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तिरुवल्लुवर

समादृत और अत्यंत लोकप्रिय प्राचीन तमिल संत कवि और दार्शनिक। संगम साहित्य में योगदान।

समादृत और अत्यंत लोकप्रिय प्राचीन तमिल संत कवि और दार्शनिक। संगम साहित्य में योगदान।

तिरुवल्लुवर की संपूर्ण रचनाएँ

कविता 36

उद्धरण 93

शत्रु में दोष देखकर बुद्धिमान झट वहीं क्रोध को व्यक्त नहीं करते हैं, अपितु समय को देखकर उस ज्वाला को मन में ही समाए रखते हैं।

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गृहिणी का सद्गुण ही गृहस्थ की मांगलिक शोभा है और सुपुत्र उसका आभूषण।

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आतिथ्य का निर्वाह करने की मूढ़ता ही धनी की दरिद्रता है। यह बुद्धिहीनों में ही होती है।

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गृहिणी सद्गुण संपन्न है तो गृहस्थ को किस वस्तु का अभाव? और यदि वैसी नहीं है तो उसके पास है ही क्या?

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अनेक विद्याओं का अध्ययन करके भी जो समाज के साथ मिलकर आचरणयुक्त जीवन व्यतीत करना नहीं जानते, वे अज्ञानी ही समझे जाएँगे।

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कवितांश 68

पुस्तकें 1

 

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