शनिवारेर चिट्ठी : वहाँ नहीं है अब कोई घर सुफ़ेद
शायक आलोक
09 मई 2026
स्मृति के घर अँधेरा
स्मृति के घर अँधेरा बहुत है। सिर्फ़ आँखें काम नहीं करतीं। नाक भी लगता है काज पर। शून्य को सुनना पड़ता है कानों को। हाथों को हवा को टटोलना पड़ता है। विस्मृति ने कोई शोर भी तो नहीं किया। बस्स धीरे-धीरे मेरी भीतरी वस्तुओं को अदृश्य बनाती गई। मैंने पाया मैं स्वयं अपनी ही स्मृति से निर्वासित होने लगा हूँ। मैंने मछली देखी बाज़ार में। मरी हुई मछलियों ने मन की मर रही स्मृतियों को पुकारा—आओ! अपनी स्निग्ध हँसी लिए आई ममिता नायर। वह कहती यह है अय्यप्प की कितनी सुंदर कविता, मैं पीछे पूछता कि करोगी मुझसे कल्याणम् या यूँ ही बस कर सकोगी कल्याण! वह कहती मछलीवालियाँ मछलियों-सी गमकती हैं, मैं जिज्ञासा करता कि क्या तुम्हारी मलयाली मछलियाँ किछु-ज़रा बांग्ला सुन-समझ लेती हैं। हमारे संवाद का द्वैत। मेरी भाषा में उदासी सुंदर सुनाई देती है—मेरी भाषा में सुंदरता एक उदास शब्द है। मैंने कल सपने में घर देखा... कल घर ने सपने में मुझे देखा होगा! तुम उदास होकर और विनम्र हो जाते हो और मैं प्रेम में बच्चों की तरह चीज़ें छूने लगता हूँ। तुम हर बात को स्मृति बना देते हो और मैं हर चीज़ को रोक लेना चाहता हूँ।
हम दो रातों की दूरी पर रहते थे और दो दिवसों के लिए मिलना चाहते थे। मिले नहीं। मिल नहीं सके। ऐसे ही तो गुज़र गए वे बरस और फिर ये बरस। पीला था उसका सबसे प्रिय रंग और पीली ही पहनी थी उसने साड़ी। उसका ब्याह हो रहा था। वह चली गई, पर ऐसे नहीं गई... जैसा जाने के लिए फिर लौटी। उसने लौटकर कहा कि वह जा रही है। वह रोग से मर रही थी, मंज। मैंने उसके मरने से पूर्व उसका मृत-मुख देखा। उसकी हँसी में भी मृत्यु का आगत था। वह दो दृश्यों के बीच से रोशनी की तरह ग़ायब हो रही थी। मैं मानना चाहता था कि यह उसका एक प्रपंच होगा और वह लौट आएगी एक किसी बेला में। मैंने उसका शव-मुख तो देखा था नहीं, फिल भला क्यों नहीं करता उसके फिर लौट आने की कल्पना! मैंने सुना भर था और सुना सब सच तो नहीं होता। हो सकता है कि वाचक उसकी प्रपंच-कथा का एक पात्र हो। गेंदा-फूल के दो गाछ हों, एक खिड़की, खिड़की से बाहर झाँकते एक आदमी की पीठ और खिड़की से बाहर दूर दृश्य का उस पात्र का मात्र एक संवाद कि वह अब नहीं रही दुर्भाग्यवती!
