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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 90

अनुभव करो; किंतु अभिभूत मत हो पड़ो, अन्यथा चल नहीं पाओगे। यदि अभिभूत होना है, तो ईश्वरप्रेम में हो जाओ।

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मेरे काम-क्रोधादि नहीं गए, चिल्लाने से वे कभी नहीं जाते। नहीं गए कहकर ऐसा कर्म, ऐसी चिंता का अभ्यास कर लेना चाहिए, जिसमें काम-क्रोधादि की गंध भी नहीं रहे—मन जिससे उन सबको भूल जाए।

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अपना दोष जानकर भी यदि तुम उसे त्याग नहीं सकते, तो किसी भी तरह उसका समर्थन कर दूसरे का सर्वनाश करो।

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आगे बढ़ो, किंतु माप कर देखने जाओ कि कितनी दूर बढ़े हो। ऐसा करने से पुनः पीछे रह जाओगे।

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जभी अपने कुकर्म के लिए तुम अनुतप्त होगे, तभी परमपिता तुम्हें क्षमा करेंगे और क्षमा मिलने पर ही समझोगे, तुम्हारे हृदय में पवित्र सांत्वना रही है और तभी तुम विनीत, शांत और आनंदित होगे।

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