, और तारीख़ से आगे बढ़ चुका था।
उनका आख़िरी लम्हा एक ऐसे ऐलान से नहीं पुर हुआ था। कोई वादा नहीं किया गया, न कोई मुस्तक़बिल की बात की गई। न लफ़्ज़ों की ज़रूरत थी क्योंकि इस ख़ामोशी में उनके दिल बेशुमार बातें कर रहे थे। उनके दरमियान की ख़ामोशी घनी, तक़रीबन बर्दाश्त से बाहर थी, फिर भी उसमें उन्होंने एक सुकून पाया, वह मुकम्मलपन जो मोहब्बत, उसकी ख़ामोश-तरीन शक्ल में, फ़राहम कर सकती है।
और जब वे जुदा हुए, उनके दरमियान सर्द रात की हवा, उन्हें अलविदा कहने की ज़रूरत नहीं थी। न कोई अलविदा, न कोई आख़िरी बात। क्योंकि मोहब्बत, जैसे बर्फ़, मुस्तक़िल होने की ज़रूरत नहीं रखती ताकि हक़ीक़त बन सके। यह बस उस लम्हे में मौजूद थी, इतनी ख़ालिस और इतनी आरिज़ी जितनी दरिया के ऊपर की यख़-बस्ता धुँध, इतनी ख़ामोश जितनी वह बर्फ़ जो प्राग की गलियों पर छा रही थी। और इस लम्हे में, वे दोनों जानते थे यह मोहब्बत, अगरचे मुकम्मल नहीं थी, हमेशा के लिए उनके दिलों के बीच के ख़ला में ज़िंदा रहने वाली थी, एक रात की याद में जो कभी हक़ीक़त में ख़त्म नहीं हुई थी।
बर्फ़ गिरती रही, सबकुछ धुँधला हो गया, गलियाँ, इमारतें, लोग जब तक कुछ भी बाक़ी न रहा। मगर दुनिया की नर्मी, एक ऐसी दुनिया जो उनसे मोहब्बत की ज़बान में सरगोशी करती थी, जो नुक़सान, वक़्त, और खो जाने का पैग़ाम देती थी। इस ख़ामोशी में उन्होंने वह सच पाया जो मोहब्बत का है, जैसे बर्फ़, जो पूछे बग़ैर, बग़ैर किसी वार्निंग के, और बग़ैर किसी वज़ाहत के गिरती है। वह बस गिरती है, और उसके गिरने में, सब कुछ बदल जाता है।
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सुबह चारों तरफ़ फैल गई, बर्फ़ अभी भी गिर रही थी, जैसे वक़्त ख़ुद उसके वज़्न के नीचे जकड़ गया हो। यह उस क़िस्म की बर्फ़ थी जो सिर्फ़ दुनिया पर नहीं गिरती थी बल्कि जैसे उसमें जज़्ब होकर गुम हो जाती हो, हर एक तेज़ लाइन, हर वह कोना जो एक मर्तबा जाना-पहचाना था, धुँधला जाता था, जैसे दुनिया ख़ुद अपनी ही यादों से बचना चाहती हो। हर बर्फ़ का टुकड़ा, इतनी नर्मी से गिरता हुआ, फिर भी एक ऐसे मक़सद के साथ, जो हज़ारों कहानियाँ, हज़ारों अनकही अलविदाओं का बोझ अपने अंदर समोए हुए था।
और फिर, वो चली गई।
इंडी ने जुंबिश नहीं की। उसने कुछ नहीं कहा। वह खिड़की के पास बे-हरकत खड़ा रहा, एक अकेला-सा इंसान, जो सुबह की ख़ामोशी में ढल चुका था, शहर ख़ुद उसके जिस्म का हिस्सा बन चुका था। एक जिस्म जो बहुत वक़्त पहले हरकत करना, महसूस करना, या उम्मीद रखना छोड़ चुका था। ऐसा लगता था कि वह न सड़कों को देख रहा था, न आसमान को, बल्कि वह एक ऐसे नुक़्ते की तरफ़ देख रहा था जहाँ माज़ी और मुस्तक़बिल मिले हों, जहाँ वक़्त ने ख़ुद को एक लम्हे में ज़म हो जाने का फ़ैसला कर लिया हो।