मैं उसे जानता नहीं था
हम अपने भीतर किस एकाकी को जीते हैं कि कोई मामूली बात भीतर यों गहरे उतर आती है कि समय बाद भी उसकी हलचल शांत नहीं होती। आत्मा का कोई आशाहीन कमरा है और किसी दुर्दांत अपरिचित ने गुज़रते उसके दरवाज़े को क्षण भर के लिए बस छू दिया है। फिर वह चला जाए पर भीतर का दरवाज़ा हमेशा के लिए खुला रह जाए। यही हुआ था उस दिन। मैं उसे जानता नहीं था। उसने मेरी आँखों को देखा भर था। एक क्षण में मेरी आँखों ने उसकी आँखों में कुछ ऐसा पा लिया था जिसे शब्दों में नहीं रखा जा सकता। परिचय से आदिम कोई स्थिति जो स्मृति में नहीं, अनुभूति में बची रहती है। फिर उसकी ऑटो जाती रही और किंकर्तव्यविमूढ़ मेरी साइकिल खड़ी रही। होश के द्वार खुले तो भागी उसी दिशा में। निर्णय लिया था मेरी आँखों ने। सड़क पर भीड़ थी, आवाज़ें और धूल। दुपहर अपनी साधारण क्रूरता में विस्तीर्ण, लेकिन मेरे भीतर केवल वे आँखें थीं। मेरी साइकिल हर रुकते हुए ऑटो को बग़ल से खँगालती। अंदर की ओर गुम होती हर गली में आँखों को उन आँखों की नई शनाख़्त के लिए भेजता रहा उसका सवार। मैं लौट रहा था तो शहर मेरी पीठ पर अपने दरवाज़े बंद कर रहा था। किसी नहीं रही वस्तु को खो देने का वह दुःख उस श्रेणी का मेरा पहला दुःख था।
छब्बीस गुज़र गए साल! अब तो उन आँखों की ठीक पहचान भी नहीं बची मेरी स्मृति में। स्मृति कितनी दयालु होती है। वह हमें भूलने नहीं देती। स्मृति कितनी निर्दय होती है। वह हमें साफ़-शफ़्फ़ाफ़ याद नहीं रखने देती।
असहाय भय
किसी के कभी भी चले जाने के असहाय भय के बीच वक़्त में पीछे लौटना और नीली क़मीज़ पहन लेना। असहाय भय! वह किसी दुर्घटना की तरह नहीं आता। वह उतरता है धीरे-धीरे—धीरे-धीरे दिन के अवसान पर काम से घर लौटते बेगार आदमी की तरह। पहले एक आशंका आती है, फिर एक नाम। उस नाम के पीछे चली आती है उससे संबद्ध एक वस्तु। इस बार वह वस्तु एक नीली क़मीज़ थी।
वह क़मीज़ मुझे उसने दी थी। वह एक साधारण दुपहर थी। अब तक हमें अवकाश नहीं मिला था कि हम कभी साथ बैठते और हमारे साथ का कोई रंग चुनते। हमारे साथ के रंग में मुलाक़ात के पहले दिन के धूसर रंग थे, बाद के दिनों की देह की उज्जर-ललाई। अलग-अलग दिनों के स्त्री-पुरुष कपड़ों के श्याम, बैंगनी, लाल और फ़िरोज़ी। सायास उसने नीली क़मीज़ चुनी। उसने रंग पर कविता का एक वाक्य भी कहा। हम रंग में नहीं, क्षण में इतने साथ थे कि उस वाक्य को किसी स्मृति की तरह सँभालकर न रख सके। हम सोचते थे हमारे पास समय बहुत है। जीवन जब अपने पुराने स्वभाव पर लौटा तो हमारे बीच घर था, शहर था। वहाँ टूट थी और टूटन थी। हम अलग हो गए। हम इतने शांत ढंग से अलग हुए कि बाद में याद करना कठिन था कि आख़िरी बार हमने एक-दूसरे को किस विधि देखा—प्रेम से या थकान से।
फिर कभी उससे बात हुई तो वह बीमार थी... इतनी बीमार कि उस पार चले जाने की बातें करती हुई थी। यह बात ठहर गई मेरे भीतर कि वह चली जाएगी। कहीं किसी की रोग-मृत्यु की ख़बर आती और मैं उसे सोचने लगता। उस असहाय भय में वह नीली क़मीज़ निकालता और पहन लेता। वह क़मीज़ चीज़ों के बने और बचे रहने का आश्रय बन जाती। मैं यों उसकी मृत्यु को टाल देना चाहता था। उसे समय में पीछे खींचता हुआ। क़मीज़ के साथ अतीत की वह दुपहर लौट आती। उस दुपहर वह बीमार नहीं थी। उस दुपहर में मृत्यु अपनी आसन्नता से मुक्त थी और दुनिया अब भी एक साधारण और सुंदर जगह बनी रहती थी।
जूते
