मैं सब धर्मो को सच मानता हूँ। मगर ऐसा एक भी धर्म नहीं है जो संपूर्णता का दावा कर सके। क्योंकि धर्म तो हमें मनुष्य जैसी अपूर्ण सत्ता द्वारा मिलता है, अकेला ईश्वर ही संपूर्ण है। अतएव हिंदू होने के कारण अपने लिए हिंदू धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए भी मैं यह नहीं कह सकता कि हिंदू धर्म सबके लिए सर्वश्रेष्ठ है; और इस बात को तो स्वप्न में भी आशा नहीं रखता कि सारी दुनिया हिंदू धर्म को अपनाए। आपकी भी यदि अपने ग़ैर-ईसाई भाइयों की सेवा करनी है तो आप उनकी सेवा करनी है तो आप उनकी सेवा उन्हें ईसाई बनाकर नहीं, बल्कि उनके धर्म की त्रुटियों को दूर करने में और उसे शुद्ध बनाने में उनकी सहायता करके भी कर सकते हैं।
अगर किसी महिला को दु:ख में सहारा न मिले, तो वह सचमुच सुखी नहीं रह सकती।
जब भी किसी कछुए को मचान पर बैठे देखो, समझ जाओ किसी ने उसकी मदद की है।
मनुष्य यदि मनुष्य को सहयोग देना स्वीकार न करता, तो न मानवता की ऐसी अद्भुत कहानी लिखी जाती और न मनुष्य अपनी आदिम अवस्था से आगे बढ़ सकता।
रत्न क्या है? निर्मल बुद्धि। शास्त्र क्या है? जिसके श्रवण से द्वैत-ज्ञान रूप अंधकार का उदय नष्ट होता है। सतत उपकार में तत्पर होने वाला मित्र कौन है? कष्ट देने में दक्ष शत्रु कौन है—दुष्ट वासनाओं का समूह।
धर्म का प्रयोजन है इस प्रज्ञा-जगत से, इस विभक्त चेतना वाले जगत से, जिसमें विभेद है, द्वित्व है, सामरस्य-मय, स्वातंत्र्यमय एवं प्रेममय जीवन में विकसित होने में हमारी सहायता करना।
मन की सहायता से ही मन को मारा जा सकता है।
तुम मदद की उम्मीद अपने से अधिक शक्तिशाली से नहीं करोगे, तो किससे करोगे।
सहायता माँगने की कला सीखने पर आपके संबंध धीरे-धीरे मधुर हो जाएँगे। जब आप ज़्यादा प्रेम और सहायता पाने में सक्षम होती हैं, जिसकी आपको ज़रूरत है, तो आपका पार्टनर भी स्वाभाविक रूप से काफ़ी ख़ुश होगा।
दूती बनकर नायिका के पास जाने वाली धाय की लड़की, नायिका को समझाए कि और वरों की अपेक्षा, यह वर सब वरों में श्रेष्ठ और विवाह करने के योग्य है। इसके साथ विवाह करके तुम अखंड सुख प्राप्त करोगी।
पतित को उद्धार की बात सुनाओ, आशा दो, छल-बल कौशल से उसके उन्नयन में सहायता करो, साहस दो—किंतु उच्छृंखल होने मत दो।
निर्दोष व्यक्तियों का संबंध न छोड़ो! दुख के समय जिसने सहायता की हो उसकी मित्रता को न त्यागो।
यदि नायिका को सोनार, जौहरी, मणिकार, नीलगर, रंगरेज, बढ़ई आदि से कुछ काम कराना हो, तो नायक अपने मित्रों से उस काम को कराए अथवा स्वयं उस काम को कराने का प्रयत्न करे।
कर्मक्षेत्र में परस्पर सहायता की सच्ची उत्तेजना देने वाली किसी न किसी रूप में करुणा ही दिखाई देगी।
कला प्रकृति की सहायता करती है और अनुभव कला की।