प्राग, अपने गहरे आसमानों और टूटे-फूटे रास्तों के साथ, अब कुछ और बन चुका था, जो इस दुनिया का नहीं था। यह अब एक जगह नहीं रही थी। यह एक एहसास बन चुका था। एक भूली-बिसरी चीज़ों का धुँधली-धुँधली-सी धुंध। शहर का दुख अब उसका दुख बन चुका था, वह सीने में एक बोझ की तरह दब गया हो, जिसे वो कभी उतार नहीं सकता था। वह रास्ते जो कभी बे-इंतिहा लगते थे, अब छोटे, तंग रास्ते महसूस होने लगे थे, जो उसे अपने ही क़दमों की गूँज में क़ैद कर रहे थे। और इस दुख में, एक तन्हाई ने जन्म लिया था। एक ऐसी तन्हाई जो शोर मचाने वाली नहीं थी, जो अपनी मौजूदगी के लिए पुकार नहीं करती थी, बल्कि वह आँखों के कोनों में बैठी, एक बोझ की तरह, इतनी गहरी और हल्की थी कि उससे बचना मुमकिन नहीं था।
प्राग की सड़कें, जो कभी वाक़िफ़ियत की थीं, अब एक अधूरी कहानी के सफ़्हात की तरह लगने लगीं, जिनके लफ़्ज़ बर्फ़ के एक पर्दे से धुँधले हो गए थे। जो कुछ कभी साफ़ और वाज़िह लगता था, वह अब धुँध में बदल चुका था। और उन सबके दरमियान, इंडी बाक़ी रहा, एक ऐसा इंसान जो अपने ही दिल के तूफ़ान की ज़द में था।
वह चली गई, और उसके जाने के साथ, इंडी ने एक स्त्री या एक प्यार को नहीं खोया था। उसने अपने आपका एक हिस्सा खो दिया था, वह वर्ज़न जो सिर्फ़ उनकी नज़रें मिलाने की जगहों में, दिलों की ख़ामोश बातों में मौजूद था। वह वर्ज़न अब मर चुका था, और उसकी जगह यादों के टुकड़े रह गए थे जैसे बर्फ़ के टुकड़े हवा में बिखर गए हों, हर एक ख़ूबसूरत, नाज़ुक, और आरिज़ी।
और फिर, इंडी चला गया। प्राग अब उसके लिए कुछ नहीं बचा था। यह एक शहर नहीं था। यह एक क़ब्रिस्तान बन चुका था। उसके अपने माज़ी का बोझ इतना भारी हो चुका था कि उसे उठाना मुमकिन नहीं था, और उन सड़कों में कुछ बाक़ी नहीं बचा था जो कभी उसकी ख़्वाहिशों की मंज़िल हुआ करती थीं। तो वह चल पड़ा, जैसे मुसाफ़िर चलते हैं, यह जानते हुए कि चाहे वह कहीं भी जाए, प्राग हमेशा उसके साथ रहेगा, जैसे कोई ख़्वाब जो तवील अर्से से भुला दिया गया हो, उसका साया। वह चला गया, न ग़ुस्से में, न नफ़रत में, बल्कि इसलिए कि कभी-कभी साँस लेने के लिए, किसी चीज़ को छोड़ना ज़रूरी होता है।
कर्कोनोशे के पहाड़ों ने उसका इस्तिक़बाल किया, अपने बर्फ़ीली ख़ामोशी के साथ, एक ऐसी जगह जहाँ वक़्त को घड़ियों से नहीं बल्कि बर्फ़ के आहिस्ता-आहिस्ता गिरने के अमल से नापा जाता था। यहाँ, ख़ामोशी में, उसने अपने आपके बाक़ी मांदा हिस्से को छोड़ दिया। वह आदमी जो कभी प्राग की सड़कों पर उम्मीद की आँखों के साथ चलता था, वह आदमी जो अपनी पूरी ज़ात से मोहब्बत करता था। वह आदमी अब मौजूद नहीं था। वह पीछे रह गया था, बर्फ़ के वज़्न में दफ़्न, जो भूली-बिसरी सालों की धूल की तरह गिरी थी।
कर्कोनोशे में, इंडी को सुकून नहीं मिला। उसे सिर्फ़ सर्दी मिली, वह बे-इंतिहा, काटती हुई सर्दी जो उसके अंदर की ख़ाली जगह से हम-आहंग थी। वह एक रहनुमा बन गया, एक ऐसा इंसान जो दूसरों को रास्ता दिखाता था, लेकिन ख़ुद को ही नहीं समझता था। वह सय्याहों को ऐसे मंज़रों में ले जाता था जो ख़ुद उसके लिए अजनबी थे, ऐसे लफ़्ज़ बोलता था जो अब मतलब नहीं रखते थे, गोया कि हर बातचीत एक अदाकारी बन गई हो, एक अदाकारी जिसमें वह समझने का नक़ाब पहनता था, जबकि उसके नीचे की सच्चाई कुछ भी नहीं थी सिवाए एक ख़ला के।