रात की बसों में एक अलग तरह का अकेलापन होता है। खिड़कियों के बाहर भागता हुआ अँधेरा और उनींदे शरीरों की सामूहिक चुप्पी। उन बसों में ड्राइवर की केबिन के ऊपर एक अपर बर्थ हुआ करता था। वहाँ लेटते हुए मुझे लगता कि मैं यात्रा से नहीं, नींद से घर-शहर से दूर-शहर जा पहुँचा। मैं वहीं सो रहा था, जब नीरवता के किसी महीन धागे की टूट से मेरी आँखें खुलीं। मैंने नीचे झुक कर देखा तो वहाँ वह मेरा हमउम्र। वह ड्राइवर की सीट के पास की तंग जगह में बैठा था और मेरे जूते अपने पैरों में डालने की कोशिश कर रहा था। उसके बाल गंदे थे, क़मीज़ निहायत पुरानी। वेश से ग़रीब। उसकी हरकत में संकोच था, जैसे वह सदियों से उसके लिए निषिद्ध किसी दरवाज़े पर पाँव रख रहा हो। मैंने उस घटित को विस्मय से देखा और उसके प्रति करुणा रखी। मुझे लगा वह मेरे जूते अपने पैरों में डाल यह देखना चाहता है कि अच्छे जूते उसके पैरों में कैसे लगते हैं। मैं उसकी कोशिश में कोई दख़्ल नहीं रखना चाहता था। सुबह हुई तो वह वहाँ नहीं था। मेरे जूते भी वहाँ नहीं थे। वहाँ उसके जूते थे। मुझे धक्का लगा कि उसने मेरे जूते ले लिए। मैंने तो सोचा था कि वह बस उन जूतों को पहनकर देखना चाहता है। चश्मे, हेयर-बैंड, घड़ी, बैगी पाजामे—जैसे मैं तुम्हारी कितनी ही चीज़ों को बस पहनकर देखता हूँ, उन्हें ले नहीं लेता। घर लौटा तो माँ से पूरी कथा कही। माँ ने कहा चोर के ये जूते घूरे में फेंक आओ। मुझे अपने जूतों से अधिक उस लड़के के पैरों का ख़याल आया। ये ख़राब जूते थे। उसके पैर दुखते होंगे। उस रात किसी लंबी सड़क पर मेरे जूते पहनकर उसे पहली बार लगा होगा कि दुनिया में बढ़िया जूते भी हैं और उसने बाक़ी बढ़िया चीज़ों के लिए कुछ उपायों पर विचार किया होगा।
गुम हुई चीज़ें
दिल्ली मैं एक निर्वासित की तरह आया। मेरे पास एक बस्ता था, कुछ कपड़े और कुछ पते। मेरे पास एक भरोसा था कि दिल्ली भी उतना ही नम शहर होगी जितना परिचय के दूसरे पुराने शहर रहे थे। एक परिचित के घर ठिकाना हुआ (उतने समय के लिए) जब तक मैं अपना एक ठिकाना न ढूँढ़ लूँ। कमरे में एक बिस्तर था, एक मेज़ और खिड़की से दिखती हुई कुछ अधूरी इमारतें... मैंने सीखना शुरू किया कि बड़े शहरों में आदमी पहले अपने लिए जगह नहीं, अपनी उपस्थिति की अनुमति खोजता है।
एक सुबह बस्ते से पैसे ग़ायब हो गए। ज़्यादा नहीं थे, लेकिन इतने थे कि इस शहर में जीने-मरने का साहस बना रहता। बस्ते को कई बार उलट-पलटकर देखा। कपड़ों की तहें खोलीं। हर जेब टटोली। कहीं तो होंगे। कहीं दब गए होंगे। तीसरे दिन तक समझ गया था कि वे नहीं लौटने के लिए कहीं चले गए हैं। कितनी ही चीज़ें कभी नहीं लौटने के लिए कितनी ही जगहों पर चली जाती हैं। मन मान ही नहीं रहा था कि जिस कमरे में मुझे आश्रय मिला, वहीं वे पैसे चोरी हो जाएँगे। मुझे अपने अभाग्य पर तो यक़ीन था, लेकिन कई दिनों तक उस चोरी की संभावना को स्वीकार नहीं कर पाया। जब भी समय पाता, बस्ते के हर ख़ाने को टटोलने लगता। एक हल्की उम्मीद उठती कि शायद इस बार मिल जाएँगे। पैसे नहीं, मनुष्यता पर भरोसा खो गया था—नए शहर के इस नव-निर्वासित व्यक्ति का और मैं उसे ही तलाश रहा था। इतने बरस हो गए, लेकिन आज भी जब कभी समय पाता हूँ, अपने कमरे की सब जेबें टटोलने लगता हूँ कि गुम हुई वे चीज़ें मिल जाएँगी जो अब स्मृति से भी गुम गई हैं।
एक उदास चलचित्र देखते हुए
वहाँ नहीं है अब कोई घर सुफ़ेद
बस धूसर माठ पर झरती हुई साँझ की नमी
पुराने पुकुर के जल में
काँपता है रात भर एक थका हुआ चाँद
शालिक लौट आती है अँधेरे ग्राम की ओर
हवा में अब भी किसी खोई बोउ की गंध
जहाँ तुम्हें देखा था कभी धान-खेत के किनारे
आज वहाँ केवल कुआशा है और एक चुप नदी
दूर किसी बोटगाछ के नीचे
झिर्र-झिर्र झर रहा समय।
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शनिवारेर चिट्ठी में यह भी पढ़ सकते हैं : छाया और छायेच्छाएँ | अनुशोचना और बाक़ी गल्प | कल से रवैया फ़र्क़ होगा | दिनानुदिन की चूलें बिठाते हुए
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