वह सबको शरण देने वाला है, दाता और सहायक है। अपराधों को क्षमा करने वाला है, जीविका देने वाला है और चित्त को प्रसन्न करने वाला है।
सच पूछो तो हम सब द्रौपदी की ही स्थिति में हैं। हमारी लाज कोई मनुष्य नहीं ढँक सकता, उसे तो ईश्वर ही ढँक सकता है। ऐसा ज़रूर होता है कि वह अपनी सहायता मनुष्य के द्वारा भेजता है, किंतु मनुष्य तो निमित्त मात्र है।
मूर्तियाँ ईश्वर की उपासना में सहायक होती हैं। कोई भी हिन्दू किसी मूर्ति को ईश्वर नहीं समझता। मैं मूर्ति-पूजा को पाप नहीं मानता।
यदि आप दूसरों की सहायता करना चाहते हैं, तो आपको अपने अहंकार को त्यागना होगा।
अगर आप दुनिया बदलना चाहते हैं, तो अपनी मदद करने के लिए किसी को तलाशिए।
तुम स्वयं सहन करो, किंतु जो नहीं कर सकता है उसकी सहायता करो, घृणा मत करो। सहानुभूति दिखलाओ, साहस दो।
इंसान घमंडी बनकर ईश्वर की सहायता नहीं माँग सकता, अपनी दीनता स्वीकार करके ही मांग सकता है।
तत्त्वतः देशभक्ति का अर्थ है देश से प्रेम। और एडमंड बर्क के शब्दों का प्रयोग करते हुए हम कहें तो "यदि तुम्हें अपने देश से प्रेम करना है तो देश को सुंदर होना ही चाहिए।" यदि हमारा देश उन मानदंडों पर खरा नहीं उतरता जिनसे उसकी जनता उससे प्रेम करे तो हमें उसकी सहायता करनी चाहिए जिससे वह उन मानदंडों पर खरा उतर सके।
यदि आप विद्वान हैं, बलवान हैं और धनवान हैं तो आपका धर्म यह है कि अपनी विद्या, धन और बल को भी देश की सेवा में लगाओ। उनकी सहायता करो जो तुम्हारी सहायता के भूखे हैं। उनको योग्य बनाओ जो अन्यथा अयोग्य ही बने रहेंगे। जो ऐसा नहीं करते, वे अपनी योग्यता का उचित प्रयोग नहीं करते।
सुनने वाले लाखों हैं, सुनाने वाले हज़ारों हैं, समझने वाले सैंकड़ों हैं, परंतु करने वाले कोई विरले ही हैं। सच्चे पुरुष वे ही हैं और सच्चा लाभ भी उन्हीं को प्राप्त होता है, जो करते हैं।
यथाशक्ति सेवा करो, किंतु सावधान—सेवा लेने की जिससे इच्छा न जगे।
आदमी जितना असमर्थ है, भगवान उतना ही समर्थ है। उसकी कृपा अपरंपार है और वह हज़ार हाथों से मदद करता है।
अपने उपाय से ही उपकारी का उपकार करना चाहिए। उपकार बड़ा है या छोटा—इस प्रकार का विद्वानों का विशेष आग्रह नहीं होता।
आर्किमिडीज़ की तरह उसने वह लीवर खोज लिया था जिसी मदद से दुनिया को उठाया जा सकता था।
जीवन के विकास के लिए दूसरों से सहायता लेना बुरा नहीं, परंतु किसी को सहायता दे सकने की क्षमता न रखना अभिशाप है।
एक चोरी करता है, एक चोरी में मदद करता है, एक चोरी का इरादा करता है, तीनों चोर हैं।
दृढ़तापूर्वक माँगने का एक मुख्य तत्व यह है कि जब आप समर्थन माँग लें, तो उसके बाद ख़ामोश हो जाएँ।
सदाचरण, सहयोग, एवं सनिश्चय—इन तीनों गुणों में सिद्ध होना दूत के लिए आवश्यक है।