उसने नए शहरों में सफ़र किया, नई ज़बानें सीखीं, नए खाने खाए, मगर उनमें से कुछ भी उसे अंदर तक छू नहीं सका। दुनिया, अपनी सारी वुसअत में, एक ख़्वाब की तरह उसके अंदर से गुज़री। अब वहाँ न कोई तअल्लुक़ था, न कोई घर था। वहाँ सिर्फ़ वह बर्फ़ थी जो आसमान से ख़ामोशी से गिर रही थी, मानो कि दुनिया बोलना ही भूल गई हो।
मोहब्बत वह ज़बान थी जो कभी उसके दिल के क़रीब थी, वह ज़बान जो गहराई से उसके अंदर गूँजती थी। मगर अब वह ज़बान वह नहीं रही थी जो वह जानता था। लफ़्ज़ अपने मानी खो चुके थे, आवाज़ें अपनी गर्मी खो चुकी थीं। मोहब्बत, इंडी के लिए, अब कुछ दूर की बात बन चुकी थी, कुछ ऐसा जो सिर्फ़ साँसों के बीच, उन लम्हों में मौजूद था, जब वह अपने ख़यालों के साथ अकेला होता था, उन जगहों पर जहाँ वक़्त ख़ुद भी अब मानी नहीं रखता था। उसने ख़ामोशी की ज़बान सीख ली थी, और इस ख़ामोशी में, वह न सिर्फ़ क़ैदी बन चुका था बल्कि एक भूत भी बन चुका था।
और चाहे वह कितनी भी दूर जाए, चाहे वह कितने भी नए नाम रखे, कोई नया शहर प्राग को उसकी रूह से नहीं मिटा सकता था। कर्कोनोशे में जो बर्फ़ गिरी, वह बर्फ़ जो सारी दुनिया को ढाँप रही थी, प्राग की ख़ुशबू अपने साथ लेकर आई थी, वह ठंडी साँस जो एक शहर ने उसके दिल के गिर्द लपेट रखी थी। यह सिर्फ़ बर्फ़ नहीं थी जो उसका पीछा कर रही थी; यह प्राग की याद थी जो उसके साथ आती थी। बर्फ़ का सफ़ेद रंग उसके दुख का सफ़ेद रंग था, वह सफ़ेद रंग जो उसने खो दिया था, और फिर भी वह अपने तरीक़े से ख़ूबसूरत थी, वह ख़ूबसूरती जो दर्द में होती है, जो कुछ ऐसा होता है जिसे हम अपना कुछ देते हैं, क्योंकि यही वह अंतिम चीज़ है जो बची हुई रह जाती है।
जब वह ख़ामोश पहाड़ों में चल रहा था, बर्फ़ उसके इर्द-गिर्द घनी थी, इंडी को इस बात का एहसास हो रहा था कि दुनिया उस पर बंद हो रही है। बर्फ़, अपनी नर्म ताल में गिरती हुई, वक़्त के गुज़रने की याद-दिहानी थी और वादा था कि वक़्त हमेशा गुज़रेगा। यह हर उस चीज़ की याद-दिहानी थी कि जो उसने मोहब्बत की थी, जो उसने खो दी थी, और जो कभी नहीं हुई थी।
आख़िरकार, इंडी को अब जवाब तलाशने की ज़रूरत नहीं थी। उसे सुकून पाने की ज़रूरत नहीं थी। क्योंकि बर्फ़ में, उसने कुछ और पाया, उसने दुनिया को ख़ामोशी से समझना पाया, मोहब्बत को, दुख को भी। उसने ये सीखा कि कभी-कभार, वह सफ़र नहीं होता जो अहमियत रखता है, बल्कि वह जगह होती है जो क़दमों के बीच में होती है, वह लम्हे जो ख़ामोशी के होते हैं, वह लम्हे जहाँ सब कुछ ग़ायब हो जाता है, और सिर्फ़ बर्फ़ बाक़ी रह जाती है।
और बर्फ़ गिरती रही। हमेशा। हमेशा के लिए।
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